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बिहार में बहार नहीं बाढ़ है
पिछले 40 सालों से यानी 1979 से अब तक बिहार लगातार हर साल बाढ़ से जूझ रहा है। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक राज्य का 68,800 वर्ग किमी हर साल बाढ़ में डूब जाता है।
देवपालिक कुमार गुप्ता, राकेश कुमार राकेश
04 Aug 2020
बिहार में बहार नहीं बाढ़ है
image courtesy : ETV Bharat

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अपना पोस्टर लॉन्च कर दिया है। जिस पर नारा है- ''विकास पथ पर चल पड़ा बिहार, मैं उसकी ही कतार हूं। बिहार के विकास में, मैं छोटा सा भागीदार हूं। हां मैं नीतीश कुमार हूं।''

क्या इस नारे को लिखने से पहले उन 11 जिलों के बारे में भी सोचा गया है जो बाढ़ का कहर झेल रहे हैं। आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव रामचंद्र डू के मुताबिक बिहार के 11 जिलों के कुल 93 प्रखंडों की 765 पंचायतें बाढ़ से प्रभावित हुई हैं। करीब 13 हजार लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। कई जानें जा चुकी हैं। 

पिछले 40 सालों से यानी 1979 से अब तक बिहार लगातार हर साल बाढ़ से जूझ रहा है। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक राज्य का 68,800 वर्ग किमी हर साल बाढ़ में डूब जाता है।

बिहार में आने वाली हर साल की बाढ़ पर अनुमप मिश्र अपने लेख, ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है’ में लिखते हैं- “बाढ़ अतिथि नहीं है। यह कभी अचानक नहीं आती। दो-चार दिन का अंतर पड़ जाए तो बात अलग है। इसके आने की तिथियां बिलकुल तय हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं।”

हवाई दौरे और राहत शिविरों के सिवाय सरकारें कोई भी ठोस कदम नहीं उठाती हैं। न ही विपक्ष इस मुद्दे को चुनाव में कभी भी गंभीरता से उठाता है। इस कारण से बिहार के लोग इस आपदा के साथ जीना सीख गए हैं। इस साल की बाढ़ से भी विपक्ष गायब है। जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ही बाढ़ से प्रभावित लोगों के बीच दिख रहे हैं। कभी-कभार नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव भी बाढ़ से प्रभावित लोगों के बीच दिख जाते हैं। 

सरकार बाढ़ आने पर आनन-फानन में अस्थायी समाधान तो कर देती है लेकिन कभी ठोस कदम नहीं उठाया गया है। हर साल बाढ़ से लाखों का जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। सरकार जागती तभी है जब काफी क्षति पहुंच चुकी होती है। सवाल पूछने पर कभी नेपाल को दोष देते हैं तो कभी चूहे को देते हैं कि चूहे ने बांध काट दिया। वही हाल कमोबेश दूसरे प्राकृतिक आपदा सूखा के साथ है। सरकार मुआवजा देना ही अपना काम समझती है।

नेपाल को जिम्मेदार ठहराने को लेकर अनुपम मिश्र अपने इसी लेख में लिखते हैं- “यदि नेपाल पानी रोकेगा तो आज नहीं तो कल, हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी।

हम सब जानते हैं कि हिमालय का यह हिस्सा कच्चा है बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं। नेपाल एक छोटा-सा देश है। बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे? कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा, इसलिए उत्तर बिहार बह गया। यह देखने लायक बात होगी कि नेपाल कितना पानी छोड़ता है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है। वहां हिमालय की चोटियों से जो पानी गिरता है, उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है। और शायद उसे रोकने की कोई व्यवहारिक जरूरत भी नहीं है। रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं। इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा।”

गंगा, गंडक, कोसी नदी की बाढ़ से लोग हर साल तबाह रहते हैं। जानकारों की माने तो बाढ़ का मुख्य कारण नदी में जमा गाद (बालू) है। गाद की वजह से वर्षा का पानी नदियों में उफान लाता है जिसके कारण से आस-पास का इलाका  तबाह हो जाता है। गाद के समस्या से स्थायी समाधान के बजाय गाद को नदी से निकालकर फिर नदी में ही डाल दिया जाता है। 

बिहार में बाढ़ का एक और प्रमुख कारण है- 1954 में बिहार में 160 किमी तटबंध था। तब 25 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित थी। अभी करीब 3700 किमी तटबंध हैं लेकिन बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र बढ़कर 68.90 लाख हेक्टेयर हो गया। जिस तरीके से बाढ़ में इजाफा हो रहा है, उस हिसाब से तटबंधों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही है।

वैसे तो बिहार में कई समस्याएं हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या बाढ़ और सूखा है। एक ओर राज्य की 50 फ़ीसदी आबादी हर साल बाढ़ के ख़तरे में रहती है तो दूसरी ओर सूखे की समस्या से जूझती है।

बिहार आपदा प्रबंधन विभाग के आकड़ों के मुताबिक बिहार 28 जिले बाढ़ प्रवण की सूची में हैं। जिनमें 15 जिले अति बाढ़ प्रवण जिलों की सूची में हैं।

बाढ़ की वजह से दो से तीन महीना आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। खासकर उत्तर बिहार के लोगों का। लोग आम दिनों में तीन समय भोजन करते हैं। बाढ़ में सिर्फ एक समय भोजन के नाम पर चूड़ा और गुड़ (मीठा) मिल पाता है। कई लोग ऐसे हैं जो पानी में चावल डाल मठ्ठा बनाकर पेट पालने को मजबूर होते हैं। बाढ़ की वजह से लोगों को शौच करने तक की जगह नहीं मिल पाती। पानी में खड़े-खड़े शौच करना पड़ता है। करोड़ों की फ़सल बर्बाद हो जाती है। 2008 में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, बाढ़ की वजह से 34 करोड़ की फसलें तबाह हुईं थी। बाढ़ के पानी से रखा अनाज सड़ जाता है। बच्चों के स्कूल बंद हो जाते हैं। महीनों तक उनकी पढ़ाई बाधित हो जाती है। बाढ़ के समय बीमारियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं जैसे- सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार, उल्टी-दस्त, मलेरिया, डायरिया। पीने का शुद्ध पानी नसीब नहीं होता। 

स्वास्थ्य व्यवस्था ठप हो जाती है। दवाई तक नहीं मिल पाती। कोई अकस्मात बीमार पड़ जाए तो अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल पाता। सड़के नदी में तब्दील हो जाती हैं। नाव और खाट पर सुलाकर लोग अस्पताल ले जाते हैं। देरी की वजह से कई बार मरीज़ रास्ते मे ही दम तोड़ देता हैं। पानी में मवेशी बह जाते हैं। चारे के आभाव में मवेशी दम तोड़ देते हैं। बाढ़ खत्म हो जाने के बाद भी लोगों की परेशानियां कम नहीं होती। चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़।

गन्दगी में जन्में कीड़े-मकोड़े लोगो के लिए अनेको बीमारियाँ लेकर आते हैं। पानी का लेबल इतना ऊपर आ जाता है कि नलों से गंदा पानी आने लगता हैं। कई बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पुल न होने से लोगों को दूसरी तरफ जाने में नाव का सहारा लेना पड़ता है। नाव पलटने से कई लोगो की जान तक चली जाती हैं। 

बिहार में अब तक की सबसे ख़तरनाक बाढ़

1987 : बाढ़ का सबसे बुरा असर 1987 में देखने को मिला। 1987 में आई बाढ़ में 30 जिलों के 24518 गांव प्रभावित हुए थे। 1399 लोगों की मौत हुई। 678 करोड़ रुपए की फसलें तबाह हुईं थी।

2000 : बाढ़ का असर 33 जिलों में रहा। 12 हजार से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में रहे। 336 लोगों की जान गई। 83 करोड़ की फसलें तबाह हुईं।

2002 : बाढ़ का असर 25 जिलों में था। 489 लोगों की मौत हुई। 511 करोड़ से ज्यादा की फसलें तबाह हुईं। 8,318 गांव जलमग्न रहे।

2004 : 20 जिलों के 9,346 गांवों के 2 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। 885 लोगों की मौत हुई। 522 करोड़ की फसलों का नुकसान हुआ।

2007 : बाढ़ का कहर 22 जिलों में था। 1287 लोगों की जान चली गई। 2.4 करोड़ लोग प्रभावित हुए। संयुक्त राष्ट्र ने इसे बिहार के इतिहास की सबसे खराब बाढ़ कहा था।

2008 : बाढ़ की चपेट में 18 जिले थे। 50 लाख लोग प्रभावित हुए। 258 लोगों की मौत हुई। 34 करोड़ की फसलें खराब हुई।

2011 : बाढ़ का असर 25 जिलों में था। 71.43 लाख लोगों के जनजीवन पर असर पड़ा। 249 लोगों की जान गई।

2013 : जुलाई में आई बाढ़ से 200 लोग मारे गए। बाढ़ का असर 20 जिलों में था। करीब 50 लाख लोग प्रभावित हुए।

2016 : 12 ज़िले बुरी तरह बाढ़ की चपेट में रहे। 23 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित। 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई।

बिहार में 2020 में अब तक बाढ़ से 20 से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। वहीं 2019 बिहार के 13 जिलों में आयी बाढ़ से 130 लोगों से अधिक की मौत हुई थी।

लेखक देवपालिक और राकेश दोनों ने आईआईएमसी-नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। देवपालिक फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं और राकेश एक संस्था से जुड़े हुए हैं। 

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