NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
दाल आयात नीति से किसानों की छाती पर मूंग दल रही सरकार!
“जिस तरह जोखिम उठाकर किसान मूंग की खेती कर रहे हैं और साल-दर-साल इसमें लागत बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था न होने से यह फसल लाभकारी नहीं बन पा रही है।”
रूबी सरकार
24 May 2021
दाल आयात नीति से किसानों की छाती पर मूंग दल रही सरकार!

मध्यप्रदेश के महाकौशल में इस बार बंपर मूंग का उत्पादन हो रहा है। लेकिन केंद्र सरकार ने 2021-22 के लिए मूंग के विदेशों से आयात का सालाना कोटा अधिसूचित कर यहां के किसानों की छाती पर मूंग दलने जैसा काम किया है। सरकार की इस प्रकार की नीति से जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मूंग के दाम बढ़ जाते हैं, वहीं अपने देश में दाम गिरने लगते हैं। इससे किसानों का बहुत नुकसान होता है। पिछले साल भी सरकार की इस नीति से यहां के किसानों को बहुत घाटा हुआ था।

इस बार भी वाणिज्य विभाग ने मूंग के आयात को अधिसूचित किया है। हालांकि अखिल भारतीय दाल मिल संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र अग्रवाल कहते हैं, कि जिस तरह जोखिम उठाकर किसान मूंग की खेती कर रहे हैं और साल-दर-साल इसमें लागत बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था न होने से यह फसल लाभकारी नहीं बन पा रही है।

दरअसल मध्यप्रदेश के होशंगाबाद, हरदा, सीहोर, रायसेन और नरसिंहपुर जैसे जिलों में मूंग का बंपर उत्पादन होने की संभावना है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार इन जिलों में इस साल मार्च में साढ़े तीन लाख हेक्टेअर से ज्यादा रकबे में मूंग की बोवनी की गई है और चार लाख मीट्रिक टन से ज्यादा पैदावार होने की संभावना है।

होशंगाबाद के किसान राजेश सामले बताते हैं, कि उसने 20 एकड़ में मूंग की बोवनी की है। इसमें लगभग 100 क्विंटल मूंग उत्पादन होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, ग्रीष्मकालीन मूंग का फसल चक्र 55 से 60 दिन का होता है। इस साल राज्य सरकार द्वारा तवा बांध से सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी छोड़े जाने के कारण मूंग को अच्छा पानी मिल गया और उत्पादन ज्यादा होने की संभावना है।  श्री सामले बताते हैं, कि एक एकड़ में पानी, दवा, हार्वेस्टिंग के साथ करीब साढ़े 6 से 7 हजार रुपये की लागत आई है। अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य 7 हजार से अधिक तय करती है, तो किसानों को लागत मिल पायेगी। लेकिन सरकार मूंग को समर्थन मूल्य के दायरे में लाना ही नहीं चाहती। हमें मंडी के खुले बाजार में इसे बेचना पड़ता है। जहां व्यापारी अपने मनमाने ढंग से दाम तय करते हैं।

हरदा जिले के किसान मनोज पटेल ने इस साल 50 एकड़ में जैविक मूंग बोया है। मनोज बताते हैं, कि जैविक में थोड़ा कम उत्पादन होता है। एक एकड़ में लगभग 4 से 5 क्विंटल। लेकिन रासायनिक में यह मात्रा बढ़कर 7 से 8 क्विंटल तक हो जाता है। मूंग की खेती में लागत बहुत आती है। एक एकड़ में 7 हजार से अधिक। पिछले साल होशंगाबाद में देर से बुवाई होने के चलते कटाई भी देरी हुई और वहां के किसानों को प्रति क्विंटल साढ़े तीन हजार रुपये ही मिल पाए थे। बारिश के बाद मूंग खराब होने लगता है। नमी से उसमें फफूंद आने लगती है। खेत -खलिहान सब जगह कीचड़ हो जाने से खेत में ही मूंग सड़ने लगता है। ऐसे में सरकार का सहयोग न मिलने से किसान निराश हो जाते हैं तथा मंडी में व्यापारी  भी मोल-भाव करने लगते हैं। इसलिए पिछले साल होशंगाबाद के किसानों को मूंग में काफी नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में अगर सरकार सीधे किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मूंग खरीद ले, तो किसानों को बहुत राहत मिलेगी।

रेहटी तहसील जिला सीहोर के किसान कृपाल सिंह ठाकुर ने कहा, कि उसने 7 एकड़ में मूंग की बुवाई की है। उन्होंने कहा, कि मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र होने के बावजूद यहां के किसानों को किसानों को कोलार बांध से सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पाता। जबकि बांध बनाने के लिए विश्व बैंक से जो पैसा मिला था, उसमें प्राथमिकता के आधार पर सिंचाई के लिए पानी देना था। पानी की कमी के चलते उन्होंने केवल 7 एकड़ में मूंग बोया है। पिछले साल बारिश जल्दी आ गई थी,  तो उनके अधिकांश मूंग सड़ गई थी और सरकार की तरफ से भी उन्हें इसका कोई मुआवजा भी नहीं मिला था। कृपाल सिंह बताते हैं, कि मूंग में न तो सरकार मुआवजा देती है और न समर्थन मूल्य।

इसी तरह टिमरनी हरदा के किसान सुरेश गुर्जर बताते है, कि कृषि मंत्री किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का आश्वासन दे रहे हैं। जबकि अगले सप्ताह से मूंग की उपज मंडियों में पहुंचना शुरू हो जाएगा और अभी तक किसानों के पंजीयन का काम शुरू नहीं हुआ है, तो राजनेता की बातों पर विश्वास कैसे किया जाये! उधर समझौते के तहत केंद्र सरकार विदेशी मूंग आयात करने जा रही है, तो वह किसानों से दाल क्यों खरीदेगी! उन्होंने कहा, वर्तमान व्यवस्था में तो किसान जोखिम उठाकर खेती कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश दीवान बताते हैं, कि होशंगाबाद और हरदा जिले के किसानों ने सोयाबीन के विकल्प के रूप में पिछले 3 साल से मूंग की खेती को अपनाया हैं। हालांकि इस इलाके में पहले परंपरागत रूप से उड़द, मूंग और ज्वार की खेती ही की जाती थी, लेकिन वर्ष 1974 में तवा बांध बनने के बाद सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलने लगा और जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों को सोयाबीन की खेती करने के लिए प्रेरित किया। उन्हें मुफ्त में बीज उपलब्ध कराये। कुछ सालों तक तो सोयाबीन की पैदावार अच्छी हुई। प्रति एकड़ लगभग 6 से 8 क्विंटल उत्पादन हुआ। इससे क्षेत्र में काफी समृद्धि आयी। इस तरह लगभग 10 सालों तक किसानों ने सोयाबीन की खेती को प्राथमिकता दी। लेकिन मोनो क्रापिंग से मिट्टी में सल्फर और जिंक की कमी होने लगी और  खेती के लिए बार-बार एक ही फसल को बोना अच्छी प्रैक्टिस नहीं मानी जाती। लिहाजा उत्पादन कम होने लगा। उसमें बीमारी आ गई। पत्ती पीली पड़ने लगी। किसानों को जबरदस्त घाटा होने लगा, तब किसान मूंग की तरफ लौटे, क्योंकि इसकी बोवनी रबी की कटाई के तुरंत बाद शुरू हो जाती है। इस तरह किसान रबी में गेहूं और खरीफ में धान की खेती की तरफ लौट आये। जहां पहले 60 फीसदी भूमि पर सोयाबीन की खेती होती थी। अब वह सिमट कर 5 फीसदी पर आ गई है। अफसोस इस बात का है, कि जिस तरह सरकार ने सोयाबीन को बढ़ावा दिया था, उस तरह मूंग को प्रोत्साहन नहीं दे रही है। जबकि सोयाबीन का भोजन में कोई उपयोग नहीं है, केवल तेल निकालने के बाद इसकी खली को अमेरिका और यूरोप में बेचा जाता है और मूंग दाल में पोषक है। 

किसान नेता शिवकुमार शर्मा कक्काजी कहते हैं, कि किसान तो न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात कर रहे हैं। अधिकतम तो वे मांग ही नहीं रहे हैं, लेकिन सरकार वह भी देने को तैयार नहीं है। उल्टे विदेशों से दाल आयात कर किसानों को मुंह चिढ़ाते हैं। उन्होंने कहा, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की बात जबरदस्त तरीके से उठाया था। अब वे देश के प्रधानमंत्री हैं और अपनी ही बात से मुकर रहे हैं। फिर किसान कहां जाये। वह केवल धरना, प्रदर्शन और ज्ञापन ही दे सकते हैं। यह संवेदनहीन सरकार है। विदेशों से दाल आयात करने का अनुबंध करती है परंतु अपने ही किसानों से दाल खरीदने से मुकरती है। इस तरह तो किसान सोयाबीन की तरह मूंग की खेती बंद कर देंगे। श्री शर्मा ने कहा, खेती अपने आप में जोखिम भरा काम है और मूंग की खेती तो दवा और पानी पर निर्भर है। इसलिए इसमें लागत बहुत आती है। ऊपर से मौसम की मार किसानों के जोखिम को और बढ़ा देती है।

कृषि विशेषज्ञ देवेन्दर शर्मा बताते हैं, कि जब भारत में दाल पर्याप्त मात्रा में होती है, ऐसे में सरकार को विदेशों से दाल आयात की जरूरत क्या है। इससे भारत के किसानों को नुकसान होता है। किसान सिर्फ अपनी उपज का अच्छा दाम ही चाहता है, इसके लिए वे पिछले 6 महीने से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे हैं, लेकिन संवेदनहीन सरकार अपनी बात पर अड़ी है। सरकार काले कानून को वापस लेने और किसानों को उनके उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी देने को तैयार  नहीं है। उन्होंने कहा, सरकार ने विदेशों से दाल आयात शुल्क में भी कटौती की है। सरकार ने आम बजट 2021-22 में इसे दोहराया है, कि दालों की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए वे आयात के अनुबंधों में ढील और दालों का आयात करने के लिए लाइसेंस जारी करेगी। यह भारत के किसानों को आत्मनिर्भरता से दूर करने जैसा है। सामाजिक कल्याण के लिए भी दाल की खरीद आवश्यक है। सरकार इसे मिड-डे मिल के लिए उपयोग कर सकती है।

पूर्व कृषि निदेशक डॉ. जीएस कौशल बताते हैं कि केंद्र सरकार 22 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाने को प्रतिबद्ध है। केंद्र ने मूंग को लेकर समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया है, लेकिन राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, कि वह समुचित कदम उठाये। आखिर दोनों जगह एक ही दल की सरकार है।

हालांकि मूंग की बंपर आवक और किसानों के दबाव के चलते प्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने इसे न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में लाने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा है लेकिन 12 दिन बाद भी केंद्र की ओर से इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। लेकिन कृषि मंत्री सार्वजनिक रूप में केंद्र से समर्थन मूल्य दिलवाने का दम भर रहे हैं। ऐसे में प्रदेश में बड़ी असमंजस की स्थिति बनी है, क्योंकि  करीब एक सप्ताह में मूंग की उपज मंडियों में आने लगेगी। कृषि मंत्री दावे के मुताबिक अब तक किसानों का पंजीयन शुरू हो जाना चाहिए था। किसानों को भ्रमित करते हुए कृषि मंत्री मूंग की फसल से प्रदेश के किसानों को 3500 करोड़ से ज्यादा की आय होने की बात कर रहे हैं। जबकि कृषि विभाग के सूत्रों की मानें तो खरीफ और रबी की फसल ही समर्थन मूल्य के दायरे में लाई जा सकती है जबकि मूंग तीसरी फसल यानी बोनस क्राप के तहत आता है।

(रूबी सरकार स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Pulses import policy
Maharastra
Moong Dal
Modi Govt
Mahakoshal
Maharashtra
MSP
farmers crises
Pulse Farmers

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

महाराष्ट्र में गन्ने की बम्पर फसल, बावजूद किसान ने कुप्रबंधन के चलते खुदकुशी की

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

उत्तर प्रदेश चुनाव : डबल इंजन की सरकार में एमएसपी से सबसे ज़्यादा वंचित हैं किसान

उप्र चुनाव: उर्वरकों की कमी, एमएसपी पर 'खोखला' वादा घटा सकता है भाजपा का जनाधार


बाकी खबरें

  • Rafale and Augusta
    न्यूज़क्लिक टीम
    रफ़ाल और अगुस्ताः अभी और कितने 'कंकाल' बाहर आएंगे Mr. PM
    09 Nov 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने इटली की अगुस्ता VVIP हेलिकॉप्टर सौदे में ब्लैकलिस्टेड कंपनी फिनमिक्का को क्लीन चिट देने और रफ़ाल सौदे में रिश्वत के नये खुलासे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी…
  • Tripura Violence
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    त्रिपुरा हिंसा : एडिटर्स गिल्ड, आइडब्ल्यूपीसी ने की यूएपीए वापस लेने की मांग, सीपीआइएमएल का प्रदर्शन
    09 Nov 2021
    त्रिपुरा हिंसा के बाद वकीलों और पत्रकारों पर प्रदेश की पुलिस द्वारा दर्ज किए गए यूएपीए को वापस लेने की मांग एडिटर्स गिल्ड, आइडब्ल्यूपीसी व सीपीआइएमएल ने की है।
  • Pegasus
    एस एन साहू 
    पेगासस पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला गांधी, राम मोहन राय के नज़रिये की अभिव्यक्ति है
    09 Nov 2021
    कई जाने-माने भारतीयों के फ़ोन की निगरानी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने महात्मा गांधी की उस बात का मज़बूती से समर्थन किया है कि अदालतों को सरकार के अधीन नहीं होना चाहिए, बल्कि इंसाफ़ देना चाहिए।
  • Arun Kumar
    न्यूज़क्लिक टीम
    "नकदी हटा देने से काला धन गायब नहीं हुआ": प्रोफेसर अरुण कुमार
    09 Nov 2021
    भारत सरकार के अर्थव्यवस्था से जुड़े आँकड़ों में पाँच साल पहले लागू नोटबंदी के भयानक असर दिखाई नहीं देतेI न्यूज़क्लिक से एक खास बातचीत में प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि इस अचानक लिए फैसले ने देश की…
  • Param Bir Singh
    भाषा
    परमबीर सिंह वसूली प्रकरण: दो पुलिस अधिकारी सात दिनों के लिए सीआईडी हिरासत में भेजे गये
    09 Nov 2021
    सीआईडी ने सोमवार को पुलिस निरीक्षक नंदकुमार गोपाले और निरीक्षक आशा कोरके को गिरफ्तार किया था। ये दोनों पहले मुंबई की अपराध शाखा में तैनात थे।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License