NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बजटः मोदी सरकार ने दलितों व आदिवासियों को नहीं दिये उनके हक़ के 173,110 करोड़ रुपये
पहली बार, किसी केंद्रीय बजट में नहीं किया गया जिक्र दलितों के शिड्यूल क्लास सब-प्लान और आदिवासियों के ट्राइबल सब-प्लान का, दलितों में आक्रोश।
भाषा सिंह
03 Feb 2021
बजटः मोदी सरकार ने दलितों व आदिवासियों को नहीं दिये उनके हक़ के 173,110 करोड़ रुपये
दिल्ली के प्रेस क्लब में दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन और नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

वर्ष 2021-22 का केंद्रीय बजट जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने पेश किया, तो कई चीजें पहली बार हुईं, उनमें एक बात बहुत अहम है और वह यह कि उन्होंने अपने पूरे बजट भाषण में एक बार भी दलितों के लिए शिड्यूल कास्ट सब-प्लान और आदिवासियों के लिए ट्राइबल सब-प्लान का जिक्र तक नहीं किया। क्या यह महज एक लापरवाही थी, बेध्यानी में हुई गलती? नहीं। बजट में हर कदम पर दलितों-आदिवासियों के हक की बटमारी की गई, नीति आयोग के निर्देशों तक का पालन नहीं किया है। इस बजट (2021-22) में दलितों के हक के 112,863 करोड़ रुपये और आदिवासियों के हक के 60, 247 करोड़ रुपये कम आवंटित किये गये।

यह आंकड़े मंगलवार, 2 फरवरी को दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन और नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स ने पेश किये। दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में खुलकर यह तथ्य सामने रखे गये कि इस बजट में न सिर्फ दलितों और आदिवासियों को उनके आर्थिक हक से वंचित रखा गया है, बल्कि बजट से उन्हें अदृश्य ही कर दिया गया है। बड़ी हैरानी की बात है कि जनवरी 2021 में ही केंद्र सरकार ने यह ऐलान किया था कि वह दलित छात्रों को दी जाने वाली पोस्ट मेट्रिक स्कॉलरशिप को को बढ़ाकर 7 हजार करोड़ करने की घोषणा की थी, जिसे खूब प्रचारित-प्रसारित भी किया गया। लेकिन जब निर्मला सीतारमन ने बजट पेश किया तो पता चला कि कुल मिलाकर इस मद में 4 हजार करोड़ रुपये ही आवंटित हुए है। इस तरह से हर कदम पर इस बजट में सबसे वंचित समुदाय के हक को मारा गया और उनसे किये गये वादे को पूरा करने से मोदी सरकार मुकर गई।

नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स की बीना पल्लिकल ने बताया, ` यह बजट बहुत निराश करने वाला है। नीति आयोग के दिशानिर्देशों तक का पालन नहीं  किया गया—जिसके ‘मुताबिक दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बजट में हिस्सेदारी तय की गई थी। न्यूनतम इतना देने के बजाय, केंद्र सरकार के बजट ने बहुत बड़ी फ्लैगशीप स्कीम के अंतर्गत दलितों और आदिवासियों के लिए आवंटित पैसे को डाल दिया गया है और इसे ओबीसी के साथ जोड़ दिया गया है, लिहाजा यह पता चलना असंभव है कि इस योजना से दलितों और आदिवासियों को कितना लाभ हुआ।

वहीं एक और बड़ी चालाकी पूरी खामोशी के साथ इस बजट में की गई है। समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाने वाली कई योजनाओं को या तो सिरे से गायब कर लिया गया है, या फिर पूरी तरह से अप्रांसगिक। गंदगी –अनक्लीन पेशे में लगे लोगों के बच्चों के लिए एक विशेष स्कॉलरशिप—छात्रवृति की योजना थी, जो इस बजट में पूरी तरह से गायब हो गई है। इस योजना का लाभ मैला ढोने वाले समुदाय के बच्चे, चमड़े और लाश जलाने का काम करने वाले समुदाय के बच्चे उठाते थे।

इसके साथ ही मैला प्रथा उन्मूलन के लिए पिछले साल आवंटित 110 करोड़ रुपये के बजट में से पूरे साल कुछ भी पैसा सरकार ने नहीं खर्च किया। इससे मोदी सरकार की प्राथमिकता बिल्कुल साफ हो जाती है। इस साल इस मद के बजट को भी घटा दिया गया है।

बजट में दलितों के हकों के मारे जाने पर दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन से जुड़े पॉल दिवाकर ने कहा, इस बजट के जरिये मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता में न दलित हैं और न आदिवासी। जहां हमारे नाम पर पैसा डाला भी गया है, वहां भी उसका इस्तेमाल दलित-आदिवासी के हित में न हो, इसका बंदोबस्त केंद्र सरकार ने कर दिया है। भीषण आपदा से जूझते देश को और खास तौर से दलित-आदिवासी समाज को जो न्याय मिलना चाहिए था, वह बिल्कुल नहीं मिला, इसके उलट अन्नाय मिला है, फरेब मिला है।

Union Budget 2021-22
Nirmala Sitharaman
Dalits
tribals
Narendra modi
Modi government

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल


बाकी खबरें

  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    कड़ी कार्रवाई के बावजूद सूडान में सैन्य तख़्तापलट का विरोध जारी
    18 Jan 2022
    सुरक्षा बलों की ओर से बढ़ती हिंसा के बावजूद अमेरिका और उसके क्षेत्रीय और पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का आह्वान करते रहे हैं। हालांकि, सड़कों पर "कोई बातचीत नहीं, कोई समझौता…
  • CSTO
    एम. के. भद्रकुमार
    कज़ाख़िस्तान में पूरा हुआ CSTO का मिशन 
    18 Jan 2022
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बुधवार को क्रेमलिन में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के साथ कज़ाख़िस्तान मिशन के बारे में कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीट ऑर्गनाइजेशन की “वर्किंग मीटिंग” के बाद दी गई चेतावनी…
  • election rally
    रवि शंकर दुबे
    क्या सिर्फ़ विपक्षियों के लिए हैं कोरोना गाइडलाइन? बीजेपी के जुलूस चुनाव आयोग की नज़रो से दूर क्यों?
    18 Jan 2022
    कोरोना गाइडलाइंस के परवाह न करते हुए हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से प्रचार में जुटे हैं, ऐसे में विपक्षी पार्टियों पर कई मामले दर्ज किए जा चुके हैं लेकिन बीजेपी के चुनावी जुलूसों पर अब भी कोई बड़ी…
  • Rohit vemula
    फ़र्रह शकेब
    स्मृति शेष: रोहित वेमूला की “संस्थागत हत्या” के 6 वर्ष बाद क्या कुछ बदला है
    18 Jan 2022
    दलित उत्पीड़न की घटनायें हमारे सामान्य जीवन में इतनी सामान्य हो गयी हैं कि हम और हमारी सामूहिक चेतना इसकी आदी हो चुकी है। लेकिन इन्हीं के दरमियान बीच-बीच में बज़ाहिर कुछ सामान्य सी घटनाओं के प्रतिरोध…
  • bank
    प्रभात पटनायक
    पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं
    18 Jan 2022
    बैंकों का सरकारी स्वामित्व न केवल संस्थागत ऋण की व्यापक पहुंच प्रदान करता है बल्कि पूंजीवाद की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License