NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
बिहार: बंपर फसल के बावजूद गेहूं की कम ख़रीद से किसान मायूस
इस वर्ष सरकार ने अब तक अपने कुल गेहूं की खरीद के लक्ष्य से 40% से भी कम की खरीद की है।
मो. इमरान खान
09 Jun 2021
Wheat Produce
प्रतीकात्मक फ़ोटो। चित्र साभार: डेक्कन हेराल्ड

पटना: बिहार के वैशाली जिले में महुआ ब्लॉक के अंतर्गत पड़ने वाले एक गाँव के एक सीमांत किसान, सोमेश राय सरकार के इस बहु-प्रचारित दावे से नाखुश हैं कि गेहूं की खरीद से किसानों को फायदा होगा। राय को इस माह की शुरुआत में अपनी गेहूं की फसल को स्थानीय व्यापारियों के हाथ औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। वो इसलिए क्योंकि उनकी ओर से किये गए बार-बार के प्रयासों के बावजूद स्थानीय प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पीएसीएस) उनसे खरीद कर पाने में विफल रहीं।

राय का इस बारे में कहना था कि साल दर साल कुछ भी नहीं बदला है क्योंकि किसानों की उपज को शायद ही कभी सही कीमत मिल पाती है। “पीएसीएस जैसी सरकारी एजेंसी द्वारा गेहूं की खरीद की आधिकारिक समय सीमा के लिए मुश्किल से सात दिन बचे हैं, लेकिन खरीद की प्रक्रिया बेहद धीमी है और किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने की उम्मीद खो दी है।

लीज पर ली गई जमीन पर गेहूं उगाने वाले एक अन्य छोटे जोतदार किसान जीतन ठाकुर ने बताया कि पिछले कई वर्षों से खरीद की समस्या बनी हुई है। सरकारी समितियां किसानों के सभी वर्गों जैसे धनी, सीमान्त एवं छोटे-पैमाने पर खेती करने वाले किसानों से खरीद कर पाने में विफल रही हैं। पटना जिले में पालीगंज ब्लॉक के तहत पड़ने वाले एक गाँव के निवासी ठाकुर का कहना था “कागज पर तो सरकार की घोषणा सुनने में काफी अच्छी लगती हैं। लेकिन इसके ठीक उलट, किसानों को बेहद कम दरों पर अपने गेहूं को व्यापारियों के हाथ बेचने के लिए मजबूर किया जाता है।” 

राय और ठाकुर दोनों के अनुभव बिहार में गेहूं की बेहद खराब खरीद के संबंध में जमीनी हकीकत को पेश करते हैं। राज्य सहकारिता विभाग के आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में 8 जून तक सरकार ने 2,60,248.720 मीट्रिक टन गेहूं की खरीद कर ली थी, जो कि इसके 7 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य से 40% से भी कम है। अभी तक, मात्र 52,629 किसानों से ही गेहूं की खरीद की जा सकी है। जबकि राज्य में 41 लाख से अधिक की संख्या में किसान मौजूद हैं।

नीतीश कुमार सरकार ने 31 मई तक 7 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य रखा हुआ था। वर्तमान में जारी लॉकडाउन के मद्देनजर, सरकार ने गेहूं की खरीद की समय-सीमा को 15 जून तक के लिए बढ़ा दिया है।

गेहूं की खरीद के मुद्दे को व्यापक तौर पर बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के 15 साल पहले के फैसले के नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है। 2006 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद, उन्होंने बिहार की कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम को रद्द कर दिया था। यह घोषित किया गया था कि इससे कृषि के आधारभूत ढाँचे में निजी निवेश के बढने का रास्ता खुलेगा, और किसानों को फसल के बेहतर दाम मिलेंगे और बिचौलियों का खात्मा हो जाएगा।

लेकिन हकीकत में देखें तो इन वर्षों में, किसानों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से काफी कम कीमत पर अपनी उपज को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है और सरकारी एजेंसी द्वारा खरीद भी बेहद कम रही है।

पीएसी एवं व्यापार मंडल जैसी सरकारी समितियों द्वारा इस साल के अप्रैल से कम से कम कागजों पर 38 जिलों की सभी पंचायतों से गेहूं की खरीद की जा रही है। 

एक कृषि कार्यकर्त्ता, इश्तियाक अहमद ने न्यूज़क्लिक को बताया “गेहूं की सरकारी खरीद से बेहद कम संख्या में किसानों को लाभ पहुंचा है। लेकिन यह भी पिछले महीने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा गेहूं की खरीद की समीक्षा करने और अधिकारियों को ज्यादा से ज्यादा किसानों को एमएसपी का लाभ हासिल होने को सुनिश्चित करने के निर्देश देने के बाद हो संभव हो सका है।”

वे गेहूं की समय पर खरीद को सुनिश्चित करने के मामले में सरकारी उदासीनता को जिम्मेदार पाते हैं, और धीमी खरीद के लिए उन्होंने सरकारी अधिकारियों, बिचौलियों और व्यापारियों के बीच की सांठगांठ को जिम्मेदार ठहराया।

कृषि विभाग के सचिव एन सरवन कुमार ने कहा कि इस साल गेहूं का उत्पादन करीब 65 लाख मीट्रिक टन होने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है।

इसके अलावा, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के कृषि मामलों के विशेषज्ञों ने कहा कि इस साल गेहूं की बम्पर फसल हुई है। किसान इस बार बेहद उत्साहित थे क्योंकि उन्हें इसे एमएसपी दरों पर बेचकर अच्छी कमाई की उम्मीद थी। लेकिन राज्य भर के गाँवों से जो रिपोर्ट मिल रही है उससे पता चलता है कि गेहूं की खरीद की प्रक्रिया में देरी हुई और इसकी गति काफी धीमी थी। 

कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, राज्य सरकार ने इस रबी सीजन में गेहूं के लिए एमएसपी 1,975 रूपये प्रति क्विंटल की दर पर घोषित कर रखा था। लेकिन किसान इसे 1600 से 1700 रूपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचने के लिए मजबूर हैं।

पीएसीज की गेहूं की खरीद में विफलता से नाराज़, मुजफ्फरपुर में कुरहनी ब्लॉक के एक अन्य सीमांत किसान, सुरेश शर्मा ने कहा कि उन्होंने करीब 70 क्विंटल गेहूं का उत्पादन किया है। शर्मा का कहना था “मैंने बीज, उर्वरक, ट्रैक्टर, थ्रेशर और मजदूरों पर 40,000 रुपये से अधिक का निवेश किया है, और कई महीनों से दिन-रात काम किया है। अगर मुझे एमएसपी नहीं मिलता है, जैसा कि अब नजर आ रहा है तो किसानों की आय को दोगुना कर देने का सरकार का दावा हमारे लिए महज एक मजाक बनकर रह गया है।”

शर्मा का कहना था कि सरकार की गेहूं खरीद नीति से किसानों को लाभ नहीं पहुँच रहा है। “हर रबी के सीजन में अच्छे उत्पादन के बावजूद हमें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। अगर किसानों को अपनी उपज को बेचने के लिए मारे-मारे फिरना पड़ता है और उससे होने वाली आय निराशाजनक बनी रहती है तो ऐसे पीएसीज का क्या फायदा है।”

पिछले वर्ष, बिहार ने किसानों द्वारा उत्पादित 1% से भी कम गेहूं की खरीद की थी। इसका अर्थ यह हुआ कि किसानों के एक छोटे से हिस्से को उनकी उपज के लिए एमएसपी मिल जाता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2020-21 के रबी विपणन सत्र में मात्र 5,000 टन गेहूं की खरीद की गई थी, जबकि संशोधित लक्ष्य 7 लाख मीट्रिक टन का था। 2019-20 में राज्य एजेंसियों ने 2815 टन गेहूं की खरीद की थी।

सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से खुलासा होता है कि बिहार में देश के कुल गेहूं के उत्पादन का 5.7% हिस्सा है। इस साल किसानों ने 2,33,000 हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि पर गेहूं की खेती की है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बिहार की कुल 12 करोड़ की आबादी का तकरीबन दो-तिहाई हिस्सा अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। इनमें से अधिकाँश छोटे और सीमान्त किसान हैं। इसके अलावा, कृषि गतिविधियों से संबंधित करीब-करीब दो-तिहाई हिस्सा बरसात पर निर्भर है। 

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें 81% आबादी कार्यरत है, एवं राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी लगभग 42% की हिस्सेदारी है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar: Bumper Harvest, But Poor Wheat Procurement Disappoints Farmers

Bihar
Wheat procurement
Wheat Farmers
MSP
agricultural crisis
farmers

Related Stories

बिहार : हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक कुंवर सिंह के परिवार को क़िले में किया नज़रबंद

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

चारा घोटाला: सीबीआई अदालत ने डोरंडा कोषागार मामले में लालू प्रसाद को दोषी ठहराया

एमएसपी कृषि में कॉर्पोरेट की घुसपैठ को रोकेगी और घरेलू खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करेगी

नीतीश सरकार का सड़क से सोशल मीडिया पर पहरा ‘अलोकतांत्रिक’ क्यों है?

किसान आंदोलन: इस ग़ुस्से और असंतोष को समझने की ज़रूरत है

क्यों सरकार झूठ बोल रही है कि खेती-किसानी को बाज़ार के हवाले कर देने पर किसानों को फ़ायदा होगा?  


बाकी खबरें

  • BIRBHUMI
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    टीएमसी नेताओं ने माना कि रामपुरहाट की घटना ने पार्टी को दाग़दार बना दिया है
    30 Mar 2022
    शायद पहली बार टीएमसी नेताओं ने निजी चर्चा में स्वीकार किया कि बोगटुई की घटना से पार्टी की छवि को झटका लगा है और नरसंहार पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री के लिए बेहद शर्मनाक साबित हो रहा है।
  • Bharat Bandh
    न्यूज़क्लिक टीम
    देशव्यापी हड़ताल: दिल्ली में भी देखने को मिला व्यापक असर
    29 Mar 2022
    केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के द्वारा आवाह्न पर किए गए दो दिवसीय आम हड़ताल के दूसरे दिन 29 मार्च को देश भर में जहां औद्दोगिक क्षेत्रों में मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी और…
  • IPTA
    रवि शंकर दुबे
    देशव्यापी हड़ताल को मिला कलाकारों का समर्थन, इप्टा ने दिखाया सरकारी 'मकड़जाल'
    29 Mar 2022
    किसानों और मज़दूरों के संगठनों ने पूरे देश में दो दिवसीय हड़ताल की। जिसका मुद्दा मंगलवार को राज्यसभा में गूंजा। वहीं हड़ताल के समर्थन में कई नाटक मंडलियों ने नुक्कड़ नाटक खेलकर जनता को जागरुक किया।
  • विजय विनीत
    सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी
    29 Mar 2022
    "मोदी सरकार एलआईसी का बंटाधार करने पर उतारू है। वह इस वित्तीय संस्था को पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है। कारपोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए अब एलआईसी में आईपीओ लाया जा रहा है, ताकि आसानी से…
  • एम. के. भद्रकुमार
    अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई
    29 Mar 2022
    इज़रायली विदेश मंत्री याइर लापिड द्वारा दक्षिणी नेगेव के रेगिस्तान में आयोजित अरब राजनयिकों का शिखर सम्मेलन एक ऐतिहासिक परिघटना है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License