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भारत
राजनीति
बिहार: नीतीश-मोदी की डबल इंजन वाली सरकार ने राज्य को ख़राब वित्तीय हालत में ला खड़ा किया
लोगों को मदद की ज़बरदस्त दरकार के बावजूद राज्य सरकार पैसा ख़र्च करने में असमर्थ है, और सरकार के खुद का कर-राजस्व गिरता जा रहा है।
सुबोध वर्मा
27 Oct 2020
बिहार
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गठबंधन को एक ऐसे 'डबल इंजन' वाला गठबंधन बताया है, जो राज्य को समृद्धि की राह पर ले जायेगा। लेकिन,राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक नज़र डालने पर जो तस्वीर दिखती है, वह अक्षमता और अनदेखी की परेशान करने वाली तस्वीर है। यह सब और ज़्यादा चौंकाने वाला इसलिए है, क्योंकि बिहार लंबे समय से व्यवस्थागत ग़रीबी और पिछड़ेपन से पीड़ित है, और मोदी और नीतीश कुमार, दोनों ही कुछ वर्षों से एक हसीन सपने का वादा कर रहे हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक ओर से प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक़, इस परेशान करने वाली स्थिति का पहला और सबसे अहम लक्षण तो यही है कि यह राज्य एक ऐसे राजस्व अधिशेष का दावा करता है, जिसमें लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। (नीचे दिया गया चार्ट देखें) इसका मतलब यह है कि राज्य साल-दर-साल जितना ख़र्च कर रहा है, उससे ज़्यादा अर्जित कर रहा है। उदाहरण के लिए, पिछले साल 21,517 करोड़ रुपये का भारी भरकम राजस्व अधिशेष था।

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यह बात हैरत पैदा करती है कि, बड़े पैमाने पर कृषि पर आधारित, भूख, अशिक्षा, पुरानी बीमारी की व्यापकता और औद्योगिकीकरण के निम्न स्तर और देश के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक इस राज्य का प्रशासन उगाहे गये धन को ख़र्च करने का तरीक़ा नहीं खोज पा रहा है।

देश के कुछ अन्य ग़रीब राज्यों में भी राजस्व अधिशेष हैं,लेकिन यहां तो पिछड़ेपन या शायद नीति निर्माण के दिवालियेपन का एक लक्षण प्रतीत होती है। अजीब बात है कि यहां पैसे तो हैं, लेकिन राज्य सरकार इसे ख़र्च नहीं कर पा रही है।

ख़ुद का गिरता कर-राजस्व

इस बीच, इस विकट स्थिति का एक और पहलू यह है कि 2013-14 से राज्य के कुल कर-राजस्व के स्वयं के हिस्से में गिरावट आ रही है। (नीचे चार्ट देखें) 2019-20 में यह हिस्सा घटकर महज़ 20% रह गया है, जो कि 15 साल पहले की ही तरह है, जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था। 2013-14 में अपने उच्चतम बिन्दु पर पहुंचते हुए यह हिस्सा 29% तक बढ़ गया था।

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राज्य सरकारें उन कई करों और शुल्कों के ज़रिये अपने राजस्व का संग्रह करती हैं, जिन्हें वे निर्धारित करती हैं। इनमें आय कर (जैसे पेशेवर लोगों पर लगने वाला कर), संपत्ति कर (जैसे भूमि, टिकट और पंजीकरण शुल्क), वस्तु और सेवा कर (जैसे बिक्री कर, उत्पाद शुल्क, परिवहन, मनोरंजन, राज्य जीएसटी आदि) शामिल हैं। इसके बाद, उनके पास केंद्रीय करों की हिस्सेदारी की वैधानिक प्राप्तियां होती हैं।

2017 में मोदी सरकार की ओर से जीएसटी लागू करने के बाद से ज़्यादातर राज्यों के ख़ुद के कर-राजस्व में गिरावट आयी है। उस उपकर के लिए आंशिक रूप से मुआवज़ा दिया जाता था,जिसे केंद्र सरकार ने इसी उद्देश्य के लिए लगाया था।

लेकिन, उद्योग और आधुनिक सेवा क्षेत्र के नहीं होने और आर्थिक विकास के निम्न स्तर, कर सृजन के निम्न होने के चलते बिहार में ख़ुद के कर-राजस्व में गिरावट आना असल में एक बड़ी समस्या का प्रतिनिधित्व करता है। यह तो हमेशा से ही एक समस्या रही थी, लेकिन डबल इंजन की सरकार में हालात ख़ासतौर पर बदतर हुए हैं।

इस निराशाजनक स्थिति के परिणामस्वरूप नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार बकाया देनदारियों के साथ उधारी पर चल रही है, जो 1.86 लाख करोड़ रुपये की हो गयी है, और जो पिछले पांच वर्षों में 71% तक बढ़ गयी है।

इस बोझ का वहन लोग करते हैं

जदयू-भाजपा सरकार द्वारा प्रदर्शित इस कुप्रबंधन और लकवाग्रस्त स्थिति का असर यह है कि सरकार द्वारा गहन हस्तक्षेप की ज़रूरत वाले प्रमुख क्षेत्रों में भी लगातार गिरावट जारी है। चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय कुल राजस्व व्यय का लगभग 4% पर स्थिर बना हुआ है, जिसकी स्थिति महामारी के चलते शर्मनाक रूप में सामने आयी है। जल आपूर्ति और स्वच्छता का आलम यह है कि इसका प्रचार नीतीश कुमार इस चुनाव अभियान में नये सिरे से कर रहे हैं, लेकिन जब से नीतीश मुख्यमंत्री बने हैं, यानी 2005 से लेकर अब तक इस पर कुल ख़र्च का लगभग 1% ही किया जा रहा है। सिर्फ़ पिछले तीन सालों में ही इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर ख़र्च थोड़ा बढ़कर तक़रीबन 4% हो गया है।

जेडीयू-भाजपा गठबंधन ने ख़ुद को अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) और 'महादलितों' के मसीहा के रूप में चित्रित किया है, लेकिन दलितों और आदिवासियों के कल्याण पर किये जाने वाले ख़र्च पर एक नज़र डालने से दिखता है कि यह पहले पांच वर्षों के कुल ख़र्च के लगभग 1% पर ही स्थिर रहा है, अगले पांच वर्षों में लगभग 4% औसत हो गया और पिछले पांच वर्षों में लगभग 2% तक गिर गया है।

ख़ास तौर पर बच्चों और शिशुओं के बीच व्यापक रूप से मौजूद भूख और कुपोषण को लेकर यह उम्मीद की जाये कि बिहार सरकार सबसे ज़्यादा जरूरतमंद वर्गों को ज़रूरी पोषण मुहैया कराने पर कुछ और पैसा ख़र्च करे। हालांकि, पिछले 15 वर्षों के जदयू-भाजपा शासन के पोषण पर ख़र्च तक़रीबन 1-2% के आस-पास रहा है।

इस तरह की उदासीनता दिखाने और अनदेखी करने वाले नीतीश कुमार ख़ुद को भले ही ‘सुशासन बाबू’ के तौर पर पेश करते हों,लेकिन वे पूरी तरह से नाकाम हो गये हैं। और, बीजेपी इस नाकामी में नीतीश कुमार के साथ रही है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar: Ni-Mo Double Engine Leaves State Finances in Mess

Bihar Assembly Polls
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Malnutrition in Bihar

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