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बिहार:  बाढ़ ने कर दिया बर्बाद, हज़ारों लोग बेघर, फ़सलें तबाह, नाव हादसों में भी मर रहे हैं लोग
बिहार का बहुत बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में है। लोगों के आशियाने बर्बाद हो चुके हैं। बिना  नाव के काम नहीं चलता और नाव सुरक्षा मानकों को अपनाए बगैर चल रही हैं। बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और जिला प्रशासन की लापरवाही अपने चरम पर है।
ऋषिकेश शर्मा
18 Aug 2020
दरभंगा में खुद नाव से आते-जाते बच्चे

बिहार के करीब दर्जन भर से भी ज़्यादा जिले बीते एक महीने से बाढ़ प्रभावित हैं, या कह सकते हैं कि पूरे तरीके से बाढ़ की चपेट में हैं। बीते कुछ दिनों से बारिश न होने की वजह से कुछ नदियों का जल स्तर अब धीरे-धीरे घटने लगा है, या फिर स्थिर है। बावजूद इसके समस्या जस की तस बनी ही हुई है। 

दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, सुपौल, गोपालगंज, मुज़फ्फरपुर, बेतिया, पूर्वी चंपारण, किशनगंज, कटिहार, भागलपुर, पुर्णिया, समस्तीपुर, बेगूसराय समेत 16 जिलों के लगभग 80 लाख से भी ज़्यादा लोग इससे सीधे तौर पर प्रभावित हैं।

हजारों लोग बेघर हो चुके हैं, करीब 3 से 4 लाख हेक्टेयर की फसल बर्बाद हो जाने का अनुमान है। लेकिन सरकारी इंतजामात ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है। शब्द का ईजाद नए अर्थों में हुआ है, मायने हर साल की तरह ही हैं।

लाखों लोग बेघर, तटबंध और एनएच पर बनाया आशियाना

बाढ़ प्रभावित जिलों के मंजर बहुत ही भयावह हैं। मिट्टी के बने हजारों घर पूरे के पूरे पानी में समा गए हैं। गाँव के गाँव टापू बन चुके हैं। पक्के मकानों में पहले तल्ले तक पानी, और मिट्टी के घर तो अपना अस्तित्व ही खो चुके हैं। मुज़फ्फरपुर-दरभंगा नेशनल हाइवे 57 का दृश्य बाढ़ की भयावहता को दर्शाने के लिए बहुत काफ़ी है। हज़ारों लोग एनएच के डिवाइडर पर त्रिपाल लगाकर बीते एक महीने से अपने परिवार और जानवरों के साथ बने हुए हैं। बिल्कुल ऐसा ही दृश्य नदियों के तटबंध पर भी देखने को मिलता है। तटबंध के अंदर के लोग अपना घर छोड़कर तटबंध पर ही आ चुके हैं।  

बाढ़ प्रभावित विभिन्न जिलों के ढेरों ऐसे गाँव थे, जहाँ सरकार की तरफ़ से अबतक कोई मदद मुहैया नहीं कराई गई है। उनका यह आरोप है कि प्रशासन की ओर से कोई सुध लेने तक नहीं पहुँचा कि उनके क्षेत्र में क्या हालात हैं?

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कोसी के कटाव में बेघर हुए लोग, धान की पूरी-पूरी फसल बर्बाद

सुपौल में एक गाँव है मर्चा। कोसी तटबंध के बिल्कुल अंदर का गाँव। लोग बताते हैं कि हर साल जब कोसी अपनी तबाही लाती है, तो इस गाँव का अस्तित्व ही मिट जाता है। लगभग हर साल पूरी की पूरी बस्ती को वह अपने आगोश में ले लेती है, और फिर लोग वहीं आसपास नए जगह पर कहीं अपना आशियाना बनाते हैं।

सुपौल के मर्चा गांव के जगदीश मंडल कटाव के बाद चौथी बार अपना घर बनाये थे। हर साल के कटाव में उनका घर कटता रहा है, और इस बार भी वही हुआ। वो बताते हैं, “चार बार हमारा घर कट गया था, अब पांचवी बार भी कट गए। किसी तरीके से दूसरों के घर में सब रह रहे हैं। सरकार ने हमारे पुनर्वास के लिए अबतक कोई व्यवस्था नहीं की है। हमारी कोई सुनने वाला नहीं। कहता है ये देते हैं, वो देते हैं, लेकिन

हमलोग को अभी तक कुछ नहीं दिया है। बार-बार हमारा घर दह जाता है, तो किसी तरह बनाते हैं। सरकार से आजतक एक रु मुआवजा नहीं मिला है। कोरोना की वजह से सब कमाने वाला 6 महीना से घर पर है, कर्जा कोई देगा तो फिर से घर बनाएंगे नहीं तो किसी तरह गुजर करेंगे"।

सहरसा जिले के नवहट्टा प्रखंड में तटबंध के अंदर कई गाँव कोसी की त्रासदी को झेल रहे हैं। घर के घर डूब चुके हैं। कटाव में कई घर बर्बाद हो गए। नवहट्टा प्रखंड के एक ग्रामीण भूपेंद्र यादव बताते हैं, कि “2008 के बाद हम अबतक सात बार कट चुके हैं और अपनी जगह बदलनी पड़ी है। कभी बगल के किसी जमीन पर बनाये तो कभी साल-दो साल जाकर तटबंध पर बिताये। हर साल कोसी का ये कटाव हमारा घर छीन लेता है। दोबारा घर बनाने में दो-ढाई लाख का तो सिर्फ़ मिट्टी भरना पड़ता है, कि ऊंचा रहेगा तो तुरंत कटाव नहीं होगा। हमारे पूरे जीवन की कमाई घर बनाने में ही निकल जा रही है, सरकार के तरफ़ से न तो कोई मुआवजा न ही पुनर्वास की कोई व्यवस्था। धान की फसल तो डूब ही गई, अब नदी से इतना बालू आ गया है कि गेहूँ भी नहीं हो पाएगा"।

कोसी के किनारों से जब हम गुज़र रहे थे तो एक बुजुर्ग धान की रोपाई करते मिले। जबकि धान की रोपनी एक या डेढ़ महीने पहले ही हो जाती है। बिहारी पंडित नाम के इस बुजुर्ग ने पूछने पर बताया, “हम इससे पहले भी तीन बार रोपे हैं, लेकिन हर बार पानी में बह गया। इस बार भी कर्ज लेकर एक और बार रोप रहे हैं, बचेगा तो बचेगा नहीं तो क्या कर सकते हैं?"

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यह पूछने पर कि क्या सरकार से तरफ़ से अबतक कोई मुआवजा मिला है या मिलता है? उन्होंने बताया कि “कभी एक रु कुछ नहीं मिला है। अबतक चार बार घर कट चुका है, और फिर कटने वाले हैं लेकिन कभी कोई देखने नहीं आया है। लगता ही नहीं कि हमारा जीवन भी कोई जीवन है। घर कटेगा तो फिर जाएंगे बांध पर। डीलर भी राशन नहीं देता, ये कहकर लौटा देता है कि तुम्हारा कार्ड ही नहीं खुलता। पिछले दो महीने का राशन नहीं दिया है। कुछ देता है तो खाते हैं, नहीं तो भुखले रहते हैं। सरकार कहती तो है लेकिन हमलोग को यहाँ कुछ नहीं मिलता। किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। हमलोग के मुँह में तो बोली ही नहीं है, गरीब को कौन देखने वाला है? सरकार जो देता है वो बड़ा लोग सब ऊपर में ही खा जाता है, हमलोग को कुछ भी नहीं मिलता"।

कोसी पुनर्निर्माण नीति और कोसी बेसिन विकास परियोजना मात्र एक ढकोसला

2008 में कोसी नदी ने जब भयानक तबाही मचाई थी तो कोसी के इलाकों के पुनर्निर्माण हेतु विश्व बैंक ने भारत को 14 हज़ार 808 करोड़ रु का कर्ज दिया था। इसका उद्देश्य कुछ इस तरह से था। “कोसी पुर्नवास एवं पुनर्निर्माण परियोजना एक व्यापक बहुप्रक्षेत्रीय परियोजना है जिसका उद्देश्य आपदा से प्रभावित लोगों के पुनर्निर्माण, सामुदायिक सुविधा, आधारभूत संरचनाओं की पूर्ण व्यवस्था, अर्थव्यवस्था एवं पारिस्थितिकी को कायम रखने की नीति पर आधारित जीविका समर्थन आदि तैयार किया जाना इस परियोजना के मुख्य उद्देश्य होंगे।"

वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, “इस परियोजना का पहला चरण पूरी तरह फ्लॉप रहा और पहले चरण में महज 259 मिलियन डॉलर देने के बाद विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपने हाथ खींच लिये थे। वजह यह थी कि कोसी का पुनर्वास करने के लिए स्थापित बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निमाण समिति इस अवधि के दौरान एक लाख आवास के लक्ष्य के मुकाबले महज 16,800 लोगों को घर उपलब्ध करा पायी। जहाँ 267 किमी सड़कें बननी थी, महज 29 किमी सड़कें बन पायीं। 70 पुल-पुलिये बनने थे, सिर्फ 26 बने।"

2016 में फिर से विश्व बैंक ने भारत सरकार को 250 मिलियन डॉलर यानी कि लगभग 1625 करोड़ रु का कर्ज दिया। इस बार एक मजबूत शर्त यह थी कि इस परियोजना से बाढ़ प्रभावित इलाकों में कृषि पैदावार बढ़े और ये क्षेत्र बाढ़ से मुकाबला करने में ज़्यादा प्रतिरोधक साबित हों। 

बिहार में इस साल बाढ़ की तबाही बताती है, कि पुनर्निर्माण नीति की तरह कोसी बेसिन विकास परियोजना भी पूरी तरह से फ्लॉप रही है। बिहार ने फिर से बाढ़ के आगे घुटने टेक दिए। कृषि पैदावार बढ़ाने के लक्ष्य से लाई गई परियोजना फसल बचाने में भी नाकामयाब रही। कोसी नदी की बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र प्रतिरोधक बनने में हर बार असफ़ल रहे हैं।

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पुनर्निर्माण नीति के तहत बाढ़ प्रभावितों के लिए बने आश्रय भवनों में या तो ताला लटका हुआ है, या फिर पूरी गंदगी पसरी हुई है। तटबंध से 5-10 किमी के दायरे में बने सहरसा के दो और सुपौल जिले के एक आश्रय भवन में हमने एक भी बाढ़ पीड़ितों को नहीं पाया। सहरसा में बने आश्रय भवन तटबंध से कुछ किलोमीटर की दूरी पर हैं, और इस वजह से भी लोग उतनी दूर जाना नहीं पसंद करते। एक कारण ये भी है कि प्रशासन ने उसकी देख-रेख अच्छे से नहीं की, और बहुत ज़्यादा गंदगी होने की वजह से लोग वहाँ जाने की बजाय तटबंध पर ही अपना आशियाना बना लेते हैं। वहीं सुपौल का आश्रय भवन बिल्कुल तटबंध के पास ही है लेकिन उसमें ताला लटका था। ठीक बगल में लोग तटबंध पर थे लेकिन पक्के आश्रय भवन का दरवाजा उनके लिए बंद था। करोड़ों की लागत से बने इन भवनों से बाढ़ प्रभावितों को किसी भी तरीके की कोई राहत नहीं मिल रही है।

सरकारी अव्यवस्थाओं के चलते नाव हादसों में मर रहे लोग

सरकारी कुव्यवस्थाओं की वजह से कहें तो हर समय लोग मौत के मुहाने पर खड़े होते हैं। बीते सप्ताह दरभंगा, खगड़िया और सहरसा जिले में नाव पलटने से 15 लोगों की मौत हो गई थी और 30 से भी ज़्यादा लोग लापता हो गए थे। सहरसा में नाव पलटने की घटना कोसी नदी और खगड़िया में गंडक नदी में हुई थी। आपदा प्रबंधन विभाग के एसओपी को एक मर्तबा देखा जाए तो ये हादसे व्यवस्था की नाकामी को दर्शाते हैं। जिला स्तर पर प्रशासन की लापरवाही ही इसका एकमात्र कारण है।

बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने नाव पर सवारी करने वालों के लिए कुछ सुझाव जारी किये थे। सुझाव का नौवां बिंदु यह कहता है, “जिस नाव पर जीवनरक्षा के लिए लाइफ़ जैकेट, लाइफ़ बॉय के साथ प्राथमिक उपचार बॉक्स एवं रस्से आदि ठीक तरीके से रखे हों उसी नाव से यात्रा करें।" अर्थात कि जिस नाव पर यह व्यवस्था न हो उसपर यात्रा न करें। लेकिन आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी किए गए सुरक्षा मानकों और जमीनी सच्चाई दो ऐसी समानांतर रेखाएं हैं जो आपस में कभी नहीं मिल सकतीं।

बिहार में चल रही शायद ही कोई एक ऐसी नाव हो जिसपर यात्री लाइफ़ जैकेट या ट्यूब के साथ यात्रा कर रहे हों। सहरसा, सुपौल और दरभंगा जिले में हमने एक भी नाव पर न ही नाविक और न ही यात्रियों को लाइफ़ जैकेट में देखा। साथ ही 12 से 14 फ़ीट की छोटी सी नावों का निबंधन 38 लोगों को ढोने के लिए कर दिया गया है। जबकि उन नावों की क्षमता 12 से 15 लोगों से ज़्यादा बिल्कुल भी नहीं है। कोरोना के दौर में इन छोटी नावों पर दस यात्री पर्याप्त होते, लेकिन जिला प्रशासन ने ही उसे 38 लोगों को ढोने की अनुमति दे दी है।

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सहरसा के नवहट्टा प्रखंड में नाव चलाने वाले चनरदेव यादव से जब हमने लाइफ़जैकेट के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि नाव के निबंधन के बाद उन्हें अबतक कुछ भी नहीं दिया गया है। यह पूछने पर कि उन्होंने कभी मांग की? उन्होंने कहा कि “मांग क्या करेंगे जब कुछ देबे नहीं करता है तो। बलुआ से लेकर बीरपुर तक 200 से भी ज़्यादा नावें चलती हैं लेकिन किसी नाव पर लाइफजैकेट नहीं है"। 

बीते सप्ताह हुए नाव हादसों पर वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र कहते हैं, कि “बिहार में इस साल जो नावें आपदा प्रबंधन विभाग को तरफ से संचालित हो रही हैं, उनमें दो बड़ी कमियां साफ-साफ नजर आती हैं। पहली, उन नावों में बिहार मोटर बोट परिचालन नियमावली का साफ उल्लंघन किया जा रहा है। इस नियमावली के हिसाब से हर नाव में यात्रियों की संख्या, बचाव के उपकरण जैसे लाइफ जैकेट, ट्यूब और ऑक्सीजन सिलिंडर आदि की संख्या तय है। 

नाव के परिचालन का समय भी निर्धारित है। वहीं कोरोना और लॉक डाउन के मद्देनजर जो सोशल डिस्टेंसिंग और सेनिटाइज़ेशन के नियम हैं, उनका भी पालन नहीं हो रहा। अगर इनका पालन होता तो शायद ही ये दुर्घटनाएं होतीं। अभी विभाग ने सिर्फ स्थानीय स्तर पर चलने वाली नावों पर अपना स्टीकर लगा दिया है। 

अगर विभाग इस वक़्त इतनी नावों का परिचालन करवा रही हैं और उसकी नावें सरकारी नियमों के हिसाब से नहीं चलने के कारण हादसे का शिकार हो रही हैं, तो पूरी जिम्मेदारी आपदा प्रबंधन विभाग की बनती है। विभाग के सक्षम अधिकारियों के खिलाफ सख्त कारवाई होनी चाहिये।"

जब हमने इस मामले में सहरसा और सुपौल के जिलाधिकारी कौशल कुमार और महेंद्र कुमार से बात की, तो उन्होंने कहा कि निबंधन की गई सभी सरकारी नावों पर यात्रियों के लिए लाइफजैकेट की व्यवस्था है। यह लापरवाही का मामला है और उन्होंने कहा कि वो इस मामले को संज्ञान में लेकर आगे कारवाई करेंगे। पूरे जिले में किसी भी नाव पर लाइफजैकेट की व्यवस्था नहीं थी, और जिलाधिकारी को बीते एक महीने से इसकी जानकारी तक नहीं थी। क्षमता से अधिक के निबंधन पर जब हमने सहरसा के जिला जिलाधिकारी कौशल कुमार से प्रश्न किया तो दो बार में भी उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। दोनों जिलों के जिलाधिकारी से बात करने के बाद हमने और एक सप्ताह तक उन जगहों की जानकारी ली, लेकिन तबतक भी नावों को लाइफजैकेट उपलब्ध नहीं कराया गया था।

बिहार सरकार के एसओपी के उलट जमीनी सच्चाई कुछ और हाल बयां कर रही हैं। दरभंगा जिले में कई जगहों पर तो यह भी देखा कि नाव की तो दूर-दूर तक कोई व्यवस्था नहीं है। लोग बताते हैं कि उन्होंने यहाँ तक मांग की थी जिनके पास अपने नाव हैं, उनका निबंधन कर दिया जाए ताकि गाँव के लोगों की परेशानी दूर हो जाए और उसके बदले नाविकों की कुछ आमदनी भी हो जाएगी। लेकिन ऐसी कोई सुविधा बहाल नहीं की जा सकी। कुछ एक जगह तो यह भी दिखा कि नाव तो लगे हुए हैं, लेकिन यात्रियों को खुद चलाकर जाना होता है क्योंकि उसपर से नाविक ही गायब रहते हैं। 

इस तरह से बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और जिला प्रशासन की लापरवाही अपने चरम पर है। उत्तरी एवं पूर्वी बिहार की बाढ़ प्रभावित जनता को सरकारी व्यवस्था ने कोरोना और बाढ़ से निपटने के लिए पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया है। कई चीज़ों की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद सरकार जनता तक वो चीज़ें नहीं पहुँच पा रही है, जो इस वक्त उनके लिए बेहद ही ज़रूरी है। खासकर मोटर बोट अधिनियम का उल्लंघन जिसमें सभी यात्रियों के लिए सुरक्षा के लिहाज से लाइफ़जैकेट एवं ट्यूब जैसे उपकरणों का होना अत्यंत आवश्यक है। ऐसा न होने की परिस्थिति में हर यात्रा खतरे से खाली नहीं है, और इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो बीते सप्ताह हुए हादसों की पुनरावृत्ति कभी भी संभव है।

(ऋषिकेश शर्मा स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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