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आंदोलन
भारत
राजनीति
रौशनी का दाख़िला...
लखनऊ शहर का हर रास्ता घंटा घर की ओर मुड़ गया है। हज़ारों की तादाद में औरतों का बाहर आकर एहतिजाज करना ऐसा पहले कभी किसी आंदोलन में नही देखा गया। तारीख़ लिख रही है ये औरतें।
नाइश हसन
30 Jan 2020
Ghanta Ghar Protest

उसके बंद कमरे के दरवाजे़ आहिस्ता-आहिस्ता खुलने लगे, उसमें दबे-पांव रौशनी दाख़िल होने लगी, यही रौशनी तो उसके हिस्से की रौशनी है। ये जिक्र है तारीख़ लिखती लखनवी ख़वातीन का।

लखनऊ अपनी तहज़ीब के साथ ही अपने जद्दोजहद के लिए भी तारीख़ी शहर है, ये बेगम हज़रत महल और वाजिद अली शाह का भी शहर है, हसरत मोहानी और रशीद जहाॅं का भी। यहाॅं आज भी बड़ी तादाद में ख़वातीन (महिलाएं) समाजी कारकुन (सामाजिक कार्यकर्ता) के तौर पर काम कर रही हैं। यहाॅं होने वाले अदबी, सियासी, तहज़ीबी प्रोग्राम इस शहर को एक ज़िदा शहर बनाए रखते है। अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाए और बनाए रखना ये शहर खूब जानता है। देश सहित दुनिया के तमाम नामचीन लोग यहाॅं के प्रोग्रामों में शिरकत करते है। इस मायने में लखनऊ का मयार बहुत ऊॅंचा और काबिले तारीफ़ है।

अपनी उसी विरासत को आगे बढ़ाती औरतों ने जब सीएए के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो उसकी गूॅंज दूर तलक अपना असर छोड़ गई। शहर के कोने-कोने से औरतों का क़ाफ़िला घंटा घर पर जमा होने लगा। उनकी तादाद रोज़ बढने लगी। शहर का हर रास्ता घंटा घर की ओर मुड़ गया। हज़ारों की तादाद में औरतों का बाहर आकर एहतिजाज करना ऐसा पहले कभी किसी आंदोलन में नही देखा गया।

तारीख़ (इतिहास) लिख रही हैं ये औरतें। बड़ी तादाद में वो औरतें भी हैं जो अपने घरों से पहली बार निकली हैं, पुलिस की लाठी, और गालियां भी खा रही है, लेकिन दिन रात डटी है। ये सब किसी के इशारे पर नहीं हो सकता। ऐसा करने के लिए जिगर की ज़रूरत होती है।

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जिन्होंने कभी चौखट न लाॅंघी हो वो एहतिजाज में कमान सम्हाल रही है। अपने बच्चों को गोद से चिपकाए, शदीद सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे रह रही हैं, वो कितनी हिम्मतवर औरतें होगी। इसका अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उनके हौसलों को सलाम पेश करना लाज़मी है। हुकूमत जिन्हें मुल्क बदर कर देना चाहती है। वो अपने घर की हिफाज़त और दस्तूर (संविधान) बचाए रखने के नारे लगा रही है।

नौजवान से लेकर उम्रदराज़ औरतों के नारे सुन कर आप के रोएं कांप जाएंगे। पढ़ी नहीं पर कढी हुई ये औरतें इस नामुनासिब निज़ाम को बदल डालने पर आमादा हैं। एक तरफ़ वो अपनी ज़िद की ज़द में सब कुछ ले आना चाहती हैं, तो दूसरी तरफ ग़दर के ज़माने की ये जा़लिम पुलिस उन्हें मार-पीट कर उनके एहतिजाज के हक़ को भी छीन लेने पर आमादा है।

वाजिद अली शाह के लखनऊ में आज वाजिद बहुत याद आ रहे हैं, वो दौर जब सन् 1856 में उन्हें शहर बदर किया गया था, पूरी होशियारी के साथ बर्तानिया हुकूमत ने उनकी ताकत व उनके रूतबे को चूर-चूर कर दिया था और उन्हें कलकत्ता (कोलकाता) के मटियाबुर्ज भेज दिया था, उनसे जब ये शहर छूटा जा रहा था तो उन्हें इस शहर के दरो-दीवार अपनी तरफ खींच रहे थे। उनके दिल में एक कसक और गहरा सदमा भी था उस भावुक लम्हे में उन्होंने एक गीत लिखा बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए, अंगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेस... उस गीत को इतने दर्द भरे अन्दाज में शुभा मुद्गल ने वाजिद के सेहन में ( जो अब सीडीआरआई बन गया है) जब बैठ कर गाया तो दरो-दीवार ख़ामोश हो गए। वाजिद का दर्द सभी ने महसूस किया।

आज शहर ही नहीं मुल्क बदर किए जाने का फ़रमान जारी है। वाजिद के आशियाने को निहारती ये लखनऊ की औरतें अपने आशियाने के उजाड़े जाने की फिक्र में सड़कों पर हैं। वो ख़वातीन जो बाहर निकलने से भी डरती थीं उनकी दुनिया उनके घर तक महदूद थी, वो कह रही हैं कि घर ही न होगा तो दुनिया कहाॅं होगी। साहिबे वक्त ने ये हुक्म किया है जारी कि अपनी नस्लों से कहो मेरे मुताबिक सोचें।

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जो पुरअज़ीयत मन्ज़र सामने पेश आया है उससे डरने का उनके पास वक्त नही है। वो सड़कों पर जवाब माॅंगने के लिए जमा हैं। वो पूछ रही हैं कि साहिबे वक्त ये बताओं कि क्या माॅं और मुल्क को बदला जा सकता है? क्या अपने बुजुर्गो की कब्रगाहों, दरगाहों, खानकाहों,मस्जिदों को छोड़कर जाया जा सकता है? क्या जंगे-आज़ादी में अपने बाप,दादाओं की कुरबानियों को मिटाया जा सकता है?

बच्चे, नौजवान, बूढ़े हमआवाज़ हो गए हैं, हसरत मोहानी का दिया नारा इंकलाब ज़िन्दाबाद बार-बार गूॅंज रहा है। नारों की गूॅंज सड़कों पर ही नहीं फैल रही दिल के भीतर की दुनिया को भी झकझोर रही है। लड़कियाॅं तराने गा रही हैं, हीरे जवाहरात न चाहत की बात कर, ऐ बुलबुले चमन मेरे भारत की बात कर...।

आते-जाते लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि मुसलमान औरतें ही ज्यादा तादाद में क्यों हैं ये तो सबका मामला है। सवाल वाजिब है और सच की तरजुमानी करता है। लगेगी आग तो उसकी ज़द में सभी आऐंगे लेकिन नागरिकता संशोधन कानून में हुकूमत ने मुसलमान को शामिल ही नहीं किया है। बड़ा नुकसान तो मुसलमानों का ही होगा। हुकूमत एक मज़हब को कुचल देने पर आमादा है,जम्हूरी मुल्क को हिन्दू मुल्क बना डालने पर आमादा है। अपनी आईनी (संवैधानिक) जिम्मेदारी निभा पाने में पूरी तरह नाकामयाब है तो उससे अखलाकी जिम्मेदारी पूरी करने के बारे में सोचना भी बेमानी है।

ऐसे दौर में औरतों का एहतिजाज न सिर्फ लखनऊ-दिल्ली बल्कि पूरे मुल्क में नई इबारत रच रहा है। उसके मौन को नज़रअन्दाज किया गया, अब उसके शब्द हुकूमत पर भारी पड़ रहे हैं। दबी आवाज़ें यकबयक रोष में बदल चुकी हैं, वो जवाब माॅंग रही हैं इस मुल्क के दस्तूर का हवाला देकर,वो हुकूमत से आँख में आँख मिलाकर सवाल कर रही हैं, और हुकूमत कह रही है ऐसा सबक सिखाऐंगे कि पुश्तें याद रखेंगी।

सरकारें असरकार आवाजों को अक्सर बरदाश्त नहीं करतीं। इन औरतों की आवाज़ें बहुत असरकार हैं। दुनिया में गूॅंज रही हैं, हुकूमत डर और बौखलाहट में कुछ भी कर देना चाहती है। ऐसे में गोरख पाण्डे की बात याद आ रही है वो हुकूमत के बारे में कहते थे 'वो डर रहे हैं कि एक दिन निहत्थे और गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे।’

ये काली लाल चीटिंयाॅं जो घंटाघर की तरफ बढ़ी चली जा रही हैं, तुम्हारी गोलियाॅं अब कितनी चीटिंयों को मारेंगी, वो कुचलने वालों पर भी चढ़ जाएंगीं, वो खुद से वादाबंद हैं। वो चीटिंयां जिन्हें तुम पांव तले कुचलने का सोच रहे थे ये तुम्हारे लिए अब मुमकिन न हो पाएगा। अब तुम उनसे उनके ख्वाबों का सतरंगी हिन्दुस्तान नहीं छीन पाओगे।

इतना तो तय है कि इस आन्दोलन से कई सवालों को शिकस्त मिलेगी। रौशनी का दाखि़ला अब घरों के भीतर भी होगा, कुछ न होगा तो भी ‘हमारे भीतर का कायर तो टूटेगा ही’, जम्हूरियत घर के भीतर भी कायम कर ले जाएंगी ये औरतें, पितृसत्ता की जकड़ को भी ढीला कर डालेंगी, ये आंदोलन बड़ा असर छोड़ जाएगा ऐसी आहट मिलने लगी है।

(लखनऊ में रहने  वाली नाइश हसन एक रिसर्च स्काॅलर व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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