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राजनीति
बिहार चुनाव : कभी वामपंथ का गढ़ रहा बेगूसराय वापस वाम की झोली में आ सकता है
90 के दशक के मध्य तक वह समय था जब सीपीआई और सीपीआई(एम) सहित वामपंथी पार्टियाँ- यहाँ की सात में से पाँच सीटों पर मज़बूत थीं। आख़िरी बार ऐसा 1995 में हुआ था जब लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल के पक्ष में लहर थी। 
मोहम्मद इमरान खान
03 Nov 2020
Translated by महेश कुमार
बिहार चुनाव
चुनाव अभियान के दौरान मटिहानी विधानसभा सीट से माकपा के उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह प्रचार करते हुए

तेघरा/मटिहानी/बखरी/बछवाड़ा(बिहार): "लाल झंडे की जीत की संभावना दिख रही है वह भी बरसो बाद," मुनेश्वर राय, एक मामूली किसान ने अपने धान के खेत के पास एक पेड़ के नीचे बैठकर उक्त बात कही।

राय बता रहे थे कि इन चुनावों में महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर बेगूसराय जिले की सात विधानसभा सीटों में से चार पर वाम दलों ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं। एक समय में यह वामपंथ/लेफ्ट का गढ़ माना जाता था- इसे बिहार के लेनिनग्राद के रूप में भी जाना जाता है- यह इलाका और इसके लोग वाम पार्टियों के पुनरुत्थान के प्रति आशान्वित है।

90 के दशक के मध्य तक वह समय था जब वामपंथी दल- जिनमें सीपीआई और सीपीआई (एम) शामिल हैं- यहाँ की सात में से पाँच सीटों पर हावी थी। आखिरी बार ऐसा 1995 में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल के पक्ष में लहर के समय हुआ था।

तेघड़ा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले धनकौल गांव के निवासी राय ने बताया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राजग सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता- और उनका महागठबंधन का सीएम का उम्मीदवार होना- युवाओं के बीच बड़ा  प्रभाव डाल रहा है। तेजस्वी ने बेरोज़गारी के मुद्दे को असरदार ढंग से उठाया है और सत्ता में आने पर दस लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया है।

प्रचार के दौरान बरखी विधानसभा सीट से सीपीआई (आई) के उम्मीदवार सूर्यजंत पासवान

राय के अनुसार, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रामरतन सिंह की जेडी-यू के उम्मीदवार वीरेंद्र कुमार सिंह पर बढ़त बनाए हुए है। उन्होंने कहा कि राजद-कांग्रेस के साथ वामपंथी दल का गठबंधन, जेडी-यू-भाजपा के एनडीए के मुक़ाबले एक जबरदस्त ताकत हैं। उन्होंने कहा कि दोनों सत्ताधारी दलों में समन्वय का अभाव था और हाल के दिनों में उनके खिलाफ अविश्वास बढ़ा है।

राय का मानना है कि वामपंथ को महागठबंधन के हिस्से के तौर पर सफलता मिलेगी। 2016 के  विधानसभा चुनावों में, राजद ने यह सीट जीती थी जब महागठबंधन में जेडी-यू और कांग्रेस शामिल थे। उस समय, सीपीआई ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा था। हालांकि, चुनाव से पहले, राजद के मौजूदा विधायक ने पाला बदल लिया था और वे सत्तारूढ़ जद-यू में शामिल हो गए थे। 

इसमें लोक जनशक्ति पार्टी जो बीजेपी की सहयोगी है, जिसने अपने उम्मीदवार लल्लन कुंवर जो कि बीजेपी का बागी उम्मीदवार है को जेडी-यू के खिलाफ मैदान में उतारा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि कुंवर भाजपा के हमदर्दों के समर्थन से जद-यू के वोटों को काटेगा। बरौनी के रहने वाले सत्यनारायण सिंह ने कहा कि अगर भाजपा मैदान में होती तो वे उसका समर्थन करते।

सिंह ने कहा कि, "मैं नीतीश के जद-यू को वोट देने के लिए लाइन में खड़े होने के बजाय घर पर बैठना पसंद करूंगा।" उन्होंने कहा कि सरकार हमारे इलाके में किसी भी तरह के नए उद्योग लगाने में विफल रही है, इस तथ्य के बावजूद कि दशकों पहले यह एक विकसित औद्योगिक इलाका हुआ करता था। सिंह की तरह इलाके के अन्य बीजेपी समर्थक भी जेडी-यू को लेकर उत्साहित नहीं हैं।

अमजदपुर बिठोली गाँव के सुल्तान अहमद ने कहा कि: "लगता है कि लाल झंडा जीत रहा है।" उन्होंने कहा कि सभी जातियों और समुदायों के लोग बदलाव के लिए महागठबंधन का समर्थन कर रहे हैं। आखिरी बार सीपीआई ने 2005 में तेघरा सीट जीती थी। दिग्गज पार्टी नेता चंद्र शेखर सिंह पहली बार यह सीट 1962 में जीते थे और 2005 के पांच साल बाद पार्टी पहली बार हारी थी। 

बछवारा सीट पर चुनाव अभियान करते सीपीआई उम्मीदवार रतन सिंह

बछवारा एक और ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है जिसके बारे में सीपीआई चुनावों से पहले ही काफी आशान्वित है। कहा जाता है कि सीपीआई के अवधेश कुमार राय को बीजेपी उम्मीदवार सुरेंद्र मेहता पर बढ़त मिली हुई है। हालांकि, राय की परेशानी निर्दलीय उम्मीदवार शिव प्रकाश उर्फ गरीब दास है- जो कांग्रेस के बागी और रामदेव राय के बेटे है, जिन्होंने 2015 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में सीट जीती थी और कुछ महीने बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। सीट-बंटवारे के फार्मूले के तहत सीपीआई के खाते में सीट आने से, शिव प्रकाश निराश हो गए थे। सीपीआई के लिए बछवारा के महत्व को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उसने 2010 में नीतीश कुमार के एनडीए की लहर के बावजूद यह सीट जीती थी। यह बेगूसराय से पार्टी द्वारा जीती गई एकमात्र सीट थी।

सरकार के खिलाफ गुस्सा और बदलाव की इच्छा के कारण सीपीआई के सीट जीतने की संभावना काफी बढ़ गई है। लोग नौकरियों की कमी के बारे में मुखर हैं, विशेष रूप से युवा तबका नितीश को बढ़ती बेरोज़गारी के लिए कोस रहा है, ”भगवानपुर गांव के निवासी अजय कुमार का यही कहना है। भिकान चक गांव के सुरेश प्रसाद ने कहा कि सीपीआई एक दशक बाद अपनी जीत दोहराने की संभावना में है। उन्होंने कहा कि यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उसे भूमिहारों, यादवों और दलितों से कितना समर्थन मिलता है। 

मटिहानी में, माकपा के उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को जेडी-यू के मौजूदा विधायक बोगो सिंह के खिलाफ खड़ा किया गया है, जो एक ठेकेदार से राजनेता बने हैं, जो अपने पैसे और बाहुबल के लिए जाने जाते हैं और उनके खिलाफ एक दर्जन से अधिक आपराधिक मामले चल रहे हैं। लोजपा ने यहां कुख्यात गैंगस्टर-कम-तस्कर कामदेव सिंह के बेटे राजकुमार सिंह को मैदान में उतारा है। जबकि राजकुमार की छवि अपने पिता से अलग है, उनके मुक़ाबले में आने से मुक़ाबला त्रिकोणीय हो गया है। मटिहानी एक भूमिहार बहुल सीट है जिसमें मुस्लिम, यादव और दलित मतदाताओं की भी आबादी है। यहां तीन उम्मीदवार भूमिहार हैं।

"हम (भूमिहार) यहाँ विभाजित हैं। जो कोई उम्मीदवार भूमिहार के अलावा अन्य जातियों के वोट हासिल करने में कामयाब होगा वह आगे बढ़ेगा। यदि सामाजिक समीकरण महागठबंधन के पक्ष में काम करता है, तो माकपा के पास जेडी-यू को चुनौती देने का उचित मौका है और वह इस सीट को जीत सकती है। बोगो सिंह अभी भी संसाधनों के मामले में एक शक्तिशाली व्यक्ति हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि लोजपा के राजकुमार को कितना नुकसान हो सकता है, ”बालापुर निवासी पप्पू सिंह ने कहा।

तेघरा विधानसभा सीट से सीपीआई के उम्मीदवार अवधेश राय

मटिहानी प्रखंड के अंतर्गत सैदपुर गाँव के निवासी मौ॰ सलीम ने कहा कि वाम दल के उम्मीदवार मुक़ाबले में हैं। माकपा नेता विनिताभ ने कहा कि पार्टी को जीत की उम्मीद है क्योंकि लोगों में पार्टी के बारे में अप्रत्याशित रूप से अच्छी प्रतिक्रिया है। सीपीआई नेता अनिल अंजान अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की तुलना में मटीहानी में माकपा के उम्मीदवार के लिए अधिक प्रचार कर रहे हैं।

 उन्होंने कहा कि, "यह एक जागरूक कदम है क्योंकि यहाँ जीतने का मौका है और उसे मजबूत करने की जरूरत है।" आरक्षित बखरी विधानसभा सीट पर सीपीआई के उम्मीदवार सूर्यकांत पासवान के पास बीजेपी के कुमार शैलेंद्र से सीट जीतने का बेहतर मौका है। 

राजद ने पिछले चुनावों में इस सीट पर जीत दर्ज की थी और यह सीट बंटवारे के फार्मूले के तहत सीपीआई के खाते में चली गई थी। “हम सीपीआई पक्ष में मतदान करेंगे और इसका फिर से समर्थन करेंगे। बेरोजगारी और मूल्य वृद्धि हमें मार रही है। इस सरकार को जाना चाहिए क्योंकि यह हमारे जैसे गरीबों की मदद करने में विफल रही है, ”चक हामिद गांव के महेंद्र पासवान ने उक्त बाते कही। बागबान से सतीश राय ने कहा कि अगर सीपीआई को राजद के समर्थकों का समर्थन मिलता है, तो पार्टी आसानी से इस सीट को जीत जाएगी। “सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा और असंतोष है। लोग सरकार बदलने के लिए तैयार हैं।”

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, जिन्होंने बेगूसराय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव लड़ा था और हार गए थे, यहाँ काफी मेहनत कर रहे हैं, वे एक दिन में दर्जन से अधिक चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए, पार्टी के उम्मीदवार के लिए समर्थन मांग रहे हैं। तेजस्वी यादव ने भी ग्रैंड अलायंस के उम्मीदवारों के समर्थन में बेगूसराय में चुनावी रैलियों को संबोधित किया है। बिहार चुनाव में  दूसरे चरण का मतदान 3 नवंबर को है और बेगूसराय की सीटों पर भी मतदान इसी दिन होगा।

सभी तस्वीरें मौ. इमरान ख़ान द्वारा ली गई हैं

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar Elections: Once a Stronghold, the Left Looks Set for a Comeback in Begusarai

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