NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार: मेहसी सीप बटन उद्योग बेहाल, जर्मन मशीनों पर मकड़ी के जाल 
बिहार के पूर्वी चंपारण के मेहसी स्थित विश्व प्रसिद्ध सीप-बटन उद्योग की मशीनों पर मकड़ी के जाले लग चुके हैं। बिजली की सप्लाई नहीं है। उद्योग यूनिट दर यूनिट बंद हो रहे हैं। इस उद्योग के कारीगर पंजाब-हरियाणा के खेतों में काम करने के लिए पलायन कर चुके हैं।
शशि शेखर
26 Oct 2021
Mehsi oyster button industry

याद कीजिये, 2020 का साल, एक तरफ लाखों बिहारी मजदूर पलायन कर के वापस बिहार आ रहे थे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा कर रहे थे। अद्भुत मंजर था। एक तरफ इंसानियत सड़क पर दम तोड़ रही थी, दूसरी तरफ राजनीतिक निर्लज्जता ये दावा कर रही थी कि अब किसी भी बिहारी मजदूर को दो जून की रोटी कमाने के लिए बिहार से बाहर नहीं जाने देंगे। भाजपा के नेता हों या स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, योजनाओं पर योजनाओं की बारिश किए हुए थे। खैर, कोरोना का कहर कम हुआ, वैसे ही पंजाब-हरियाणा की बसें बिहार के गांवों में घूमने लगीं। बिहारी मजदूर एक बार फिर अपना देस छोड़ कर परदेसी होने को मजबूर होने लगे। और हों भी क्यों ना, जब खुद अपने यहाँ के उद्योग धंधों पर मकड़ी के जाले लग चुके हों।

किस्मत पर मकड़ी के जाले 

न्यूजक्लिक आपको बिहार के पूर्वी चंपारण के मेहसी स्थित विश्व प्रसिद्ध सीप-बटन उद्योग की कहानी बता रहा है, जहां जर्मन तकनीक से स्थापित मशीनों पर मकड़ी के जाले लग चुके हैं। बिजली की सप्लाई नहीं है. यूनिट दर यूनिट बंद हो रहे है। इस उद्योग के कारीगर पंजाब-हरियाणा के खेतों में काम करने के लिए पलायन कर चुके हैं। पूर्वी चंपारण व मुजफ्फरपुर की सीमा पर स्थित मेहसी में स्थापित जर्मन टेक्नॉलोजी वाली सीप बटन मशीनों में मकड़ों ने जाल बना लिए है। रख-रखाव ठीक से नहीं होने व उसके चालू नहीं होने के कारण सभी मशीनों में मकड़ी के जाल लगे हुए हैं। मशीन जंग खा रही हैं। मेन मेहसी व बथना में, इसी साल जनवरी माह में मुख्यमंत्री सूक्ष्म लघु उघोग क्लस्टर योजना के तहत 94 आधुनिक मशीनें स्थापित की गयी थीं। मशीनों के स्थापित होने से लगा था कि मेहसी का बटन उघोग एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटेगा और प्रतिदिन लाखों बटन का उत्पादन करेगा। यूनिट्स चालू होने से कोरोना काल में हुए हजारों बेरोजगारों को रोजगार मिलेंगे और घरों में खुशहाली लौटेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह उद्योग एक बार फिर समस्याओं में उलझ कर रह गया।

न बिजली, न लोन

मेहसी सीप बटन उद्योग के एक क्लस्टर के अध्यक्ष हाजी जैनूल बताते हैं कि बिजली आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होने के कारण इस तरह की स्थिति बनी और स्थापित होने के साथ ही ये जर्मन मशीनें केवल शोभा की वस्तु बनकर रह गईं हैं। यहां बिजली एक बड़ी समस्या है और इस पर सरकार व विभाग ध्यान दे तो शीघ्र समस्याओं का समाधान हो जाएगा। मेहसी सीप उद्योग द्वारा उत्पादित बटन की मांग देश की राजधानी दिल्ली, हरियाणा, मुंबई सहित कई महानगरों में रहती है। मेहसी के ही सामाजिक कार्यकर्ता हामिद भाई बताते हैं कि आज तक किसी को भी इस उद्योग के लिए मुद्रा लोन नहीं मिला है। असल में ये लोग कच्चा माल नजदीक के ही बागमती और बूढ़ी गंडक नदी से खरीद लाते है. इस काम में हजारों की संख्या में कभी महिला मजदूर भी जुड़ीं हुईं थी, जिनकी संख्या घट कर आज दर्जन भर रह गयी है। ऐसी ही एक महिला मजदूर नसीमा खातून कहती हैं कि जब काम ही नहीं होगा तो मालिक कहाँ से पैसा देगा। नसीमा बताती हैं,“पहले 300 रुपए तक रोज कमा लेते थे, अब तो 150 रुपये कमाना भी मुश्किल हो गया है, काम जीरो हो गया है जीरो”।

ये भी पढ़ें: एक बार फिर बाढ़ की चपेट में उत्तर बिहार, जनजीवन बुरी तरह प्रभावित

मेहसी में ही सीप से फैशनेबल ज्वेलरी बनाने का काम करने वाले हैदर बताते हैं कि इंडस्ट्री डिपार्टमेंट ने यहाँ क्लस्टर विकास के प्रयास तो किए लेकिन बैंक हमें लोन देने के लिए तैयार ही नहीं है। उनका माल तमिलनाडु से गोवा तक जाता था, आजकल काम मंदा हो गया है। वजह, वही कि पैसे की कमी है। हामिद भाई, हैदर और जैनूल एक स्वर में बताते हैं कि पीएम द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज में से इस उद्योग को आज तक एक रुपया भी नहीं मिल सका है।

हैदर 

देसी तकनीक, स्थानीय कच्चा माल, फिर भी बुरा हाल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकल पर वोकल का नारा देते हैं, लेकिन लोकल पर वोकल की क्या दुर्दशा है, इसका जीता-जागता उदाहरण है, मेहसी का सीप बटन उद्योग। मेहसी व आसपास के इलाके में करीब तीन सौ सीप बटन, ज्वेलरी बनाने की फैक्ट्रियां चलती थीं, जो अब 25 हो गयी हैं। ये सभी फैक्ट्रियां लोकल रॉ मैटेरियल से, लोकल देसी तकनीक से उत्पादन करती हैं और सरकार के मेक इन इंडिया व लोकल पे वोकल के सपनों को धरातल पर उतारती हैं। बगल में गंडक और बागमती नदी होने के कारण मैटेरियल के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन अब यूनिट्स के लगातार बंद होने से एक बड़ी आबादी के रोजी रोटी पर संकट आ गया है। 

सरकारी जुमलों की पोल-खोल

मेहसी में सीप बटन उद्योग, पूरे देश में अपनी तरह का एक मात्र उद्योग है, जिसने दुनिया में प्रसिद्धि अर्जित की थी. मेहसी एक छोटा बाजार है, जो मेहसी रेलवे स्टेशन के करीब 48 किमी दूरी पर है। इस उद्योग की शुरुआत स्कूल के एक उद्यमी सब-इंस्पेक्टर ने की थी। मेहसी के भुलावन लाल ने 1905 में सिकरहना नदी में पाए गए ऑयस्टर से बटनों का निर्माण शुरू किया था। स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित करने के विचार ने उन्हें ऐसे बटनों के निर्माण के लिए प्रेरित किया। ये बात 1905 की है, तब अंग्रेजों का ज़माना था। इस उद्योग को अंग्रेज सरकार ने भी मदद दी थी, लेकिन आज अपनी सरकार है तो यह उद्योग अब अंतिम साँसे ले रहा है। सरकारी उदासीनता एक बहुत बड़ा कारण तो है ही, लेकिन इसके अलावा यहाँ इस उद्योग को कुछ लालची लोगों की भी नजर लग गयी है। मेहसी के ही गांधीवादी व सामाजिक कार्यकर्ता अमर भाई बताते हैं कि चंद पैसे वाले लोग चाहते हैं कि इस उद्योग पर उनका एकछत्र कब्जा हो। जबकि, पहले ये उद्योग घर-घर चलता था, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ था। लेकिन, जब से बहुत ही सस्ते में बनने वाले सीप बटन और ज्वेलरी की मांग दूसरे राज्यों और देशों में बढ़ने लगी, तब से कुछ लालची लोगों की बुरी नजर इस उद्योग को लग गयी। बहरहाल, मेहसी का सीप बटन उद्योग मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी जुमलों, जैसे मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, मुद्रा लोन, लोकल पर वोकल को मुँह चिढ़ाता नजर आ रहा है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Bihar
Mehsi oyster button industry
East Champaran
unemployment
poverty
SEEP INDUSTRY CLUSTER

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

मिड डे मिल रसोईया सिर्फ़ 1650 रुपये महीने में काम करने को मजबूर! 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया


बाकी खबरें

  • kashmir jammu
    सुहैल भट्ट
    विशेषज्ञों के मुताबिक़ कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति अपने कगार पर है
    27 Dec 2021
    जम्मू-कश्मीर में तनाव से मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका बड़ा कारण साल 2019 में हटाई गई धारा 370 को मुख्य माना जा रहा है, खुद को कैदी जैसा महसूस कर रहे जम्मू-कश्मीर के लोगों में…
  • Ethiopia
    पीपल्स डिस्पैच
    अमेरिका समर्थित टीपीएलएफ़ ने इथियोपिया में जंग हारने के बाद संयुक्त राष्ट्र से सुरक्षा की गुहार लगाई
    27 Dec 2021
    संघीय सरकार की फ़ौज ने टीपीएलएफ़ को टिगरे राज्य में वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया, अब टीपीएलएफ़ शांति प्रक्रिया के लिए बातचीत शुरू करने की गुहार लगा रहा है। सरकार ने समूह के नि:शस्त्रीकरण और इसके…
  • Mental health
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: मानसिक सेहत गंभीर मामला लेकिन इलाज के लिए जाएं कहां?
    27 Dec 2021
    फ़रवरी 2019 में उत्तराखंड में मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण का गठन करने के लिए स्वीकृति प्रदान की गई। ये प्राधिकरण काग़ज़ों में भी पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है। प्राधिकरण में मानसिक स्वास्थ्य के लिए…
  •  Muzaffarpur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुज़फ़्फ़रपुर: हादसा या हत्याकांड!, मज़दूरों ने कहा- 6 महीने से ख़राब था बॉयलर, जबरन कराया जा रहा था काम
    27 Dec 2021
    बॉयलर छह महीने से ख़राब था। कामगारों ने ख़तरे की आशंका जताई थी। बॉयलर का सेफ्टी वाल्व भी ख़राब था। इसके विरोध में दो दिन तक मज़दूरों ने काम भी बंद रखा था लेकिन प्रबंधन ने इसको ठीक नहीं कराया था।
  • haridwar
    वसीम अकरम त्यागी
    राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग: आख़िर तुम किस मर्ज़ की दवा हो?
    27 Dec 2021
    हरिद्वार, आगरा से लेकर गुरुग्राम तक, त्रिपुरा से लेकर कर्नाटक तक, नमाज़ से लेकर चर्च की प्रार्थना सभा तक अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले हो रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिये बना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License