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मानवाधिकार के मुद्दे पर फिर फंसे अमेरिकी गृहसचिव ब्लिंकेन
ब्लिंकेन ने तय किया है कि अब आगे मानवाधिकार अभियान जारी नहीं रह सकता, क्योंकि दोहरी बात और पाखंड के चलते मानवाधिकारों पर बाइडेन प्रशासन मुश्किल में फंस चुका है।
एम. के. भद्रकुमार
05 Mar 2021
मानवाधिकार के मुद्दे पर फिर फंसे अमेरिकी गृहसचिव ब्लिंकेन

3 मार्च को अमेरिकी गृह विभाग ने अपनी वेबसाइट पर "यूनाइटेज स्टेट फिलिस्तीन जांच में ICC की जांच का विरोध करता है (द यूनाइटेड स्टेट्स अपोज़ेस द आईसीसी इंवेस्टिगेशन इनटू द पेलेस्टिनियन इंवेस्टीगेशन)" शीर्षक से बेहद हास्यास्पद वक्तव्य डाला।

वक्तव्य से पता चलता है कि पश्चिम एशिया में मानवाधिकार के मुद्दों पर अमेरिका दूसरी बार फंसा है, यहां तो उसने यह तक मानने से इंकार कर दिया कि ICC की "फिलिस्तीनी स्थिति" की जांच मानवाधिकार के बारे में है।

अमेरिकी गृह विभाग का तर्क यहां अफ़सरशाही भरे ढर्रे तक सीमित हो जाता है। अमेरिकी वक्तव्य यहां ICC द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की जांच, जिसमें इज़रायल राज्य शामिल है, उस जांच के क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाता है। अमेरिकी वक्तव्य यह तर्क भी देता है कि "फिलिस्तीन कोई संप्रभु राज्य नहीं है, इसलिए उसका ICC में एक सदस्य देश के तौर पर शामिल होना, भागीदारी करना या वहां ICC का क्षेत्राधिकार होना संभव नहीं है।"

मानवाधिकार के मुद्दों को भीतर से महसूस करने की जरूरत होती है, वे कानूनी नज़रिए से ठंडी तार्किकता या राजनीतिक मुनाफ़े का सौदा नहीं बन सकते। असहाय फिलिस्तीनियों पर गृह विभाग का वक्तव्य पाब्लो पिकासो के शब्दों को याद दिलाता है, पिकासो कहते हैं, "नियमों को किसी कुशल व्यक्ति की तरह जानिए, ताकि उन्हें आप एक कलाकार की तरह तोड़ सकें।"

फिलिस्तीनियों के दुख पर पर्दा डालने के लिए इस तरह के कुतर्कों का इस्तेमाल अमेरिकी अधिकारियों को वैश्विक स्तर पर सिर्फ़ चालबाज कलाकार की भूमिका में सीमित कर देगा। तथ्य यह है कि फिलिस्तीन राज्य को संयुक्त राष्ट्रसंघ के 138 सदस्य देशों द्वारा मान्यता प्राप्त है और 2012 से फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र संघ में एक गैर-सदस्यीय पर्यवेक्षक राज्य का अधिकार मिला हुआ है। फिलिस्तीन, अरब लीग, इस्लामिक सहयोग संगठन, G77, अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सदस्य है।

यहां अमेरिका संदेशवाहक ICC अभियोजक को सजा दे रहा है, जिसने फिलिस्तीन के मुद्दे को उठाने की हिम्मत की है, जबकि वह खुद जून में सेवानिवृत्त होने वाली हैं!

अमेरिकी गृह विभाग दावा करता है कि "वे अंतरराष्ट्रीय अत्याचार के अपराधों में न्याय और जवाबदेही तय करने के लिए गंभीर तौर पर प्रतिबद्ध हैं" लेकिन ICC एक "सीमित न्यायक्षेत्राधिकार का न्यायालय है। साथ ही अमेरिका का विश्वास है कि मध्यपूर्व के लोगों के लिए ज़्यादा खुशहाल भविष्य का निर्माण आपसी संबंधों में पुल बनाकर और विमर्श के नए आयाम खोलकर हो सकता है, ना कि एकतरफा न्यायिक कार्रवाई के ज़रिए, जिससे तनाव बढ़ता है और दो राज्यों के बीच समाधान के विमर्श की कोशिशें कमज़ोर होती है। हम इज़रायल और इसकी सुरक्षा के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता को बरकरार रखेंगे। इसके तहत हम उन कार्रवाईयों का भी विरोध करेंगे, जो इज़रायल को गलत तरीके से निशाना बनाने के लिए की जा रही हैं।" 

यह बेहद हास्यास्पद तर्क है, जिसमें बहुत सारे विरोधाभास हैं। आखिर इसका क्या मतलब हो सकता है? संक्षेप में कहें तो अमेरिकी गृह विभाग कहता है, "मुझे अपना चेहरा दिखाइए, तब मैं आपको कानून बताऊंगा।" लेकिन जब इज़रायल पर ICC जांच की बात आती है, तो बाइडेन प्रशासन में इतनी उथल-पुथल क्यों मच जाती है? इज़रायली नज़रिए को समझने के लिए एक्सियोस द्वारा "अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कोर्ट ने इज़रायल फिलिस्तीन युद्ध अपराध जांच खोली" नाम के शीर्षक से गई रिपोर्ट को पढ़िए।

दरअसल यह वही नकारात्मक रवैया है, जिसके चलते बाइडेन प्रशासन जमाल खाशोगी की हत्या का आदेश देने के लिए सऊदी अरब के राजकुमार पर प्रतिबंध नहीं लगा पाया। जबकि जमाल खाशोगी ना केवल अमेरिकी नागरिक था, बल्कि अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए वह "रणनीतिक संपत्ति" था।

बाइडेन प्रशासन के पास अपनी कायरता को छुपाने के लिए शब्द नहीं हैं। ऊपर से दब्बूपन के साथ अमेरिका अपना विचार बदलता है। अमेरिका, पिछले शुक्रवार को सीआईए द्वारा जमाल खाशोगी की हत्या पर जारी की गई मूल रिपोर्ट से 3 सऊदी नामों को हटाने पर विचार कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सऊदी सुरक्षातंत्र में मौजूद यह 3 शीर्ष नाम वार्ताकार भी हैं, जिनके साथ अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां लगातार व्यवहार जारी रखे हुए हैं। आखिर अमेरिका अपने सऊदी सहयोगियों पर प्रतिबंध कैसे लगाए?

इज़रायल और सऊदी अरब के राजकुमार के मामले में अमेरिका 'एक तरफ खाई, तो दूसरी तरफ कुआं' वाली स्थिति में फंस चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका हमेशा ही इज़रायल और सऊदी अरब द्वारा होने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों में उनके साथ किसी ना किसी तरह लिप्त रहा है। अमेरिका के हाथों पर इतना खून है कि पूरे अरब का इत्र भी उसे साफ़ नहीं कर सकता।

अगर इज़रायल को अमेरिकी सहारे का भरोसा नहीं होता, तो वो कभी इतनी हत्याओं के साथ बिना सजा भुगते बच नहीं सकता था। जहां तक सऊदी अरब की बात है, तो मानवाधिकार के नज़रिए से उसने एक बहुत बड़ा अपराध किया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह पिछले कुछ दशकों से अमेरिका का प्राथमिक भूराजनीतिक हथियार रहा है।

सोचिए कि सीआईए ने 2015 में सऊदी तख़्त के पूर्व दावेदार राजकुमार मुहम्मद बिन नायेफ को जॉर्ज टेनेट पदक क्यों दिया था। सीआईए प्रमुख के तौर पर खुद माइक पॉम्पियो ने रियाध जाकर राजकुमार नायेफ को पुरस्कृत किया था! साधारण शब्दों में कहें तो अमेरिकी अधिकारी उसी खून की नदी में तैरते रहे हैं, जिसमें "आतंक के खिलाफ़ युद्ध" के नाम पर राजकुमार नायेफ मौजूद थे।

आज बाइडेन प्रशासन 35 साल के सऊदी राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान को नाराज़ करना नहीं चाहता, जो संभावित तौर पर अपने पिता की जगह लेंगे। वह अगले कई दशक तक शासन कर सकते हैं। हालांकि सऊदी अरब के जाने-माने विशेषज्ञ और सीआईए के पूर्व कर्मी ब्रूस रिडेल का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन जितना सोचता है, सलमान उससे बहुत कम सुरक्षित हैं।

3 मार्च के दिन सचिव के तौर पर गृह सचिव ब्लिंकेन ने "अमेरिकी लोगों के लिए विदेश नीति" नाम से बेन फ्रैंकलिम रूम से अपना पहला बड़ा भाषण दिया। यहां ब्लिंकेन ने खुद को 'मानवाधिकारों का रक्षक' होने के तौर पर पेश करने से बहुत दूर रखा। खाशोगी प्रकरण के बाद शायद अमेरिका को मिली वास्तविक यथार्थ की झलक इसकी व्याख्या करती है। 

ब्लिंकेन ने पहले दावा किया था कि मानवाधिकार का मुद्दा अमेरिकी विदेश नीति के केंद्र में होगा। लेकिन कल उन्होंने बाइडेन प्रशासन की विदेश नीतियों की शीर्ष 8 प्राथमिकताएं कुछ इस तरह बताईं: कोविड-19 महामारी और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा; आर्थिक हालातों की मरम्मत; तानाशाही और राष्ट्रवाद के चंगुल से लोकतंत्र को बाहर निकालना; "एक प्रभावी और मानवीय प्रवासी तंत्र का विकास करना"; मित्र देशों और साझेदारों से संबंधों में फिर से ताजगी लाना; पर्यावरण संकट और हरित ऊर्जा क्रांति; अमेरिका का "तकनीक में नेतृत्व" और चीन के साथ संबंध। 

ब्लिंकेन ने तय किया है कि मानवाधिकारों का अभियान आगे ज़्यादा नहीं चल सकता, क्योंकि दोहरी बात और पाखंड के चलते इसका खुलासा हो गया है। व्हाइट हॉउस द्वारा इतना जबरदस्त माहौल तैयार करने के बावजूद, आसियान देशों ने म्यांमार में सत्ता परिवर्तन के एंग्लो-अमेरिकी एजेंडे को नकार दिया है। 

यहां तक कि अमेरिका के सबसे करीबी मित्र देश सिंगापुर ने तक म्यांमार में 'राष्ट्रीय स्थिरता और सुलह' के साथ-साथ "मौजूदा स्थिति में समझौते पर विमर्श" का सुझाव दिया है। सिंगापुर ने यहां म्यांमार को "एक तरफ़ अकेला किए जाने के बजाए, उससे बातचीत करने पर" जोर दिया है।

साभार: इंडियन पंचलाइन

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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