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मज़दूर-किसान
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भारत
ग्रामीण भारत में कोरोना-27:  मध्यप्रदेश के बडोरा गांव के ग़रीबों का धुंधलाता भविष्य
इस गांव में बड़ी संख्या में छोटे किसान और अनियमित मज़दूर रहते हैं, ये किसान और मज़दूर अब भी दीर्घकालिक निहितार्थों को जाने बिना ही इस संकट को देख रहे हैं।
सुनीत अरोड़ा
29 Apr 2020
ग्रामीण भारत

यह उस श्रृंखला की 27 वीं रिपोर्ट है, जो ग्रामीण भारत के जन-जीवन पर COVID-19 से जुड़े नीतियों के असर को दिखाती है। सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा तैयार की गयी इस श्रृंखला में अनेक ऐसे जानकारों की रिपोर्ट शामिल है,जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में गांव का अध्ययन कर रहे हैं। ये रिपोर्ट उनके अध्ययन किये जा रहे गांवों के बारे में जानकारी देने वालों के साथ टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत के आधार पर तैयार की गयी हैं। इस रिपोर्ट के ज़रिये दक्षिणी मध्य प्रदेश के बडोरा गांव के सिलसिले में COVID-19 महामारी की वजह से लगाये गये प्रतिबंधों के असर का आकलन करने की कोशिश की गयी है।

मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले में सपना नदी के तट पर स्थित, बडोरा लगभग 7,500 लोगों की आबादी वाला एक बड़ा गांव है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 47 और उस बैतूल शहर से तीन किलोमीटर दूर है, जो ज़िले के मुख्यालय के रूप में भी कार्य करता है। अब तक, इस ज़िले में COVID-19 के एक मामले की पुष्टि हुई है।

इस गांव में लगभग 70% परिवार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आते हैं, जिनमें प्रमुख जातियां कुनबी और पवार हैं। गांव के कई घर अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में वर्गीकृत किये गये हैं। बैतूल में लगभग 25% परिवारों के पास ज़मीन नहीं है और वे मुख्य रूप से अनियमित मज़दूर के रूप में कार्यरत हैं। ज़्यादतर कृषक परिवारों के पास पांच एकड़ से छोटी जोत वाली ज़मीन है और ऐसे सिर्फ़ दस घर ही हैं, जिनमें 25 एकड़ से ज़्यादा जोत वाली ज़मीन है।

इस गांव की भूमि की सिंचाई मुख्य रूप से सपना बांध से की जाती है और क़रीब आधे क्षेत्र में गन्ने की खेती की जाती है। गेहूं और काले चने महत्वपूर्ण रबी की फसलें हैं और सोयाबीन ख़रीफ़ मौसम के दौरान उगाया जाता है। बडोरा गांव, जिले के कृषि उपकरण और उर्वरक की दुकानों का केंद्र भी है।

गन्ने की फसल पर लॉकडाउन का असर

बडोरा के ज़्यादतर कृषक परिवार अपनी कृषि भूमि के 50% से 75%  हिस्से पर गन्ना उगाते हैं। वे अपनी उपज को उस चीनी मिल को बेच देते हैं, जो गांव से लगभग दस किलोमीटर दूर है। गन्ना किसान मार्च के मध्य से ही अपने गन्ने के खेतों में मिट्टी चढ़ाने का काम कर रहे हैं। क्यारियों के दोनों किनारों पर मिट्टी चढ़ाया जाता है और इस मिट्टी से निकलने वाले अंकुर को  इस मिट्टी से आधार दिया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर उर्वरकों के इस्तेमाल के साथ-साथ संपन्न होती है। गांव के कई छोटे किसान सहकारी सोसाइटी से ही अपनी खाद लेते हैं और उन्होंने इसके लिए अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की है, जो इसे पिछले एक पखवाड़े से चला रहे हैं।। हालांकि, लॉकडाउन के ऐलान के बाद से यह सोसाइटी काम नहीं कर रही है। इसके अलावा, 22 मार्च से सभी कृषि से जुड़े सामान की दुकानें भी बंद हो गयी हैं। इस वजह से गन्ने की फ़सल के लिए उर्वरकों के छिड़काव में देरी हुई है, जो फ़सल के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा, और जिसके चलते उपज में कमी आयेगी।

गेहूं की फ़सल पर प्रभाव

गेहूं की कटाई या तो हाथ से की जाती है या गांव में इस्तेमाल होने वाली छोटी-छोटी मशीनों से होती है। कटाई के समय, मज़दूर बैतूल ज़िले के भैंसदेही, अथनेर और चिचोली तहसील से गेहूं के खेतों में काम करने लिए आते हैं, ये मज़दूर मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्य (जिसे स्थानीय रूप से आदिवासी के रूप में जाना जाता है) होते हैं। उनकी आवाजाही पर रोक लग जाने की वजह से उनमें से कई मज़दूर गांव तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिसका नतीजा यह हुआ है कि कटाई के दौरान श्रमिकों की भारी क़िल्लत हो गयी है।

इस क़िल्लत के साथ-साथ समय पर फ़सल की कटाई करने वाले मशीनों की ज़रूरी संख्या आसपास के ज़िलों से गांव में नहीं लायी जा सकी है। लिहाजा, इन मशीनों को लगाने की क़ीमत 800 रुपये प्रति घंटे से बढ़कर 1,100 रुपये प्रति घंटा हो गयी है। श्रमिकों और मशीनों की क़िल्लत के कारण, क़रीब-क़रीब सभी किसान परिवार इस मौसम में गेहूं की कटाई को अंजाम देने के लिए पारिवारिक श्रम का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। कटाई के दौरान एक और बड़ी समस्या सामने आयी और वह थी-बांधने वाली उस रस्सी की उपलब्धता में कमी, जिसका इस्तेमाल गेहूं के बोझ को बांधने के लिए किया जाता है; रस्सी के ग्यारह किलोग्राम के इस बैग की क़ीमत 1,100 रुपये से बढ़कर 1,800 रुपये हो गयी है। इसी तरह की समस्या का सामना अनाज को रखने के लिए बोरे को खरीदने में करना पड़ा है। इन ज़रूरी सामान की क़ीमतों में हुई बढ़ोत्तरी ने किसानों पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।

गांव में लगभग 80% गेहूं की फ़सल की कटाई हो चुकी थी। चूंकि ज़्यादातर किसान छोटे-छोटे जोत में गेहूं बोते हैं, इसलिए उनका उत्पादन भी सीमित होता है और वे फ़सल कटाई के तुरंत बाद इसे बेच देना पसंद करते हैं। 25 दिनों तक बंद रहने के बाद, 15 अप्रैल को बडोरा कृषि मंडी खोली गयी। सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए, मंडी के फिर से शुरू होने के बाद पहले दिन केवल छह किसानों को ही अपनी उपज बेचने की अनुमति दी गयी। इसे देखते हुए, किसान अपनी उपज बेचने में होने वाली देरी को लेकर सशंकित दिख रहे हैं।

अन्य फ़सलों पर प्रभाव

इस इलाक़े के ज़्यादातर किसान गन्ने के साथ-साथ आलू, प्याज और लहसुन का उत्पादन करते हैं। थोक उत्पाद को बडोरा मंडी में बेचा जाता है। मंडी बंद होने के कारण, किसानों को घर पर कटी हुई फ़सल का भंडारण करने के लिए अस्थायी व्यवस्था करनी पड़ी है।

गांव में ऐसे तीन पॉली हाउस हैं, जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से सब्ज़ी की खेती के लिए किया जाता है। उत्पादक अपनी फ़सल को बेचने के लिए आमतौर पर अमरावती और नागपुर जैसे प्रमुख केंद्रों का रुख़ करते हैं। मार्च के तीसरे हफ़्ते में परिवहन सुविधाओं के अचानक और पूरी तरह से बंद हो जाने की वजह से उन्हें कुछ नुकसान हुआ है। उन्होंने अपनी फ़सल के एक हिस्से, मुख्यतः टमाटर और खीरे को गांव में ही बेच दिया। चूंकि इन पॉली हाउस के मालिक स्थापित कारोबारी हैं, इसलिए वे बहुत जल्दी परमिट हासिल करने में कामयाब रहे और समय पर अपनी फ़सल को पहुंचाने में सक्षम भी रहे।

डेयरी व्यवसाय पर प्रभाव

बडोरा में छोटे किसान रोज़ाना दूध बेचकर अपनी आय में बढ़ोत्तरी करते हैं। हालांकि इस गांव में पशुधन रखने के रुझान में गिरावट आयी है, फिर भी बड़ी संख्या में घरों में लोग कुछ जानवर तो रखते ही हैं। गांव में एक स्थानीय डेयरी है, जहां अतिरिक्त दूध एकत्रित किया जाता है। यहां से एकत्र किये गये दूध को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चलाये जा रहे सांची कॉपरेटिव को बेच दिया जाता है। लॉकडाउन लगने के बाद दूध की मांग में आयी गिरावट के कारण, दूध संग्रह लगभग पांच दिनों तक बाधित रहा। दूध बेचने के लिए कोई दूसरे विकल्प भी नहीं था, क्योंकि इस अवधि के दौरान बैतूल के सभी रेस्तरां बंद रहे। कुछ परिवार शहर स्थित मिठाई की उन दुकानों पर जाकर सीधे दूध बेच दिया करते थो, जो इस समय लॉकडाउन के दौरान बंद हैं। यही वजह है कि ये परिवार पिछले 25 दिनों से दूध नहीं बेच पा रहे हैं और नतीजतन उनकी कमाई पर असर पड़ा है। कुछ पशुधन को तत्काल चिकित्सा की ज़रूरत थी, लेकिन किसी भी पशु चिकित्सक ने इस बीच गांव का दौरा नहीं किया है। इसके अलावे, दुकानें बंद हैं और मवेशियों के लिए चारे भी उपलब्ध नहीं हैं।

हाथ से काम करने वाले मज़दूरों पर प्रभाव

बैतूल के कोसमी औद्योगिक क्षेत्र में गांव के क़रीब सौ लोग कार्यरत हैं। कुछ ग्रामीण पास के आटे और तेल मिलों में भी काम करते हैं, लेकिन इस समय कारखानों के बंद होने के कारण ये श्रमिक अब घर पर ही हैं। उन्हें मार्च महीने की मज़दूरी तो मिल गयी है, लेकिन वे अपने मौजूदा रोज़गार को लेकर असमजंस में हैं। गांव के भूमिहीन परिवारों के ज़्यादातर लोग निर्माण क्षेत्र में और बैतूल शहर की विभिन्न दुकानों में दिहाड़ी मज़दूरों के रूप में कार्यरत हैं।

लॉकडाउन के दौरान, इन मज़दूरों को कृषि क्षेत्र में काम नहीं मिल पाया है, क्योंकि उनके पास विशिष्ट कार्य करने के लिए ज़रूरी कौशल की कमी है। इस परिवार की आजीविका इस समय सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत पंचायत से मिलने वाले राशन से चल रही है। गांव में 555 ऐसे लाभार्थी हैं, जिन्हें मार्च की शुरुआत में तीन महीने के लिए राशन मिला था। यह मध्यप्रदेश के गेहूं उगाने वाले इस क्षेत्र में एक आम चलन है; लाभार्थियों को गेहूं ख़रीद के मौसम के शुरू होने से पहले तीन महीने के लिए राशन दे दिया जाता है।

मनरेगा की सूची में गांव के 109 सक्रिय मज़दूर हैं, जिनमें से 90% महिलायें हैं। ग्रामीण स्तर पर प्रभारी अधिकारी को निर्देश दे दिया गया है कि वे गांव में उन कुछ ऐसे छोटे-मोटे कार्यों को चिह्नित करें, जो स्थिति सामान्य होने के बाद इन महिलाओं को मनरेगा योजना के तहत रोजगार मुहैया करा पाये। पिछले कुछ महीनों में इस योजना के तहत कोई काम उपलब्ध नहीं था और पंजीकृत श्रमिकों को लॉकडाउन के दरम्यान सरकार से कोई पैसा नहीं मिला है। तीन परिवारों ने पिछले सप्ताह भोजन की पूर्ण अनुपलब्धता की वजह से मुख्यमंत्री की हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज की और उन्हें ग्राम पंचायत द्वारा राशन उपलब्ध कराया गया।

संकटग्रस्त परिवारों को मदद पहुंचाने के लिए, अपेक्षाकृत अच्छी हैसियत वाले किसानों के एक समूह ने राशन किट वितरित किये, जिसमें पांच किलोग्राम चावल, दो किलोग्राम गेहूं का आटा, दो किलोग्राम दाल और कुछ एससी और एसटी परिवारों को नमक के एक पैकेट दिये गये।

गांव में पांच आंगनवाड़ी केंद्र हैं, लेकिन उनके नियमित काम को रोक दिया गया है; लॉकडाउन से ठीक पहले गांव लौटे लोगों को चिह्नित करने को लेकर गांव के परिवारों का सर्वेक्षण करने के लिए आंगनवाड़ी कर्मचारियों को तैनात किया गया है। नब्बे ऐसे लोगों की पहचान की गयी और उन्हें ख़ुद को घर में ही क्वारंटाइन करने के लिए कहा गया।

तमिलनाडु से अपने घर लौट रहे छिंदवाड़ा ज़िले के लगभग 120 प्रवासी मजदूरों को बैतूल में पुलिस ने रोक लिया और 29 मार्च को बडोरा भेज दिया गया। इन मज़दूरों ने गांव में कई दिन बिताये और उन्हें चिकित्सीय परीक्षण के बाद ही अपने-अपने घरों में जाने की अनुमति मिली। इससे गांव के रहने वाले लोगों में बेचैनी का भाव पैदा हो गया है।

आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों पर प्रभाव

गांव और उसके आस-पास उत्पादित होने वाली इन वस्तुओं की वजह से दूध और सब्ज़ियों के दाम में कोई बदलाव नहीं आया है। ज़िले में हर दिन सिर्फ़ तीन घंटे के लिए किराना दुकानों को खोलने की इजाज़त मिली थी। हालांकि, गांव में छोटी-मोटी ऐसी कई किराना दुकानें हैं, जो उसे चलाने वालों के घरों से ही संचालित होती हैं। ये ग्राहकों के लिए खुले रहते हैं। इससे किराने की वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। लेकिन, पिछले 20 दिनों में कुछ आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी हुई है; वनस्पति तेल 99 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर हो गया है; चीनी 30 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 45 रुपये प्रति किलोग्राम और दाल और चावल के दाम भी दस प्रतिशत बढ़ गये हैं।

आवश्यक उर्वरकों और कीटनाशकों की आपूर्ति में कमी आने की वजह से इनसे जुड़े कारोबारी चिंतित हैं। लॉकडाउन की घोषणा से पहले गांव के एक दुकान मालिक ने आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले उर्वरक, डीएपी के 100 टन के लिए एक ऑर्डर दिया था,लेकिन उसकी डिलीवरी अभी तक नहीं हो पायी है। गन्ने की फ़सल के लिए उर्वरकों की मौजूदा अनुपलब्धता की वजह से किसान इन उर्वरकों की क़ीमतों में होने वाली बढ़ोतरी की आशंका जता रहे हैं।

गांव में तीन एटीएम हैं और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की एक शाखा है। यह शाखा भले ही चालू है, लेकिन,लॉकडाउन शुरू होने के बाद से बहुत सारे लोगों ने इस शाखा का दौरा ही नहीं किया है।

लॉकडाउन के चलते लगने वाले प्रतिबंध के कारण पैदा होने वाली बाधाओं ने पहले से ही तनाव महसूस कर रही यहां की आबादी के संकट को बढ़ा दिया है। इस गांव में बड़ी संख्या में छोटे किसान और अनियमित मज़दूर रहते हैं, ये किसान और मज़दूर अब भी दीर्घकालिक निहितार्थों को जाने बिना ही इस संकट को देख रहे हैं। हालांकि, स्थिति की भयावहता को देखते हुए, गांव के परिवारों को इस महामारी के नुकसान पहुंचाने वाले आर्थिक प्रभाव से बचाने में मदद के लिए राज्य की मदद की तत्काल ज़रूरत है।

(सुनीत अरोड़ा सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में एक रिसर्च स्कॉलर हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

COVID-19 in Rural India-XXVII: A Bleak Future for the Poorest in MP’s Badora Village

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