NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: देखते ही देखते बदलते गए हालात, पलटती गई बाज़ी!
बिहार में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद से अब तक के घटनाक्रम पर निगाह डाली जाए तो साफ दिखाई देता है कि चुनाव का ऐलान होने से पहले तक बिहार में विभिन्न दलों की जो हैसियत या स्थिति थी, वह चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगातार बदलते-बदलते बहुत बदल गई है।
अनिल जैन
09 Nov 2020
बिहार चुनाव

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। नतीजे आने में अब कुछ ही घंटे बाकी रह गए हैं, लेकिन ज्यादातर एग्ज़िट पोल के मुताबिक महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा है। चूंकि हमारे यहां एग्ज़िट पोल आमतौर पर सट्टा बाजार से संचालित होते रहे हैं और कुछेक अपवादों को छोड दें तो वास्तविक नतीजों ने हमेशा ही एग्ज़िट पोल के अनुमानों को नकारा है। एग्ज़िट पोल की तरह ओपिनियन पोल भी अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं, क्योंकि वे भी पिछले कुछ वर्षों से तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि प्रायोजित होने लगे हैं। यह हकीकत इस चुनाव में और ज्यादा पुख्ता हुई है। बिहार चुनाव को लेकर जितने भी ओपिनियन पोल हुए थे उन सभी में एनडीए का पलडा भारी ही नहीं बल्कि बहुत भारी बताया गया था। इसलिए किसी भी चुनाव की तस्वीर एग्ज़िट पोल या उससे पहले हुए ओपिनियन पोल के निष्कर्षों के आधार पर नहीं समझी जा सकती।

बिहार में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद से अब तक के घटनाक्रम पर निगाह डाली जाए तो साफ दिखाई देता है कि चुनाव का ऐलान होने से पहले तक बिहार में विभिन्न दलों की जो हैसियत या स्थिति थी, वह चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगातार बदलते-बदलते बहुत बदल गई है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों की भाषा और अंदाज तथा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 'अंतिम चुनाव’ की दुहाई ने भी यही संकेत दिया है। चुनावी राजनीति के चैंपियन माने जाने वाले नरेंद्र मोदी और उनके गठबंधन के सूबेदार नीतीश कुमार, दोनों के भाषणों में हताशा और डगमगाते आत्मविश्वास की झलक साफ नजर आई।

चुनाव प्रचार का दौर शुरू होने से पहले तक जनता दल (यू) और भाजपा के सत्तारूढ गठबंधन यानी एनडीए की स्थिति हर तरह से मजबूत दिख रही थी। गठबंधन खुद भी बहुत मजबूत दिख रहा था। हालांकि सीटों के बंटवारे को लेकर जनता दल (यू) से हुए विवाद के चलते पासवान परिवार की लोक जनशक्ति ने गठबंधन छोडने का ऐलान कर दिया था। पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा था उनकी पार्टी एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ेगी। हालांकि तब उनके इस फैसले को किसी ने भी ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। जनता दल (यू) और भाजपा के बीच थोडी बहुत खींचतान के बाद सीटों का बंटवारा भी हो गया था और भाजपा ने घोषित कर दिया था कि एनडीए के मुख्यमंत्री प्रत्याशी नीतीश कुमार ही होंगे।

एनडीए की इस स्थिति के बरअक्स महागठबंधन में सब कुछ अव्यवस्थित और अनिश्चित नजर आ रहा था। लालू प्रसाद की कमी सबको खल रही थी। रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की नाराजगी मीडिया में सुर्खियां बन रही थी। गठबंधन के घटक दल तेजस्वी को नेता मानने को तैयार नहीं थे। इसी सवाल पर उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की पार्टियों ने खुद को महागठबंधन से अलग कर लिया था।

महागठबंधन की ओर से सीटों के बंटवारे की जानकारी देने के लिए आयोजित प्रेस कांफ्रेन्स में असंतोष जताते हुए वीआईपी पार्टी के सुप्रीमो मुकेश सहनी भी उठकर भाजपा के पास चले गए थे। भाजपा ने भी उन्हें हाथोंहाथ लेते हुए अपने हिस्से की सीटों में से पांच सीटें उनके लिए छोड दी थी। उधर जीतनराम मांझी भी नीतीश कुमार के साथ आ गए थे। उनकी पार्टी के लिए नीतीश कुमार ने भी कुछ सीटें जनता दल (यू) के खाते में से छोड दी थीं।

यही नहीं, महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए उपेंद्र कुशवाह के नेतृत्व में मायावती की बसपा और ओवैसी की पार्टी का गठबंधन तथा पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी भी मैदान में थी। कुल मिलाकर महागठबंधन की स्थिति को बेहद कमजोर माना जा रहा था। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार जो पकडता गया, एनडीए की समस्याएं उजागर होने लगी और महागठबंधन की कमजोरियां दूर होती गईं। वामपंथी दलों से जहां इस गठबंधन को विचारधारा और काडर की ताकत मिली, तो वहीं राष्ट्रीय जनता दल से सवर्ण जातियों के पारंपरिक अलगाव को कांग्रेस की मौजूदगी ने कम कर दिया।

सबसे अहम बात यह रही कि महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जरा भी इधर-उधर नहीं भटके और अपने सूबे के बुनियादी मुद्दों पर ही एनडीए को घेरते रहे। राजनीतिक विमर्श को भाजपा ने जहां जंगल राज, हिन्दू-मुस्लिम, और पाकिस्तान जैसे मसलों की ओर मोड़ने की भरसक कोशिशें कीं तो नीतीश कुमार ने तेजस्वी को निजी आरोप-प्रत्यारोप में उलझाने के खूब जतन किए। लेकिन न तो भाजपा कामयाब हुई और न ही नीतीश कुमार।

तेजस्वी यादव की खूबी यह रही कि वे भाजपा और नीतीश के जाल में फंसने से साफ बचते हुए अपने एजेंडे पर ही कायम रहे। यही नहीं, वे अपने एजेंडे में रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य और लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं की चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लगातार ललकारते रहे। उन्होंने प्रधानमंत्री को उनके सवा लाख करोड़ रुपये के स्पेशल पैकेज और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के वादे की भी बार-बार याद दिलाई। प्रधानमंत्री ने जब उन्हें 'जंगल राज का युवराज’ कहा तो भी उन्होंने आपा नहीं खोया और सधे हुए अंदाज में इतना ही कहा कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं लेकिन उनके पास बिहार के सवालों पर बोलने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे कुछ भी बोल सकते हैं।

28 अक्टूबर से पूर्व हुए तमाम चुनावी सर्वे में एनडीए को साफ़ बढत दिखायी जा रही थी लेकिन उसी दौरान तेजस्वी यादव के दस लाख नौकरी के वादे से मुक़ाबला रोचक होना शुरू हो गया। इस वादे के जवाब में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने बजट की समस्या उठाई। नीतीश कुमार ने तो इस पर व्यंग्यात्मक लहजे मे टिप्पणी की, जिसकी स्तरहीन भाषा पर सबको आश्चर्य हुआ।

स्थिति यह हो गई कि नीतीश कुमार द्वारा सार्वजनिक रूप से बार-बार इसे अव्यावहारिक बताए जाने के बावजूद भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में 19 लाख नौकरियों के प्रस्ताव के साथ इस वादे का तोड़ निकालने की कोशिश की। कुल मिलाकर इस मुद्दे पर एनडीए के दोनों साझेदारों जनता दल (यू) और भाजपा में एक राय नहीं दिखी। इसलिए लोगों ने भी भाजपा के 19 लाख नौकरियों के वादे को गंभीर और विश्वसनीय नहीं माना।

बेशक भाजपा को कई विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन उसने नफरत और धार्मिक ध्रुवीकरण को ही अपना विश्वसनीय राजनीतिक हथियार माना और हर जगह पूरी शिद्दत से उसका इस्तेमाल किया है। बिहार भी अपवाद नहीं रहा। पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी पहले दौर के मतदान में हवा का रुख एनडीए के खिलाफ भांप कर पूरा प्रचार अभियान सांप्रदायिक नफरत और महागठबंधन के नेताओं पर निजी हमलों पर केंद्रित कर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर, जय श्रीराम, धारा 370 और एनआरसी-घुसपैठ आदि मुद्दों पर ऐसी बातें की, जिनसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्थिति असहज होती गई।

पांच साल पहले भी बिहार में मोदी और अमित शाह ने बेहद निचले स्तर पर उतर कर सांप्रदायिक नफरत से भरे भाषण दिए थे। प्रचार के स्तर के लिहाज से 2015 का विधानसभा चुनाव संभवत: देश में सबसे घटिया चुनाव था। उससे पहले कभी भी किसी विधानसभा चुनाव को जीतने के लिए भारत के प्रधानमंत्री ने इतने ओछे हथकंडे नहीं अपनाए थे। इसके बावजूद भाजपा को करारी शिकस्त झेलनी पडी थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि बिहार के राजनीतिक मिजाज को समझने में मोदी इस बार भी गच्चा खा गए।

रही सही कसर चिराग पासवान ने पूरी कर दी। चुनाव मैदान में उनकी पार्टी की अलग मौजूदगी ने एनडीए खेमे में सिर्फ कन्फ्यूजन ही पैदा नहीं किया, बल्कि एनडीए की दोनों प्रमुख पार्टियों जनता दल (यू) और भाजपा के बीच की परस्पर अविश्वास को भी उजागर कर दिया। चिराग पासवान ने बाकायदा घोषणा की कि उनका लक्ष्य नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करना है, इसलिए उनकी पार्टी सिर्फ उन्हीं सीटों पर अपने उम्मीदवार खडे करेगी जहां पर जनता दल (यू) के उम्मीदवार मैदान में होंगे। भाजपा के कई नेता चिराग पासवान की पार्टी से उम्मीदवार बन गए। यही नहीं, चिराग लगातार प्रधानमंत्री मोदी को अपना नेता बताते हुए यह भी कहते रहे कि बिहार में अगली सरकार भाजपा-लोजपा की बनेगी। हालांकि भाजपा के कई नेताओं ने चिराग की इन बातों का खंडन किया लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी किसी भी सभा में इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा तो जनता दल (यू) खेमे में शक गहरा गया। उसकी ओर से सीधे-सीधे कहा जाने लगा कि चिराग तो महज जमूरा है, उसे नचाने वाला मदारी कोई और है। मदारी के तौर पर किसी का नाम नहीं लिया गया था लेकिन इशारा स्पष्ट रूप से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर था।

आखिरी दौर में भाजपा की ओर से योगी आदित्यनाथ ने बिहार में फिर से सत्ता में आने पर घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात कह कर मुसलमानों पर निशाना साधा तो नीतीश कुमार ने बिना कोई देरी किए योगी के इस बयान को फालतू बात करार देते हुए कह दिया कि किसी में दम नहीं जो ऐसा कर सके। इसके बाद भी जो कुछ कसर रह गई थी तो नीतीश ने आखिरी दिन यह कहकर पूरी कर दी कि यह उनका अंतिम चुनाव है। तेजस्वी ने तत्काल इसको अपनी इस दलील की तसदीक के रूप में पेश कर दिया कि नीतीश कुमार थक चुके हैं। आम तौर पर नीतीश कुमार अपने भाषणों में विरोधियों पर निजी हमला करने से बचते हैं, लेकिन इस चुनाव में तो वे इस मामले में पूरी तरह प्रधानमंत्री मोदी का अनुसरण करते दिखे। उन्होंने तेजस्वी पर हमला करते हुए कहा कि जिनके बाप ने बेटे की चाहत में नौ-नौ संतानें पैदा कर दी, वे लोग किस मुंह से विकास की बात करते हैं। नीतीश की यह भाषा उनकी हताशा और डोलते आत्मविश्वास की चुगली करने वाली थी।

बहरहाल, चुनाव प्रचार चाहे जैसा भी हो, फैसला तो इस बात से होना है कि मतदाताओं ने इन बातों का क्या मतलब समझा और बटन दबाने से पहले किस नतीजे पर पहुंचे। जो फैसला आने वाला है, उसका काफी कुछ अंदाजा विभिन्न दलों के शीर्ष नेताओं की चुनावी सभाओं में उमड़ी भीड ने भी दे दिया है। एग्ज़िट पोल के अनुमानों को देखकर एनडीए के नेताओं की ठंडी और हताश प्रतिक्रियाएं भी यही बता रही है कि उन्हें नतीजों का अंदाजा हो गया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Bihar Elections 2020
Bihar Polls
Nitish Kumar
NDA Govt
Narendra modi
Tejashwi Yadav
RJD
jdu
Bihar Mahagathbandhan

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License