NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार विधानसभा चुनाव: दलित चिंता पर दल चिंता भारी!
क्या होगा बिहार में चुनाव का मुद्दा? इस सवाल को लेकर चिंतन-मंथन सत्ताधारी दल में भी है, विपक्ष में भी। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने एक दिन आगे-पीछे यानी 5 और 6 सितंबर को अपनी-अपनी चुनावी टीमें घोषित कर दी हैं। सीएम नीतीश कुमार ने ‘दलित’ को सियासी मुद्दा बनाने की कोशिश की है तो आरजेडी ने ‘युवा सरकार अबकी बार’ स्लोगन जारी कर दिया है।
प्रेम कुमार
08 Sep 2020
बिहार विधानसभा चुनाव
सांकेतिक तस्वीर। साभार : aapnabihar

बिहार में बाढ़ का पानी अभी उतरा नहीं है। कोरोना की महामारी भी ख़तरे की घंटी बजा रही है। मगर, चुनाव का बुखार नेताओं पर चढ़ने लगा है। आप चाहें तो नशा भी समझ सकते हैं क्योंकि एक नशा सुशांत सिंह मामले को लेकर भी दिख रहा है। बिहार बीजेपी ने सुशांत की तस्वीर के साथ पोस्टर बनाया है “न भूले हैं ना भूलने देंगे”। जबकि, मुंबई पुलिस के बाद सीबीआई भी अभी सुशांत की मौत के रहस्य के बारे में कोई खुलासा नहीं कर पायी है। सियासी नशे में नेता भी हैं जो अभी मुद्दा तय करते हुए लड़खड़ा रहे हैं।

आरजेडी से ‘युवा सरकार’ देंगे तेजस्वी

क्या होगा बिहार में चुनाव का मुद्दा? इस सवाल को लेकर चिंतन-मंथन सत्ताधारी दल में भी है, विपक्ष में भी। और, यह 4 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से चुनाव टलने संबंधी अफवाहों से उलट चुनाव कराने के संकेत के बाद और तेज हो गया है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने एक दिन आगे-पीछे यानी 5 और 6 सितंबर को अपनी-अपनी चुनावी टीमें घोषित कर दी हैं। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने रविवार को चुनावी स्लोगन जारी किया है- ‘नयी सोच नया बिहार/युवा सरकार, अबकी बार’। एक तरह से मुख्यमंत्री के चेहरे का एलान कर दिया गया है।

दलितों को लुभाने की कोशिश में ‘फंसे’ नीतीश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘दलित’ को सियासी मुद्दा बनाने की कोशिश की है। जिस दलित परिवार में हत्या हो जाए, उस परिवार के सदस्य को नौकरी देने की घोषणा कर नीतीश ने अचानक बिहार का मुद्दा सेट करने की पहल की है। इसकी तुरंत प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सियासी चतुराई दिखलायी। उन्होंने नीतीश के कहे गये ‘दलित’ और ‘नौकरी’ शब्दों में में से ‘नौकरी’ को पकड़ लिया। कहा कि नौकरी तो हर परिवार को चाहिए। हत्या चाहे किसी की हो, नौकरी सबके लिए जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने बिहार में बेरोजगारी और रोजगार देने में नीतीश सरकार की विफलता का मुद्दा छेड़ दिया। ‘बेरोजगारी हटाओ’ नाम से पोर्टल खोलने की घोषणा करते हुए उन्होंने बेरोजगारों को इस पोर्टल से जुड़ने की अपील कर डाली। टोल फ्री नंबर तक जारी कर दिए। अब यह तय होना बाकी है कि ‘नौकरी’ और ‘दलित’ में मुद्दा वास्तव में क्या बनने जा रहा है। इस पर बिहार की भावी सियासत निर्भर करने वाली है।

बिहार में रोजगार बड़ी चिंता का सबब है। कोरोना काल में यहां बेरोजगारी का स्तर 46 फीसदी से भी ज्यादा हो गया था। आज भी यह दोहरे अंक में है। यहां पक्का रोजगार करने वाले सिर्फ 12 फीसदी लोग हैं। बाकी लोग खेती या कारोबार करते हैं। कारोबार भी संगठित नहीं, व्यक्तिगत अधिक है। 32 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूरों की मौजूदगी भी नीतीश कुमार के लिए चिंता का विषय है। कोरोना काल में चाहे केंद्र-बिहार की एनडीए सरकार से प्रवासी मजदूर निराश हुए हैं। ऐसे में बेरोजगारी अगर मुद्दा बनती है, तो नीतीश कुमार के लिए परेशानी का सबब हो सकता है।

पप्पू यादव ने सीएम के लिए दिए 3 दलित नाम

जब नीतीश ने दलित को मुद्दा बनाने की कोशिश की, तो इस कोशिश को आगे बढ़ाते हुए और सियासी रूप से नीतीश की घेराबंदी करते हुए पप्पू यादव सामने आ गये। उन्होंने बिहार में अगला सीएम दलित को बनाने की मांग कर डाली और कहा कि जो पार्टी ऐसा करेगी, पप्पू यादव उसके साथ है। उन्होंने तीन नाम सुझाए हैं- मीरा कुमार, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान। एक तरह से दलित सियासत का मौका पप्पू यादव ने झटकने की कोशिश की है। वहीं उन्होंने बिना बोले यह भी कह डाला है कि नीतीश कुमार अगला सीएम ना हों।

नीतीश के बचाव में उतरे मांझी

नीतीश के ‘दलित’ वाले बयान का एक और मतलब निकाला गया। विरोधी दलों ने जानना चाहा कि अब नौकरी पाने के लिए दलितों को अपने परिजनों की हत्या का इंतजार करना होगा! माहौल उल्टा पड़ता देख जेडीयू को प्रेस कान्फ्रेन्स करनी पड़ी। पार्टी ने कहा कि संविधान में पहले से यह प्रावधान है। वे तो सिर्फ नियम बनाने की बात कर रहे थे। एक तरह से जेडीयू ने परिजनों की हत्या की स्थिति को नौकरी के लिए शर्त बताने जैसे आरोंपों से पल्ला झाड़ने की कोशिश की। महागठबंधन छोड़कर एनडीए में आए जीतन राम मांझी भी इसी तर्क के आधार पर नीतीश का बचाव करने को उतर आए।

दलित वोट इसलिए हैं महत्वपूर्ण

दलित सियासत और इसकी अहमयित को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बिहार में एससी के लिए सुरक्षित सीटें 38 हैं और एक निर्दलीय दलित विधायक हैं। इन 39 विधायकों में एनडीए की ओर निर्दलीय समेत 18 विधायक हैं जबकि महागठबंधन में शामिल या उसके समर्थक दलों में 21 विधायक हैं।

38 दलित विधायकों में कितने-किधर

1_37.JPG

जब मोदी ने बताया था नीतीश को दलित विरोधी, ख़राब डीएनए

जेडीयू नेता अब तर्क दे रहे हैं कि बिहार में जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार ही हैं। इसके अलावा स्पीकर जैसे पद पर भी दलित को सम्मान दिलाने का काम जेडीयू ने किया है। मगर, लोग भूले नहीं होंगे जब खुद जीतन राम मांझी ने खुद को मुख्यमंत्री से हटाने के बाद नीतीश कुमार को दलित विरोधी कहा था। जीतन राम मांझी ही क्यों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को कौन भुला सकता है जो उन्होंने मुजफ्फरपुर में लोकसभा चुनाव के दौरान दिया था,

“जब नीतीश ने हमसे समर्थन वापस लिया था तो मुझे बहुत दुख हुआ था। लेकिन, जब उन्होंने जीतन राम मांझी जैसे महादलित के साथ भी ऐसा ही किया, तब मैंने सोचा कि उनके राजनीतिक डीएनए में ही कुछ गड़बड़ है।”- नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

दलित वोट की नीतीश की चिंता के पीछे पासवान?

सवाल उठता है कि नीतीश कुमार ने दलितों को लुभाने की कोशिश क्यों की? जरूर ही इसकी जरूरत उन्होंने महसूस की होगी। दलितों का आधार छिटकता दिख रहा होगा। स्थिति यह है कि दलितों को दो बड़े नेता चिराग पासवान और जीतन राम मांझी एनडीए में ही हैं। फिर भी दलितों की चिंता उन्हें सता रही है तो इसकी वजह है एनडीए के भीतर की सियासत जिसमें चिराग पासवान और नीतीश कुमार में जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। यह लड़ाई थमने वाली भी नहीं है। पासवान को बैलेंस करने के लिए मांझी को नीतीश ने अपने साथ जोड़ा है। ऐसे में दलित से लड़ते हुए न दिखें नीतीश- छवि की यही चिंता उन्हें दलितों का हितैषी साबित करने की जरूरत बता रही है।

नीतीश की रणनीति को समझने के लिए इन आंकड़ों पर भी गौर कीजिए-

2_37.JPG

पासवान जाति को छोड़कर बाकी जातियों को महादलित घोषित करते हुए नीतीश कुमार ने पहले भी दलितों को साधने या बांटने की सियासत की थी। हालांकि आज तकनीकी रूप से बिहार में दलित जाति है ही नहीं। सबके सब महादलित हैं। एक बार फिर गैर पासवान दलित जातियों को जोड़ने में नीतीश जुटे हैं ताकि चुनाव बाद की परिस्थितियों में भी पासवान के विरोध से लड़ा जा सके। जेडीयू यह मान कर चल रहा है कि पासवान की पार्टी लोजपा जितनी अधिक सीटें जीतेगी उतनी अधिक दिक्कत चुनाव के बाद सरकार बनाने में होने वाली है।

आरजेडी दलितों में पैठ रखती है। उसके पास 14 दलित विधायक हैं। श्याम रजक का छिटक कर आरजेडी खेमे में आना तेजस्वी के लिए गिफ्ट की तरह है। इन कारणों से ही नीतीश कुमार दलितों को रिझाने का कार्ड खेल रहे हैं। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि नीतीश दलहित की चिंता कर रहे हैं या दलित की।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Bihar Assembly Elections
bihar election
RJD
Tejashwi Yadav
jdu
Nitish Kumar
BJP
Congress
Narendra modi

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2 हज़ार नए मामले, 71 मरीज़ों की मौत
    19 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,075 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.06 फ़ीसदी यानी 27 हज़ार 802 हो गयी है।
  • Nehru
    न्यूज़क्लिक टीम
    पैगाम-ए-आज़ादी। जवाहरलाल नेहरु पर लेक्चर अदित्या मुख़र्जी द्वारा। लोकतंत्रशाला
    18 Mar 2022
    पैगाम-ए-आजादी श्रंखला लोकतंत्रशाला और न्यूजक्लिक की एक संयुक्त पहल है, जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान पर केंद्रित है। श्रृंखला का यह व्याख्यान जवाहरलाल नेहरू पर केंद्रित होगा और आदित्य…
  • असद शेख़
    ओवैसी की AIMIM, मुसलमानों के लिए राजनीतिक विकल्प या मुसीबत? 
    18 Mar 2022
    यूपी चुनाव के परिणाम आ चुके हैं, भाजपा सरकार बनाने जा रही है, इस परिप्रेक्ष्य में हम ओवैसी की पार्टी से जुड़े तीन मुख्य मुद्दों पर चर्चा करेंगें– पहला ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल…
  • neo librelism
    प्रभात पटनायक
    नवउदारवादी व्यवस्था में पाबंदियों का खेल
    18 Mar 2022
    रूस के ख़िलाफ़ अब तक जो पाबंदियां लगायी गयी हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूसी बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं को, पश्चिमी दुनिया के वित्तीय ताने-बाने से काटे जाने का ही है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    विज्ञापन में फ़ायदा पहुंचाने का एल्गोरिदम : फ़ेसबुक ने विपक्षियों की तुलना में "बीजेपी से लिए कम पैसे"  
    18 Mar 2022
    रिपोर्ट्स में पता चला है कि 2019-2020 में हुए दस चुनावों में से नौ में बीजेपी को कांग्रेस की तुलना में विज्ञापनों के लिए फ़ेसबुक पर 29 फ़ीसदी कम कीमत चुकानी पड़ी थी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License