NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
बिहार: नीतीश जी की ‘आदर्श व्यवस्था’ में धान की आधी कीमत भी मयस्सर नहीं
आइए जानते हैं उस बिहार के किसानों का हाल, उनकी सच्ची कहानी, जहां 2006 में ही सरकार ने किसानों को मंडी व्यवस्था से बचाने के लिए एपीएमसी एक्ट को खत्म कर दिया था। वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र की ख़ास रिपोर्ट
पुष्यमित्र
08 Dec 2020
बिहार
सरकारी ख़रीद के इंतज़ार में ब्रह्मानंद ठाकुर के दरवाजे पर पड़ा धान। फोटो : पुष्यमित्र

ब्रह्मानंद ठाकुर मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड के किसान हैं। उनके दरवाजे पर पिछले डेढ़ महीने से बोरियों में 40 क्विंटल धान रखा हुआ है। वे इस इंतजार में हैं कि धान की सरकारी खरीद शुरू हो और इसे वे बेच सकें। वे कहते हैं, वैसे तो बिहार में धान की सरकारी खरीद 15 नवंबर से ही शुरू करने का नियम है, मगर हर साल इसे कायदे से शुरू होने में आधा दिसंबर बीत जाता है। अब 25 अक्टूबर के आसपास तैयार धान की फसल को किसान कैसे 15-20 दिंसबर तक बचा कर रखे। नमी में खराब होने और चूहों द्वारा बर्बाद करने का खतरा तो रहता ही है, कई किसानों के सिर पर कई तरह की मजबूरियां होती हैं। रबी की बुआई करनी है, बेटी की शादी करनी है, घर के बीमार सदस्य का इलाज कराना है, बच्चों की फीस जमा करनी है। उसे तत्काल पैसों की जरूरत होती है और वह सरकारी खरीद के शुरू होने का इंतजार नहीं कर पाता।

सरकारी ख़रीद का इंतज़ार

ब्रह्मानंद ठाकुर के ही गांव के किसान विकास चौधरी, भिखारी राम और रामकिशोर ठाकुर ने अपना धान मजबूरन 1150 रुपये प्रति क्विंटल की दर से स्थानीय गल्ला व्यापारी को बेच दिया। वे धान की सरकारी खरीद शुरू होने का इंतजार नहीं कर पाये। ब्रह्मानंद ठाकुर कहते हैं, मामला सिर्फ खरीद शुरू होने के इंतजार करने का नहीं है अगर किसान दिसंबर तक इंतजार कर भी ले, उनका धान खरीद भी लिया जाये तो इस बात की गारंटी नहीं है कि उन्हें फसल की पूरी कीमत हाथो-हाथ मिल जायेगी। वे कहते हैं, पिछले साल मैंने 25 दिसंबर को अपनी धान की फसल बेची थी, काफी जद्दोजहद और पैरवी लगाने के बाद 18 अप्रैल को उन्हें धान का पैसा दिया गया, वह भी प्रति क्विंटल पांच किलोग्राम की कटौती करके। इतना धैर्य बहुत कम किसान रख पाते हैं, क्योंकि ज्यादातर किसान काफी गरीब होते हैं। घरेलू जरूरतें उनके सिर पर सवार होती हैं और वे हर जरूरत को अगहन महीने तक टालते रहते हैं कि धान बिकेगा तो काम कर लिया जायेगा। ऐसे में एक तो खरीद देर से शुरू होती है और सुस्त गति से चलती है, फिर किसानों के लिए पैसा लेना एक बड़ा काम हो जाता है। ऐसे में मजबूरन वह आधी कीमत में अपनी फसल व्यापारियों को बेच देता है।

यह उस बिहार की कहानी है, जहां 2006 में ही सरकार ने किसानों को मंडी व्यवस्था से बचाने के लिए एपीएमसी एक्ट को खत्म कर दिया था। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अभी भी इस उपलब्धि का खूब क्रेडिट लेते हैं। उन्होंने कहा है कि बिहार में 2006 से ही एपीएमसी एक्ट को खत्म कर दिया गया है और इससे किसानों को कोई परेशानी नहीं हुई है। मगर बिहार सरकार के इस साल के आंकड़े भी कहते हैं कि राज्य में धान को एमएसपी पर बेच पाना किसानों के लिए आज भी सपना है। बिहार के सहकारी विभाग के अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक 7 दिसंबर तक राज्य में सिर्फ 2922 किसान ही अपनी धान की फसल सरकारी क्रय केंद्रों में बेच पाये हैं। जमुई, लखीसराय, सारण, शेखपुरा और सीतामढ़ी जैसे जिलों में तो सरकारी क्रयकेंद्रों में धान बेचने वाले किसानों की संख्या दहाई में भी नहीं पहुंच पायी है। अभी तक सिर्फ 23500 मीट्रिक टन धान की ही खरीद हुई है, जबकि सरकार का दावा है कि उसने इस बार कुल 45 लाख मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा है।

राज्य सरकार ने कुल 5118 एजेंसियों को धान खरीद का जिम्मा दिया है। अगर यह माना जाये कि हर एजेंसी में एक किसान ने ही अब तक अपना धान बेचा होगा तो भी आधे के करीब एजेंसियों में अब तक धान की खरीद शुरू नहीं हो पायी है। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि राज्य में धान की सरकारी खरीद की स्थिति कैसी है।

खलिहान में तैयार होता धान

क्या है बिहार में धान खरीद की नयी व्यवस्था

एपीएमसी एक्ट के खत्म होने से पहले बिहार में भी सरकारी मंडियों में धान की खरीद होती थी। मगर नयी व्यवस्था में सरकार ने हर पंचायत में किसानों की कोऑपरेटिव संस्था पैक्स का गठन करवाया और उनके साथ-साथ व्यापार मंडलों को खरीद का जिम्मा दिया। अपनी फसल बेचने के लिए किसानों को राज्य के सहकारिता विभाग के पास अपना निबंधन कराना पड़ता है और यह निबंधन ऑनलाइन होता है। तकनीकी ज्ञान और सुविधाओं के अभाव में छोटे किसान और निबंधन भी नहीं करा पाते। ताजा आंकड़ों के मुताबिक राज्य में सिर्फ 1,37,055 किसानों ने ही निबंधन कराया है। जबकि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि राज्य में किसान सम्मान निधि के लिए ही 41 लाख के अधिक किसानों ने पंजीकरण कराया है। जबकि माना जाता है कि राज्य में किसान परिवारों की संख्या लगभग एक करोड़ है। इससे यह साफ समझा जा सकता है कि राज्य के ज्यादातर किसान अभी भी सरकारी खरीद की व्यवस्था से बाहर हैं।

क्या है सरकारी खरीद की गड़बड़ियां

पूर्णिया जिले के धमदाहा गांव के किसान अमर जी मंडल कहते हैं, भले ही हर पंचायत में सरकार ने सरकारी खरीद की व्यवस्था शुरू करवा दी है, मगर अमूमन छोटे किसान और बटाईदार इस खरीद के भरोसे नहीं रहते। इसकी बड़ी वजह खरीद की शुरुआत देर से होना, छोटे किसानों को कभी नमी के नाम पर कभी दूसरे तरीके से परेशान किया जाना और पेमेंट में समय लगना है। ऐसे में इस क्रयकेंद्रों में कुछ बड़े किसान और पैक्स या व्यापार मंडल के अध्यक्ष के करीबी लोग ही अपना धान बेच पाते हैं।

हालांकि इसके बावजूद सरकारी आंकड़ों में हर साल अमूमन 15 से 20 लाख क्विंटल धान की खरीद का ब्योरा दर्ज हो जाता है। ब्रह्मानंद ठाकुर का आरोप है कि यह सब पैक्स अध्यक्ष औऱ सरकारी अधिकारियों की मिली भगत से होता है और जो छोटे व्यापारी किसानों से एक हजार और ग्यारह सौ रुपये क्विंटल की दर से नवंबर-दिसंबर में धान खरीदते हैं, वही जनवरी-फरवरी और मार्च में गैर रैयत कृषक यानी बंटाईदार बनकर पैक्स को धान बेच देते हैं। कई बार वे छोटे किसानों के निबंधन का भी लाभ लेते हैं। इस तरह सरकारी खरीद में ज्यादातर धान इन्हीं गल्ला व्यापारियों का होता है, मुनाफा पैक्स और व्यापार मंडल के अध्यक्षों, सरकारी अधिकारियों और इनके बीच बंट जाता है। किसान को हर बार ठग लिया जाता है। अखबारों और मीडिया में धान की सरकारी खरीद का खूब ढिंढोरा पीटा जाता है, मगर 90 फीसदी किसान हर बार एमएसपी से आधी कीमत पर अपना धान मजबूरन बेचता है।

पंजाब-हरियाणा-यूपी और बंगाल जाता है धान

बिहार में एपीएमसी एक्ट खत्म होने का लाभ पंजाब, हरियाणा, वेस्टर्न यूपी और बंगाल जैसे राज्यों के राइस मिलर उठाते हैं। चूंकि सरकारी प्रावधान के मुताबिक उन्हें जनवितरण प्रणाली के लिए चावल का कोटा उपलब्ध कराना होता है। इसलिए वे इस सीजन में बिहार आकर यहां के किसानों से कम गुणवत्ता वाला धान खरीदते हैं, वे खुद बासमती और अच्छी क्वालिटी का चावल बाजार में उपलब्ध कराते हैं और एक्सपोर्ट करते हैं, जबकि यहां का धान पीडीएस में वितरण के लिए सरकार को उपलब्ध कराते हैं। इस वक्त बिहार के लगभग सभी सीमावर्ती जिलों में इन राज्यों के ट्रक लगे बिहार के किसानों से औने-पौने दर पर धान खरीदते नजर आ जाते हैं। जाहिर है कि एपीएमसी व्यवस्था को हटाना उनके लिए नुकसान का सबब ही बन रहा है।

आय के आंकड़े भी कहते हैं बदहाली की कहानी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही यह दावा करें कि एपीएमसी एक्ट हटाने से बिहार के किसानों को लाभ हुआ है, मगर आंकड़े कहते हैं कि आय के मामले में बिहार के किसान अभी भी देश में सबसे पिछड़े हैं। नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक जहां पंजाब जैसे राज्य में किसानों की औसत मासिक आय 16,020 रुपये हैं, वहीं बिहार में किसानों की औसत मासिक आय सिर्फ 3558 रुपये है। यही वजह है कि बिहार के बड़े पैमाने पर मजदूर खेती के काम में रोजगार तलाशने हर साल पंजाब जाते हैं। दिलचस्प है कि देश में सबसे अधिक मासिक आय कमाने वाले पंजाब के किसान आज एपीएमसी कानून को बरकरार रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं और देश में सबसे कम आय पाने वाला बिहार का किसान जहां की सरकार ने 14 साल पहले एपीएमसी मंडियों को खत्म कर दिया है, अपनी उपज आधी कीमत में बेचने को विवश है।

(पटना स्थित पुष्यमित्र वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Bihar
Bihar Farmer
APMC Act
Nitish Kumar
Nitish Kumar Government
agrarian crises
paddy farmers
Paddy MSP

Related Stories

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान

ग्राउंड रिपोर्ट: कम हो रहे पैदावार के बावजूद कैसे बढ़ रही है कतरनी चावल का बिक्री?

पीएम के 'मन की बात' में शामिल जैविक ग्राम में खाद की कमी से गेहूं की बुआई न के बराबर

बिहारः खाद न मिलने से परेशान एक किसान ने की आत्मदाह की कोशिश

किसान आंदोलन : पूरे 378 दिनों का ब्यौरा

MSP की लड़ाई जीतने के लिए UP-बिहार जैसे राज्यों में शक्ति-संतुलन बदलना होगा

बिहार खाद संकटः रबी की बुआई में देरी से किसान चिंतित, सड़क जाम कर किया प्रदर्शन

कृषि क़ानूनों के वापस होने की यात्रा और MSP की लड़ाई

खेती गंभीर रूप से बीमार है, उसे रेडिकल ट्रीटमेंट चाहिएः डॉ. दर्शनपाल


बाकी खबरें

  • indian economy
    अजय कुमार
    क्या 2014 के बाद चंद लोगों के इशारे पर नाचने लगी है भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति?
    18 Nov 2021
    क्या आपको नहीं लगता कि चंद लोगों के पास मौजूद बेतहाशा पैसे की वजह से भारत की पूरी राजनीति चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूरों ने की मुआवज़े की मांग, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरें
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी मज़ार रहेगी निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूर संकट में, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरों पर।
  •  कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर गरीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    न्यूज़क्लिक टीम
    कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर ग़रीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह और न्यूज़क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ ने कॉप-26 में जलवायु परिवर्तन पर किए गए एग्रीमेंट पर चर्चा की है।
  • congress
    सुहित के सेन
    राहुल जहां हिंदुत्व को धर-दबोचने में सफल, लेकिन कांग्रेस सांगठनिक तौर पर अभी भी कमज़ोर
    17 Nov 2021
    जहाँ एक तरफ विचारधारा चुनावों में सफलता पाने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है, वहीं इसके लिए एक सांगठनिक नींव अपनेआप में अपरिहार्य है।
  • judge
    भाषा
    लखीमपुर हिंसा: एसआईटी जांच की निगरानी पूर्व न्यायाधीश राकेश कुमार जैन करेंगे
    17 Nov 2021
    पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए आईपीएस अधिकारियों के नामों पर भी गौर किया और जांच के लिए गठित एसआईटी में तीन आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License