NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
सर्वेक्षण के अनुसार, तेलंगाना में लॉकडाउन के दौरान गरीबों के बीच बढ़ी ऋणग्रस्तता
विभिन्न व्यावसायिक पृष्ठभूमि में कार्यरत 57 उत्तरदाताओं के बीच संचालित इस सर्वेक्षण में जो एक  माँग बेहद मजबूती से उठाई गई है वह यह है कि इस संकट की घड़ी में कम से कम स्वास्थ्य सुविधाओं को सभी के लिए मुफ़्त में उपलब्ध किया जाना सुनिश्चित किया जाये।
सूराजीत दास, अथारी जानिसो, प्रकाश कुमार शुक्ला
18 Jun 2020
तेलंगाना में लॉकडाउन के दौरान गरीबों के बीच बढ़ी ऋणग्रस्तता

यह रिपोर्ट तेलंगाना में कोरोना वायरस के चलते अपनाए गए लॉकडाउन से हुए असर को समझने का एक प्रयास है जोकि 57 उत्तरदाताओं के साथ संचालित किये गए टेलीफोनिक साक्षात्कारों पर आधारित है, जिसे 1 जून से 10 जून के दौरान अलग-अलग व्यावसायिक पृष्ठभूमि से आने वाले 247 लोगों को इसमें शामिल किया गया था।

हालांकि इस सैंपल का आकार बेहद छोटा है और इसे किसी भी तौर पर एक प्रत्निधित्व वाला सैंपल नहीं कह सकते, लेकिन चूँकि इससे बेहतर कोई और अधिक विश्वसनीय डेटा उपलब्ध न होने से इस टेलीफोनिक सर्वेक्षण से हमें जमीनी हकीकत के बारे में कुछ प्रारंभिक संकेत अवश्य मिलते हैं।

सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले उत्तरदाता हैदराबाद, शापुर, वारंगल, मंचेरियल, महबूबनगर और रंगारेड्डी से थे। कुल 57 उत्तरदाताओं में से तेईस लोग प्रवासी श्रमिक थे और मूल रूप से मणिपुर, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे विभिन्न राज्यों से आकर यहाँ रह रहे थे।

उत्तरदाताओं में शामिल सभी लोग अलग-अलग व्यावसायिक पृष्ठभूमि से थे जिनमें किसान, खेतिहर मजदूर, दिहाड़ी मजदूर, निर्माण मजदूर, ऑटोरिक्शा चालक, राजमिस्त्री, फल-सब्जी विक्रेता, रसोइये, घरेलू नौकर, दर्जी, बढ़ई, बाइक मैकेनिक, आया, चाय की दुकान चलाने वाले, स्टोर कीपर, इंजीनियर, कैशियर, ड्राईवर, बुटीक और गारमेंट शॉप मालिक, एम्ब्रायडरी का काम करने वाले मजदूर, ग्रामीण विकास से जुड़े प्रोफेशनल्स, सेल्स एडवाइजर, अमेज़ॅन कैटलॉग विशेषज्ञ, स्किन थेरेपिस्ट, गेस्ट रिलेशन एसोसिएट्स, ट्रेनर, अध्यापक, शैक्षिक सलाहकार, सेल्स मेनेजर, ब्यूटी कंसलटेंट, डीजे ऑपरेटर इत्यादि लोग शामिल थे।

हमारे सर्वेक्षण में कुल 28 महिलाएं और 29 पुरुष उत्तरदाता शामिल थे, जिनकी आयु 18 से 70 वर्ष के बीच की थी। इसमें अनपढ़ से लेकर एमए की डिग्री वाले कुल 31 हिंदू, 21 ईसाई और 5 मुस्लिम उत्तरदाता शामिल थे। इस नमूना सर्वेक्षण में शामिल उत्तरदाताओं में अनुसूचित जाति की पृष्ठभूमि से आने वाले कुल 29 लोग थे और 9 उत्तरदाता अनुसूचित जन-जाति से सम्बद्ध थे।

इन उत्तरदाताओं में से मोटे तौर पर हर पाँचवे व्यक्ति की प्रति व्यक्ति मासिक आय 1,000 रुपये या उससे कम थी, वहीं हर पांचवे में से एक व्यक्ति की औसत आय 1,000 रुपये से तो ऊपर  लेकिन 2,500 रुपये या उससे कम थी, और अगले हर पांचवे व्यक्ति की 2,500 रुपये से अधिक लेकिन 4,500 रुपये से कम पर और चौथी श्रेणी वाले हर पाँचवे व्यक्ति की आय 4,500 रुपये से अधिक लेकिन 12,000 प्रति माह तक और बाकी के पांचवें हिस्से के उत्तरदाताओं की प्रति व्यक्ति मासिक आय 12,500 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह आय या उससे ऊपर की थी।

सैंपल में शामिल परिवारों का आकार 1 से लेकर 12 सदस्यों तक अलग-अलग होने के साथ औसत परिवार की संख्या 4.3 बैठती है। ऐसे कुल 26 परिवार इसमें शामिल थे जिसमें कमाई करने वाला एकमात्र सदस्य था जबकि 6 परिवार ऐसे हैं जिनमें दो से अधिक कामकाजी सदस्य हैं।

इस सर्वेक्षण के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह है कि 57 में से 25 उत्तरदाताओं (यानी आधे से भी कम) को इस बात की उम्मीद थी कि लॉकडाउन के एक बार खत्म होने के बाद से उनकी मासिक कमाई एक बार फिर से पुरानी स्थिति में वापस हो जाने वाली है, जबकि इनमें से अधिकांश लोग शीर्ष और सबसे निचले आय वर्ग के लोग हैं।

चौदह उत्तरदाता इस बात को लेकर आशंकित हैं कि उनकी औसत मासिक आय में तकरीबन एक तिहाई तक की कमी आ सकती है। बाकी 18 उत्तरदाताओं (यानी 30% से अधिक) का कहना था कि वे इसके बारे में आकलन नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए कह सकते हैं कि श्रमशक्ति के बहुसंख्यक हिस्से के विचार में अपनी आय को लेकर में अत्यधिक अनिश्चितता और नौकरी को लेकर दुश्चिंताएं बनी हुई हैं।

50% से अधिक उत्तरदाताओं का यह मानना है कि शहरी क्षेत्रों में भी अंतिम उपाय के तौर पर (मनरेगा जैसे) किसी न किसी प्रकार के रोजगार को सुनिश्चित कराये जाने की आवश्यकता है।

एक और दिलचस्प तथ्य यह देखने को मिला है कि लॉकडाउन के बाद से (अप्रैल और मई के महीनों में) सैंपल में शामिल आबादी के समृद्ध वर्ग में परिवार के प्रति व्यक्ति मासिक खर्च का अनुपात उनके लॉकडाउन से पहले के प्रति व्यक्ति औसत मासिक आय से काफी कम है (नीचे दिए ग्राफ पर नजर डालें)। जबकि गरीब वर्ग के लोगों के लिए यह अनुपात काफी अधिक है, जिसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं।

सबसे पहला तो यह कि जनसंख्या के गरीब वर्ग के भीतर औसत उपभोग की प्रवृत्ति काफी अधिक है जबकि अमीर तबका अपनी कमाई के बड़े हिस्से की बचत करते हैं। लेकिन इसमें गौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब लोग ज्यादातर आवश्यक वस्तुओं का उपभोग करते हैं, क्योंकि उनके पास जीवन निर्वाह लायक आय ही उपलब्ध रहती है। और कोरोनावायरस की वजह से लागू लॉकडाउन के दौरान भी उनके लिए इसमें कोई खास कटौती कर पाना काफी मुश्किल काम है।

इसी वजह से 29 उत्तरदाताओं (उनमें से अधिकांश लोग आबादी के गरीब वर्ग से हैं) ने सूचित किया है कि इस लॉकडाउन के दौरान उनकी ऋणग्रस्तता में इजाफा हुआ है।

new.JPG

स्रोत: 1 जून से लेकर 10 जून तक के दौरान फोन कॉल के माध्यम से इकट्ठा किए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर।

भारत सरकार की ओर से मार्च के महीने में घोषित पीएम गरीब कल्याण योजना में तीन ठोस चीजों की घोषणा की गई थी- इसमें मुफ्त राशन, 500 रुपये प्रत्यक्ष लाभ के तौर पर जन धन खातों में हस्तांतरण और मुफ्त गैस सिलेंडर के हस्तांतरण की घोषणा की गई थी। दस उत्तरदाताओं (सैंपल में शामिल करीब 20% सदस्यों) ने सूचित किया है कि इस घोषणा के दो महीने बाद भी उन्हें मुफ्त राशन के तौर पर कुछ भी नहीं मिला है।

करीब आधे उत्तरदाताओं (कुल 57 में से 26 लोगों) का कहना है कि उनमें से कईयों के पास या तो जन धन खाता ही नहीं था, या जिनके पास था भी तो उनके खातों में कोई पैसा नहीं पहुँचा है। 90% से अधिक लोगों ने सूचित किया है कि लॉकडाउन के दो महीने बीत जाने के बाद भी उनमें से किसी को मुफ्त में कोई गैस सिलेंडर नहीं मिला है।

कुल 23 अन्तर्राज्यीय प्रवासी श्रमिकों में से 13 श्रमिक चाहते हैं कि लॉकडाउन के बाद उन्हें उनके गृह राज्यों में जाने दिया जाए, जबकि शेष 10 लोग वापिस नहीं जाना चाहते। कुल बारह उत्तरदाताओं ने बताया है कि उनके परिवार में कोरोना वायरस को छोड़कर पहले से ही कुछ अन्य बीमारियां चली आ रही थीं और उनमें से 11 ने सूचित किया है कि लॉकडाउन की वजह से उन रोगियों के इलाज में उन्हें कई कठिनाइयों के बीच से गुजरना पड़ा है।

जहां तक उत्तरदाताओं की ओर से इस विषय में टिप्पणियों और सुझावों का संबंध है, जिनको लेकर ठोस कदम उठाये जाने की आवश्यकता है, के सम्बन्ध में हमें निम्नलिखित सुझाव मिले हैं। एक राय यह निकल कर आई है कि ऐसे वक्त में सरकार को आगे आकर यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दिहाड़ी मजदूरों और जरूरतमंदों की उपेक्षा न हो।

सरकार को चाहिये कि कम से कम गरीबों और जरूरतमंद लोगों की बुनियादी जरूरतों जैसे कि सब्जियों और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जाये। नकद हस्तांतरण को लेकर जोरदार माँग बनी हुई है, जिसमें कोरोना वायरस की वजह से लागू किये गए लॉकडाउन की वजह से आय के नुकसान की भरपाई के लिए 500 रुपये थमाने के बजाय कम से कम 7,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये प्रति माह क्षतिपूर्ति के तौर पर दिए जाने के तौर पर देखा जा रहा है।

राज्य सरकार द्वारा गरीबों के खातों में 1,500 रुपये हस्तांतरित किये जाने के प्रयासों को सराहा जा रहा है। राशनकार्ड की बाध्यता को समाप्त कर हर किसी को राशन मिले, इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिये और इस प्रकार की सुविधाएं होनी चाहिए जिससे कि प्रवासी श्रमिक अपने गृह प्रदेशों की ओर रुख करने के लिए मजबूर न हों।

लोगों से जो फीडबैक मिला है उसके अनुसार उन्हें इस बात का यकीन था कि सरकार ने जो वादा किया था कि सभी लोग अपने-अपने मौजूदा स्थानों पर बने रहें, और उन्हें आवश्यक धन मुहैय्या कराया जायेगा, लेकिन हकीकत में कईयों को कुछ भी नहीं मिला है। इसके साथ यह सुझाव भी है कि सरकार को सार्वजनिक उद्योग शुरू करने चाहिए और रोजगार के अवसर मुहैय्या कराने चाहिए।

यह भी माँग रखी गई कि सरकार को इस बात को अनिवार्य कर देना चाहिए कि इस आर्थिक लॉकडाउन के दौर में मकान मालिकों की ओर से मकान का किराया न वसूला जाये और बिजली के बिल संबंधित राज्य सरकारों द्वारा वहन किए जाएं। सरकार को चाहिये कि वह ऑटो चालकों और दुकान जैसे छोटे-मोटे व्यवसायों को कुछ आर्थिक मदद पहुंचाए।

सरकार को सभी के लिए कुछ न कुछ रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिये जिससे सभी को कुछ हद तक सुरक्षित और स्थाई आय हो सके। कम से कम आज के जैसी स्थिति में सभी के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा हो, इस प्रश्न पर सभी एकमत थे। लोगों की राय में मौजूदा हालात से लड़ने के लिए बेहतर योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच में बेहतर समन्वय बनाये जाने की आवश्यकता है। आशा करते हैं कि शासन खुद को दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में लोगों की जरूरतों के प्रति पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील और उत्तरदायी बनाएगा!

सुरजीत दास सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग, जेएनयू में सहायक प्रोफेसर हैं। अथारी जानिसो और प्रकाश कुमार शुक्ला डिपार्टमेंट ऑफ़ इकॉनोमिक्स एंड फाइनेंस, बिट्स-पिलानी हैदराबाद कैम्पस में पीएचडी स्कॉलर हैं।

मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

COVID-19: Indebtedness Among Poor Increased During Lockdown in Telangana, Says Survey

COVID-19
Poor
Migrant workers
KCR
Telangana
KCR Government
Jan Dhan Accounts
Narendra modi

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    केरल: RSS और PFI की दुश्मनी के चलते पिछले 6 महीने में 5 लोगों ने गंवाई जान
    23 Apr 2022
    केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने हत्याओं और राज्य में सामाजिक सौहार्द्र को खराब करने की कोशिशों की निंदा की है। उन्होंने जनता से उन ताकतों को "अलग-थलग करने की अपील की है, जिन्होंने सांप्रदायिक…
  • राजेंद्र शर्मा
    फ़ैज़, कबीर, मीरा, मुक्तिबोध, फ़िराक़ को कोर्स-निकाला!
    23 Apr 2022
    कटाक्ष: इन विरोधियों को तो मोदी राज बुलडोज़र चलाए, तो आपत्ति है। कोर्स से कवियों को हटाए तब भी आपत्ति। तेल का दाम बढ़ाए, तब भी आपत्ति। पुराने भारत के उद्योगों को बेच-बेचकर खाए तो भी आपत्ति है…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लापरवाही की खुराकः बिहार में अलग-अलग जगह पर सैकड़ों बच्चे हुए बीमार
    23 Apr 2022
    बच्चों को दवा की खुराक देने में लापरवाही के चलते बीमार होने की खबरें बिहार के भागलपुर समेत अन्य जगहों से आई हैं जिसमें मुंगेर, बेगूसराय और सीवन शामिल हैं।
  • डेविड वोरहोल्ट
    विंबलडन: रूसी खिलाड़ियों पर प्रतिबंध ग़लत व्यक्तियों को युद्ध की सज़ा देने जैसा है! 
    23 Apr 2022
    विंबलडन ने घोषणा की है कि रूस और बेलारूस के खिलाड़ियों को इस साल खेल से बाहर रखा जाएगा। 
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    प्रशांत किशोर को लेकर मच रहा शोर और उसकी हक़ीक़त
    23 Apr 2022
    एक ऐसे वक्त जबकि देश संवैधानिक मूल्यों, बहुलवाद और अपने सेकुलर चरित्र की रक्षा के लिए जूझ रहा है तब कांग्रेस पार्टी को अपनी विरासत का स्मरण करते हुए देश की मूल तासीर को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License