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मज़दूर-किसान
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ग्रामीण भारत में कोरोना-11 : इरेंगबंद में भूमिहीन और श्रमिक सबसे ज़्यादा प्रभावित
मणिपुर के इस गांव में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की कमी हो गई है और क़ीमतों में इज़ाफ़ा हो गया है जिससे लोग बुरी तरह परेशान हो रहे हैं। इनमें से कई लोगों ने अपनी नौकरी गँवा दी है। इस गांव में मुख्य रुप से मीतेई समुदाय के लोग रहते हैं।
दूरदर्शनी थोकचोम
15 Apr 2020
ग्रामीण भारत में कोरोना-11

यह इस श्रृंखला की 11वीं रिपोर्ट है जो ग्रामीण भारत में लोगों के जीवन पर COVID-19 से संबंधित नीतियों के प्रभाव की तस्वीर पेश करती है। सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा तैयार की गई इस श्रृंखला में कई स्कॉलर की रिपोर्ट शामिल है जो भारत के विभिन्न गांव का अध्ययन कर रहे हैं। ये रिपोर्ट अध्ययन किए जाने वाले गांवों में प्रमुख श्रोतों के साथ टेलीफोन पर साक्षात्कार के आधार पर तैयार की गई है। इस रिपोर्ट में मुख्य रुप से इरेंगबंद के मितेई समुदाय के लोग और उनकी आजीविका पर COVID-19 महामारी के प्रभाव और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के बारे में बताया गया है। ये लोग आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों में तेजी से वृद्धि और काम समाप्त होने पर कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

इरेंगबंद गांव उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर के काकचिंग ज़िले में स्थित है। सामाजिक-आर्थिक तथा जाति जनगणना 2011 (एसईसीसी 2011) के अनुसार इस गांव में लगभग 2,215 घर है और इस बड़े गांव की आबादी लगभग 11,664 है।

मणिपुर के अन्य हिस्सों की तरह इरेंगबंद में लिंगानुपात 1,007 (एसईसीसी 2011) है। इस गांव के सभी परिवार मीतेई समुदाय के हैं जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की श्रेणी में आता है।

बहरहाल बड़ी संख्या में यहां के लोग कृषि में लगे हुए हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा इससे प्राप्त करते हैं। इस गांव के एक हालिया सर्वेक्षण के अनुमान से पता चलता है कि 50 प्रतिशत परिवारों ने कृषि भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा पट्टा पर लिया था। हालांकि, जोत वाली भूमि के छोटे आकार को देखते हुए, अधिकांश परिवार शारीरिक श्रम में भी लगे हुए हैं।

इसी सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 10% परिवारों के पास कोई भूमि नहीं है और वे केवल स्वयं को ज़िंदा रखने के लिए कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं। गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वाले ये श्रमिक पत्थर तोड़ने के कार्य, निर्माण कार्य और ईंट भट्टों में लगे हैं।

इरेंगबंद में कृषि भूमि के एक बडे हिस्से को रबी मौसम के दौरान परती छोड़ दिया जाता है; इस तरह कई किसान इस मौसम में कैजुअल शारीरिक श्रमिक के रूप में भी काम करते हैं।

खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली धान मुख्य फसल है। रबी मौसम में केवल कुछ किसान ही सरसों और आलू उगाते हैं; COVID-19 का प्रकोप इन दो रबी फसलों की कटाई के समय में ही फैल गया है।

चूंकि लॉकडाउन अवधि के दौरान लोगों का एकजुट होना प्रतिबंधित है, ऐसे में दो लोगों ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार के लोगों के साथ कटाई का काम पूरा कर रहे हैं और सुबह में ही काम कर रहे हैं। एक अन्य किसान ने कहा कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान तीन एकड़ में लगी सरसों की कटाई के लिए 92 श्रमिकों को काम पर रखा था।

कृषि-संबंधी सामग्रियों की कमी फिलहाल बड़ी चिंता की बात नहीं है क्योंकि रबी के मौसम के दौरान अधिकांश भूमि को परती छोड़ दिया गया। हालांकि, चिंता की बात यह है कि अगले खरीफ सीजन के लिए समय पर ये सामग्री उपलब्ध नहीं होंगे।

गांव के मज़दूर भी काम की तलाश में बाहर निकलते हैं। इनमें ज़्यादातर दूसरे शहरों और राज्य की राजधानी इम्फाल में जाते हैं।

लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिक अपने काम करने वाले स्थानों से लौट आए हैं और अब उनके पास कोई काम नहीं है। प्रवासी श्रमिक पढ़े लिखे नहीं होते हैं और वेस्ट इम्फाल (इरेंगबंद से लगभग 55 किलोमीटर दूर) में म्यांग लैंगजिंग के इलाके में विनिर्माण मजदूर के तौर पर काम करते थें उन्हें 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लागू होने के बाद अपनी मज़दूरी छोड़कर लौटना पड़ा। लगभग 45 किमी चलने के बाद वे आधी रात को अपने गांव पहुंचे क्योंकि वहां जाने के लिए गाड़ी की व्यवस्था नहीं थी।

ग़रीब घर से संबंध रखने वाले एक अन्य प्रवासी श्रमिक लॉकडाउन की घोषणा के बाद अपने कार्यस्थल से जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अब काम करने और आमदनी का मौका भी गंवा दिया है।

इस गांव में कोई बैंक या एटीएम नहीं है और बैंक की सुविधा या एटीएम यहां से तीन किलोमीटर दूर काकचिंग शहर में है। सभी लोगों ने कहा कि चूंकि उन्हें लॉकडाउन के दौरान घर में रहने का निर्देश दिया गया है और इस पर निगरानी रखने के लिए अक्सर पुलिस गश्त होती है ऐसे में किसी ने भी गांव छोड़ने का जोखिम नहीं उठाया है। एक महिला ने चिट फंड से अपना हिस्सा प्राप्त करने के बारे में बताया था जिसमें उन्होंने लॉकडाउन लागू होने से कुछ दिन पहले पैसा निवेश किया था। इससे उन्होंने घर के लिए ज़रुरी चीजों को खरीदा और पैसे निकालने के लिए बाहर जाने से बचा लिया।

दूसरे व्यक्ति ने बताया कि बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों तक जाने में होने वाली परेशानी ने उन्हें प्रभावित किया है: दो लोगों ने 5 जनवरी 2020 को अपने जन धन खातों में पांच पांच सौ रुपये प्राप्त किए हैं लेकिन वे अभी तक इस रक़म को निकाल नहीं पाए हैं।

इस गांव में आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो गई है। लॉकडाउन लागू होने के बाद चना दाल की क़ीमत दोगुना बढ़कर 80 रुपये प्रति किलो हो गया है; लॉकडाउन से पहले आलू की क़ीमत 24 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलो हो गई है; सरसों तेल की क़ीमत लॉकडाउन से पहले 100 रुपये प्रति लीटर थी जो बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर हो गई है।

आपूर्ति की कमी और आवश्यक चीज़ों की क़ीमतों में तेज़ी से वृद्धि ने ग्रामीणों को मुश्किल में डाल दिया है। गांव के बाज़ार में केवल कुछ ही खुदरा दुकानें हैं और सामान्य दिनों में काकचिंग शहर से यहां आने वाली ज़रुरी चीज़ों को लोग हासिल कर पाए हैं लेकिन फिलहाल यह संभव नहीं है।

इस स्थिति से निपटने के लिए गांव के कुछ लोग काफ़ी कम क़ीमतों पर आवश्यक वस्तुओं (चावल के अलावा) के वितरण की व्यवस्था करने के लिए आगे आए हैं। लोगों के इस व्यक्तिगत पहल के चलते आलू 30 रुपये प्रति किलो, प्याज़ 45 रुपये प्रति किलो, सूखा मटर 60 रुपये प्रति किलो और दाल 65 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहे हैं।

दूसरी पहल के तौर पर एक स्थानीय क्लब द्वारा इस गांव में लगभग 100 कमज़ोर परिवारों की पहचान की गई है और उनको आवश्यक चीजों की मदद की गई है। एक निर्वाचित वार्ड सदस्य ने लगभग 30 विधवा परिवारों की पहचान की है और उनमें से प्रत्येक को 5 किलो चावल, एक किलो आलू और आधा लिटर तेल वितरित किया है। भू-स्वामी परिवार की एक महिला ने कहा कि उनके परिवार ने वार्ड सदस्य द्वारा पहचान किए गए 30 कमज़ोर परिवारों को खुद किए गए उत्पादन में से 4 किलो चावल, आधा किलो दाल और 250 एमएल सरसों तेल वितरित किया है। उनके अनुसार, इस गांव में आवश्यक खाद्य पदार्थों की सीमित आपूर्ति इस समुदाय के लिए बड़ी चुनौती है।

सभी लोगों ने घर में उगने वाली सब्जियों और कंदों के महत्व का उल्लेख किया। जिन परिवारों ने पहले जरूरी सामान खरीद लिया था और जिनके घर में सब्जियां होती हैं, वे अपने पड़ोसियों को इसे देते हैं। इलाके में कमज़ोर परिवारों को पहचानने और उन्हें मदद पहुंचाने का एक सक्रिय प्रयास जारी है।

इरेंगबंद गांव में छोटे पैमाने पर दुग्ध उत्पादकों की एक बड़ी संख्या है जिन्हें अब अपने दुग्ध बेचने के लिए बाज़ारों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। आमतौर पर गांव से थोक विक्रेताओं द्वारा दुग्ध एकत्र किया जाता था जो इसे काकचिंग में बेचते थे। एक पशुपालक ने कहा कि वह थोक खरीदारों को 30 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से प्रतिदिन ढाई से तीन लीटर दूध बेचते थे।

अब थोक विक्रेताओं से बेचे जाने वाले दुग्ध की बिक्री पूरी तरह से बंद हो गई है और अब रिश्तेदारों और पड़ोसियों को दुग्ध दिया जा रहा है। दुग्ध की बिक्री से होने वाली नियमित छोटी कमाई जो दुग्ध उत्पादकों को मिलती थी वह अब बंद हो गई है।

बुनाई का काम एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है जो इस गांव की महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस गांव में दो तरह के बुनकर हैं। एक तरह के बुनकर ठेकेदारों से कच्चा माल प्राप्त करते हैं जो फिर बुने हुए कपड़े को इकट्ठा करते हैं और किए गए काम के लिए मज़दूरी का भुगतान करते हैं। इन बुनकरों ने लॉकडाउन के दौरान धीरे धीरे अपना काम जारी रखा है। दूसरे प्रकार के बुनकर छोटे और स्वतंत्र बुनकर हैं जो स्वयं कच्चे माल की ख़रीदारी करते हैं और अपने उत्पादों को स्वयं बेचते हैं। इन स्वतंत्र बुनकरों को अब कच्चे माल की ख़रीद के साथ-साथ अपने उत्पादों की बिक्री के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

एक बुनकर ने बताया कि उनके पास छह तैयार आइटम हैं और प्रत्येक आइटम की क़ीमत 1,000 रुपये है लेकिन लॉकडाउन के चलते उसे बेच नहीं सकते है। इसी तरह अपने घर में फर्नीचर की दुकान चलाने वाले एक बढ़ई ने कहा कि वह कच्चे माल की कमी के कारण पहले से लिए गए काम के ऑर्डर को पूरा करने में असमर्थ थे।

मौजूदा संकट ने इस गांव के छोटे व्यवसायों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। मणिपुर के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अप्रैल 2020 में राज्य के सभी घरों में प्रत्येक व्यक्ति को 5 किलो चावल वितरित किए गए। हालांकि, स्थानीय श्रोतों के अनुसार, 5 किलो चावल का वितरण केवल मतदाता सूची में मौजूद लोगों तक ही सीमित है। साथ ही, 18 वर्ष से कम उम्र के किसी को भी ये लाभ प्राप्त करने से दूर रखा गया।

15 सदस्यों वाले परिवार के एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें इसके तहत केवल 40 किलो चावल प्राप्त हुआ है, जो कि उनकी आवश्यकता से बहुत कम है। केवल मतदाता सूची में मौजूद लोगों को चावल वितरण करने के चलते प्रवासी श्रमिक और उनके परिवार इस लाभ को प्राप्त करने से पूरी तरह वंचित हो गए हैं।

COVID-19 महामारी के कारण लगा प्रतिबंध कृषि में लगे लोगों पर गंभीर रुप से असर डालेगा। धान की खेती के लिए भूमि की तैयारी मई में शुरू होने वाली है और खेती करने वालों में डर है कि खरीफ की फसल में देरी होगी। भूमिहीन और शारीरिक श्रम पर निर्भर परिवार सबसे कमज़ोर हैं जिनके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है। इस विकट समय में इन परिवारों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

[10 परिवारों के सदस्यों के साथ साक्षात्कार 30 मार्च से 9 अप्रैल 2020 के बीच टेलिफोन पर लिया गया ताकि गांव की मौजूदा परिस्थितियों के बारे में जानकारी जुटाई जा सके। जिन 10 परिवारों से संपर्क किया गया उनमें से चार परिवारों के पास कृषि भूमि है जबकि पांच परिवार पट्टे पर दिए गए भूमि पर कृषि करते हैं जबकि शेष परिवार पूरी तरह से कैजुअल शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं। इन लोगों में किसान, प्रवासी श्रमिक, बुनकर, बढ़ई, पशुपालक, कंस्ट्रक्शन श्रमिक और पेंशन लाभार्थी शामिल हैं।]

लेखक नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में रिसर्च स्कॉलर हैं।

मूल रुप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख को यहाँ पढ़ा जा सकता है।

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