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स्वास्थ्य
भारत
कोविड-19 : क्या भारत में लागू हुआ लॉकडाउन सफल रहा है?
सब लोगों को यह सवाल चिंता में डाल रहा है कि क्या लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जाएगा।
सुबोध वर्मा
06 Apr 2020
लॉकडाउन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के 10 दिन से ज़्यादा बीत चुके हैं। उन्होंने 24 मार्च को रात 8 बजे अपनी घोषणा में कहा था ''आज रात 12 बजे से.... '' और रात 12 बजे से लॉकडाउन हो गया। कोरोना महामारी ने अब तक दुनियाभर में 13 लाख लोगों को संक्रमित कर दिया है। क़रीब 67,000 लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में ही पॉजिटिव मामलों की संख्या तीन अप्रैल तक 4000 से ज़्यादा हो हो चुकी है। जबकि 24 मार्च को यह 536 थी। इस दौरान जान गंवाने वालों का आंकड़ा 10 से बढ़कर 118 पहुंच गया है।

लेकिन लोगों के दिमाग़ में सवाल है कि क्या लॉकडाउन सफल रहा है? क्या इससे कोरोना महामारी का संक्रमण धीमा हुआ है? यह लाखों भारतीयों के लिए जीने-मरने का सवाल है। वह रोज़ ख़बरों में सुन रहे हैं कि एक के बाद एक कई देश महामारी के चलते घुटनों पर आ गए। बहुत लंबे समय में यह इतने बड़े स्तर पर दुनिया में फैली महामारी है। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि लॉकडाउन के चलते एक बड़ी आबादी को अपनी आय से हाथ धोना पड़ा है। उनसे खाने का निवाला तक छीन लिया गया, अब वो एक अंधकार भरे भविष्य की ओर देख रहे हैं।

जैसा नीचे चार्ट में दिखाया गया है, भारत में पहला केस 30 जनवरी को आ गया था। इस चार्ट के आंकड़े स्वास्थ्य मंत्रालय और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के हवाले से लिए गए हैं। 24 मार्च को 53 दिनों के बाद कोरोना संक्रमण के भारत में  536 मामले आए थे। इस दौरान 30 जनवरी से 24 मार्च के बीच 10 लोगों को कोरोना के चलते जान से हाथ धोना पड़ा था।

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महामारी फैल तो रही थी, लेकिन उसकी दर धीमी थी। यह एक बहुत लंबा 53 दिनों का वक़्त था। दुनियाभर में कोरोना के मामलों की संख्या इस दौरान 8,234 से बढ़कर 4,18,045 हो गई। 30 जनवरी को जान गंवाने वालों की संख्या महज 171 थी, जो 24 मार्च को बढ़कर 18,625 पहुंच गई। साफ है कि महामारी फैल रही थी, वक़्त के साथ इसका भारत पर प्रभाव पड़ना ही था।

लेकिन मोदी सरकार इससे बेपरवाह थी, शायद सरकार ने मान लिया था कि किसी पौराणिक वजह से भारत महामारी की मार से बच जाएगा। पहले भारत ने उन देशों के नागरिकों की स्क्रीनिंग करने का आदेश दिया, जहां बड़े पैमाने पर कोरोना फैल चुका था। फिर कुछ दिन बाद सरकार ने सभी अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की स्क्रीनिंग करने को कहा। साथ ही राज्य सरकारों को ख़त लिखकर तैयार रहने के लिए कहा। सरकार ने कुछ जांच केंद्रों को तैयार करवाया। इसमें कोई शक नहीं है कि बंद दरवाजों के पीछे सभी तरह की बैठकें हुई होंगी। लेकिन असल दुनिया में कुछ नहीं हो रहा था।

पीएम ने उठाया नेतृत्व का बीड़ा

19 मार्च को पहली बार प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित किया और सोशल डिस्टेंसिंग को कोरोना से बचाव का तरीका बताया। हां यह जरूर है कि उन्होंने कोरोना से लड़ने की पूरी जिम्मेदारी लोगों पर डाल दी और उनसे संयम से काम लेने को कहा। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना से लड़ने में मदद करने वाले दूसरे कर्मियों की तारीफ़ भी की।

फिर 24 मार्च को उन्होंने लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इस पर पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन इसे फिर बताने की जरूरत है कि लॉकडाउन से पैदा होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई थी। इन समस्याओं में लोगों की आय का नुकसान, खड़ी फसलों का नुकसान, रोज़ाना के खाद्यान्न में कमी और प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं शामिल थीं, जो अपने मूल घर से बहुत दूर अचानक बे-घरबार हो गए थे।

तो इस लॉकडाउन के बाद संक्रमण की प्रवृत्ति और आकार में कितना अंतर आया है। ध्यान रहे इस लॉकडाउन में 4।5 अरब लोग पूरी दुनिया में प्रतिबंधित जीवन जी रहे हैं।

जैसा चार्ज में बताया गया है, जबसे लॉकडाउन शुरू हुआ है, तबसे संक्रमित आंकड़ों में पांच गुना ज़्यादा वृद्धि हो चुकी है। 24 मार्च को 536 केस थे, जो 3 अप्रैल को बढ़कर 2,567 हो गए। संक्रमण के चलते मरने वालों की संख्या में सात गुना का इज़ाफा हुआ। यह आंकड़ा 10 से बढ़कर 72 हो गया।

इसका मतलब यह नहीं है कि लॉकडाउन पूरी तरह असफल हो चुका है। ज़बरदस्ती लोगों को घर में रखने जाने से निश्चित संक्रमण के बड़े स्तर पर फैलने को रोका गया होगा। कोई यह नहीं बता सकता कि अगर लॉकडाउन लागू नहीं किया गया होता, तो क्या स्थिति बनती। शायद संक्रमण के मामले और मौतों की संख्या ज़्यादा होती। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि लॉकडाउन पूरी तरह असफल रहा है।

लेकिन मौजूदा आंकड़े इस बात को खारिज करते हैं कि लॉकडाउन से संक्रमण की चेन तोड़कर बीमारी को खत्म करने में कामयाबी मिली है। साफ है कि संक्रमण पहले से ज़्यादा तेजी से फैल रहा है। 

लॉकडाउन बिना योजना के लागू किया गया, जिसके चलते बड़े स्तर पर इसका उल्लंघन हुआ। सिर्फ़ प्रवासी मज़दूरों को ही नज़रअंदाज़ नहीं किया गया। वह तो साफ दिख गया। लेकिन ग़रीब वर्ग में जहां बेहद छोटे घर होते हैं, जिनकी आय एकदम से छिन गई, वहां लोगों में लॉकडाउन के चलते मेल-जोल में तो कमी आई है, लेकिन यह पूरी तरह नहीं रुका है।

किसान खेती-बाड़ी जारी रख सकते हैं। सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा करने के बाद उन्हें छूट दे दी। लेकिन इसकी भी शुरू में योजना नहीं बनाई गई। 24 मार्च तक लगातार जारी धार्मिक अनुष्ठानों में लॉकडाउन की वजह से लोग फंस गए। इन अनुष्ठानों में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्म के कार्यक्रम शामिल थे। लोग लगातार स्क्रीनिंग से बचते रहे, यहां तक कि क्वारंटाइन से भी भाग निकले। लॉकडाउन में काफ़ी लीक थे। शायद वैज्ञानिक तरीके से इसके प्रभाव को पता नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि लाखों तरीकों से इसका उल्लंघन किया गया।

टेस्टिंग और स्वास्थ्य संसाधनों का निर्माण

विश्लेषकों में सहमति है कि लॉकडाउन कोई ब्रह्मास्त्र नहीं है, जिससे कोरोना वायरस खत्म हो जाएगा। जबकि बहुत सारे भारतीय ऐसा मानते हैं। न ही घंटियां बजाने, शंख फूंकने या दिया जलाने से यह रुकने वाला है। सबसे ज़्यादा यह हो सकता है कि लॉकडॉ़उन के चलते एक बड़ा विस्फोट कुछ वक़्त के लिए टल सकता है। लेकिन दूसरे देशों के साथ तुलना से पचा चलता है कि भारत में कोरोना के बढ़ने के दर लॉकडाउन के बावजूद विकासशील देशों जैसी ही है। आने वाले दिनों में इसके बढ़ने की संभावनाएं हैं।

फ़िलहाल आने वाले तूफान से पहले शांति का दौर है, इस दौरान अच्छी तैयारियां की जा सकती थीं। भारतीय सरकार ने हाल ही में टेस्टिंग किट्स और प्राथमिक तौर पर स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मास्क बनाए जाने का आदेश दिया है। अब तक महज़ 66,000 टेस्ट ही किए गए हैं। यह भी सिर्फ कांटेक्ट टेस्टिंग की नीति के तहत किए गए हैं। केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में निगरानी और एकांतीकरण की प्रक्रिया तेज़ और मजबूत है। लेकिन कुछ दूसरे राज्यों में तो यह पूरी तरह नदारद है।

खाद्यान्न और स्वास्थ्य उपकरणों की आपूर्ति पर अब भी सिर्फ काम ही चल रहा है। डॉक्टर, नर्स और दूसरे पैरा-मेडिकल स्टॉफ की तैनाती के नाम पर सिर्फ उनकी छुट्टियां ही रद्द की गई हैं। स्क्रीनिंग या टेस्ट करने में सक्षम वालेंटियर्स के लिए अभी तक कोई ट्रेनिंग प्रोग्राम चालू नहीं किया गया है।

बल्कि कुछ राज्यों को छोड़ दें तो लोगों से अध्यात्मिक तरीक़ों से समर्थन जुटाया जा रहा है। उन्हें इस बात का गलत भरोसा दिलाया जा रहा है कि कोई काम कर रहा है या कोई ऊपरी ताकत सबकुछ ठीक कर देगी।

यह बहुत ख़तरनाक ग़लती है, जिसकी बड़ी क़ीमत कोरोना के जिन्न के बोतल से बाहर आने पर भारत को चुकानी होगी। अगर ऐसा होता है तो पूरी संभावना है कि लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जाएगा, क्योंकि इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

COVID-19 - Has The Leaking Indian Lockdown Succeeded?

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