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राजनीति
“एक बुज़ुर्ग होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने बच्चों की आवाज़ बनें”
मैं तो शाहीन बाग़ की बिल्क़ीस दादी से उन्हें मिले सम्मान पर चर्चा करने गई थी लेकिन दादी तो हर मसले पर बहुत ही मज़बूती से अपनी राय पेश कर रही थीं।
नाज़मा ख़ान
04 Dec 2020
बिल्क़ीस दादी

लरजते हाथ, चेहरे पर तजुर्बे की सलवटें, लेकिन ऐसी खिलखिलाहट की पूरा कमरा चहक उठा। 82 साल की बिल्क़ीस दादी जैसे ही कमरे में दाख़िल हुईं उनके एनर्जी लेवल ने मुझे शर्मिंदा कर दिया। उसी मूंगिया हरे शाल को ओढ़े जिसमें पिछले साल उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुई थीं। पहले अमेरिका की फ़ेमस टाइम मैगजीन में दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों में उनका नाम आया और हाल ही में बीबीसी ने भी दुनिया भर की 100 प्रेरणा देने वाली प्रभावशाली महिलाओं की लिस्ट निकाली तो 'शाहीन बाग़ की दादी' बिल्क़ीस का नाम शामिल किया। ''हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़'' बनीं दादी इस सम्मान को पाकर क्या सोचती हैं? क्या वाक़ई वो ख़ुद में वो रौशनी देखती हैं जो दूसरों को भी राह दिखा सकती हो? 

मैं तो दादी से उन्हें मिले सम्मान पर चर्चा करने गई थी लेकिन दादी तो हर मसले पर बहुत ही मज़बूती से अपनी राय पेश कर रही थीं। जब मैंने दादी से पूछा इन सम्मान को मिलने का मतलब समझती हो दादी?  तो वो मुस्कुरा दीं और तपाक से जवाब दिया "पता है''। इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्हें अंदाज़ा तो है कि इन दोनों लिस्ट में उनका नाम आना बहुत बड़ी बात है। लेकिन ये कितनी बड़ी बात है वो इससे बेख़बर थीं और शायद बेपरवाह भी।  बिल्क़ीस दादी के मुताबिक़ वो ना तो नाम के लिए सीएए, एनआरसी के विरोध में  हुए धरने पर बैठी थीं और ना ही उन्होंने चर्चा में आने का कोई ब्लू प्रिंट तैयार किया था।

जिस हौसले ने बिल्क़ीस दादी को पूरी दुनिया में एक रोल मॉडल की तरह पेश किया वो जज़्बा आख़िर कहां से आया? मैंने दादी से पूछा कि क्या वो बचपन से ही ऐसी थीं? तो एक बार फिर दादी ने चहकते हुए जवाब दिया कि ''नहीं, ये हौसला हालात ने बख़्शा है", उनके मुताबिक़ अगर हमारे बच्चों को पढ़ने की जगह (जामिया, जेएनयू) में घुस-घुसकर पीटा जाएगा तो एक बुज़ुर्ग होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने बच्चों की आवाज़ बनें''।

मैंने बिल्क़ीस दादी से पूछा कि आपको क्या लगता है कि महिलाओं को अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए और वो भी ख़ासकर आपकी क़ौम (मुसलमान) की लड़कियों के लिए? कुछ डपटने के अंदाज़ में दादी ने झिड़कते हुए कहा कि क़ौम की लड़कियों ही क्यों? हर लड़की को अपने हक़ के लिए आगे आना चाहिए और मज़बूती से अपनी बात रखनी चाहिए। उन्हें ख़ूब पढ़ना चाहिए ताक़ि वो सही और ग़लत की पहचान कर सकें।

जिस वक़्त मैं बिल्क़ीस दादी का इंटरव्यू कर रही थी उसी वक़्त किसान आंदोलन का पहला दिन था और वो दिल्ली में घुसने की जद्दोजहद में लगे थे। चूंकि इस आंदोलन में भी सीएए,एनआरसी की तरह ही विरोध का वही जज़्बा दिखाई दे रहा था तो मैंने दादी से पूछा क्या वाकई विरोध एनआरसी का है, तो उनका जवाब था  कि नहीं ऐसा नहीं है, बात ग़रीबी, रोज़गार, किसान और हर उस शख़्स की है जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि ये सरकार अजीब, अजीब से क़ानून बनाकर लोगों को परेशान कर रही है कभी, नोटबंदी तो कभी बग़ैर इंतज़ाम के लॉकडाउन लगा रही है।

मैं बिल्क़ीस दादी का इंटरव्यू ख़त्म कर घर पहुंची ही थी देखा जिस वक़्त मैं दादी का इंटरव्यू कर रही थी उसी वक़्त हर मुद्दे पर बिन मांगी अपनी राय रखने वाली कंगना रनौत ने एक फेक न्यूज़ शेयर की और एक बुज़ुर्ग महिला की तस्वीर पोस्ट करते हुए दावा किया कि तस्वीर में दिखाई दे रही बुज़ुर्ग महिला शाहीन बाग़ की दादी हैं और लिखा कि ये वही दादी हैं जो सौ रुपये लेकर प्रदर्शन में शामिल होती हैं। कंगना ने अपने एजेंडे का ट्वीट सोशल मीडिया पर फेंका और एक बार फिर, शाहीन बाग़ की दादी, बिल्क़ीस, शाहीन बाग़, एनआरसी, जैसे कीवर्ड के साथ सोशल मीडिया पर बिल्क़ीस दादी से जुड़ी पोस्ट शेयर की जाने लगी। हमेशा की तरह दो गुट बंट गए।  हालांकि जब मैं उनका इंटव्यू कर रही थी तो मैंने भी उनसे पांच सौ रुपये और बिरयानी के लिए प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप का ज़िक्र किया और इस सवाल पर तो दादी ने ऐसा ज़ोर का ठहाका लगाया की मेरा सवाल उनकी हंसी में कहीं गुम हो गया।  उन्होंने अपनी उसी बात को एक बार फिर दोहराया जो वो अक्सर दोहराती रहती हैं, उन्होंने कहा कि जो हमपर ऐसे आरोप लगाते हैं हम उन्हें एक लाख रुपये की पेशकश करते हैं कि वो आकर हमारे साथ बैठें और लोगों की आवाज़ बनें।  हालांकि जिस वक़्त मैं ये स्टोरी लिख रही थीं सर्द रात में दादी किसानों की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाने के लिए पहुंच गई थीं। 

मैंने दादी से पूछा कि अगर कोरोना महामारी नहीं आई होती तो क्या उनका आंदोलन चलता रहता और क्या सरकार उनकी सुनती, इससे पहले की मेरा मेरा सवाल ख़त्म होता दादी बोल उठीं सरकार तो अब भी सुनेंगी, पब्लिक से सरकार है, पब्लिक ने ही तो सरकार बनाई है। 

उम्र के इस पड़ाव पर दादी ना सिर्फ मुसलमान औरतों की बल्कि हर उस महिला की आवाज़ बनीं जो सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा रखती है। मैंने दादी से मोदी जी के लिए कोई संदेश पूछा तो अचानक ही उनकी आवाज़ में नरमी उतर आई और बहुत ही प्यार से कहने लगीं वो सबके लिए बड़े हैं तो हमारे लिए भी बड़े हैं लेकिन यही कहना चाहती हूं कि हमारी बात सुनें, हमसे आकर मिलें और बच्चों पर जुल्म ना करें, उन्हें पढ़ाई लिखाई करने दें यही बच्चें आगे चलकर कोई नेता तो कोई डॉक्टर, इंजीनियर बनेगा। 

पिछले साल यही महीना था और दिल्ली के शाहीन बाग़ से सीएए एनआरसी के विरोध के लिए उठी आवाज़ पूरे देश में गूंजने लगी थी।  एक बार फिर दिसंबर की सर्द रातों में एक और कानून के विरोध में दिल्ली के आसमान में विरोध के नारे गूंज रहे हैं। वही जज़्बा, वही हौसला और सरकार का वही नज़रअंदाज़ करने का स्टाइल। लेकिन इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा देश ही नहीं पूरी दुनिया जानना चाहती है।

(नाज़मा ख़ान स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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