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भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: लोग ख़फ़ा, नेता बेपरवाह
अगर विपक्ष सही तरीक़े से आगे बढ़ता है,तो तक़रीबन तय माना जाना चाहिए कि नीतीश कुमार की जेडीयू और मोदी की भाजपा, दोनों ही दल भारी असंतोष और हार का सामना करने जा रहे हैं।
सुबोध वर्मा
03 Oct 2020
बिहार चुनाव
प्रतीकात्मक फ़ोटो

बिहार सियासी तौर पर एक बेहद संवेदनशील सूबा है-कम से कम ऐसी सामान्य धारणा है। इसका मतलब शायद यही है कि लोग राजनीति के बारे में बात करने में दिलचस्पी रखते हैं। इसके अलावा, राजनीतिक आकांक्षायें भी ज़्यादा हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में मतदान का तक़रीबन पांचवां वोट छोटी-छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को गया था। विधानसभा चुनावों में यह हिस्सा एक चौथाई से ज़्यादा होता है।

यह बात हर किसी को नज़र आ सकती है कि आख़िर क्यों प्रमुख राजनीतिक गुट हमेशा छोटे-छोटे दलों का एक बेड़ा है,जिनमें से हर पार्टियां स्थानीय और हमेशा जाति आधारित असर वाली होती हैं। असल में यह अतीत का एक नतीजा है, क्योंकि यह राज्य आज़ादी का मैदान-ए-जंग था, और फिर 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले ताक़तवर आंदोलन सहित वैकल्पिक लोहियावादी समाजवादी राजनीति का भी जंग-ए-मैदान रहा है।

लेकिन, इतिहास की यह धरोहर भी संकट के रोने को ही दर्शाता है। बिहार के लोग राज्य को ठहराव की चपेट से बाहर ले आने के लिए बेताब हैं। पार्टियां आती हैं और चली जाती हैं, गठबंधन बनते हैं और बिखर जाते हैं, मुख्यमंत्री शासन पर काबिज होते हैं और शासन से बाहर हो जाते हैं, लेकिन दर्दनाक ग़रीबी, किसी तरह गुज़र-बसर करने वाली अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की कमी और सामाजिक संघर्ष अब भी जारी है।

तीन चरणों (28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 अक्टूबर) में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में फिर से उसी खेल को खेलने वाले पात्रों का वही समूह फिर से दिखायी देगा, हालांकि महामारी के प्रकोप के चलते इस बार के हालात साफ़ तौर पर अलग होंगे।

मतदान का हालिया इतिहास

पिछले 15 सालों में मतदान का लगभग 70% हिस्सा चार राजनीतिक दलों-जनता दल यूनाइटेड (JDU), भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बीच गया है। (नीचे चार्ट देखें)

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2014-15 की एक छोटे सी अवधि को छोड़कर इस दौरान मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक़रीबन लगातार सत्ता में बने रहे हैं। 2015-16 में कुछ समय के लिए उन्होंने अपना पक्ष बदल लिया था और मौजूदा विपक्षी दल-कांग्रेस और राजद वाले गुट में शामिल हो गये थे, उस अवधि को अगर छोड़ दिया जाये,तो वे इस दरम्यान पूरे समय उनका भाजपा के साथ गठबंधन रहा है। विपक्षी दलों से बने उस महागठबंधन की 2015 के चुनावों में निर्णायक रूप से जीत हुई थी और नीतीश कुमार सत्ता के सिंहासन पर बैठे थे, लेकिन एक बार फिर उन्होंने अपना पाला बदला और अपने पूर्व सहयोगी भाजपा के साथ वापस आ गये, और दूसरे गुट की तरफ से मुख्यमंत्री बन गये। किसी जनादेश के साथ इस तरह हैरान कर देने वाले विश्वासघात और दो विपरीत ध्रुवों वाले गुटों के बीच आने-जाने की उनकी इस कलाबाज़ी ने उन्हें "पलटू बाबा" की उपाधि से नवाज़ा।

इन सालों में आरजेडी और कांग्रेस की क़ीमत पर जेडीयू और बीजेपी दोनों को फ़ायदा हुआ है। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर वह भाजपा ही है, जिसने जदयू के आधार में सेंध लगाते हुए ज़्यादा ताक़त बटोरी है। लेकिन, भाजपा नीतीश कुमार को अपने चेहरे के रूप में प्रचारित करने को लेकर उस 2015 की घटना से कड़वा सबक लेते हुए सचेत है, जब उसे महागठबंधन द्वारा पटखनी मिलने के बाद सिर्फ 53 सीटों के साथ ही संतोष करना पड़ा था।

एनडीए के लिए मुश्किल चुनाव

आगामी चुनाव फिर से एनडीए के लिए कड़ी टक्कर वाला चुनाव साबित होने वाला है। इनके संयुक्त शासन के पिछले पांच वर्षों, ख़ासकर उनके किये गये वादों पर विचार करने पर लोगों के भारी मोहभंग दिखायी पड़ता है। इस समय, फिर से बनने वाले दोनों ही गठबंधनों में ग़ुस्से का यह उभार पहले से दिख रहा है। विभिन्न सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए विभिन्न छोटे-छोटे दल सख़्त तोल-मोल कर रहे हैं।

बीजेपी के एक भरोसेमंद सहयोगी रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) ने इस बात को महसूस करते हुए अपने हाथ खड़े कर दिये हैं कि हवा का रुख़ नीतीश कुमार के खिलाफ हो रहा है। महागठबंधन से असंतुष्ट तत्व एनडीए में शामिल होने को लेकर उत्सुक नहीं हैं, जैसा कि उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी या आरएलएसपी के मामले में देखा गया है, जिसने बहुजन समाज पार्टी के साथ अपना ख़ुद का मोर्चा बना लिया है।

इस सभी मंथन के पीछे कुछ ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं, जिन्होंने नीतीश किमार के नेतृत्व को कलंकित किया है। जिन ज्वलंत मुद्दों से आम लोग घिरे हुए हैं, वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और संकट को बढ़ाने वाले हैं।

कोविड-19 महामारी

हाल ही में भाजपा ने इस बात का ऐलान किया था कि बिहार जल्द ही कोरोना-मुक्त होने वाला है। बेशक यह तथ्य सच्चाई से बहुत दूर है। 30 सितंबर तक बिहार में 1.83 लाख संक्रमण के पुष्ट मामले थे। 22 मार्च को पहला मामला सामने आने के बाद, महामारी धीरे-धीरे फैलती गयी थी, जिसमें 30 जून तक महज़ 9,744 मामले ही सामने आये थे। फिर, 31 जुलाई तक मामले में तेज़ बढ़ोत्तरी होते हुए संक्रमितों की संख्या 50,987 हो गयी थी और इसके बाद 31 अगस्त तक यह बढ़कर 1.36 लाख हो गया था।

हालांकि, इस अवधि में परीक्षण संख्या में तेज़ी आयी, लेकिन अनुमानित 10% परीक्षण ही आरटी-पीसीआर के ज़रिये किये जा सके थे। ग़ौरतलब है कि इन पुष्टिकरण परीक्षणों का राष्ट्रीय औसत तक़रीबन 40% है। संपर्क की निगरानी नहीं हो पा रही है, अस्पताल मरीज़ों से ठसाठस भरे हुए हैं और स्वास्थ्य कर्मचारियों की तरफ़ से बार-बार सुरक्षात्मक साज़-ओ-सामान की कमी को लेकर विरोध की आवाज़ उठ रही है।

सभी विपक्षी दलों की तरफ़ से देरी से चुनाव कराये जाने की मांग अपने आप में एक गर्म मुद्दा बन गयी थी। लेकिन,नीतीश कुमार को इस बात को लेकर डर था कि चुनाव में देरी से उन्हें ज़्यादा नुकसान हो सकता है और इसलिए उन्होंने समय पर चुनाव कराने पर ज़ोर दिया। बीमारी का डर, और इससे कहीं ज़्यादा उचित स्वास्थ्य सेवा नहीं हासिल कर पाने के डर ने ख़ास तौर पर सत्तारूढ़ भागीदारों द्वारा की गयी लीपापोती के चलते लोगों को एनडीए सरकार का कटु आलोचक बना दिया है।

वापस आने वाले प्रवासी

कोरोनोवायरस को रोकने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ़ से किये गये एक व्यर्थ और कुप्रबंधन वाली पहल के चलते अनुमान है कि 30 लाख प्रवासी श्रमिक अप्रैल-मई के दौरान देश के सभी हिस्सों से बिहार वापस लौट आये थे।

ये लौटने वाले तमाम श्रमिक बिहार में अपने-अपने गांवों / क़स्बों में भीषण आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण प्रवासी बन गये थे। उन्होंने कृषि कार्यों, निर्माण, अनौपचारिक क्षेत्र के व्यवसायों, औद्योगिक या सेवा क्षेत्र में बतौर श्रमिक या कर्मचारी काम किया।

अचानक हुए ऐलान की वजह से ज़्यादतर प्रवासी श्रमिक अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे, और यहां तक कि मज़दूरी से कमायी गयी उनकी जमा-पूंजी भी ख़त्म हो गयी। कई लोग तो 1,500 किलोमीटर का लम्बा सफ़र पैदल ही तय करते हुए अपने-अपने घर वापस लौट आये। इस सफ़र में खाने-पीने की कमी, या फिर घोर थकावट के चलते वापस लौटते हुए सैकड़ों लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिये।

लौटे हुए प्रवासियों को अपने पैतृक स्थानों में काम नहीं मिलने से भारी संकट का सामना करना पड़ा। मुफ़्त खाद्यान्न की सरकारी योजनायें बहुतों तक पहुंच ही नहीं पायी और गांव में नौकरी की गारंटी वाली योजना में काम या तो नहीं था या फिर नाकाफ़ी था। केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों ने जिस तरह से उनकी ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ किया है, और श्रमिकों के इस वर्ग की भारी उपेक्षा की है,इस सबके चलते लोगों में ज़बरदस्त ग़ुस्सा है। आने वाले चुनावों में इनमें से कई कामगार,जो गांवों में रहते हैं, वे इस बेमुरव्वत सरकार को चुनाव में हराने की तैयारी कर रहे हैं।

बेरोज़गारी

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी के अनुमानों के मुताबिक़, फ़रवरी 2019 से यानी पिछले 20 महीनों से लगातार बिहार में बेरोज़गारी की दर 10% से ज़्यादा रही है। यह राज्य के अबतक की बेरोज़गारी का सबसे लंबा और सबसे क्रूर चक्र है। बिहार कोई औद्योगिक राज्य तो है नहीं, इसलिए पिछले साल के मध्य से औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली मंदी इस चौंका देने वाली तादाद की वजह नहीं है। न ही यह महामारी और तालाबंदी के कारण है।

मार्च और अप्रैल में बेरोजगारी की यह दर बिहार में अविश्वसनीय स्तर 46.6% तक बढ़ गयी थी। बेरोज़गारी की इस निरंतर स्थिति ने लोगों की कमर तोड़कर रख दी है। सितंबर में ख़रीफ की अच्छी बुआई के बावजूद भी बेरोज़गारी की दर तक़रीबन 12% थी। इस लगातार बनी हुई त्रासदी के लिए लोग सीधे-सीधे नीतीश कुमार की सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। और यह आने वाले चुनावों में सबसे अहम चुनावी मुद्दों में से एक होगा।

भ्रष्टाचार और अपराध

ये ऐसे मुद्दे हैं,जिन पर नीतीश कुमार और उनके भाजपा सहयोगी, दोनों ही पिछले 15 वर्षों से मुखर रहे हैं। डेढ़ दशक के शासन के बाद भी नीतीश कुमार वोट बटोरने के लिए लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के नेतृत्व को “जंगल राज” बताकर लोगों की भावना की बैसाखी का इस्तेमाल करते रहे हैं। इस बीच, लोगों की आम धारणा है और बेशुमार ऐसी ज़मीनी रिपोर्टों भी हैं,जो यह बताती है कि भ्रष्टाचार हर तरफ़ व्याप्त है और अपराध बेलगाम हो चुका है,कुल मिलाकर हालात बदतर हो गये हैं।

कोषागार से 2,000 करोड़ रुपये के गबन से जुड़े सृजन घोटाले का भूत मुख्यमंत्री को सता रहा है। सुधार गृह अत्याचार और लगातार हो रहे जातिवादी हमलों जैसे मामलों ने लोगों को हिलाकर रख दिया है। इसके अलावे, हिंदू कट्टरपंथी भीड़ वाले अपराधों का उभार, अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सशस्त्र उकसावे और ख़तरों ने मिल-जुलकर आग को और भड़काने का काम किया है। ये ऐसे मामले हैं, जिन्होंने नीतीश कुमार के प्रति विश्वास को तेज़ी से खत्म कर दिया है, और भाजपा के साथ उनके गठबंधन को क़ानून और व्यवस्था में आयी इस गिरावट को सीधे-सीधे ज़िम्मेदार वजह के तौर पर देखा जाता है। यह सत्तारूढ़ एनडीए के ख़िलाफ़ असंतोष के बढ़ने की वजह भी है।

इस तरह, जेडीयू और बीजेपी के उस अवसरवादी गठबंधन की हार को लेकर मैदान तैयार है, जिसने 2016 में चुनाव पूर्व गठबंधन को तोड़कर सत्ता को हड़प लिया था।

राजद और कांग्रेस को एक ऐसा गठबंधन बनाने और वाम दलों को समायोजित करने की ज़रूरत है, जिसका एक खित्ते में बहुत ज़्यादा असर है। इसकी तमाम नाकामियों के बावजूद यह नज़रिया ज़रूरी है कि एनडीए को हराया जा सकता है। अगर विपक्ष इस नज़रिये के साथ अपने क़दम आगे नहीं बढ़ाता है और नीतीश कुमार और उनके भगवा सहयोगियों की वापसी को नहीं रोक पाता है,तो यह बिहार के लिए एक और त्रासदी होगी।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar Elections: Angry People, Indifferent Leaders

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