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सीटू ने बंगाल में प्रवासी श्रमिकों की यूनियन बनाने की पहल की 
सीटू ने यूनियन बनाने का फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि देश में पिछले साल लगे लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों को अपने कार्यस्थलों से वापस गांवों/कस्बों में वापस लौटते वक़्त दर्दनाक चुनौतियों और तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा था।
रबीन्द्र नाथ सिन्हा
10 Aug 2021
Translated by महेश कुमार
सीटू ने बंगाल में प्रवासी श्रमिकों की यूनियन बनाने की पहल की 

कोलकाता: सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) ने पश्चिम बंगाल प्रवासी श्रमिक यूनियन बनाने के बारे में गंभीर चिंतन किया था जिसका सदस्यता अभियान हाल ही के महीनों में शुरू किया गया है। यूनियन का कहना है कि अब तक उसने 40,000 से अधिक सदस्यों को सदस्यता दे दी है और उन्हें पहचान पत्र भी जारी कर दिए हैं।

पश्चिम बंगाल दूसरा ऐसा राज्य है जहां भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की श्रमिक इकाई ने खास तौर पर प्रवासी श्रमिकों के लिए एक अलग यूनियन बनाने की अपनी योजना को अंज़ाम दिया है। उन्होंने इसकी योजना इसलिए बनाई क्योंकि पिछले साल कोविड-19 के प्रकोप के कारण जल्दबाजी में बिना सोचा समझे लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन के बीच देश भर के प्रवासी श्रमिकों को विभिन्न राज्यों में अपने कार्यस्थलों से अपने मूल स्थानों या गांवो/कस्बों लौटने पर दर्दनाक अनुभव सहन करना पड़ा था। इससे पहले सीटू ने 2020 में कर्नाटक में पहली प्रवासी यूनियन बनाई थी। सीटू (यूनियन) की नज़रों में कुछ अन्य राज्य भी हैं जहां अभी ऐसी यूनियनों की शुरूवात की जानी हैं। 

राज्य में चल रहे आंशिक लॉकडाउन ने सदस्यता अभियान में बाधा डालने का काम किया है,  लेकिन इस आंशिक लॉकडाउन से संगठन को आंशिक रूप से मदद भी मिली है क्योंकि अभी भी वापस आए प्रवासी श्रमिक काम पर वाप्स नहीं लौट पाए हैं। 40,000 से अधिक सदस्य बनना मौजूदा स्थिति की ही देन है। 

पश्चिम बंगाल परवासी श्रमिक यूनियन (WBMWU) के अध्यक्ष शेख मोहम्मद सादी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि उनकी दीर्घकालिक योजना प्रवासी श्रमिकों की तीन श्रेणियों पर विचार करने की है। इन तीन श्रेणियों में एक तो वे मजदूर शामिल हैं जो पश्चिम बंगाल से दूसरे राज्यों में काम करने जाते हैं, दूसरे वे जो दूसरे राज्यों से पश्चिम बंगाल में काम करने आते हैं और तीसरे वे जो काम करने विदेश जाते हैं, विशेष रूप से खाड़ी देशों में जाने वाले प्रवासी श्रमिक तीसरी श्रेणी में आते हैं। 

"यह एक लंबी दौड़ है, काम बड़ा है, और हमारी काफी सीमाएं भी हैं। इसलिए, हम मजदूरों की पहली श्रेणी पर जोर दे रहे हैं, जिसमें प्रवासी श्रमिकों का सबसे बड़ा हिस्सा है। सादी ने कहा, कि सदस्यता के साथ, हम गंतव्य राज्यों में अपनी यूनियनों के साथ व्यवस्था बना रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संकट की घड़ी में श्रमिकों को पीड़ा न उठानी पड़े, इसलिए संयुक्त प्रयास जरूरी हैं”।

डब्ल्यूबीएमडब्ल्यूयू प्रमुख ने कहा कि एक सार्थक डेटाबेस के बिना, प्रवासी श्रमिकों की तीनों श्रेणियों की अभी कोई भी विश्वसनीय संख्या देना कठिन काम है। "हमारा केवल एक अनुमान है। लेकिन बावजूद इसके हमारा मानना ​​है कि कुल संख्या लगभग 50 लाख हो सकती है। प्रकाशित आंकड़े बताते हैं कि 1.4 करोड़ प्रवासी श्रमिक अपने गृह राज्यों में वापस गए हैं, जिनमें से पश्चिम बंगाल का हिस्सा 13 लाख से अधिक है। हम वास्तविक आंकड़ों पर विश्वास करते हैं। पश्चिम बंगाल देश में चौथा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, और बिहार, ओडिशा और झारखंड जैसे उच्च प्रवासन वाले राज्य भी इसकी सीमा के चारों ओर हैं"।

यूनियन के महासचिव, अब्दुल मन्नान ने न्यूज़क्लिक को बताया कि शुरूवात में उनका लक्ष्य पांच लाख सदस्यता करने का है, और सबकी आम सहमति थी कि सदस्यता शुल्क कम से कम 20 रुपये प्रति वर्ष होना चाहिए। कार्यालयों के कामकाज पर लगातार प्रतिबंध के कारण पंजीकरण प्रक्रिया में देरी हुई है। फिर भी, उन्होंने कहा, "हमें विश्वास है कि हमारी बातचीत के बाद, पंजीकरण प्रक्रिया, जिसमें सुनवाई शामिल भी है, कार्यालयों के सामान्य कामकाज की बहाली के साथ शुरू होगी।"

पश्चिम बंगाल प्रशासन शुरू में कोविड-19 की पहली लहर आने के दौरान घर लौटने वाले प्रवासी कामगारों की जिम्मेदारी स्वीकार करने का अनिच्छुक था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कथित तौर पर हावड़ा के लिए लंबी दूरी की ट्रेनों को 'कोरोना एक्सप्रेस' (एक टिप्पणी जिसे उन्होंने बाद में मानने से इनकार किया) के रूप में वर्णित किया था। इस बीच, ओडिशा सरकार ने अधिक मानवीय दृष्टिकोण का विकल्प अपनाया था।

ओडिशा में प्रवासी कामगार काफी सतर्क हैं 

ओडिशा के अधिकारियों ने प्रदेश के फंसे हुए प्रवासी कामगारों को राज्य में आने की अनुमति देने के लिए एक वेब पोर्टल शुरू किया था, जो राज्य में लौटने के इच्छुक थे, पोर्टल पर खुद को पंजीकृत कर सकते थे। पंजीकरण करने वालों में से प्रत्येक को एक खास नंबर दिया गया था। ओडिशा खाद्य अधिकार अभियान (ओकेएए) के सह-संयोजक समीत पांडा के मुताबिक, पोर्टल पर करीब 10 लाख लोगों ने पंजीकरण कराया था। हालांकि, पांडा ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि यह पंजीकरण डेटा रिवर्स माइग्रेशन की वास्तविकता को नहीं दर्शाता है; उनके आकलन में, ओडिशा के प्रवासी श्रमिकों की संख्या 20 लाख से अधिक है। 

पांडा ने बताया कि जो सबसे दुखद जो बात थी और जहां राज्य प्रशासन ने भी खुद को असहाय पाया, वह यह कि बहुत से श्रमिक सब्सिडी वाला राशन पाने में विफल रहे क्योंकि कई श्रमिकों के पास अनाज और सब्जियां खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और इसलिए उन्हे कुछ दिनों तक बिना भोजन के रहना पड़ा। ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई क्योंकि कुछ कारख़ाना मालिकों ने श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान नहीं किया था, और कुछ मालिकों ने केवल आंशिक भुगतान किया था। इसने श्रमिकों को वहीं रहने पर मजबूर किया, जहां वे काम कर रहे थे, जिसमें नई दिल्ली और तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना के कई शहर शामिल हैं, जहां वे परिधान कारखानों में काम करते थे। 

बावजूद इसके, कई प्रवासी श्रमिक अपने मूल स्थानों पर लौटने में कामयाब रहे क्योंकि टीकाकरण अभियान के गति पकड़ने से कोविड-19 मामले कम हो गए थे। अब-जब दूसरी लहर कम हो गई है, क्या वहाँ वापस चले जाएंगे जहां वे काम कर रहे थे? ऐसा "संदिग्ध," है। ओकेएए के सह-संयोजक ने कहा कि, "चूंकि वे अभी भी अपने दर्दनाक अनुभव को याद कर भयभीत हो जाते हैं।" हालांकि, उन्होंने कहा कि श्रमिक अपने कारखाने के आस-पास के हालात की जानकारी हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। 

कोविड-19 की पहली दो लहरों के बाद की स्थिति पर बोलते हुए, प्रो॰अमिताव कुंडू ने न्यूज़क्लिक को बताया कि सकारात्मक विकास के साथ-साथ कुछ प्रतिकूल दुष्प्रभाव भी पड़े हैं। नई दिल्ली स्थित स्वतंत्र थिंक-टैंक रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज के सीनियर फेलो प्रो॰ कुंडू ने बताया कि सकारात्मक विकास जनवरी में चार असंगठित क्षेत्रों को कवर करते हुए एक सर्वेक्षण शुरू कर रहा है। इन खंडों में घरेलू कामगार, प्रवासी कामगार, परिवहन कर्मचारी और लेखाकारों से जुड़े अनौपचारिक कर्मचारी शामिल हैं।

सर्वेक्षण के लिए, प्रारंभिक काम शुरू हो गया है, और कई हजार सर्वेक्षणकर्ताओं को शामिल किया जाना है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने इंडियन स्टेट्सटिकल इंस्टीट्यूट के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष को सर्वेक्षण का अध्यक्ष और प्रोफेसर कुंडू को सह-अध्यक्ष नियुक्त किया है।

प्रवासी डेटा की कमी को ठीक करना

2020 में राष्ट्रीय लॉकडाउन के दौरान लाखों प्रवासी कामगारों को तब भयंकर पीड़ा का सामना करना पड़ा था जब उन्होंने गांवों और कस्बों में अपने प्रियजनों के साथ रहने जाने के लिए महामारी की दहशत में अपना काम छोड़ दिया, यह दर्शाता है कि सरकार त्रासदी से निपटने के लिए कतई तैयार नहीं थी। प्रशासन की विफलता के पीछे के कारणों में से एक बड़ा कारण प्रवासी श्रमिकों के संदर्भ-आंकड़ों की अनुपस्थिति थी। 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) द्वारा किए गए सर्वेक्षण, जिन्हें अधिकारियों ने संदर्भित किया था, बहुत मददगार साबित नहीं हुए क्योंकि डेटा का कोई जिला-वार विभाजन नहीं था। 2011 की जनगणना, जिसमें जिलेवार जानकारी थी, उस पर उनके द्वारा विचार नहीं किया जा सकता था क्योंकि इस दौरान जिलों को कई बार पुनर्गठित किया जा चुका है। प्रशासन ने प्रशासनिक कारणों और कभी-कभी "राजनीतिक विचारों" की वजह से नए जिले बनाए हैं।  

स्थिति, शायद, इतनी विकट नहीं होती अगर केंद्र और राज्यों द्वारा अंतर-राज्यीय कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन किया होता) अधिनियम, 1979 के द्वारा कार्रवाई की जाती और स्थिति का जायजा लेते हुए अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाते। 

बड़ा प्रतिकूल दुष्प्रभाव तब पड़ा जब बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक अपने मूल राज्यों या अंतिम रहने वाले निवास के स्थानों पर लौटे। यह तर्क देते हुए कि बेरोजगार लोगों की संख्या बढ़ गई है, इसलिए मूल राज्यों ने विशिष्ट श्रेणियों की नौकरियों से बाहरी लोगों की नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। उन्होंने स्थानीय लोगों को नौकरी देने पर जोर दिया, लेकिन कुछ राज्यों ने स्थानीय भाषा को रोजगार के लिए पूर्व-आवश्यकता के रूप में भी निर्धारित किया है। प्रोफेसर कुंडू ने कहा कि, वास्तव में, इस तरह का कदम भारत के संघीय चरित्र पर हमले के बराबर हैं।

दूसरा दुष्परिणाम तब सामने आया जब वापस आने वाले श्रमिकों ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानि मनरेगा के तहत काम मांगा। ग्रामीणों ने कमाई के अपने दायरे के सिकुड़ने की आशंका जताई और इसलिए, वापसी करने वालों को काम देने का विरोध करने की कोशिश की। इससे कई जगहों पर तनाव की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने कहा कि केंद्र ने जब मनरेगा के लिए अधिक धनराशि देने का निर्णय लिया तो कुछ हद तक हालात सामान्य हुए। 

इस बीच, 16 जुलाई, 2021 के द इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार की अन्य राज्यों से आने वाली आय में 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आई क्योंकि कई प्रवासी श्रमिकों ने वहाँ काम छोड़ दिया था जहां वे कोविड-19 के प्रकोप के बाद अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ थे। यह निष्कर्ष नई दिल्ली स्थित मानव विकास संस्थान और ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा अक्टूबर 2020 और जनवरी 2021 के बीच किए गए एक अध्ययन के आधार पर निकाला गया था। आय में अचानक गिरावट कार्यदिवसों के नुकसान के परिणामस्वरूप हुई जिसमें 10 में से नौ श्रमिकों को नुकसान उठाना पड़ा। यह अध्ययन 12 गांवों के 1,613 घरों में किया गया था।

तमिलनाडू राज्य के उद्योग मंत्री थंगम थेनारासु के हवाले से द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार शुरवाती संकट के बाद, तमिलनाडु सरकार ने, 26 जुलाई, 2021 को उद्योगों में कार्यरत प्रवासी श्रमिकों का एक डिजिटल डेटाबैंक बनाने का निर्णय लिया था, विशेष रूप से एमएसएमई और आतिथ्य क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों का जो अपने आप में श्रमिकों का बड़ा हिस्सा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

CITU Launches Migrant Workers' Union in Bengal; Centre Commissions Survey for Migrants

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