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भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: संघ प्रचारक और कद्दावर भाजपा नेता राजेंद्र सिंह के लोजपा में जाने के मायने
मंगलवार को एक तरफ भाजपा आधिकारिक रूप से खुद को नीतीश के साथ बताने की कोशिश करती रही, मगर अनाधिकृत रूप से पार्टी के कई बड़े और कद्दावर नेता चिराग पासवान को मजबूत करने लोजपा में चले गये।

पुष्यमित्र
07 Oct 2020
संघ प्रचारक और कद्दावर भाजपा नेता राजेंद्र सिंह के लोजपा में जाने के मायने

मंगलवार की शाम को जब बिहार के भाजपा और जदयू नेता संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि राज्य में एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगा, ठीक उससे पहले बिहार भाजपा के एक कद्दावर नेता राजेंद्र सिंह की तस्वीर लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के साथ सोशल मीडिया में तैर रही थी। मंगलवार को वे लोजपा में शामिल हो गये, उनके साथ-साथ भाजपा के कई दूसरे बड़े नेता लोजपा में शामिल हुए। इनमें झाझा के वर्तमान विधायक रवींद्र यादव भी हैं। भागलपुर के एक बड़े नेता मृणाल शेखर का नाम भी लोजपा में शामिल होने वालों की सूची में बताया गया। एक अन्य बड़े भाजपा नेता रामेश्वर चौरसिया को भी लोजपा ने अपना सिंबल दिया, मगर उनके पार्टी छोड़ने की खबर में अभी किंतु-परंतु लगा है।

मंगलवार को एक तरफ भाजपा आधिकारिक रूप से खुद को नीतीश के साथ बताने की कोशिश करती रही, मगर अनाधिकृत रूप से पार्टी के कई बड़े और कद्दावर नेता चिराग पासवान को मजबूत करने लोजपा में चले गये। इन विरोधाभासी घटनाओं ने एक बार फिर से यह संशय उत्पन्न कर दिया है कि क्या बिहार में भाजपा सचमुच पूरी तरह जदयू के साथ है, या फिर वह अंदर ही अंदर लोजपा को मजबूत कर रही है। खास तौर पर संघ के प्रचारक रह चुके राजेंद्र सिंह का लोजपा में शामिल होना अभी भी लोगों के गले सहजता से नहीं उतर रहा। लोग मान नहीं पा रहे कि महज एक चुनावी टिकट के लिए राजेंद्र सिंह जैसा नेता भाजपा को छोड़ सकता है और लोजपा में शामिल हो सकता है।

संघ और भाजपा में बड़ा कद रहा है राजेंद्र सिंह का

बिहार के रोहतास जिले के रहने वाले राजेंद्र सिंह का भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बड़ा कद रहा है। वे संघ के प्रचारक थे और वहां उनकी स्थिति इतनी मजबूत थी कि वे उन तीन लोगों में से एक हैं, जिनके कहने पर संघ के संविधान में बदलाव हुए। बाकी दो पीएम नरेंद्र मोदी और हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर हैं। भाजपा में आने के बाद भी उनकी स्थिति काफी मजबूत रही। 2014 में उन्हें झारखंड का प्रभारी बनाया गया और उस साल वहां भाजपा की जीत में उनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका बतायी गयी। उसके बाद 2015 में वे बिहार आ गये और पार्टी ने उन्हें यहां से दिनारा की सीट से उम्मीदवार बनाया।

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जब भाजपा जदयू से अलग होकर चुनाव लड़ रही थी, तब यह चर्चा सरेआम थी कि राजेंद्र सिंह बिहार में भाजपा के अघोषित सीएम कैंडिडेट हैं। हालांकि उस चुनाव में भाजपा बिहार में तीसरे नंबर पर रही और खुद राजेंद्र सिंह भी अपना चुनाव हार गये। उस चुनाव में दिनारा सीट से जीते जदयू नेता जयकुमार सिंह फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री हैं और वे एनडीए के उम्मीदवार भी हैं। ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि राजेंद्र सिंह हर हाल में दिनारा से चुनाव लड़ना चाहते हैं, इसलिए वे भाजपा को छोड़कर लोजपा में शामिल हो गये। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों के गले यह बात नहीं उतर रही कि भाजपा का कोई इतना बड़ा कद्दावर नेता, जिसकी संघ की भी मजबूत पृष्ठभूमि रही हो, वह पार्टी छोड़कर लोजपा ज्वाइन कर सकता है।

प्रभात खबर अखबार के कारपोरेट एडिटर रहे राजेंद्र तिवारी इस मसले पर कहते हैं कि मंगलवार के एनडीए के प्रेस कांफ्रेंस से यह साफ है कि भाजपा का लोजपा के प्रति साफ्ट स्टैंड है। पार्टी के किसी नेता ने लोजपा का ठीक से नाम नहीं लिया और कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया। ऐसे में यह लगता है कि पार्टी अंदर ही अंदर लोजपा को मजबूत करना चाहती है और संगठन में रहकर काम करने के लिए जाने-जाने वाले राजेंद्र सिंह को बहुत मुमकिन है कि इसी वजह से लोजपा में भेजा गया हो। क्योंकि भाजपा और संघ के कार्यकर्ता और नेता अपने अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। वे अमूमन ऐसा कदम नहीं उठाते। राजेंद्र सिंह तो संघ के काफी करीबी रहे हैं। अगर उनकी कोई महत्वाकांक्षा रहती तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ते। उनके लोजपा में शामिल होने की बात बहुत सहज नहीं लगती।

हालांकि कुछ विश्लेषक इस बात से सहमत नहीं नजर आते कि राजेंद्र सिंह किसी मिशन के तहत लोजपा गये हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, मुझे लगता है कि चिराग पासवान बिहार में भाजपा को उलझन में डाल रहे हैं। वे ऐसे भाजपाई नेताओं को पार्टी में शामिल करा रहे हैं, जिन्हें जदयू के साथ गठबंधन की वजह से टिकट नहीं मिल रहा और फिर वे उन्हें जदयू के खिलाफ खड़ा करेंगे। वैसे भी बिहार में भाजपा दो धड़े में बंटी दिख रही है। एक जदयू के साथ खड़ी नजर आती है तो दूसरी जदयू से अलग होकर चुनाव लड़ना चाहती है।

यह मुमकिन है कि बिहार में अपना स्वतंत्र अस्तित्व खड़ा करने और बड़ी पावर बनने के लिए चिराग ऐसा कर रहे हों। मगर ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर भाजपा से आये बागियों की वजह से वे कई सीटें जीत जाते हैं और ऐसी संभावना बनती है कि भाजपा के साथ मिलकर वे सरकार बना लें। क्या तब भी भाजपा लोजपा के साथ नहीं जायेगी? दिलचस्प यह है कि भाजपा ने इस बारे में कोई साफ बात नहीं कही है।

इस चुनाव में भाजपा के कोर वोटरों का समर्थन लोजपा को मिल सकता है। राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन भी ऐसी संभावना जता रहे हैं। वे कहते हैं कि बिहार में भाजपा की कोर समर्थक सवर्ण जातियां हैं और वे अमूमन पिछड़ी जाति के नेताओं से बिदकते हैं और उनके बनिस्पत दलितों के साथ सहज रहते हैं। ऐसे में जहां जदयू के खिलाफ लोजपा खड़ी होगी वहां मुमकिन है कि भाजपा के कट्टर समर्थक जदयू के बदले लोजपा को वोट करे। जाहिर है कि ऐसे में जदयू की स्थिति काफी कमजोर होने वाली है। मगर राजेंद्र सिंह किसी रणनीति के तहत लोजपा में शामिल हुए हैं, यह अभी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता।

राजनीतिक हलकों से ऐसी खबरें भी हैं कि अभी बड़ी संख्या में मजबूत भाजपा नेता लोजपा में शामिल होने जा रहे हैं। इससे चिराग पासवान को दो फायदे होंगे। पहला यह कि उन्हें बैठे बिठाये ऐसे उम्मीदवार मिल जायेंगे, जिससे वे जदयू को कड़ी चुनौती दे सकें। दूसरा फायदा यह होगा कि भाजपा के कोर वोटरों में मैसेज जायेगा कि लोजपा भाजपा की टीम बी है और जहां भाजपा नहीं है, वहां लोजपा को जिताकर ही भाजपा को मजबूत कर सकते हैं। अगर भाजपा किसी नीति के तहत ऐसा नहीं कर रही, तब भी यह स्थिति उसके अनुकूल है और वह इस तरफ से आंखें मूंदे है। जदयू के साथ रहने की औपचारिकता का निर्वाह कर रही है। 

 

(पुष्यमित्र पटना से रिपोर्ट करते हैं। आप वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

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