NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
कला
भारत
राजनीति
बिहार: मिथिला पेंटिंग ने पुरुष प्रधान और सामंती समाज में नारी मुक्ति और सामाजिक न्याय के खोले रास्ते!
उर्मिला पासवान  ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में बताया की कैसे उन्होंने इस कला के माध्यम से अपने परिवार और समाज को बदला। वे आज भी मैथली बोलती हैं और हिंदी बोलने में सहज नहीं हैं। उन्होंने कहा "मैं कला की वजह से ही देश के सभी राज्यों में गई हूं, अगर मैं पेंटिंग न करती तो शायद अपने गांव से भी बाहर न जा पाती।
मुकुंद झा
24 Sep 2020
उर्मिला पासवान

"मेरे पति रिक्शा चलाते थे और हमारे परिवार को बहुत ही मुश्किल से दो वक्त का भोजन मिलता था, उस समय मैंने मिथिला पेंटिंग बनानी शुरू की। परन्तु यह मेरे पति को पसंद नहीं थी और वो मेरे द्वारा बनाई गईं कलाकृतियों को चूल्हे में जला देते थे और मेरे साथ मारपीट भी करते थे। इसके बाद भी मैं चोरी चुपके पेंटिंग बनाती थी और उसका कुछ दाम मेरे को मिल जाता था, उसी पैसों से मै अपने बच्चों को पढ़ाती थी। यह भी मेरे पति को पसंद नहीं था। वो चाहते थे कि मैं बस घर का काम करूं। परन्तु जब मुझे 1985-86 में सरकार की तरफ से मेरी कला के लिए राज्य सम्मान मिला तब से मेरे पति का रवैया पूरी तरह से बदल गया। वो अब मुझे सम्मान की नज़रों से देखने लगे और मेरे साथ पुरस्कार लेने भी गए। उसके बाद से उन्होंने मेरा पूरा साथ दिया। इस कला ने मेरे जीवन को बदल दिया। आज इस कला के कारण ही मैंने अपने बच्चो को शिक्षा दी और आज सम्मान के साथ जी रही हूँ।"

ये कहानी है जितवारपुर निवासी 75 वर्षीय उर्मिला पासवान की, उर्मिला मिथिला पेंटिंग के गोदना (टैटू) विधा की सबसे वरिष्ठ कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने यह कला ग्राम जितवारपुर के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार स्वर्गीय चानो देवी से सीखी। उर्मिला पिछले 45 से अधिक सालों से इस कला का अभ्यास कर रही हैं। वह गाँव जितवारपुर, जो बिहार के मधुबनी से लगभग 5 किलोमीटर दूर है और वो वहीं रहकर काम करती हैं। उनकी कलात्मक यात्रा बिल्कुल आसान नहीं थी वो पासवान समुदाय से हैं जो अनुसूचित जाति है। इसकी पहचान बिहार में भूमिहीन के तौर पर भी है और इस समुदाय के साथ ऐतिहासिक तौर पर भेदभाव सामान्य है। इन सभी भेदभाव के साथ ही वो एक महिला थीं जिस कारण उन्हें और भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 

उर्मिला के पिता देबु पासवान मजदूरी करते थे और उनकी मां कौशल्या देवी एक आम गृहणी थीं। 15 वर्ष की आयु में उर्मिला का विवाह जितवारपुर के बिलट पासवान से हुआ। जो पहले होमगार्ड के तौर पर काम करते थे। फिर रिक्शा चलाने लगे। वो पूरी तरह से भूमिहीन थे। आज भी उर्मिला का मकान सरकारी ज़मीन इंदिरा आवास योजना से बना है। उनके चार बच्चे हैं। सबसे बड़े बेटे सरवन पासवान जिनकी उम्र इस समय लगभग 50 वर्ष के आसपास होगी। वो भी इस कला से जुड़े हैं और उन्होंने पढाई भी की है और वो इसके उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं। 

उर्मिला पासवान आज भी बेहद साधारण तरीके से जीवनयापन करती हैं। जब न्यूज़क्लिक की टीम उनसे मिलने के लिए उनके घर जा रही थी तब हमने गांव के बाहर जैसे ही उनका नाम पूछा तो सभी उन्हे जानते थे। तुरंत हमें उनके घर जाने का रास्ता दिखाया। हालांकि वो रास्ता पूरी तरह से कीचड़ और बरसात के पानी से भरा हुआ था। इस गांव में राज्य पुरस्कार प्राप्त रौदी पासवान, चानो देवी, महनमा देवी, दिलीप पासवान, उत्तम प्रसाद पासवान, उर्मिला देवी, धर्मशीला देवी मालेश्वरी देवी ,वीना देवी जैसे कई कलाकार हैं जिन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं।  यह भी एक दुर्भाग्य की बात है कि पूरे बिहार में जिस गांव में सबसे अधिक राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले कलाकार रहते हैं वहां का रास्ता इतना बुरा हो। शायद यह गाँव किसी और राज्य में होता तो वहां एक म्यूजियम होता और विकास की अलग ही चकाचौंध होती। खैर छोड़िए अभी बिहार में ऐसा कुछ नहीं है। वापस हम उर्मिला जी कहानी पर आते हैं।

इसे भी पढ़ें : बिहार चुनाव: मधुबनी पेंटिंग का भरपूर उपयोग लेकिन कलाकारों की सुध लेने वाला कोई नहीं

उर्मिला जी ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में बताया कि कैसे उन्होंने इस कला के माध्यम से अपना अपने परिवार और समाज को बदला। वे आज भी मैथली बोलती हैं और वो आज भी हिंदी बोलने में सहज नहीं हैं। उन्होंने कहा "मैं  कला के वजह से ही देश के सभी राज्यों में गई हूँ ,अगर मैं पेंटिंग न करती तो शायद अपने गांव से भी बाहर न जा पाती। मेरा परिवार जिस हालात में था उसमें दो वक़्त का खाना भी मुश्किल था। ऐसे में मुझे स्वर्गीय रौंदी पासवान जिन्होंने गोदना विधा को स्थापित किया, उन्होंने मुझे पेंटिंग करने के लिए कहा और उनकी पत्नी चानो देवी ने मुझे प्लेन पेपर दिया और बेसिक चित्रकारी बताया, उन्होंने सिर्फ मुझे हाथी और दुर्गा जी की तस्वीर बनाने सिखाई। इसके बाद मैंने खुद से ही गोदना पेंटिंग सीखी और कई पेंटिंग बनाकर देती थी उसके बाद वो मुझे पैसे देते थे जिससे मैं अपने बच्चों को पढ़ती थी।"

आगे उन्होंने कहा, इस कला ने हमारे परिवार को जीवन जीने के लिए आधार दिया अन्यथा शायद हमारा आज भी बुरा हाल होता। उर्मिला जी ने अपने राज्य पुरस्कार को याद करते हुए कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी कि उनके पेंटिंग को पुरस्कार मिला है। वो घर में काम कर रही थी। उसी समय किसी और ने आकर उन्हें बताया की उन्हें इनाम मिला है।" 

अंत में उन्होंने इतना ही कहा कि अगर सरकार पेंटिंग करने वाले कलाकरों को मदद ठीक से करे तो यह कला अपने नए आयम को छूएगी। उन्होंने कहा कि इस कला को प्रसिद्धी मिलने के बाद बिचौलिये ज्यादा हो गये हैं।  जिससे कलाकारों को इसका उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा सरकार से आग्रह है कि वह राष्ट्रीय स्तर का एक क्रय-विक्रय केंद्र बनाए, जहां कलाकार अपनी पेंटिंग को खुद बेच सकें।' 

उर्मिला जी की यह कहानी उदहारण है कि कैसे इस कला ने बिहार और खासतौर पर मिथिला के पुरुष प्रधान और सामंती समाज में नारी मुक्ति और सामाजिक न्याय के नए रास्ते खोले हैं। शुरुआती विरोध के बाद जातियों में बंटे समाज में इस कला से समरसता भी आई है। आज जितवारपुर का पासवान टोला इस पूरे इलाक़े में सबसे अधिक प्रसिद्ध क्षेत्र है। यहाँ के इन दलित परिवारों को बाकी समाज के लोगों भी सम्मान के साथ देखते हैं क्योंकि इन्होंने न केवल इस गांव का बल्कि बिहार के साथ ही देश का भी नाम रोशन किया है। आज इस गांव में बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी भी इस कला को देखने पहुँचते हैं। हालांकि बिहार के बाकी हिस्सों में आज भी बड़ी संख्या में दलितों का शोषण और अत्याचार जारी है। परन्तु इस कला ने यहां पर जातिगत भेदभाव को काफी हद तक कम किया है।

Bihar Polls
Madhubani
mithila painting
Mithila Art
Ramayana
Mahabharata
Dusadh community
Indian art

Related Stories

राम कथा से ईद मुबारक तक : मिथिला कला ने फैलाए पंख

मूर्तिकार रामकिंकर : मूर्ति शिल्प में जीवन सृजक

बिहार चुनाव: मधुबनी पेंटिंग का भरपूर उपयोग लेकिन कलाकारों की सुध लेने वाला कोई नहीं


बाकी खबरें

  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: किसान और राजनीति, क्या दिल्ली की तरह फ़तह होगा यूपी का मोर्चा!
    12 Dec 2021
    एक साल से भी ज़्यादा समय बाद किसान दिल्ली का मोर्चा जीत कर घर लौट रहे हैं। और जिनका यूपी, पंजाब में घर है उनके सामने आने वाला चुनाव है...जिसमें उन्हें अपने हक़ में एक नई सरकार चुननी है। यूपी का किसान…
  • CBSE
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: प्रश्न पूछो, पर ज़रा ढंग से तो पूछो
    12 Dec 2021
    अभी ऐसे ही, बारहवीं कक्षा की परीक्षा में एक प्रश्न पूछ लिया गया कि किस सरकार के तहत सन् दो हजार दो में गुजरात में अप्रत्याशित स्तर पर मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई थी। सरकार को अखर गया, माथा ठनक गया। इतना…
  • PM modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: अमृत महोत्सव, सांसदों को फटकार का नाटक और अन्य
    12 Dec 2021
    एक तरफ प्रधानमंत्री सांसदों को सदन में उपस्थिति रहने को कहते हैं दूसरी ओर उनकी पार्टी चुनाव वाले राज्यों के अपने करीब सौ सांसदों को निर्देश देती है कि वह सारे काम छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों…
  • varanasi
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: बनारस में जिन गंगा घाटों पर गिरते हैं शहर भर के नाले, वहीं से होगी मोदी की इंट्री और एक्जिट
    12 Dec 2021
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 दिसंबर को बनारस के जिन घाटों से गंगा में इंट्री और एक्जिट करेंगे, उनमें एक है खिड़किया घाट और दूसरा रविदास घाट। एक पर शाही नाले का बदबूदार पानी गंगा को गंदा कर रहा है,…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'ईश्वर को किसान होना चाहिये...
    12 Dec 2021
    भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े जनआंदोलन में किसानों ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है और अब किसान धीरे धीरे घर की तरफ़ जा रहे हैं। पढ़िये विहाग वैभव की किसानों पर यह नज़्म...
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License