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भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: उद्योगों के ख़त्म होते जाने का दुखद पहलू
जदयू-भाजपा की सरकार उद्योगों को बढ़ावा देने में नाकाम रही है, जिससे पिछड़ापन और ग़रीबी, दोनों बने हुए हैं।
सुबोध वर्मा
02 Nov 2020
बिहार चुनाव

यदि आप कभी यह देखना चाहते हैं कि औद्योगिक उत्पादन की कमी किसी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था को कहां लाकर खड़ा कर देती है, तो इस लिहाज़ से बिहार एक ऐसा सूबा है, जहां आपको आना चाहिए। 'विकास' और 'सुशासन'  के तमाम दावों के बावजूद, बिहार की नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने न सिर्फ़ औद्योगिक ठहराव पैदा कर दिया है, बल्कि इस सरकार के मौजूदा कार्यकाल के पिछले कुछ वर्षों में सही मायने में कारखानों और श्रमिकों की संख्या में भी गिरावट आयी है।

इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि ये वो साल थे, जब उन्होंने 2015 के राज्य विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ जीत हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया था। लिहाजा, उनके पीछे मोदी सरकार का पूरा समर्थन था और उनकी राजनीतिक ताक़त भी थी। इसके बावजूद, इसका नतीजा बिहार के उभरते हुए औद्योगिक क्षेत्र के लिए किसी आपदा से कम नहीं रहा।

जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से पता चलता है कि कारखाना अधिनियम के तहत पंजीकृत इकाइयों का वार्षिक सर्वेक्षण करने वाले कारखानों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASI) से प्राप्त नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक़, वर्ष 2015-16 में इकाइयों की संख्या 3,623 पर पहुंचकर अपने उच्च स्तर पर थी,लेकिन 2017-18 में यह संख्या घटकर 3461  हो गया है।

इस औद्योगिक परिदृश्य की ख़ास बात यह है कि कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या बुरी तरह कम हुई है और पिछले कुछ सालों में तो यह तक़रीबन एक लाख तक रह गयी है। जिस राज्य की कामकाजी उम्र की आबादी सात करोड़ से ज़्यादा हो,एक लाख की यह संख्या इस आबादी का लगभग 0.1% हिस्से का ही प्रतिनिधित्व करती है।

इस प्रकार, यह हैरत नहीं पैदा करता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान (जैसा कि सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) द्वारा मापा जाता है) देश में सभी प्रमुख राज्यों में सबसे कम, यानी 19% है। वास्तव में, सिर्फ़ उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का अपने सम्बन्धित जीएसडीपी में कम औद्योगिक योगदान है।

कैसी है एमएसएमई सेक्टर की स्थिति?

यह सोचा जा सकता है कि शायद सूक्ष्म,लघु एवं मझोले उद्यम (MSME) वाला सेक्टर फल-फूल रहा हो, और कम से कम बिहार की अर्थव्यवस्था की कमी को यह आंशिक रूप से पूरा कर रहा हो। लेकिन ऐसा लगता नहीं है।

भारतीय रिज़र्व बैंक की तरफ़ से 2015-16 में राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के संग्रह के मुताबिक़, बिहार में 35 लाख सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (MSME) थे, जो 2006-07 में लघु स्तरीय उद्योगों की अखिल भारतीय गणना में तक़रीबन 15 लाख थे। यह एक शानदार और सही मायने में एक नाटकीय बढ़ोत्तरी दिखायी देती है। हालांकि, ये आंकड़े स्पष्ट अनिश्चितता के एक कोहरे में लिपटे हुए हैं।

इस उच्च आंकड़ा की रिपोर्ट राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) द्वारा अनिगमित उद्यमों के सर्वेक्षण में की गयी थी और इसमें सभी उद्योगों के लिए फ़सल पैदा करने वाले उद्यमों (सार्वजनिक क्षेत्र और ग़ैर-लाभकारी उद्यमों को छोड़कर) को शामिल किया गया था। इसमें ‘ख़ुद के श्रम से चलने वाले उद्यम’ भी शामिल थे, जो किसी काम के लिए श्रमिक नहीं रखते हैं। दूसरे शब्दों में, वे घरेलू व्यवसाय हैं, जैसे कि पकौड़े बेचना। इसके और भी उदाहरण हैं; जैसे कि सड़क के किनारे चाय या तंबाकू उत्पाद बेचना, या सड़क किनारे मोटरबाइक की मरम्मत करने का काम, गलियों में पैदल या ठेले पर घूम-घूमकर सामान बेचने के काम आदि।

जैसा कि विधि एवं केंद्रीय मंत्रालय द्वारा परिभाषित किया गया है, और जैसा कि पारंपरिक रूप से माना भी जाता है कि एमएसएमई क्षेत्र में वे उद्यम शामिल नहीं होते हैं,जिनमें कोई ख़ुद के श्रम से उद्यम चलाता हो। असल में एमएसएमई की आधिकारिक परिभाषा रोज़गार के आधार पर नहीं, बल्कि निवेश के आधार पर पारिभाषित रही है। लेकिन, इस साल मई में मोदी सरकार ने इस परिभाषा में संशोधन कर दिया और सूक्ष्म उद्यमों को एक करोड़ रुपये के निवेश और पांच करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाले उद्यमों के तौर पर परिभाषित कर दिया गया। इसी तरह, छोटे और मझोले उद्यमों के लिए भी निवेश की मात्रा को आगे किया गया। साफ़ है कि जिन उद्यमों पर विचार किया जा रहा है, उनमें लाखों या करोड़ों रुपये के निवेश होते है, और वे सड़क किनारे कुछ बेचने वाले या मरम्मत करने वाले मैकेनिक भर नहीं होते हैं, जिनके पास कहने के लिए भी कोई निवेश या टर्नओवर नहीं है।

यही वजह है कि बिहार के एमएसएमई सेक्टर में इन ख़ुद के श्रम से चलने वाले उद्यमों को शामिल करने का एक ऐसा बड़ा इंद्रजाल है, जिसे लगता है कि ख़ुद केंद्रीय मंत्रालय से रचा है, क्योंकि इस आंकड़े को जारी करते हुए वे भी उसी एनएसएसओ सर्वेक्षण रिपोर्ट को उद्धृत करते हैं।

ऐसे में सवाल यही पैदा होता है कि बिहार में आख़िर इसकी वास्तविक संख्या क्या होगी? राज्य सरकार के आधिकारिक प्रकाशनों में उद्धृत उद्योग विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़, 2018 तक बिहार में 7.89 लाख एमएसएमई थे। उनमें रोज़गार पाने वालों की तादाद को तक़रीबन 16 लाख बताया गया था। यह आंकड़ा विभाग के पास किये गये पंजीकरण के आधार पर आया है और इसलिए एक कहीं ज़्यादा मान्य आंकड़े को दर्शाता है, हालांकि इनमें से कितने अभी भी चालू हैं,इस बारे में कोई भी अनुमान हमारे पास नहीं है।

ज़ाहिर है, बिहार में एमएसएमई सेक्टर का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं है। महामारी और लॉकडाउन के बहाने नीतीश कुमार की सरकार ने मज़दूरों और कर्मचारियों के लिए कार्य-दिवस को आठ घंटे से लेकर 12 घंटे तक बढ़ाने में कई दूसरे राज्यों का अनुसरण करने में जल्दबाज़ी दिखायी है। इससे तो यही पता चलता है कि नीतीश और उनके शुभचिंतक, प्रधानमंत्री मोदी,दोनों ही बिहार में जो भी उद्योगपति हैं, उनके हितों की सुरक्षा को लेकर बेचैन हैं।

लेकिन, ये दोनों बुद्धिमान पुरुष, जिनमें से दोनों का ही दावा है कि वे विकास के पुजारी हैं,ये दोनों ही बिहार में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं – और दोनों ने इस सूबे को और कुछ वर्षों तक के लिए उद्योगों के ख़त्म होते जाने की दुखद स्थिति और पिछड़ेपन के हवाले कर दिया है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar Elections: The Tragic Face of De-Industrialisation

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