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ग्रामीण भारत में कोरोना-35:  मुश्किलों में लॉकडाउन का सामना कर रहा असम का अतुगांव
जो लोग ग़ैर-कृषि स्व-रोज़गार वाले काम से जुड़े हैं उन्हीं लोगों पर लॉकडाउन की मार सबसे ज़्यादा पड़ी है। इनमें वे महिलाएं भी शामिल हैं जो घर में ही हथकरघे पर काम करती थीं, आज वे इस काम को इसलिए नहीं कर पा रही हैं क्योंकि इसे करने के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत है उसकी आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
स्मृति रेखा सिंघा
16 May 2020
ग्रामीण भारत में कोरोना
प्रतीकात्मक तस्वीर

यह इस श्रृंखला की 35वीं रिपोर्ट है जो ग्रामीण भारत के जीवन पर कोरोना वायरस से संबंधित नीतियों से पड़ने वाले प्रभावों की तस्वीर पेश करती है। सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा जारी की गई इस श्रृंखला में कई विद्वानों की रिपोर्टों को शामिल किया गया है जो भारत के विभिन्न गांवों का अध्ययन कर रहे हैं।

यह रिपोर्ट अतुगांव ग्राम की है जो असम के बोंगाईगांव ज़िले में स्थित है। अतुगांव के साथ पांच अन्य गांव अतुगांव ग्राम पंचायत के अंतर्गत आते हैं। इस ग्राम पंचायत में कुल 1,130 परिवार हैं और यहां की जनसंख्या 4,579 है, जिसमें 2,457 पुरुष और 2,522 महिलाएं हैं। वहीँ अतुगांव ग्राम में कुल 475 घर हैं, जिसकी कुल जनसंख्या क़रीब 1,765 (875 पुरुष और 890 महिलाएं) है। इस गांव में सभी घर हिन्दू समाज के हैं, जिसमें से तेरह घर राभा समुदाय (एसटी) के हैं, एक घर सूत्रधार समुदाय (एससी) का और शेष 461 घर कोच-राजबोंगशी समुदाय के हैं।

इस रिपोर्ट के लिए मैंने 16 अप्रैल, 2020 के दिन गांव में मौजूद कई लोगों के साथ व्यक्तिगत तरीके से इंटरव्यू किया। मैं मूलतः अतुगांव की ही रहने वाली हूं और लॉकडाउन की वजह से आजकल गांव में ही हूं। मेरे सवालों का जवाब देने वालों में पंचायत के मुखिया, बतख मीट के एक विक्रेता, एक गृहिणी और एक सरकारी स्कूल के अध्यापक शामिल थे।

इस गांव का मुख्य बाज़ार मुलागांव है जो यहां से सिर्फ एक किमी की दूरी पर है। आम दिनों में मुलागांव में हफ्ते में दो बार हाट (बाज़ार) लगता है, जिसमें सब्ज़ियां, छोटे-मोटे काम का सामान और मीट की बिक्री होती है। मुलागांव में भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा है जिसमें एक एटीएम है। अतुगांव के लोगों के लिए यही सबसे नज़दीक की उपलब्ध बैंकिंग सुविधाएं हैं। अतुगांव के सबसे नज़दीक में जो शहर पड़ता है वो बोंगाईगांव है जो यहां से लगभग 10 किमी की दूरी पर है। बोंगाईगांव शहर में बैंक, स्कूल, अस्पताल और रेलवे स्टेशन है। हाल के वर्षों में जबसे यातायात की सुविधा हुई है, अतुगांव से ग्रामीणों का बोंगाईगांव बाज़ार में लगातार आना-जाना आसान हो गया है।

खेतीबाड़ी एवं अन्य रोज़गार के मौक़े

अतुगांव ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले गांव मुख्यतः धान की खेती पर निर्भर हैं। इलाक़े में बंटाई पर फसल की खेती का काम आम चलन में है और यहां पर दो तरह की बंटाई प्रचलित है: अधि और कुटनी। अधि में जहां खेत मालिक और पट्टे पर किसानी करने वाले दोनों ही लोग खेती में लगने वाले खर्च़े और उपज को आपस में साझा करते हैं, वहीँ कुटनी में ज़मीन मालिक और पट्टेदार दोनों को फसल उत्पादन में हिस्सा मिलता है, लेकिन खेती में लगने वाली सारी लागत की ज़िम्मेदारी पट्टाधारक को उठानी पड़ती है।

धान की खेती अप्रैल से दिसंबर के बीच की जाती है। किसान आम तौर पर 15 अप्रैल से 15 मई के बीच ज़मीन (जुताई) को तैयार करना शुरू कर देते हैं। धान की बुवाई आमतौर पर 15 जून से 15 जुलाई के बीच की जाती है। लेकिन इस बार लॉकडाउन की वजह से जब मैं लोगों से इंटरव्यू कर रही थी, उस दौरान खेतों को तैयार करने का काम शुरू नहीं हो सका था। किसानों को उम्मीद है कि वे समय पर खाद, बीज और ट्रैक्टर जैसे आवश्यक इनपुट की ख़रीद कर पाएंगे। कुछ परिवार अपनी कृषियोग्य भूमि में सब्ज़ियों को भी उगाते हैं।

खेतीबाड़ी के अलावा कुछ परिवार जर्सी या क्रॉस-ब्रीड जैसी दुधारू गायों को पालते हैं और उनका दूध बेचते हैं। गांव के कई युवा निर्माण क्षेत्र में बतौर मज़दूर कार्यरत हैं। जबकि कुछ मज़दूर मनरेगा के तहत पंजीकृत हैं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान इस स्कीम के तहत कोई काम नहीं मिला है।

आवश्यक सेवाओं और वस्तुओं की उपलब्धता पर असर

ज़िला कमिश्नर की ओर से मुलागांव ग्राम में दो किराने की दुकानों को निर्धारित समय के लिए खुले रखने की इजाज़त मिली हुई है। हालांकि मुलागांव में हफ्ते में दो बार लगने वाले हाट को लगाने की इजाज़त नहीं है। जबकि अतुगांव के किसान, गायों के लिए चारे जैसे कुछ आवश्यक चीज़ों के लिए इसी बाज़ार पर ही निर्भर हैं। इस लॉकडाउन के दौरान बाज़ार के बंद हो जाने के बाद से गायों के लिए चारा सिर्फ एक दुकान में ही उपलब्ध है। लॉकडाउन की वजह से मुर्गियों के दाने की उपलब्धता का भी संकट खड़ा हो गया है। इस वजह से लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में ही पौल्ट्री फार्म मालिकों ने अपनी मुर्ग़ियों को औने-पौने दामों में बेचने में ही भलाई समझी। लॉकडाउन से पहले जहां एक किलो चिकन की क़ीमत 200 रुपये थी, उसकी तुलना में यह क़ीमत गिरकर 70 रुपये प्रति किलो रह गई थी। इसके अलावा मुर्ग़ियों से वायरस फ़ैलने की अफवाहों ने भी चारों तरफ आतंक का माहौल पैदा कर दिया था और लॉकडाउन शुरू होने के दो हफ़्ते बाद तक तो कई पोल्ट्री फार्मों ने पूरी तरह से इस धंधे से तौबा कर ली है। इसके चलते स्थानीय बाज़ार में चिकन की भारी किल्लत हो गई थी। भविष्य में इसकी मांग की पूर्ति को ध्यान में रखते हुए कुछ उद्यमी परिवारों ने अब ब्रॉयलर चिकन पालना शुरू कर दिया है।

मछली, मीट (चिकन के अलावा) और सब्ज़ियों के लिए ग्रामीण बोंगाईगांव शहर के बाज़ार (बोरो बाज़ार) पर निर्भर हैं। लेकिन लॉकडाउन घोषित होने के फौरन बाद से बाज़ार में नए माल की आपूर्ति ठप पड़ चुकी थी। अप्रैल के दूसरे सप्ताह में जाकर मछली की बिक्री फिर से शुरू हो सकी, हालांकि क़ीमतों में काफी उछाल देखने को मिला है। जो मछली पहले 200 रुपये प्रति किलो में मिल जाया करती थी, उसे अब 400 रुपये प्रति किलो की दर पर बेचा जा रहा था।

ज़्यादातर घरों में अपनी घरेलू खपत के लिए गाय, बकरी, मुर्ग़ी और बत्तख पालन किया जाता है और इसलिए अंडों और दूध की उपलब्धता बनी हुई है। ये गायें देसी सामान्य नस्ल की गायें हैं और वे जो दूध देती हैं उसे घर में ही इस्तेमाल के लिए रख लिया जाता है।

लॉकडाउन के पहले कुछ हफ्तों के दौरान तो गांव वाले ज़्यादातर अपने घर के आसपास उगने वाली सब्ज़ियों जैसे कि अरबी, कटहल, सहजन और स्थानीय हरी साग-सब्जी पर ही पूरी तरह से निर्भर थे। लॉकडाउन के दौरान कुछ लोग जो अपने खेतों में सब्ज़ियां उगाते थे, उन्हें अपने खेतों से सब्ज़ियों की कटाई के लिए दोपहर के वक्त अपने घरों से निकलने की अनुमति दे दी गई थी। इसके साथ ही अप्रैल के पहले हफ्ते से तीन सब्ज़ी विक्रेताओं को अपनी बैलगाड़ियों से अतुगांव में सब्ज़ी बेचने की इजाज़त मिल चुकी थी। पंचायत के मुखिया की तरफ से इन सब्ज़ी विक्रेताओं को अधिकृत किया गया था।

राहत उपाय और कोरोना वायरस से लड़ने की तैयारी

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जो चावल वितरण का काम हुआ, उसने गांव में लोगों को कुछ राहत अवश्य पहुंचाई है। पंचायत मुखिया के अनुसार, ज़िला कमिश्नर के निर्देशानुसार जिन लोगों के पास कोई राशन कार्ड नहीं हैं, उनके खातों में 1,000 रुपये जमा कराये गए थे। हालांकि उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त एलपीजी सिलेंडरों को हासिल करने का काम कहीं अधिक कष्टदायक साबित हुआ है। इसके लिए जो आवश्यक कागजी कार्रवाई करनी होती है उसे एक साथ रख पाना काफी मुश्किल हो रहा है। क्योंकि फोटोकॉपी की दुकानें बंद पड़ी हैं और लॉकडाउन के दौरान कई बैंक प्रक्रियाएं या तो बेहद सुस्त रफ़्तार में चल रही हैं या उपलब्ध ही नहीं हैं। पंचायत अध्यक्ष को अपने दायरे में आने वाले सभी छह गांवों के लोगों की आवाजाही पर निगाह रखने की ज़िम्मेदारी है। गांव वालों से कहा गया है कि इस दौरान होने वाले बोहाग बिहू और पहाड़ी पूजा जैसे त्यौहारों को मनाते समय एक जगह पर भीड़ न होने दें। इस बीच एक महिला जो पड़ोसी जिले (धुबरी) के सील हुए गांव (चापर) से चलकर इस पंचायत तक पहुंच गई थी, उसके बारे में ज़िला स्तर के अधिकारीयों को सूचित कर दिया गया था जिसके बाद उसे होम क्वारंटीन में रहने के निर्देश दिए गए थे।

स्थानीय पुलिस की ओर से नियमित तौर पर गश्त का काम जारी है, ताकि बाज़ारों में कोई भीड़-भाड़ न होने पाए। गांव में अफवाहों का बाज़ार गर्म है कि पुलिस के ये गश्ती दल लोगों को पीट रहे हैं। हालांकि पुलिसिया पिटाई के खौफ के बावजूद स्थानीय चाय विक्रेता और अन्य दुकानदारों ने अपनी दुकानों को खोले रखने का सिलसिला जारी रखा है। चूंकि सार्वजनिक स्थलों पर जमा होने की मनाही है इसलिए नौजवानों के लिए इकट्ठा होने और हाल-समाचार के आदान प्रदान या ताश खेलने के लिए गांव के सेंटर से दूर खाली पड़े धान के खेत पसंदीदा जगहें साबित हो रही हैं। स्थानीय युवाओं ने एक बिहू उत्सव आयोजन समिति का भी गठन कर रखा है और ज़रूरतमंद लोगों को मदद पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

मैं यहां अपने तीन लोगों के अनुभवों और चिंताओं को संक्षेप में प्रस्तुत कर रही हूं।

कसाई का काम करने वाले मिज़ेन सिंघा

पचास वर्षीय मिज़ेन सिंघा बत्तख का मीट बेचते हैं। वे बत्तखों को मुस्लिम बत्तख-विक्रेताओं से ख़रीदते रहे हैं, जो पास के गांवों से बत्तख बेचने अतुगांव आते रहते थे। ये बत्तखों की बिक्री करने वाले लोग खुद तो बत्तख पालते ही हैं, साथ में दूसरे किसानों की पाली हुई बत्तखों को भी बेचते रहे हैं। हालांकि जबसे तब्लीगी जमात वाला मामला सुर्ख़ियों में आया है, जिस पर मीडिया ने कई हफ्तों तक फोकस बनाये रखा था उसके बाद से गांव वालों ने मुसलमानों द्वारा पाले गए बत्तख का मीट खरीदना बंद कर दिया है। सिंघा के लिए इसका मतलब साफ है कि अब उसके पास बत्तख की आपूर्ति नहीं होने जा रही है, जिसने उनके काम को बुरी तरह से प्रभावित कर डाला है। कई महीनों से मिज़ेन सिंघा गंभीर आमातिसार की बीमारी से ग्रस्त हैं, और इसकी वजह से कहीं आना-जाना नहीं कर सकते हैं। अब वे और उनके परिवार का जीवन पूरी तरह से उनके खेत में उगाई गई सब्ज़ियों और ताज़ी सुपारी (तामुल) बेचने पर टिका हुआ है।

चार बच्चों की मां सोबिता दास

तीस वर्षीय सोबिता दास अपने पति और चार बच्चों के साथ एक ज़़मींदार से लीज़ पर ली हुई ज़मीन पर रहती हैं। सोबिता का पति कार मैकेनिक का काम करता था, लेकिन लॉकडाउन शुरू हो जाने के बाद से उसका यह काम छूट गया है और अब वह शराब का शिकार हो चुका है। खेतीबाड़ी के सीजन के दौरान सोबिता बुवाई और कटाई का काम कर लेती है और उसे उम्मीद है कि जैसे ही खेती का सीजन शुरू होगा तो उसे काम मिल जाएगा। कुछ आमदनी का इंतज़ाम वह घर पर हथकरघे से कपड़ा बुनकर कर लेती थी, लेकिन लॉकडाउन के चलते धागे की आपूर्ति बाधित है और इसलिए वह अपना काम जारी नहीं रख पा रही है। उसके दो बच्चे आंगनवाड़ी राशन पाने के हक़दार हैं जो उसे नहीं मिला है, और वह पीडीएस के राशन में मिलने वाले चावल पर काफी हद तक निर्भर है। स्थानीय बिहू उत्सव आयोजन समिति की ओर से उसे कुछ चावल, दाल, सरसों का तेल और साबुन मिला था जिससे उसके हफ्ते भर का गुजारा चल जाएगा।

किसान बेदाब्रत की कहानी

अड़तीस साल के बेदाब्रत मान्यता प्राप्त सरकारी शिक्षक हैं। अपने एक सहकर्मी के साथ मिलकर उन्होंने पिछले साल पहली बार स्ट्राबेरी की खेती का काम शुरू किया था। दोनों सहकर्मियों ने सब्ज़ियां भी उगाईं, जिसे उन्होंने उस समय बाज़ार में बेच दिया था। हालांकि इस साल बेदाब्रत इस बात को लेकर उलझन में हैं कि उन्हें समय पर अच्छी गुणवत्ता वाले बीज न मिल पाए तो क्या होगा, क्योंकि लॉकडाउन के दौरान बीज की दुकानें बंद पड़ी हैं।

निष्कर्ष

अतुगांव में लोगों के साथ किए गए साक्षात्कार में जो प्रमुख बिंदु निकल कर सामने आए वे इस प्रकार हैं। लॉकडाउन के दौरान ग्रामवासी खरीफ की पैदावार के लिए अपने खेत तैयार नहीं कर सके हैं। जो मज़दूर मनरेगा के तहत पंजीकृत थे, उन्हें लॉकडाउन के दौरान कोई रोज़गार मुहैया नहीं कराया जा सका है। गायों और मुर्गियों के लिए चारे की उपलब्धता बेहद सीमित रह गई है, जिसके परिणामस्वरूप पौल्ट्री फार्म से जुड़े लोगों ने लॉकडाउन के शुरूआती दिनों के दौरान ही अपनी मुर्ग़ियों को बेहद सस्ते दरों पर बेच डाला। जबकि जो लोग ग़ैर-कृषि स्वरोज़गार वाले काम-धंधों से जुड़े थे वे लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इसमें वे महिलाएं भी शामिल हैं जो अपने घरों में रहकर हथकरघे से जुड़े कार्य कर लेती थीं लेकिन उस काम के लिए ज़रूरी वस्तु की आपूर्ति बाधित होने के चलते इस काम को जारी नहीं रख पा रही हैं।

(लेखिका गुवाहाटी स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं।)

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

COVID-19 in Rural India-XXXV: How Assam’s Atugaon Is Coping With Lockdown

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