NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कानून
कृषि
मज़दूर-किसान
समाज
भारत
राजनीति
किसान के तौर पर मान्यता दिए जाने की मांग के साथ बुंदेलखंड में महिलाओं ने कृषि क़ानूनों के विरोध को तेज़ किया
उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कई गांवों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में महिलाएं हर रोज़ भारी तादाद में इकट्ठा हो रही हैं।
अब्दुल अलीम जाफ़री
17 Feb 2021
Women Farmers

लखनऊ: उत्तरप्रदेश का आर्थिक एवं सामाजिक तौर पर पिछड़ा बुन्देलखण्ड का इलाका, जो कि कृषि संकट से बुरी तरह प्रभावित एक असिंचित प्यासे टुकड़े के तौर पर है, वहां महिला नेतृत्व की एक नई लहर उभरकर सामने आ रही है।

उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड के हिस्से में पड़ने वाले गाँवों में महिलाएं हर रोज भारी संख्या में जमा हो रही हैं। यह कुछ ऐसा है, मानो केंद्र के तीन हालिया कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का काम उनके कर्तव्य में शामिल हो। रोजाना सुबह 10 बजे के वक्त महिलाओं का जमावड़ा जमने लगता है और अगले दिन एक बार फिर से इकट्ठा होने से पहले भीड़ शाम तक तितर-बितर हो जाती है।

इस अनुशासनबद्ध एकजुटता और प्रतिरोध के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से लोगों की कई दशकों से की जा रही उपेक्षा का हाथ है।

न्यूज़क्लिक के साथ अपनी बातचीत में प्रदर्शनकारी ठाकू पुजारी ने जमीन पर मौजूद भावना का सार निकालते हुए कहा “अब हम आपस में विभाजित नहीं होने वाले और हम तब तक यहाँ से टस से मस नहीं होने जा रहे हैं, जब तक कि इन कृषि कानूनों को रद्द नहीं कर दिया जाता है। हम अपने संघर्ष में एकजुट हैं और यह जारी रहेगा।”

पुजारी एक सामजिक कार्यकर्ता हैं जो मीरा राजपूत, ललिता, मुबीना खान, कुशमा, फूला और बच्चों सहित दर्जनों महिलाओं के साथ चिंगारी संगठन – जो कि महिला अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए काम करने वाला एक अनौपचारिक मंच है - के झंडे तले पोस्टर, बैनर और हाथों में प्लेकार्ड लिए कम से कम 25 गांवों में तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध में हिस्सा ले रही हैं। पिछले सात दिनों से ये टोली उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के बाँदा के भंवरपुर, नीबी, खेरवा, अतर्रा, भरोसापुरवा, नौगवा, नरसिंगपुर, चाँदपुरा और शहबाजपुर जैसे गाँवों में अपने प्रदर्शन को जारी रखे हुए है।

पुजारी जो कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में महिलाओं को घर-घर जाकर संगठित करने का भी काम कर रही हैं, ताकि वे इन कृषि कानूनों और महिलाओं के मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन में भाग ले सकें, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि “शुरुआत में एक दर्जन के करीब महिलाएं और पुरुष ही इसमें शामिल थे लेकिन अब हर रोज 1000 से भी अधिक की संख्या में लोग सुबह से लेकर शाम तक हमारे साथ इस आंदोलन में शामिल होते हैं। हर गुजरते दिन के साथ अधिकाधिक संख्या में महिलाएं हमारे साथ जुड़ रही हैं।”

कुछ इसी प्रकार की भावनायें मुबीना और कुशमा ने भी व्यक्त की। उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में बाँदा के अतर्रा ब्लाक में विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली चिंगारी संगठन के सदस्य राजा भैया का कहना था कि “जब तक मोदी सरकार इन किसान-विरोधी कानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक हम अपने आंदोलन को स्थगित नहीं करने जा रहे हैं। सरकार को किसानों की दुर्दशा पर ध्यान देने की जरूरत है और उसे इन काले कानूनों को तत्काल वापस ले लेना चाहिए।”

उनका कहना था कि कई गांवों में इन विरोध प्रदर्शनों को आयोजित किया जा रहा है और रोजाना महिलायें अपने गाँवों में प्राथमिक पाठशालाओं या पंचायत भवनों में इकट्ठा होकर भारत के इन नए विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ अपने प्रतिरोध का इजहार कर रही हैं।

महिला किसानों के तौर पर मान्यता दिए जाने की माँग 

कृषि सुधारों के विरोध में शामिल होने के लिए महिलाओं की टुकड़ी ने उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की पैदल यात्रा इस उम्मीद में निकाली है कि न सिर्फ उनकी आजीविका की रक्षा हो सके बल्कि उन्हें किसानों के तौर मान्यता दिए जाने की लड़ाई में भी जीत हासिल हो सके। 

40 वर्षीया कुशमा, जिनके हिस्से में बाँदा जिले के अतर्रा ब्लाक में खेत का एक बेहद छोटा हिस्सा ही है ने कहा कि “हमारे विरोध के पीछे एक मकसद यह भी है कि हमें एक किसान के बतौर देखे जाने में कामयाबी हासिल हो सके, क्योंकि भारत में महिलाओं को कभी भी किसान के तौर पर मान्यता नहीं मिलती है...हम हमेशा घरेलू महिलाओं के रूप में गिनी जाती हैं, किसानों या कामगारों के तौर पर नहीं।” 

भूमिहीन किसान फूला ने न्यूज़क्लिक को बताया “निराई गुड़ाई से ले कर फसल तैयार करना हो या फसल काटना, सब औरतें ही करती हैं। हमारे योगदान को कभी भी पुरुषों के समतुल्य नहीं देखा जाता है, भले ही पुरुषों की तुलना में हम अधिक काम ही क्यों न करते हों।” वे आगे कहती हैं कि वे इस विरोध प्रदर्शन में इसलिए शामिल हुई हैं ताकि दिल्ली और पश्चिमी यूपी की अपनी समकक्षों के साथ अपनी एकजुटता का इजहार कर सकें, जो पिछले 80 दिनों से विभिन्न सीमाओं पर डेरा डाले हुए डटी हुई हैं। उनका कहना था कि “यह एक प्रमुख राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शन है और मैं इसमें इसलिए शामिल हुई हूँ, ताकि लोग यह जान सकें कि हम भी किसान हैं, क्योंकि आज तक किसी भी महिला को महिला किसान का दर्जा हासिल नहीं हो सका है। उसकी पहचान एक महिला किसान के तौर पर विकसित नहीं हो सकी है, इसे ध्यान में रखते हुए भी इस विरोध को आयोजित किया जा रहा है।”

बुंदेलखंड क्षेत्र में महिला किसानों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए राजा भैय्या, जो खुद इन विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया: “हर साल सैकड़ों की संख्या में बुंदेलखंड क्षेत्र में किसान आत्महत्या करते हैं, लेकिन कृषि संकट के चलते यदि कोई महिला किसान आत्महत्या करती है तो सरकार या मीडिया कभी भी इस मौत को कृषि संकट के तौर पर मान्यता नहीं देती, बल्कि इसे वे एक ‘घरेलू कलह’ के तौर पर चित्रित करते हैं। कृषि संकट के कारण किसानों की आत्महत्याओं का कोई आंकड़ा नहीं मौजूद है, लेकिन पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आत्महत्या का अनुपात कहीं अधिक है।” 

चिंगारी संगठन का कहना है कि इन कानूनों पर उनके विचारों और दृष्टिकोण को भी तरजीह देने की जरूरत है। उनकी ओर से कहा गया कि यदि सरकार ने उनकी मांगों को नहीं स्वीकारा तो उनका यह धरना-प्रदर्शन अनिश्चितकाल तक चलने जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि “भले ही हमारी फसलें खेतों में सड़ जाए, हम तब तक यहाँ से नहीं हिलेंगे जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं। एक सीजन की उपज को बचाने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य इन कानूनों को निरस्त कराने में है।”

इस संगठन के मुताबिक 2011 की जनगणना में महिलाओं को ‘खेतिहरों’ के तौर पर मान्यता प्रदान की गई थी लेकिन उन्हें ‘किसानों’ का दर्जा नहीं दिया गया था। किसानों के तौर पर मान्यता हासिल हो जाने  पर महिलाओं को खेती के लिए कर्ज लेने, ऋण माफ़ी, फसल बीमा, विभिन्न सब्सिडी और यहाँ तक कि मुआवजे का हकदार बनने में सहूलियत हो सकेगी।”

इस बीच बाँदा स्थित एक किसान नेता प्रेम सिंह का कहना था “सारे देश में किसानों की समस्या एक जैसी है, और ऐसा कहते हुए हम सिर्फ कृषि बिलों के फायदे और नुकसानों के बारे में नहीं कह रहे हैं। किसानों को अपने प्रतिनिधि की दरकार है, जो उनसे जुड़े मुद्दों को उठाये।”

न्यूज़क्लिक के साथ अपनी बातचीत में प्रेम सिंह ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में बात करते हुए आगे कहा “बुंदेलखंड क्षेत्र के मात्र 2% किसान ही एमएसपी का लाभ उठा पा रहे हैं। मेरे गाँव छोटी बरोखर में, जो कि एक किसान-बहुल गाँव है में मुश्किल से सिर्फ 1% लोगों को ही अपनी फसलों पर एमएसपी का लाभ मिल पा रहा है। विडंबना यह है कि आज भी दलाल और बिचौलिए सस्ते दामों पर फसलों की खरीद कर उन्हें शहरों में दुगुने-तिगुने रेट पर बेचने में सफल हैं।” प्रेम आगे कहते हैं कि वे फसलों के लिए गारंटीशुदा कीमत चाहते हैं।


बाकी खबरें

  • Harnaaz Sandhu
    भाषा
    भारत की हरनाज संधू ने मिस यूनिवर्स 2021 का ख़िताब जीता
    13 Dec 2021
    संधू से पहले सिर्फ दो भारतीय महिलाओं ने मिस यूनिवर्स का खिताब जीता है। अभिनेत्री सुष्मिता सेन को 1994 में और लारा दत्ता को 2000 में यह ताज पहनाया गया था।
  • Madras High Court
    गौरी आनंद
    ट्रांसजेंडर लोगों के समावेश पर बनाए गए मॉड्यूल को वापस लेने पर मद्रास हाई कोर्ट ने सीबीएसई को फटकार लगाई
    13 Dec 2021
    पिछले दिनों सीबीएसई ने अपनी वेबसाइट से ट्रांसजेंडर बच्चों की शिक्षा से संबंधित एक शिक्षक प्रशिक्षण नियमावली को हटा दिया था, मद्रास हाईकोर्ट ने इसपर चिंता जताई है।
  • Julian Assange
    जॉन पिल्गेर
    जूलियन असांज का न्यायिक अपहरण
    13 Dec 2021
    हम में से कौन-कौन जूलियन असांज के साथ लम्बे समय तक चल रहे न्यायिक उपहास जैसे इस न्यायिक अपहरण के सिलसिले में महज़ तमाशाई बने रहने के बजाय उनके साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं?
  • property card
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: ‘स्वामित्व योजना’ लागू होने से आशंकित आदिवासी, गांव-गांव किए जा रहे ड्रोन सर्वे का विरोध
    13 Dec 2021
    आदिवासी समाज बनाम प्रशासन के इस तनाव का मूल कारण बन रहा है, प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ‘स्वामित्व योजना’ लागू किये जाने के लिए पूरे इलाके के लोगों के गांव-घरों का ड्रोन से सर्वे कराया जाना। प्रशासन के…
  • jobs
    सुबोध वर्मा
    मोदी जी, शहरों में नौकरियों का क्या?
    13 Dec 2021
    पिछले कुछ वर्षों से 7-8 प्रतिशत की बेरोज़गारी दर के चलते शहरों में नौकरी चाहने वाले असहाय और निराश हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License