NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पुस्तकें
किताबः ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ के बारे में
‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ की कविताएं राजनीतिक परिपक्वता, गहन संवेदनशीलता, सघन बिंबात्मकता और प्रकृति के साथ लयात्मक व दोस्ताना रिश्ते की वजह से हमारा ध्यान खींचती हैं।
अजय सिंह
10 Sep 2021
किताबः ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ के बारे में

कवि और संस्कृतिकर्मी शोभा सिंह (जन्म 1952) का दूसरा कविता संग्रह ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ (2020, गुलमोहर किताब, दिल्ली) उनके पहले कविता संग्रह ‘अर्द्ध विधवा’ (2014, गुलमोहर किताब) से आगे बढ़ा हुआ कदम है। ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ की कविताएं राजनीतिक परिपक्वता, गहन संवेदनशीलता, सघन बिंबात्मकता और प्रकृति के साथ लयात्मक व दोस्ताना रिश्ते की वजह से हमारा ध्यान खींचती हैं।

इन कविताओं में कुछ भी न तो शुद्ध रूप से पर्सनल है न शुद्ध रूप से पॉलिटिकल—दोनों एक-दूसरे से घुले-मिले हैं। कहा जाये कि शोभा सिंह के यहां जो पर्सनल है, वही पॉलिटिकल भी है। संग्रह की कविताओं में राजनीति और प्रकृति साथ-साथ क़दमताल करती नज़र आती हैं। प्रतिरोध का माहौल रचने में दोनों साथ हैं।

187 पेज के संग्रह ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ में 61 कविताएं हैं। किताब का दाम 120 रुपये है।

इन कविताओं में प्रकृति के इतने मोहक, विविधरंगी, गतिशील, सघन बिंबमालाएं व अनूठी व्यंजना लिये हुए कल्पानशील चित्र हैं—और ये लंबे समय के बाद हिंदी कविता में दिखायी पड़े हैं। (उदाहरण के लिएः ‘कोहरा’, ‘मछली, औरत और सब्र’, ‘नमक मज़दूर’, ‘सागर रात और भोर का सम्मोहन’, ‘रियो दे प्लाता’, और ‘कवि से मिलकर लौटते हुए’ शीर्षक कविताएं देखिए।) शोभा सिंह के यहां प्रकृति मनुष्य-निरपेक्ष नहीं, मनुष्य-सापेक्ष है।

कवि का गहरा, आधुनिक सौंदर्य बोध और मानव जगत व प्रकृति जगत की जटिलता और विविधता को देखने-समझने (ऑब्ज़र्व करने) की उसकी क्षमता कभी-कभी चकित कर देती है। शोभा सिंह की कविताओं की दृश्यात्मकता समय, प्रकृति, पर्यावरण पर जैसे टिप्पणी करती चलती हैं। कवि के यहां न प्रकृति इकहरी है, न राजनीति। कवि धीमी आवाज़ में अपनी बात कहती है, लेकिन असरदार तरीक़े से कहती है।

ऊपर जिन कविताओं के नाम दिये गये हैं, उनके अलावा इन कविताओं को देखियेः ‘धान के खेत में कुहकते सपने’, ‘मिसफ़िट’, ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’, ‘भुट्टेवाली’, ‘रुक़ैया बानो’, ‘इति’, ‘पालो बोरोचो’, ‘औरत बीड़ी मज़दूर’, ‘शंखमुखम बीच’, ‘कश्मीर’ और ‘अर्बन नक्सल’। इनमें कई दृश्य, कई नज़ारे, कई मनःस्थितियां, कई भावजगत दिखायी देंगे।

कवि की कविताओं का दायरा (रेंज) काफ़ी बड़ा और विविध हैः उसमें कश्मीर, शाहीनबाग़ व अर्बन नक्सल हैं, रोहित वेमुला व अंबेडकर हैं, बिलकिस बानो, गौरी लंकेश व सोनी सोरी हैं, सीवर/गटर में होने वाली मोतें हैं, नमक मज़दूर, बीड़ी मज़दूर व भुट्टेवाली है, अपने ‘मिसफ़िट’ होने की वेदना है, रुक़ैया बानो और वीरेन डंगवाल हैं, म्यूजियम, पुलिस कस्टडी और एसिड अटैक विक्टम हैं, और ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश’ है।

इस कविता संग्रह की एक और ख़ास बात यह है कि चार कवियों—मंगलेश डबराल, सविता सिंह, हेमलता महीश्वर और शुभा—ने इसकी भूमिकाएं लिखी हैं, अलग-अलग। ऐसा शायद पहली बार हुआ है। मंगलेश डबराल को जहां शोभा सिंह की कविताओं में ‘नये पड़ाव की शिनाख़्त’ दिखायी पड़ी, वहीं सविता सिंह कहती हैं, ‘एक कनी-सी चमकी थी वह’। हेमलता महीश्वर को कवि की कविताएं ‘नव निर्माण का आह्वान’ लगती हैं, और शुभा इन कविताओं को ‘हमारे समय की महत्वपूर्ण कविताएं’ कहती हैं। यह भूमिकाएं शोभा सिंह की कविता पर गंभीर विमर्श पेश करती हैं।

कविता संग्रह ‘यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा’ मनुस्मृति-आधारित हिंदुत्व फ़ासीवाद के राजनीतिक प्रतिरोध की चेतना, विवेकसंगत आलोचनात्मक दृष्टि, गहरी संवेदनात्मक और सामाजिक जागरूकता व पर्यवेक्षण, और सघन बिंबों से लैस काव्यात्मकता की वजह से महत्वपूर्ण बन गया है।

(लेखक वरिष्ठ व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Book Review
यह मिट्टी दस्तावेज़ हमारा
Sobha Singh

Related Stories

चर्चा में नई किताब 'भारत के प्रधानमंत्री'


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License