NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
कला
भारत
राजनीति
बिहार चुनाव: मधुबनी पेंटिंग का भरपूर उपयोग लेकिन कलाकारों की सुध लेने वाला कोई नहीं
कोरोना महामारी ने मिथिला कलाकारों को बर्बाद कर दिया है। अभी चुनाव के दौरान सभी दल इस कला का इस्तेमाल अपने प्रचार और वोट के लिए कर रहे हैं लेकिन कलाकारों की चिंता किसी को भी नहीं है।
मुकुंद झा
22 Sep 2020
बिहार चुनाव:

दरभंगा/मधुबनी : आजकल बिहार में विधानसभा चुनाव है। इस दौरान नेता हर उस प्रतीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो लोगों को आकर्षित करे। इसी कड़ी में मिथिला या मधुबनी पेंटिंग भी शामिल है। इस चुनाव में इस कला का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है लेकिन दुखद यह है कि किसी भी राजनीतिक दल को इस कला की समस्याओं की चिंता नहीं है।  

अभी बिहार चुनाव में राज्य के प्रमुख राजनीतिक चेहरे इस कला के साथ बने मास्क का प्रयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही ये मास्क लोगों को बांटा भी जा रहा है। इस कला ने अनिवार्य मास्क पहनने के नियम को स्टाइल स्टेटमेंट में बना दिया है। मिथिला पेंटिंग से सजे मास्क 50-100 रुपये के बीच बिक रहे हैं। लेकिन केवल इतने से ही इस कला का भला नहीं हो रहा है। आपको बता दें कि कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन ने मिथिला पेंटिंग करने वाले कलाकारों को बर्बाद कर दिया है।

इसके अलावा बिचौलिये इस कला के बाज़ार में वर्षों पहले सेंध लगा चुके हैं, जिस कारण कलाकारों तक उनकी कला का पूरा मेहनताना नहीं पहुँच पाता है।

ये बातें हमें मधुबनी पेंटिंग करने वाले कलाकारों से बातचीत के बाद पता चला। न्यूज़क्लिक की टीम ने मधुबनी पेंटिंग करने वाले कलाकारों से इस कला के मुख्य केंद्र कहे जाने वाले मधुबनी जिले के रांटी और जितवारपुर गांव जाकर मुलाकात की।

Mithila painting 1.jpg

रांटी गांव के भोला झा जोकि इस कला से लंबे समय से जुड़े हुए हैं, कहते हैं, 'यह कला अपने आप में समृद्ध है। इस कला की सराहना करने वाले आज पूरी दुनिया में है। आज यह कला केवल अपने कलाकारों के कलाकारी के नाम पर जिन्दा है। इसमें सरकार या नेताओं की मदद बिल्कुल भी शामिल नहीं है।'

वे आगे कहते हैं कि इस चुनाव और कोरोना के दौर में मिथिला कलाकारी वाले मास्क की मांग आ रही है लेकिन यह बहुत कम है। कई कलाकार ऐसे भी है जो कोरोना महामारी के बाद से भारी आर्थिक मंदी से गुजर रहे है। कला को बचाने के लिए उन्हें तत्काल आर्थिक सहायता दिए जाने की जरूरत है।

इसी तरह जितवारपुर गांव के सरवन पासवान जिनका परिवार कई पीढ़ियों से मधुबनी पेंटिंग कर रही है। उन्होंने कहा, 'कला का दाम असली कलाकारों को नहीं मिल रहा है। बीच में दलालों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो कलाकारों की मेहनत की कमाई खा रहे हैं। जबकि इस कला को पसंद करने वाले लोग विदेशों से खरीदारी करने आते हैं लेकिन अधिकांश मामलों में वो बिचौलिए के माध्यम से ही ख़रीदारी करते हैं।'

Mithila Painting 2.jpg

कलाकारों से मिलने के बाद एक बात स्पष्ट हुई कि कला और उसके कलाकारों की हालत में सुधार केवल सरकारी फाइलों और राजनेताओं के भाषण में है। हमने कई कलाकारों से बात की सभी ने एक मांग की कि सरकार कला को बेचने के लिए नियमित एक बाजार उपलब्ध कराए जिससे उनको उचित दाम मिल सके। इसके साथ ही यह पेंटिंग कपड़ों ,साड़ी और अन्य वस्तुओं पर होती है इसलिए सरकार कलाकारों को यह वस्तुएं सस्ते दामों पर उपलब्ध कराए।

मिथिला पेंटिंग का इतिहास पुराना

आपको बता दें कि इस कला की उत्पत्ति रामायण के समय से बताई जाती है, जब भगवान राम उत्तर भारत में अयोध्या के राजकुमार थे। कथा और कहानियों के अनुसार भगवान राम और देवी सीता ने एक दूसरे को पहली बार 'मधुबन' (शहद का जंगल) देखा था, जिससे मधुबनी शब्द की उत्पत्ति हुई है।

जनक - मिथिला के तत्कालीन राजा - ने अपनी बेटी सीता का विवाह भगवान राम से करवाया। इस विवाह के लिए एक पूर्व शर्त थी जिसके लिए राम ने भगवान शिव के धनुष को तोड़ा था , जिसके बाद राम और सीता दोनों की शादी हुई। इस दौराण राजा जनक ने मेहमानों पर मिथिला की अमिट छाप और समृद्ध संस्कृति को दिखाने के लिए कलाकारों के एक समूह को सुंदर चित्रों के साथ विवाह स्थल को सजाने का काम सौंपा था।

मिथिला चित्रों में दो 'घराने' हैं - रांती घराना और जितवारपुर घराना (मधुबनी जिलों में दो इलाके) - पाँच प्रसिद्ध शैलियां कोहबर, गोदना, तांत्रिक, भरनी, काचनी और हरिजन है ।

भरनी, काचनी और तांत्रिक पेंटिंग धार्मिक विषयों पर आधारित हैं। बिहार का मिथिला क्षेत्र शिवा और शक्ति समुदायों के लिए तांत्रिक साधनाओं का केंद्र रहा है। मधुबनी पेंटिंग के तांत्रिक संबंध के संदर्भ कवि विद्यापति के साहित्यिक कार्य में पाए जाते हैं,जोकि 12 वीं शताब्दी के थे।

यह एक ऐसी कला जिसने बिहार और खासतौर पर मिथिला के पुरुष प्रधान और सामंती समाज में नारी मुक्ति और सामाजिक न्याय के नए रास्ते खोले हैं। शुरुआती विरोध के बाद जातियों में बंटे समाज में इस कला से समरसता भी आई। ऊपर वर्णित तीन शैलियों का उपयोग "उच्च जाति" ब्राह्मण और कायस्थ परिवारों की महिलाओं द्वारा किया जाता था। यह उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जीवन शैली पर आधारित था।

लेकिन 1960 के आसपास एकाधिकार टूट गया था जब दुसाध समुदाय की दलित महिलाओं ने हरिजन पेंटिंग की शुरुआत की थी, जो काफी हद तक किंग सलेश पर आधारित थी, जिन्हें समुदाय में भगवान माना जाता है। जबकि हरिजन पेंटिंग के रूपांकनों, तकनीक और शैली पारंपरिक है, सामग्री रामायण और महाभारत के हिंदू आख्यानों से एक उल्लेखनीय बदलाव का प्रतीक है।

Mithila Painting 3.jpg

नवाचारों और प्रगति के बाद, बुद्ध के जीवन की कहानियों को इस कला के माध्यम से समाज के समक्ष चित्रण से किया गया है।

आपको बता दें कि त्रेता युग (युग) में मिथिला पेंटिंग शुरू हुई। 1934 तक, यह सिर्फ गांवों की लोक कला थी। उस साल एक बड़े भूकंप ने मिथिलांचल को तबाह कर दिया था, जो नुकसान और विनाश का कारण बना था। एक ब्रिटिश अधिकारी विलियम आर्चर इस क्षेत्र का दौरा करने के लिए आए जिससे उसने मलबे में पड़ी टूटी दीवारों पर चित्रों को देखा था।

उन्होंने इसे पिकासो और मीरा जैसे आधुनिक कलाकारों के चित्रों के समान पाया। 1949 में लिखे एक लेख में, उन्होंने मिथिला पेंटिंग की विशिष्टता, चमक और विशिष्ट विशेषताओं का उल्लेख किया था। और इस तरह, दुनिया के बाकी हिस्सों को इस चमत्कारिक कला के बारे में पता चला।

उस समय फुलब्राइट स्कॉलर के वित्तीय सहयोग से 1977 में मधुबनी के जितवारपुर में मास्टर क्राफ्ट्समैन एसोसिएशन ऑफ मिथिला नामक एक यूनियन की स्थापना की गई थी। इससे क्षेत्र के कलाकारों को अच्छी कमाई हुई।

हालांकि, क्षेत्र के कला रूप को आधिकारिक मान्यता बहुत बाद में मिली। 1969 में, बिहार सरकार ने अपने मधुबनी चित्रों के लिए सीता देवी को सम्मानित किया। बाद में 1975 में, जगदम्बा देवी को उनके चित्रों के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

सीता देवी को 1984 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था। बाद में, उन्हें बिहार रत्न और शिल्पगुरु पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। 2011 में, महासुंदरी देवी को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनके बाद बुआ देवी थीं जिन्हें 2017 में यह पुरस्कार मिला।

Bihar Polls
Madhubani
mithila painting
Mithila Art
Ramayana
Mahabharata
Dusadh community
Indian art

Related Stories

राम कथा से ईद मुबारक तक : मिथिला कला ने फैलाए पंख

मूर्तिकार रामकिंकर : मूर्ति शिल्प में जीवन सृजक

बिहार: मिथिला पेंटिंग ने पुरुष प्रधान और सामंती समाज में नारी मुक्ति और सामाजिक न्याय के खोले रास्ते!


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License