NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
कोविड-19 : जो घर लौट रहे हैं, क्या फिर कभी वापस आएंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 महामारी का सबसे अधिक दिखाई देने वाला परिणाम मज़दूरों का घर लौटना है, चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के मामले में प्रवासी श्रमिकों का बड़ा महत्व है, इसलिए उन्हें फिर से वापस लाना एक मुश्किल काम हो सकता है।
सौरभ शर्मा
09 May 2020
Translated by महेश कुमार
कोविड-19
Image Courtesy: Scroll.in

लखनऊ: 32 साल के अखंड कुमार अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ पिछले 14 दिनों से पंजाब के लुधियाना शहर से उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तक पहुँचने के लिए पैदल मार्च कर रहे हैं। वे पानी, बिस्कुट और दूसरों की दयालुता के कारण मिलने वाले भोजन पर ज़िंदा हैं।

कुमार एक कपड़ा मिल या कारखाने में काम करते थे, उन्हे प्रति माह 10,000 रुपये मिलते थे, और करीब पिछले 12 वर्षों से लुधियाना में ही रह रहे थे।

“कुछ भी हो, मैं वापस नहीं जाऊंगा। मैंने सबसे खराब वक़्त देखा है। मैं पिछले दो हफ्तों से भटक रहा हूं लेकिन हमारे जैसे लोगों की दुर्दशा को सुनने वाला कोई नहीं है। मेरे गाँव में मेरा अपना कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि खेत भी नहीं है, लेकिन मैं अपने परिवार के भरण पोषण का तरीका खोज लूँगा। लेकिन, मैं किसी भी कीमत पर शहर वापस नहीं लौटूंगा।” कुमार ने उक्त बातें कहीं, जो अपने गांव में वापस ठहरने की ज़िद पर अड़े हैं।

कुमार जैसे ऐसे हजारों प्रवासी मज़दूर हैं, जिन्हें नॉवेल कोरोनवायरस महामारी को रोकने के लिए देश में की गई तालाबंदी के बाद वापस गाँव जाने के लिए कठिन पैदल यात्रा करने पर मजबूर किया गया है। सड़क के माध्यम से प्रवासियों की वापसी की कहानियाँ सिर्फ अखण्ड कुमार और उनकी पत्नी और बच्चों के फूले हुए पैरों पर ही समाप्त नहीं होतीं; बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।

हाल ही में दर्ज किए अपने नोट में, क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि भारत में 46.5 करोड़ लोगों का कार्यबल है। इसमें से लगभग 41.5 करोड़ लोग अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जहां उन्हे किसी भी तरह का सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध नहीं है। अर्थशास्त्री और लेखक विवेक कौल का कहना है कि आबादी के इतने बड़े हिस्से के लिए तालाबंदी बहुत मुश्किल समय लेकर आई है।

कौल ने कहा कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के भीतर नियमित वेतन कर्मी भी शामिल हैं जो संगठित क्षेत्र के लिए ठेके के आधार पर काम करते हैं। “इनमें से बहुमत से मज़दूरों के अपने मूल स्थानों या गृह राज्य लौट  जाने के बाद, यहाँ तक कि संगठित क्षेत्र में काम को फिर से शुरू करना मुश्किल हो सकता है, अगर वे ऐसा करना चाहे भी तो नहीं कर पाएंगे। अनुबंधित मज़दूरों या ठेके पर काम करने वाले श्रमिकों के अलावा, अस्थायी मज़दूर भी संगठित क्षेत्र के व्यवसायों में काम करते हैं। उन्हौने कहा कि इनमें निर्माण और परिवहन दो ऐसे क्षेत्र हैं,”।

कौल ने उल्लेख किया कि शहरों में औद्योगिक क्षेत्र में फंसे इन प्रवासी मज़दूरों के लिए पिछले कुछ सप्ताह "मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से" बहुत ही मुश्किल रहे हैं। उन्होंने कहा कि "समाचार-रिपोर्टों से पता चलता है कि ऐसे कई मज़दूर हैं जिनकी छोटी-मोटी बचत भी खत्म हो गई है," इसलिए इस तरह के परिदृश्य को देखते हुए “इसकी संभावना कम ही है कि ये मज़दूर शहरों और औद्योगिक क्षेत्र में काम पर जल्द वापस लौटेंगे।" निर्माण और परिवहन जैसे क्षेत्रों को बुरी तरह से प्रभावित करने के अलावा, यह कई सेवाओं और व्यवसायों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। ई-कॉमर्स कंपनियों के मामले को ही लें, जो कि उनकी घर-घर या अन्य गंतव्य की डिलीवरी के लिए डिलीवरी-बॉय पर निर्भर करती हैं। उन्होंने कहा कि अगर ये कंपनियाँ अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करना चाहती हैं तो उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश मिश्रा, जो देश में प्रवासी संकट के बारे में बहुत ही मुखर रहे हैं, ने कहा कि सबसे पहले जिस बात को रोकने की जरूरत है वह है "जुमलेबाज़ी" क्योंकि यह उन प्रवासियों की मदद करने वाली नहीं है जो लगातार 40 दिनों के लंबे समय से घर वापसी के लिए पैदल और भूखे पेट चल रहे हैं।

“ये प्रवासी मज़दूर एक शांत समुदाय हैं और उनके लिए आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है। अब, कम से कम इस बड़े पैमाने पर हुए मज़दूरों के पलायन के पीछे कारण के प्रति जवाबदेही तय की जानी चाहिए। सरकार को इस बात का रोड-मैप तैयार करना चाहिए कि वह कैसे अपने घर लौट रही इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी  मज़दूरों को रोजगार देने जा रही हैं। सभी लौटने वाले प्रवासियों का एक डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए और उस आधार पर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराए जाने चाहिए।”

मिश्रा ने कहा कि मनरेगा जैसी योजनाओं को फिर से शुरू करने और इसके बजट को बढ़ाने का समय आ गया है क्योंकि अब स्थिति बहुत ही भिन्न है। “सरकार को एक ब्लॉक को एक इकाई बनाने पर विचार करना चाहिए और रोज़गार ब्लॉक-वार उत्पन्न करने चाहिए क्योंकि इससे कई गाँवों को मदद मिलेगी। अधिकारियों के लिए यह एक बहुत ही कठिन लेकिन महत्वपूर्ण काम होगा, क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में करीब 800 ब्लॉक हैं, ”उन्होंने कहा।

“कृषि क्षेत्र और कृषि क्षेत्र आधारित उद्योगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रवासियों के मन में इस समय विश्वास की बहुत ही कमी है और इसकी कीमत देश को चुकानी पड़ेगी।''

बुंदेलखंड में स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता संजय सिंह ने कहा कि सरकार के लिए यह एक उचित अवसर है कि वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करे क्योंकि कार्यबल अब घर वापस आ गया है, लेकिन उन्हौने यह भी कहा कि समाज के लिए इसके बड़े परिणाम भी होंगे।

गांवों में पैर जमाने के लिए संघर्ष और लड़ाई होगी। सरकार को आजीविका कार्यक्रम और परिसंपत्ति निर्माण की योजना को तैयार करना चाहिए लेकिन यह ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार और धन की आमद पर निर्भर करेगा।

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) में स्कूल ऑफ लॉ, राइट्स एंड कॉन्स्टीट्यूशनल गवर्नेंस के सहायक प्रोफेसर डॉ॰ शमीम मोदी ने कहा कि दो तरह के लोग होते हैं जो शहरों की ओर पलायन करते हैं। उनके अनुसार, पहले वे लोग जिन्हे वास्तव में जीविका के लिए काम की जरूरत होती है, और दूसरे वे मज़दूर होते हैं जो अपनी आय बढ़ाने के लिए शहरों की तरफ आते हैं। उन्होंने कहा कि आय बढ़ाने वाला तबका अब अपने गांवों से वापस जाने वाले नहीं हैं, और दूसरे तबके को लौटने में बहुत समय लगेगा।

उन्होंने कहा कि “जो लोग लौट गए हैं या लौट रहे हैं ये वे लोग हैं जो वास्तव में शहरों को चलाते हैं। मज़दूरों के लिए एक समग्र और परिप्क्क्व दृष्टिकोण होना चाहिए और साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती पर जोर दिया जाना चाहिए अन्यथा अर्थव्यवस्था पूरी तरह से डूबने वाली है। यह समय इस बात को समझने का है कि आत्मनिर्भरता बहुत ही महत्वपूर्ण है और कृषि इसका बड़ा और मुख्य आधार है, इसलिए जड़ों की ओर वापस लौटना होगा और इसलिए वहां से काम शुरू करना बहुत महत्वपूर्ण है।”

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख आप नीचे लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

COVID-19 Reverse Migration: They are Leaving, But will They Return?

Reverse Migration
COVID-19
Coronavirus
Lockdown
Rural Economy
economic cost of COVID

Related Stories

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

सड़क पर अस्पताल: बिहार में शुरू हुआ अनोखा जन अभियान, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता ने किया चक्का जाम

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

यूपी: शाहजहांपुर में प्रदर्शनकारी आशा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा, यूनियन ने दी टीकाकरण अभियान के बहिष्कार की धमकी

दिल्ली: बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ मज़दूर, महिला, छात्र, नौजवान, शिक्षक, रंगकर्मी एंव प्रोफेशनल ने निकाली साईकिल रैली

पश्चिम बंगाल: ईंट-भट्ठा उद्योग के बंद होने से संकट का सामना कर रहे एक लाख से ज़्यादा श्रमिक


बाकी खबरें

  • Neha Singh Rathore
    न्यूज़क्लिक टीम
    ‘यूपी में सब बा’ के जवाब में नेहा सिंह राठौर का ‘ यूपी में का बा’
    23 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों को रिझाने के लिए सांसद और अभिनेता रवि किशन भाजपा की तारीफ़ में एक वीडियो लेकर आए, जिसके बोल हैं ‘ यूपी में सब बा’। भाजपा की उपलब्धियों का बखान वाला यह वीडियो घर-घर…
  • pm
    अजय कुमार
    दो टूक: मोदी जी, आप ग़लत हैं! अधिकारों की लड़ाई से देश कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत बनता है
    23 Jan 2022
    75 वर्षों में हम सिर्फ़ अधिकारों की बात करते रहे हैं। अधिकारों के लिए झगड़ते रहे, जूझते रहे, समय भी खपाते रहे। सिर्फ़ अधिकारों की बात करने की वजह से समाज में बहुत बड़ी खाई पैदा हुई है: प्रधानमंत्री…
  • Ethiopia
    शिरीष खरे
    इथियोपिया : फिर सशस्त्र संघर्ष, फिर महिलाएं सबसे आसान शिकार
    23 Jan 2022
    इथियोपिया, अफ्रीका महाद्वीप का यह देश पिछले दो वर्षों से अधिक समय से सुखिर्यों में है, जहां नवंबर, 2020 से शुरू हुआ सशस्त्र संघर्ष अभी भी जारी है, जहां टिग्रे अलगाववादियों और उनके खिलाफ इथियोपियाई…
  • nehru and subhash
    एल एस हरदेनिया
    नेताजी की जयंती पर विशेष: क्या नेहरू ने सुभाष, पटेल एवं अंबेडकर का अपमान किया था?
    23 Jan 2022
    नरेंद्र मोदी का यह आरोप तथ्यहीन है कि नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस, डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    …सब कुछ ठीक-ठाक है
    23 Jan 2022
    "क्यों, क्या सब ठीक-ठाक नहीं हैं? क्या सब ख़ैरियत से नहीं है? क्या हम हिंदू राष्ट्र नहीं बन रहे हैं? ठीक है भाई! बेरोज़गारी है, महंगाई है, शिक्षा बरबाद हो रही है और अस्पताल बदहाल। पर देश में क्या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License