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बिहार: बाढ़़ प्रभावित इलाकों में कैसे होगा पंचायत का चुनाव; कैसी हैं चुनाव आयोग की तैयारियां
बिहार में 11 चरणों में पंचायत चुनाव कराए जाने पर मुहर लग गई है। 24 सितम्बर से शुरू होने वाले पंचायत चुनाव के लिए आखिरी चरण का मतदान 12 दिसंबर को होगा।
राहुल कुमार गौरव
06 Sep 2021
बिहार: बाढ़़ प्रभावित इलाकों में कैसे होगा पंचायत का चुनाव; कैसी हैं चुनाव आयोग की तैयारियां
बिहार के दरभंगा जिला स्थित कुशेश्वरस्थान के अशरफी मंडल

बिहार के अधिकतर गांवों के लोग मुखिया और सरपंची के चुनाव की तैयारी में लगें हुए हैं। वहीं दरभंगा के पूर्वी प्रखंड में पानी से घिरे गांवों में लोग बोट, राहत शिविर और सामुदायिक रसोई के भरोसे अपनी जिंदगी को जीने की कश्मकश में लगे हुए हैं।

कुशेश्वरस्थान के विजय यादव जो 68 साल के हैं, उन्होंने न्यूजक्लिक को बताया कि, “कुशेश्वरस्थान क्षेत्र को बाढ़़ के पानी का अघोषित ससुराल कहा जाता है। हालत यह है कि छह से आठ महीने तक ये इलाका बाढ़़ के पानी की चपेट में रहता है। हमें अपने लिए राहत शिविर और सामुदायिक भोजन की लड़ाई लड़ने से फुर्सत नहीं है। चुनाव की बात तो यहां बहुत दूर है।”

वहीं कुशेश्वरस्थान के अशरफी मंडल बताते हैं कि पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के सहारे आयोग चुनाव करवा भी लें तो इस क्षेत्र से बहुत कम की संख्या में वोट गिरेगी। वह आगे कहते हैं, “बाढ़़ के पानी, सरकार की नाकामी के साथ आने-जाने का रास्ता न होने के चलते आमजनों की सक्रियता चुनाव को लेकर कम रहती है और यही कारण रहता है कि यहां चुनाव का दिन भी आम दिनों की तरह ही रहता है।"

बिहार में 11 चरणों में पंचायत चुनाव कराए जाने पर मुहर लग गई है। 24 सितम्बर से शुरू होने वाले पंचायत चुनाव के लिए आखिरी चरण का मतदान 12 दिसंबर को होगा।

चुनाव की तिथि के बाद बिहार के गांव के हालात भी जान लेते हैं जहां चुनाव होने हैं

आपदा प्रबंधन विभाग की बाढ़़ रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में बाढ़़ से अभी 16 जिले प्रभावित हैं। इन 16 जिलों के 88 प्रखंडों के 600 पंचायत बाढ़़ से प्रभावित है। इनमें 1975 गांवों में 29 लाख की आबादी बाढ़़ की समस्या से घिरी हुई है।

इन 29 लाख बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राज्य सरकार द्वारा सिर्फ 161 कम्युनिटी किचन चल रहे हैं, जिनमें गत 2 सितंबर को दोनों शाम मिला कर कुल 1 लाख 51 हजार 369 लोगों को भोजन कराया गया था। 

इन हालात के बाद आने वाले वक्त में पंचायत चुनाव कितना प्रभावी होगा? इस सवाल का जवाब बिहार बाढ़ पर  सालों काम कर चुके चन्द्रशेखर झा देते हैं कि इस बार बाढ़ के दौरान कटाव के वजह से सिर्फ सुपौल जिला में हजारों परिवारों को विस्थापित होना पड़ा है। बिहार में सैकड़ों गांवों के लोगों को दूसरे गांव में जाकर आशियाना बनाना पड़ा है। क्या इस बार के चुनाव में इन लाखों लोगों के वोट की गिनती होगी।"

मो.इनाम, जो बिहार के नवादा जिले के नरहट गांव के रहने वाले हैं, न्यूज क्लिक को बताते हैं कि हमारे गांव के लोगों का जिला मुख्यालय से संपर्क का साधन धनार्जय नदी पर बना डायवर्ज़न था जो इसबार बाढ़ में डुब गया। वह आगे कहते हैं, “इस वजह से तकरीबन एक दर्जन गांव के हजारों लोगों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हो गई है। इससे पहले भी ग्रामीणों ने श्रमदान से ही टूटे डायवर्ज़न की भराई की थीं। फिलहाल, लोगों को घूमकर जाना पड़ता हैं। ऐसे में महिलाओं की अधिकतम संख्या वोट देने नहीं जाएगी।"

अभी तक कोई सरकारी आंकड़ा तो नहीं हैं। लेकिन सिर्फ सुपौल जिला में 100 से अधिक मामले डायवर्ज़न और रोड टूटने की आ चुकी हैं।

अगस्त से ज्यादा सितंबर में बारिश होगी

बाढ़़ग्रस्त इलाकों के पंचायतों में पानी कम होने से बाढ़़ में क्षतिग्रस्त हो चुके मतदान केंद्रों को अन्यत्र स्थानांतरित करने सहित अन्य कार्य किए जाएंगे। लेकिन मुश्किल यह है कि अभी पूरा सितंबर अभी बाकी है।

पूरे देश की बात की जाए तो अगस्त महीने में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी, लेकिन अब सितम्बर में सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान है। आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने बताते हैं कि सितम्बर में मध्य भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान है। 

चुनाव आयोग की क्या तैयारी हैं

बिहार में बाढ़ के हालात को देखते हुए पहले उन प्रखंडों में चुनाव कराए जाने की संभावना है जहां बाढ़ का प्रभाव नहीं है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में मतदान अंतिम चरणों में होगा।

तो क्या बाढ़ से चुनाव पर फर्क नहीं पड़ेगा? इस सवाल का जवाब राज्य चुनाव आयोग के एक अधिकारी बिना नाम बताने की शर्त पर न्यूज़क्लिक से कहा, "पंचायत चुनाव के लिए बाढ़ प्रभावित जिलों से जल-जमाव वाली पंचायतों की रिपोर्ट मांगी गयी है। इस रिपोर्ट के आधार पर उनके एरिया में चुनाव की तिथि निर्धारित की जायेगी।"

आगे अधिकारी साहब बताते हैं कि वैसे चुनाव तक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पंचायतों से पूरी तरह पानी निकलने की संभावना कम है। ये भी एक सच है कि पंचायत के मतदाता भी बाढ़ राहत शिविरों में रहते हैं, ऐसे में उनकी चुनाव में भागीदारी कम होगी।

बाढ़ और चुनाव एक समान

सहरसा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता विनय कुमार वर्मा ने न्यूज़क्लिक को बताया, "बाढ़ और चुनाव में एक समानता है। दोनों कचरे को बाहर निकलने का रास्ता देती हैं। लेकिन इस बाढ़ के कारण चुनाव सही कचड़े को निकाल नहीं पाएगी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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