NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
प्रेम कुमार
02 Apr 2022
cbi

देश की प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई का जन्म संविधान की कोख से नहीं हुआ। न ही संसद ने सीबीआई को जन्म दिया है। सीबीआई का जनक है डेल्ही स्पेशल पुलिस इस्टैबलिशमेंट एक्ट। गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव से जब सीबीआई 1963 में जन्म ले रही थी तब मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन महज छह साल के थे। आज वे देश में सबसे ज्यादा विश्वसनीय व्यक्ति हैं जो न्याय की मुख्य कुर्सी पर विराजमान हैं। इसी वजह से उनकी इस टिप्पणी ने पूरे देश को झकझोर दिया- सीबीआई अपनी साख खो चुकी है।

सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती। केंद्र सरकार का हस्तक्षेप और राज्य सरकारों का सीबीआई के लिए अछूत जैसा व्यवहार अब खुली सच्चाई है। इससे वर्तमान ढांचे में सीबीआई कैसे लड़ सकती है?

सीबीआई की असंवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट चुप क्यों?

मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन जब सीबीआई की ओर उंगली उठाते हैं तो निश्चित रूप से कुछ उंगलियां उनकी ओर भी उठ जाती हैं। सीबीआई की संवैधानिकता का सवाल क्या सीबीआई की साख से जुड़ा नहीं है? और, अगर ‘हां’, तो क्यों सुप्रीम कोर्ट इस सवाल पर चुप्पी साधे बैठा है? गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई को असंवैधानिक करार दिया था, उस पर सुप्रीम कोर्ट के लिए स्टे लगाना छुट्टी वाले दिन भी जरूरी था, तो उसी मामले का निपटारा करना 9 साल बाद भी संभव क्यों नहीं हो पाया है? 

सीजेआई न्यायमूर्ति एनवी रमन कहते हैं, “अगर आपको (सीबीआई को) फिर से क्रेडिबिलिटी हासिल करनी है तो सबसे पहले राजनेताओं से गठजोड़ तोड़ना होगा और साख वापसी के लिए फिर से काम करना होगा।" इस बयान के दो स्पष्ट मतलब हैं-

1. सीबीआई अपनी साख खो चुकी है

2. सीबीआई का राजनेताओं से गठजोड़ है

नेताओं से सीबीआई के गठजोड़ की क्या है वजह?

सीबीआई का राजनेताओं से गठजोड़ की असली वजह क्या है? सीबीआई का संवैधानिक निकाय नहीं होना ही कमजोर कड़ी है। फिर भी हम सीबीआई से उम्मीद कर रहे हैं कि वह स्वतंत्र संवैधानिक निकाय की तरह आचरण दिखलाए। जब न्यायपालिका ऐसा आचरण नहीं दिखा पा रही है और न्यायमूर्तियों के फैसले रिटायरमेंट के बाद नियुक्तियों की उम्मीद से प्रभावित होकर सामने आ रहे हैं तो सीबीआई अपेक्षाओं पर खरा कैसे उतरे?

सीएजे रहते विनोद राय ने कहा था कि अगर आप वास्तव में यह चाहते हैं कि सीबीआई और सीवीसी कुछ करके दिखाएं तो आपको जोखिम उठाना होगा और साहस दिखाते हुए इन्हें संवैधानिक दर्जा देना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही कह दिया था कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोते के समान है। ऐसे तोते से उसकी साख के बारे में उसी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कुछ कह रहे हैं तो यह वक्त भूलकर पुरानी बातों का दोहराव ही है और इससे सीबीआई नहीं, समूची व्यवस्था असहाय नज़र आती है।

न्यायमूर्ति एनवी रमन सीबीआई को लेकर जो चिंता जता रहे हैं उस चिंता का समाधान बहुत पहले मद्रास हाईकोर्ट दे चुकी है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था- “सीबीआई को कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (सीएजी) जैसी स्वायत्तता मिलनी चाहिए जो कि सिर्फ संसद के प्रति जवाबदेह हो।“

सीबीआई की स्वतंत्रता का अपहरण किसने किया?

केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह सीबीआई सत्ता के प्रभावों से मुक्त होकर कैसे काम कर सकती है? अगर नहीं कर सकती है तो इसके लिए सीबीआई को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? एक-दो नहीं 8 प्रांतीय सरकारें सीबीआई को अपने प्रांत में घुसने देने को तैयार नहीं हैं। इनमें पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, केरल और मिजोरम शामिल हैं। केवल मिजोरम में ही एनडीए की सरकार है बाकी सभी जगह गैर बीजेपी-गैर एनडीए सरकार है।

बाकी प्रदेशों ने अगर सीबीआई के लिए दरवाजे खोल रखे हैं और उनमें से ज्यादातर में उस पार्टी का शासन है जिसकी केंद्र में सरकार है तो इसके मायने भी सीबीआई के लिए सुखद नहीं हैं। यह केंद्र में सरकार चला रही पार्टी और सीबीआई के बीच नाजायज रिश्ते की चुगली कर रहे हैं।

सीबीआई निष्पक्ष जांच के लिए देश की उम्मीद हुआ करती थी। उसकी निष्पक्षता पर उठते सवालों को वाजिब ठहराने का काम खुद सुप्रीम कोर्ट, गुवाहाटी हाईकोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट कर चुकी है। सीबीआई के अधिकारी अपने संगठन का स्वरूप नहीं बदल सकते। वे सीबीआई के मौजूदा ढांचे में ही काम करने को विवश हैं।

जब केंद्र सरकार ने सीबीआई डायरेक्टर को जबरन हटाया...

सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा के साथ 2018 में क्या हुआ था, देश ने देखा है। उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने नहीं दिया गया। यहां तक कि काम करने से भी रोक दिया गया। सीबीआई डायरेक्टर के विरोध के बावजूद स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को उनके समक्ष खड़ा कर दिया गया। विवाद बढ़ने पर केंद्र सरकार राकेश अस्थाना के बचाव में और आलोक वर्मा के खिलाफ में काम करती नज़र आयी थी। उस वक्त अगर सुप्रीम कोर्ट सीबीआई के बचाव में खड़ी हो पाती तब भी शायद आज सीबीआई के लिए उसकी नसीहत के मायने होते।

सीबीआई ने खास तौर से राजनीतिक मामलों की जांच में जिस तरह से केंद्र में सत्ताधारी दल की जरूरतों का ध्यान रखा है उससे उसकी साख लगातार गिरती चली गयी है। किसी मामले को तुरंत निपटाने में या लटकाए रखने के पीछे राजनीतिक मंशा हावी रही है। लंबित मामलों की संख्या से भी इसे समझा जा सकता है।

31 जनवरी 2022 को संसद में रखी गयी रिपोर्ट कहती है कि सीबीआई के पास 1025 मामले लंबित हैं। इनमें से 66 मामले तो पांच साल से लटके हुए हैं। पांच साल से अधिक समय तक सीबीआई किसी केस को हाथ ही न लगाए तो स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है।

प्रांतीय सरकार बनाम सीबीआई

लंबित मामलों पर अपनी निष्क्रियता पर सीबीआई चुप है। लेकिन, वह प्रांतीय सरकारों पर आरोप लगाने में पीछे नहीं है। सीबीआई का कहना है कि धोखाधड़ी के हाई प्रोफाइल करीब 100 मामले ऐसे है जिनमें केस इसलिए दर्ज नहीं किए जा सके क्योंकि संबंधित प्रांतीय सरकारों ने इसकी अनुमति नहीं दी। सीबीआई की शिकायत में ही उसके प्रति प्रांतीय सरकारों का घटता विश्वास व्यक्त हो रहा है।

देश की डबल इंजन की सरकारों में सीबीआई के लिए विश्वास बरकरार मिलता है और डबल इंजन की प्रांतीय सरकारें बहुत सहजता से सीबीआई जांच की मांग को स्वीकार कर अग्रसारित कर देती हैं। मगर, सिंगल इंजन और गैर बीजेपी की प्रांतीय सरकारें सीबीआई जांच की मांग को संदिग्ध नज़र से देखती हैं। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर सीबीआई के लिए परस्पर विरोधी विचार स्पष्ट रूप से यह इंगित करते हैं कि सीबीआई की विश्वसनीयता गंभीर रूप से खतरे में हैं।

अब खुद संसद में भी सीबीआई के कामकाज पर सवाल उठने लगे हैं। संसद में मार्च 2022 को रखी गयी रिपोर्ट के मुताबिक मुताबिक तीन महीने के भीतर अभियोग चलाने की निश्चित अवधि बीत जाने के बावजूद सीबीआई 72 मामलों में मुक़दमे नहीं चला पायी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस किस्म की देरी आम घटना है। इसे रोकने के लिए सेंट्रल विजिलेंस कमीशन को सशक्त बनाना जरूरी है। यानी संसदीय समिति भी अब सीएजी और मद्रास हाईकोर्ट की बात पर हामी भर्ती दिख रही है। मगर, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लगता है कि सीबीआई खुद राजनीतिक गठजोड़ से बाहर निकल आएगी और अपनी विश्वसनीयता भी खुद ही बहाल कर लेगी।

ये भी देखें: अदालत: सीबीआई को आज़ाद करो भाजपा सरकार !

CBI
Central Bureau of Investigation
Supreme Court
N. V. Ramana
BJP
Modi Govt

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट


बाकी खबरें

  • मुंबई के अंबेडकरनगर के निवासियों का विलाप: 'कोरोना से पहले तो हमें बारिश ही मार डालेगी'  
    आशा कापसे, हृषिकेश पाटिल
    मुंबई के अंबेडकरनगर के निवासियों का विलाप: 'कोरोना से पहले तो हमें बारिश ही मार डालेगी'  
    15 Jul 2021
    बारिश के बाद पानी की बहाव के दबाव के कारण इलाक़े में दीवार ढहने, घरों के बह जाने और 31 लोगों की मौत के दो साल बाद भी प्रभावित लोगों को आज भी अपने पुनर्वास का इंतज़ार है।
  • धर्म, साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और अन्तर्धार्मिक विवाह
    राम पुनियानी
    धर्म, साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और अन्तर्धार्मिक विवाह
    15 Jul 2021
    पिछले कुछ दशकों से 'लव जिहाद' के नाम पर समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जा रहा है और महिलाओं और लड़कियों को उनकी जिंदगी के बारे में स्वयं निर्णय लेने से रोका जा रहा है. साम्प्रदायिक राजनीति…
  • खोरी गांव: विरोध प्रदर्शन के बीच बारिश में तोड़े जा रहे मकान, कई स्थानीय और सामाजिक कार्यकर्ता हुए गिरफ़्तार
    मुकुंद झा
    खोरी गांव: विरोध प्रदर्शन के बीच बारिश में तोड़े जा रहे मकान, कई स्थानीय और सामाजिक कार्यकर्ता हुए गिरफ़्तार
    15 Jul 2021
    हरियाणा सरकार ने उनसे रोटी कपड़ा और मकान सब छीन लिया है। अब उसके पास जीने का कोई रास्ता नहीं बचा है। सरकार ने सर्वे नहीं किया है इसलिए अब पुनर्वास यदि मिलेगा तो सरकार यह कह देगी कि ये परिवार यहां…
  • जीवाश्म तरंगों से पता चला- डायनासोर को ख़त्म करने वाले क्षुद्र ग्रह से बड़ी सुनामी भी पैदा हुई थी
    संदीपन तालुकदार
    जीवाश्म तरंगों से पता चला- डायनासोर को ख़त्म करने वाले क्षुद्र ग्रह से बड़ी सुनामी भी पैदा हुई थी
    15 Jul 2021
    'अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंस लेटर्स' में प्रकाशित शोध के मुताबिक़, "जहां बड़ी सुनामी और उसके नतीज़ों के बारे में पहले सैद्धांति व्याख्याएं की जाती रही हैं, लेकिन इस सिद्धांत का समर्थन करने वाले सबूतों को…
  • उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग क्यों है ग़लत?
    संदीप चक्रवर्ती
    उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग क्यों है ग़लत?
    15 Jul 2021
    उत्तर बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग, प्रमुखत: भाजपा सांसद जॉन बारला उठा रहे हैं। याद रहे कि इस क्षेत्र में अलग राज्य की मांग को लेकर हिंसक आंदोलनों का इतिहास रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License