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स्वास्थ्य
भारत
जनस्वास्थ्य आपातकाल में मुनाफ़े में हिस्सेदारी
'अच्छी जैवविविधता वाले भारत जैसे देश में स्थानीय ABS रेगुलेशन के पालन पर ज़ोर नहीं दिया जा रहा है, कोरोना महामारी में दी गई छूट से हमारे एक सुचारु ABS ढांचे को बनाने में मदद के बजाए नुक़सान ही होगा।'
शालिनी भुटनी, कांची कोहली
14 Aug 2020
जनस्वास्थ्य आपातकाल में मुनाफ़े में हिस्सेदारी
प्रतीकात्मक तस्वीर

PMCARES फंड से 100 करोड़ रुपये, कोरोना महामारी की वैक्सीन बनाने के घरेलू प्रयासों के लिए आवंटित हो चुके हैं। प्रधानमंत्री द्वारा कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के लिए अप्रैल, 2020 में एक टास्क फोर्स बनाई गई। इस टास्कफोर्स की समन्वय एजेंसी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाला बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग है। इस विभाग के अंतर्गत वैक्सीन बनाने के लिए कुछ कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

उसी महीने भारत की "नेशनल बॉयोडॉयवर्सिटी अथॉरिटी (NBA)" ने दो सर्कुलर पास किए। आम नज़र में नुकसानदेह न दिखने वाले इन सर्कुलर पर किसी की नज़र नहीं गई। सर्कुलर से देश के जैव विविधता कानून, 2002 से संबंधित 2 विस्तृत और आपस में जुड़े सवाल पैदा होते हैं।

  • क्या कोरोना महामारी से जुड़े इन सर्कुलर से क्या भारत के जैव संसाधनों के फायदों को बांटने के विचार पर अंतर नहीं पड़ता?
  • दूसरा सवाल है कि इस कानून के ज़रिए कोरोना जैसी महामारी पर चल रहे शोधों को कैसे नियंत्रित किया जा रहा है?
  • जैवसंसाधन तक पहुंच के लिए क्या कानूनी प्रावधान हैं?

वैक्सीन के विकास, चिकित्साविधान और डॉयग्नोस्टिक के लिए जैविक संसाधनों तक पहुंच की जरूरत पड़ती है। चाहे शोध या व्यवसायिक उपयोग के लिए, भारतीय संस्थानों को "राज्य जैवविविधता बोर्ड (SBBs)" इस तरह की पहुंच प्रदान करते हैं। सभी राज्यों में SSBs बनाए गए हैं, क्योंकि ऐसा करना जैव विविधता कानून के तहत अनिवार्य है। कोई भी भारतीय व्यक्ति या कंपनी, जो भी किसी चीज का पेटेंट करवाना चाहता है या किसी बौद्धिक संपदा पर अपने अधिकार का दावा करता है, उसे चेन्नई में स्थित NBA से पहले सहमति लेनी होती है।  किसी भी विदेशी संस्थान को जो भारतीय जैवसंसाधनों या बौद्धिक संपदा अधिकारों तक पहुंच चाहता है, उसे राज्य जैवविविधता बोर्ड के बजाए NBA में आवेदन लगाना पड़ता है।

इन जैवसंसाधनों तक पहुंच बनाने वाला चाहे भारतीय हो या गैर-भारतीय, इनसे जो फायदे मिलते हैं, उनका बंटवारा सभी संभावित दावेदारों में होना चाहिए, इनमें स्थानीय समुदाय और जैवविविधता का संरक्षण करने वाले भी शामिल हैं। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना गया विचार है, जिसे "एक्सेस एंड बेनेफिट शेयरिंग (ABS)" कहा जाता है।

नागोया प्रोटोकॉल में भी ABS पर अंतरराष्ट्रीय नियामकों को माना गया है। इसमें जेनेटिक संसाधनों की महत्ता को भी पहचान दी गई है। नियामक जरूरतों पर अपने ABS प्रस्ताव का विकास और उसे लागू करते हुए, अनुच्छेद 8 में नागोया प्रोटोकॉल सभी देशों से कहता है:

"उन मौजूदा या आपात मामलों पर दोहरा ध्यान रखें, जिनसे मानव, पशु और पौधों के स्वास्थ्य को खतरा बन सकता है। सभी पक्ष इस चीज को भी ध्यान में रख सकते हैं कि जेनेटिक संसाधनों तक पहुंच की जरूरत अब बढ़ रही है। ऐसे जेनेटिक संसाधनों के उपयोग से पैदा होने वाले फायदों में न्यायपूर्ण और समान बंटवारा किए जाने की भी जरूरत है, जिसमें जरूरतमंदों तक सस्ता इलाज़ पहुंच सके, खासकर विकासशील देशों में ऐसा किए जाने की जरूरत है।"

भारत 2014 से नागोया प्रोटोकॉल में शामिल है। भारत में लागू ABS के प्रावधान नागोया प्रोटोकॉल के साथ मेल खाते हैं, यह जैव विविधता तक पहुंच और इससे जुड़े ज्ञान और फायदों के बंटवारे पर बने दिशानिर्देशों में परिलक्षित होते हैं। जैव विविधता कानून के तहत इन्हें 2014 में NBA ने जारी किया था। मुख्य जैव विविधता कानून के मुताबिक़, अगर स्थानीय पंचायत के अंतर्गत आने वाले किसी इलाके से संसाधन या वहां से ज्ञान इकट्ठा किया जाता है, तो वहां की जनता की सहमति ली जानी जरूरी है। जैव विविधता कानून में हर गांव और शहरी वार्ड के भीतर जैवविविधता प्रबंध कमेटी (BMC) को बनाने का प्रावधान है, ताकि ऐसे मामलों में सलाह-मशविरा किया जा सके। जैव विविधता कानून ने BMC को अपने इलाके में आने वाले जैवविविधता संसाधनों तक संस्थानों को मिली पहुंच के एवज में उनसे शुल्क वसूलने का अधिकार है।

क्या है कोरोना से जुड़ा सर्कुलर?

जब देश में कोरोना के चलते लॉकडाउन लगाया गया था, तब इसके शुरुआती दिनों में NBA ने दो सर्कुलर जारी किए, ताकि जैवसंसाधनों से दवाओं और वैक्सीन को बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके, ताकि कोरोना महामारी के प्रसार को रोका जा सके। इन सर्कुलर के उद्देश्यों पर करीबी परीक्षण की जरूरत है कि कैसे महामारी के दौर में संसाधनों तक पहुंच को नियंत्रित किया जाएगा। यह भी देखे जाने की जरूरत है कि संसाधनों तक जिस पहुंच की अनुमति दी गई है, क्या उसमें फार्मा कंपनियों को संसाधनों से होने वाले फायदे के बंटवारे के कानूनी प्रावधान हैं या नहीं। आखिर कोई भी स्थिति बने, यहां होने वाले शोध से व्यवसायिक उत्पाद ही तो बनाया जाएगा।

3 अप्रैल, 2020 को, लॉकडाउन के पहले चरण में NBA ने सर्कुलर नंबर NBA/Chairman/Misc/2020-21 जारी किया, जो नये कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वैक्सीन, डॉयग्नोस्टिक के विकास और स्वास्थ्य शोध की वैश्विक मांग के जवाब में जारी किया गया था। सर्कुलर के ज़रिए सभी गैर भारतीय संस्थानों को पांच दिन के भीतर क्रियान्वयन की सुविधा दी गई। उसी दिन जारी किए गए एक और सर्कुलर से लॉकडाउन पीरियड में NBA के साथ ABS समझौते में शामिल होने की वक़्त सीमा बढ़ा दी गई। इसका मतलब हुआ कि जब संसाधनों तक पहुंच को अनुमति हासिल हो जाएगी, उसके बाद पहुंच के एवज में शर्तें बनाई जाएंगी।

ना तो जैव विविधता कानून और ना ही 2014 के ABS रेगुलेशन में कोई समय सीमा नहीं है, जिसमें बताया गया हो कि कितने दिनों में पूरी प्रक्रिया को खत्म कर लिया जाएगा। ABS के लिए गाइडलाइन के एक नए सेट में प्रस्ताव दिया गया है कि संसाधनों तक पहुंच की मांग करने वालों को 45 दिनों की भीतर निपटाया जाए। लेकिन महामारी के दौर में जारी हुआ 3 अप्रैल का सर्कुलर आवेदन को पांच दिन के भीतर निपटाने की बाध्यता बनाता है। सर्कुलर में संसाधनों के इस्तेमाल से होने वाले फायदे के बंटवारे को लेकर कुछ नहीं कहा गया है।

यह तेजी सही दिखाई पड़ती है, क्योंकि दुनिया को जल्द से जल्द महामारी के इलाज़ की जरूरत है। लेकिन फायदों के बंटवारे का क्या होगा?

नागोया प्रोटोकॉल में इसे बताया गया है:

"स्वास्थ्य और खाद्यान्न सुरक्षा जैसे प्राथमिकता से जुड़े जो शोध होंगे, उनमें जेनेटिक संसाधनों के स्थानीय उपयोग का भी ख्याल रखा जाएगा"। यह भी एक गैर आर्थिक फायदा हो सकता है।

भारत की ABS सच्चाई और कोरोना शोध

भारत के ABS रेगुलेशन, 2014 का रेगुलेशन 13 कहता है कि कोई भी संस्थान जो महामारी और अन्य आपातों से बचाव की कोशिशों के लिए जैवविविधता संसाधनों को देश के बाहर भेजता है, उसे NBA में फॉर्म B भरकर आवेदन करना होगा। फॉर्म आवेदक को अंडरटेकिंग दिलवाता है कि सामग्री को व्यवसायिक उपयोग के लिए NBA की अनुमति के बिना बाहर नहीं भेजा जाएगा। NBA द्वारा इस आवेदन का 45 दिन में समाधान किया जाएगा। 

भारतीय संस्थानों के मामले में, जैव विविधता कानून की धारा 7 इन संस्थानों को SBBs से संसाधनों तक पहुंच की अनुमति लेने की बाध्यता बनाती है। इन संस्थानों को अपने फायदों का बंटवारा भी करना होगा। जून, 2020 में बाबा रामदेव की हर्बल मेडिसिन कंपनी, पतंजलि आयुर्वेद ने निजी संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च, जयपुर के साथ मिलकर कोरोनिल टेबलेट और स्वसारी वाटी दवाई को लॉन्च किया, उन्होंने दावा किया कि यह कोरोना का इलाज़ कर सकती है। बाद में इन दावों को वापस ले लिया गया। इस सवाल पर जाए बिना कि बाबा रामदेव की दवाईयों से कोरोना ठीक हुआ या फिर सिर्फ रोग प्रतिरोधक क्षमता ही बढ़ी, यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या दोनों में से किसी भी निर्माताओं ने SBB को किसी तरह की शुल्क दी या नहीं। 

आयुर्वेदिक और पौष्टिक औषधीय उत्पादों में कच्चे माल और मुख्य सामग्री के तौर पर जैविक संसाधनों का ही उपयोग होता है। अतीत में रामदेव की दिव्य फॉर्मेसी ने ABS का खूब विरोध किया था। 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिव्य फॉर्मेसी के खिलाफ़ फ़ैसला सुनाया और उत्तराखंड जैवविविधता बोर्ड को दिशा-निर्देशों को मान्यता दी, जिनके तहत कंपनी को अपने मुनाफ़े में से SBB और स्थानीय BMC को FEBS (फेयर एंड इक्विटेबल बेनेफिट शेयरिंग) का पैसा चुकाना था। इस फैसले ने कानूनी तौर पर भारतीय कंपनियों के मामले में दिशा तय कर दी। साफ़ है कि भारतीय कंपनियों को भी अपने मुनाफ़े में बंटवारा करना होगा। भारतीय उद्योग लगातार इस बंटवारे का विरोध कर रहे हैं, वे इसे "दोहरा कर" करार देते हैं। 

मुनाफ़े में बंटवारे का सामान्यीकरण

कोरोना शोध अनुमति और समझौते पर NBA द्वारा जारी किए गए सर्कुलर से ABS प्रक्रिया में दो प्रभाव साफ़ नज़र आते हैं।

पहला, अब स्थानीय BMC के साथ सलाह-मशविरा और विश्लेषण नहीं होगा। पांच दिन की जो समयसीमा बनाई गई है, उसमें इन दोनों प्रक्रियाओं के लिए कोई जगह नहीं बचती है। भारतीय जैव संसाधनों तक कोरोना शोध की इस तेज पहुंच को केवल तभी सही ठहराया जा सकता है, जब बदले में हमें अपने देश की जरूरतों के हिसाब से दवाईयों की निश्चित आपूर्ति और कम दर सुनिश्चित की जाए। जैसा ABS में बताया गया है, तेजी से दी जाने वाली पहुंच के साथ FEBS में भी वृद्धि होनी चाहिए।

दूसरा, इससे भारतीय शोध संस्थानों और कंपनियों का उनके विदेशी प्रतिस्पर्धियों से अंतर और ज़्यादा बढ़ जाता है। कोरोना महामारी के मामले में संसाधनों तक जो पहुंच दी गई है, उससे भविष्य की महामारियों के लिए भी एक नया रास्ता खोल दिया गया है। अगर हमारा उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना है, तो स्थानीय शोध को समर्थन देना होगा, लेकिन मुनाफ़े के बंटवारे को खत्म नहीं करना होगा।

अच्छी जैवविविधता वाले भारत जैसे देश में स्थानीय ABS रेगुलेशन के पालन पर जोर नहीं दिया जा रहा है, कोरोना महामारी में दी गई छूट से हमारे एक सुचारू ABS ढांचे को बनाने में मदद के बजाए नुकसान ही होगा। कोरोना के बाद की जो दुनिया होगी, उसमें मुनाफ़े में बंटवारे को दुनिया की एक नई सच्चाई बनानी होगी।

लेखक स्वतंत्र क़ानूनी शोधार्थी हैं और वे साझा तौर पर BioDWatch का समन्वय करते हैं। BioDWatch एक सूची है, जो भारत में जैव विविधता क़ानूनों पर अपडेट्स को दर्शाती है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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