NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: उद्योगों के ख़त्म होते जाने का दुखद पहलू
जदयू-भाजपा की सरकार उद्योगों को बढ़ावा देने में नाकाम रही है, जिससे पिछड़ापन और ग़रीबी, दोनों बने हुए हैं।
सुबोध वर्मा
02 Nov 2020
बिहार चुनाव

यदि आप कभी यह देखना चाहते हैं कि औद्योगिक उत्पादन की कमी किसी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था को कहां लाकर खड़ा कर देती है, तो इस लिहाज़ से बिहार एक ऐसा सूबा है, जहां आपको आना चाहिए। 'विकास' और 'सुशासन'  के तमाम दावों के बावजूद, बिहार की नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने न सिर्फ़ औद्योगिक ठहराव पैदा कर दिया है, बल्कि इस सरकार के मौजूदा कार्यकाल के पिछले कुछ वर्षों में सही मायने में कारखानों और श्रमिकों की संख्या में भी गिरावट आयी है।

इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि ये वो साल थे, जब उन्होंने 2015 के राज्य विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ जीत हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया था। लिहाजा, उनके पीछे मोदी सरकार का पूरा समर्थन था और उनकी राजनीतिक ताक़त भी थी। इसके बावजूद, इसका नतीजा बिहार के उभरते हुए औद्योगिक क्षेत्र के लिए किसी आपदा से कम नहीं रहा।

जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से पता चलता है कि कारखाना अधिनियम के तहत पंजीकृत इकाइयों का वार्षिक सर्वेक्षण करने वाले कारखानों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASI) से प्राप्त नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक़, वर्ष 2015-16 में इकाइयों की संख्या 3,623 पर पहुंचकर अपने उच्च स्तर पर थी,लेकिन 2017-18 में यह संख्या घटकर 3461  हो गया है।

इस औद्योगिक परिदृश्य की ख़ास बात यह है कि कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या बुरी तरह कम हुई है और पिछले कुछ सालों में तो यह तक़रीबन एक लाख तक रह गयी है। जिस राज्य की कामकाजी उम्र की आबादी सात करोड़ से ज़्यादा हो,एक लाख की यह संख्या इस आबादी का लगभग 0.1% हिस्से का ही प्रतिनिधित्व करती है।

इस प्रकार, यह हैरत नहीं पैदा करता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान (जैसा कि सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) द्वारा मापा जाता है) देश में सभी प्रमुख राज्यों में सबसे कम, यानी 19% है। वास्तव में, सिर्फ़ उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का अपने सम्बन्धित जीएसडीपी में कम औद्योगिक योगदान है।

कैसी है एमएसएमई सेक्टर की स्थिति?

यह सोचा जा सकता है कि शायद सूक्ष्म,लघु एवं मझोले उद्यम (MSME) वाला सेक्टर फल-फूल रहा हो, और कम से कम बिहार की अर्थव्यवस्था की कमी को यह आंशिक रूप से पूरा कर रहा हो। लेकिन ऐसा लगता नहीं है।

भारतीय रिज़र्व बैंक की तरफ़ से 2015-16 में राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के संग्रह के मुताबिक़, बिहार में 35 लाख सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (MSME) थे, जो 2006-07 में लघु स्तरीय उद्योगों की अखिल भारतीय गणना में तक़रीबन 15 लाख थे। यह एक शानदार और सही मायने में एक नाटकीय बढ़ोत्तरी दिखायी देती है। हालांकि, ये आंकड़े स्पष्ट अनिश्चितता के एक कोहरे में लिपटे हुए हैं।

इस उच्च आंकड़ा की रिपोर्ट राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) द्वारा अनिगमित उद्यमों के सर्वेक्षण में की गयी थी और इसमें सभी उद्योगों के लिए फ़सल पैदा करने वाले उद्यमों (सार्वजनिक क्षेत्र और ग़ैर-लाभकारी उद्यमों को छोड़कर) को शामिल किया गया था। इसमें ‘ख़ुद के श्रम से चलने वाले उद्यम’ भी शामिल थे, जो किसी काम के लिए श्रमिक नहीं रखते हैं। दूसरे शब्दों में, वे घरेलू व्यवसाय हैं, जैसे कि पकौड़े बेचना। इसके और भी उदाहरण हैं; जैसे कि सड़क के किनारे चाय या तंबाकू उत्पाद बेचना, या सड़क किनारे मोटरबाइक की मरम्मत करने का काम, गलियों में पैदल या ठेले पर घूम-घूमकर सामान बेचने के काम आदि।

जैसा कि विधि एवं केंद्रीय मंत्रालय द्वारा परिभाषित किया गया है, और जैसा कि पारंपरिक रूप से माना भी जाता है कि एमएसएमई क्षेत्र में वे उद्यम शामिल नहीं होते हैं,जिनमें कोई ख़ुद के श्रम से उद्यम चलाता हो। असल में एमएसएमई की आधिकारिक परिभाषा रोज़गार के आधार पर नहीं, बल्कि निवेश के आधार पर पारिभाषित रही है। लेकिन, इस साल मई में मोदी सरकार ने इस परिभाषा में संशोधन कर दिया और सूक्ष्म उद्यमों को एक करोड़ रुपये के निवेश और पांच करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाले उद्यमों के तौर पर परिभाषित कर दिया गया। इसी तरह, छोटे और मझोले उद्यमों के लिए भी निवेश की मात्रा को आगे किया गया। साफ़ है कि जिन उद्यमों पर विचार किया जा रहा है, उनमें लाखों या करोड़ों रुपये के निवेश होते है, और वे सड़क किनारे कुछ बेचने वाले या मरम्मत करने वाले मैकेनिक भर नहीं होते हैं, जिनके पास कहने के लिए भी कोई निवेश या टर्नओवर नहीं है।

यही वजह है कि बिहार के एमएसएमई सेक्टर में इन ख़ुद के श्रम से चलने वाले उद्यमों को शामिल करने का एक ऐसा बड़ा इंद्रजाल है, जिसे लगता है कि ख़ुद केंद्रीय मंत्रालय से रचा है, क्योंकि इस आंकड़े को जारी करते हुए वे भी उसी एनएसएसओ सर्वेक्षण रिपोर्ट को उद्धृत करते हैं।

ऐसे में सवाल यही पैदा होता है कि बिहार में आख़िर इसकी वास्तविक संख्या क्या होगी? राज्य सरकार के आधिकारिक प्रकाशनों में उद्धृत उद्योग विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़, 2018 तक बिहार में 7.89 लाख एमएसएमई थे। उनमें रोज़गार पाने वालों की तादाद को तक़रीबन 16 लाख बताया गया था। यह आंकड़ा विभाग के पास किये गये पंजीकरण के आधार पर आया है और इसलिए एक कहीं ज़्यादा मान्य आंकड़े को दर्शाता है, हालांकि इनमें से कितने अभी भी चालू हैं,इस बारे में कोई भी अनुमान हमारे पास नहीं है।

ज़ाहिर है, बिहार में एमएसएमई सेक्टर का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं है। महामारी और लॉकडाउन के बहाने नीतीश कुमार की सरकार ने मज़दूरों और कर्मचारियों के लिए कार्य-दिवस को आठ घंटे से लेकर 12 घंटे तक बढ़ाने में कई दूसरे राज्यों का अनुसरण करने में जल्दबाज़ी दिखायी है। इससे तो यही पता चलता है कि नीतीश और उनके शुभचिंतक, प्रधानमंत्री मोदी,दोनों ही बिहार में जो भी उद्योगपति हैं, उनके हितों की सुरक्षा को लेकर बेचैन हैं।

लेकिन, ये दोनों बुद्धिमान पुरुष, जिनमें से दोनों का ही दावा है कि वे विकास के पुजारी हैं,ये दोनों ही बिहार में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं – और दोनों ने इस सूबे को और कुछ वर्षों तक के लिए उद्योगों के ख़त्म होते जाने की दुखद स्थिति और पिछड़ेपन के हवाले कर दिया है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar Elections: The Tragic Face of De-Industrialisation

Bihar
Bihar GSDP
Bihar Elections
Bihar Economy
Bihar MSME
Nitish Kumar
nsso
MSMEs
RBI
Factories Act

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : जन संघर्षों से जुड़े कलाकार राकेश दिवाकर की आकस्मिक मौत से सांस्कृतिक धारा को बड़ा झटका

बिहार पीयूसीएल: ‘मस्जिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने के लिए हिंदुत्व की ताकतें ज़िम्मेदार’

बिहार में ज़िला व अनुमंडलीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
    30 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर में सरकारी केंद्रों पर गेहूं ख़रीद शुरू हुए दस दिन होने को हैं लेकिन अब तक सिर्फ़ चार किसानों से ही उपज की ख़रीद हुई है। ऐसे में बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे है।
  • श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 
    30 Apr 2022
    प्रदेश के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 अप्रैल 2022 को विधानसभा में घोषणा की कि ग्रामसभाओं की बैठक गणतंत्र दिवस, श्रम दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के अलावा, विश्व जल दिवस और स्थानीय शासन…
  • समीना खान
    लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
    30 Apr 2022
    बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद…
  • अजय कुमार
    पाम ऑयल पर प्रतिबंध की वजह से महंगाई का बवंडर आने वाला है
    30 Apr 2022
    पाम ऑयल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। मार्च 2021 में ब्रांडेड पाम ऑयल की क़ीमत 14 हजार इंडोनेशियन रुपये प्रति लीटर पाम ऑयल से क़ीमतें बढ़कर मार्च 2022 में 22 हजार रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गईं।
  • रौनक छाबड़ा
    LIC के कर्मचारी 4 मई को एलआईसी-आईपीओ के ख़िलाफ़ करेंगे विरोध प्रदर्शन, बंद रखेंगे 2 घंटे काम
    30 Apr 2022
    कर्मचारियों के संगठन ने एलआईसी के मूल्य को कम करने पर भी चिंता ज़ाहिर की। उनके मुताबिक़ यह एलआईसी के पॉलिसी धारकों और देश के नागरिकों के भरोसे का गंभीर उल्लंघन है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License