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कोविड-19 से निपटने के लिए दिल्ली के अस्पताल कितने तैयार?
दिल्ली के ज़्यादातर सरकारी अस्पताल पीपीई, वेंटिलेटर, आईसीयू की कमी की वजह से केसों में संभावित बढ़ोतरी को संभालने की स्थित में नहीं हैं। यह चिकित्सा कर्मियों और रोगियों की जान के लिए बड़े ख़तरे की घंटी है।
तारिक़ अनवर
28 Mar 2020
Translated by महेश कुमार
Corona Virus
Image Courtesy: AP

नई दिल्ली: चूंकि भारत अनौपचारिक रूप से कोविड-19 महामारी के प्रसार (सामुदाय के भीतर संचरण) के मामले में तीसरे चरण में पहुँच गया है, इसकी रोकथाम के लिए देश भर में 21 दिन की तालाबंदी और कुछ राज्यों में कर्फ्यू लगाना कुछ ऐसे क़दम हैं जिसके तहत वायरस के संक्रमण को रोकने की कोशिश जारी है।

लेकिन, जहां तक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का सवाल है, सरकारें (केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारें भी- केवल कुछ को छोड़कर) घातक वायरस से संक्रमित लोगों की बढ़ती संख्या (जो अब 700 से अधिक हो गई है) से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं।

डॉक्टरों, पैरामेडिक्स और सफ़ाई कर्मियों को सुरक्षात्मक गियर या किट की बेढंगी आपूर्ति, अस्पतालों में सुरक्षित और साफ सुथरे आइसोलेशन वार्डों को तैयार न करने, उचित क्वारंटाईन  व्यवस्था का न होना, परीक्षण किटों की कम आपूर्ति, वेंटिलेटर की खरीद आदि में कमी की शिकायतें आम हैं।

आइए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ अस्पतालों की दुख भरी दास्तान पर एक नज़र डालें। दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दिल्ली के कई प्रमुख अस्पताल, जैसे कि लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल या एलएनजेपी अस्पताल, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज द्वारा संचालित अस्पताल और केंद्र सरकार द्वारा संचालित डॉ॰ राम मनोहर लोहिया अस्पताल या आरएमएल अस्पताल, क्रमशः चल रहे हैं। इन सब में पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) की कमी है- जिस किट में दस्ताने, एप्रन, लंबी आस्तीन वाले गाउन, गॉगल्स, द्रव प्रतिरोधक सर्जिकल मास्क, फेस विज़र्स और सांस लेने वाले मास्क की कमी शामिल है।

अस्पतालों में वेंटिलेटर की संख्या अपर्याप्त है, जो गंभीर रूप से बीमार रोगियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। कोविड-19 संक्रमित रोगी आमतौर पर सांस की बीमारी  का सामना करते हैं और इस उपकरण से कृत्रिम सांस देने में मदद मिलती है खासकर तब जब फेफड़े स्वाभाविक रूप से काम करने में विफल हो जाते हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने एक हालिया रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि लगभग 5 प्रतिशत नोवेल कोरोना वायरस रोगियों को गहन चिकित्सा देखभाल की जरूरत होगी और उनमें से आधे को यांत्रिक वेंटिलेशन की आवश्यकता होगी।

शहर के अधिकांश अस्पतालों ने अपनी चिकित्सा और शल्य चिकित्सा वार्डों को अस्थायी रूप से आइसोलेशन वार्डों में बदल दिया है, तय सर्जरी को आगे बढ़ा दिया है, आपातकालीन रोगियों को छोड़, बाहरी रोगी विभाग (ओपीडी) सेवाओं को बंद कर दिया है और मरीजों का दाखिला भी बंद कर दिया है

बुनियादी पीपीई की कमी

इन अस्पतालों में ड्यूटी दे रहे कुछ डॉक्टरों ने शिकायत की है कि व्यवस्था ठीक नहीं है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह संकट को संभालने में सक्षम नहीं होगी।

"पीपीई के बारे में तो भूल जाओ, दिल्ली सरकार ने अब तक अपने डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मचारियों और गार्डों को एन-95 मास्क तक उपलब्ध नहीं कराए हैं जो संदिग्ध केसों के नमूनों को जांचने, जांच करने और उनके अपशिष्ट पदार्थों के संपर्क में आ सकते हैं।" उक्त बातें एलएनजेपी अस्पताल के एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर न्यूज़क्लिक को बताईं।

डॉक्टर ने कहा कि स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों को हालत की मांग के हिसाब से सर्जिकल मास्क उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन उन्हें पीपीई और एन-95 मास्क भी दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा, “गर्भवती महिलाओं में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। सभी अस्पतालों में पीपीई, एन-95 मास्क, दस्ताने और वेंटिलेटर की आपूर्ति अपर्याप्त है। डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों के अनुसार, आपातकालीन सेवाओं में लगे सभी डॉक्टरों, नर्सों, स्वच्छता कर्मचारियों और गार्डों को पीपीई दिया जाना चाहिए, इस तथ्य के बावजूद कि वे कोरोनोवायरस संक्रमित रोगियों के साथ काम कर रहे है या नहीं, क्योंकि आप सभी रोगियों के मेडिकल इतिहास के बारे में नहीं जानते हैं। आपको सभी को कोरोना पॉजिटिव समझना होगा, जब तक कि यह साबित न हो जाए।”

अस्पताल की तैयारी के बारे में पूछे जाने पर, उनका सिर्फ यही कहना था, कि "ऐसी कोई तैयारी नहीं है।"

उसी अस्पताल के एक अन्य डॉक्टर ने कहा कि सर्जरी रद्द करना और सर्जरी वार्डों को आइसोलेशन और कोविड वार्डों में बदलना कोई बेहतर विचार नहीं है।

डॉक्टर ने कहा, “हम संभावित तबाही से निपटने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। हमारे पास नई गहन चिकित्सा इकाइयाँ (ICUs) नहीं हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मौजूदा आईसीयू की संख्या नियमित रोगियों को इलाज़ देने में ही अपर्याप्त है, किसी भी महामारी से निपटने के बारे में तो आप भूल जाओ। नए वेंटिलेटर रातों रात नहीं खरीदे जा सकते। आईसीयू में उपलब्ध कई वेंटिलेटर काम नहीं कर रहे हैं। हमने प्रमुख अस्पतालों में टेक्नीशियन होने के बावजूद एमआरआई की समस्याओं को ठीक नहीं किया है, यही वजह है कि हमारे अस्पतालों में लंबी कतारें लगी रहती हैं।”

डॉक्टर ने कहा कि “एमआरआई मशीनों की खरीद के बजाय, सरकार शॉर्ट-कट रास्ता लेकर आई है। अब सरकार मरीजों को निजी अस्पतालों या जांच केन्द्रों से एमआरआई और अन्य जांच कराने के लिए कह रहे है, यह कहते हुए कि सरकार इसका खर्च उठाएगी। यही वजह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं होता है। हमारे अस्पतालों में सब कुछ होना चाहिए। यदि कोई उपकरण खराब हो है, तो उसे ठीक करवाएँ या उसे बदलवाएँ।"

अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में एक नेत्रहीन डॉक्टर ने कहा, “सरकार क्वारंटाईन के बारे में बात कर रही है, लेकिन अगर आपको असलियत जाननी है तो एलएनजेपी के लेबर रूम में जाएँ। आपको तैयारियों का एहसास हो जाएगा। हम सभी लोग डरे हुए हैं। हम ऐसे माहौल में मरीजों का इलाज नहीं कर सकते। यह वह जगह है जो संक्रमण के भयंकर ज़ोखिम का सामना करती है क्योंकि हम संक्रमित रोगियों के सीधे संपर्क में रहते हैं। सरकार केवल स्वास्थ्य कर्मियों के मामले में गाल बजाही का काम करने के अलावा कुछ नहीं कर रही है।”

डॉक्टर ने कहा कि संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लोगों को घर में रहने के लिए कहना बेहद ज़रूरी है, लेकिन सच तो यह है कि "देश में स्वास्थ्य सेवा का कोई बुनियादी ढांचा नहीं है और सरकार यह बात अच्छी तरह से जानती है।"

हालांकि सरकार दावा कर रही है कि उसके अस्पताल अच्छी तरह से तैयार हैं और कोविड़ के लिए समर्पित आइसोलेशन और क्वारंटाईन वार्ड हैं, लेकिन इन वार्डों में तैनात डॉक्टरों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए कि कई अस्पतालों में जांच किट और सुरक्षा गियर की कमी है और इसलिए मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। बहुत कम अस्पताल हैं जिन्हौने असलियत में मरीजों की जांच शुरू की है जबकि कुछ ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए उन्हें टाल दिया है।

एक डॉक्टर, जो एलएनजेपी में कोविड़ वार्ड में नियुक्त हैं उन्होंने बताया, “अभी कई अस्पतालों में जांच उपलब्ध नहीं हैं। यहां (एलएनजेपी में) हमने कल (26 मार्च) से जांच शुरू की है। अब चूंकि आरएमएल अस्पताल में जांच किटों की कमी है, वहाँ जांच बंद हो गई है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों ने भी हाल ही में जांच शुरू कर दी है, लेकिन हमें इस बात का यकीन नहीं है कि वे कितने समय चलेंगी, क्योंकि किट आपूर्ति सीमित है।”

आइसोलेशन वार्ड वास्तव में अलग नहीं हैं

डॉक्टर ने आरोप लगाया कि कई अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड इतने अलग-थलग नहीं हैं। कई अस्पतालों ने ऐसे वार्डों के लिए एक या दो मंजिल समर्पित कर दी हैं, लेकिन सभी रोगियों के लिए रास्ता आम हैं।

उन्होंने कहा, “सभी संदिग्ध मरीजों को पहले आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया जाता है। जब वे पॉज़िटिव पाए जाते हैं, तो उन्हें आइसोलेशन वार्ड में भेज दिया जाता है। इससे उन सभी को संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है जो मरीज नेगटिव पाए गए हैं। आदर्श रूप से तो सभी संदिग्ध मरीजों के लिए अलग से आपातकालीन वार्ड और आइसोलेशन वार्ड होना चाहिए और वे वार्ड पूरी तरह से सुरक्षा को समर्पित होने चाहिए। इन्हें अन्य वार्डों से पूरी तरह अलग किया जाना जाना चाहिए।”

डॉक्टर ने सुरक्षा किट की कमी के बारे में भी शिकायत की

"सभी डॉक्टर जो कोविड-19 संक्रमित रोगियों का इलाज कर रहे हैं, उन्हें हज़मत सूट (जो ख़तरनाक पदार्थ/सामग्री से बचाव करने वाला सूट है)। इसकी आपूर्ति भी बहुत सीमित है। पीपीई उन डॉक्टरों के लिए उपयुक्त नहीं है जो संक्रमित रोगियों के सीधे संपर्क में रहते हैं, लेकिन हमारे पास अपने जीवन को खतरे में डालकर मरीजों का इलाज करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। हमारा मनोबल बढ़ाने के बजाय, अगर हम अपनी आवाज उठाते हैं तो हमें धमकाया जाता है।”

डॉक्टर ने ड्यूटी रोस्टरों में विसंगतियों का भी आरोप लगाया, यह कहते हुए कि "वरिष्ठ डॉक्टर जो रोस्टर बनाते हैं, उसामने वे जूनियर डॉक्टरों को नियुक्त कर रहे हैं।"

अन्य अस्पतालों में भी स्थिति बहुत अधिक ऐसी ही है। डॉक्टरों पर काम का भार अब्ध गया हैं क्योंकि कोई नई नियुक्ति नहीं की गई है।

आरएमएल अस्पताल के दो डॉक्टरों ने मिलकर कहा, “हम इस घातक बीमारी के संभावित प्रकोप से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। हमारे पास जांच किट की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है। आइसोलेशन और क्वारंटाईन वार्ड सिर्फ एक दिखावा है। मीडिया में जो कुछ कहा और बताया जा रहा है, उससे वास्तविकता बहुत दूर है। सभी डॉक्टरों को अपने जीवन का जोखिम सता रहा है। हमारे पास बुनियादी सुरक्षा गियर की कमी है, उन्नत सुरक्षा उपकरण का मिलना तो आप भूल जाइये। अस्पताल में सीमित संख्या में वेंटिलेटर और आईसीयू हैं। संक्षेप में, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। इसलिए, हम लोगों से हाथ जोड़कर अपील कर रहे हैं कि अगर आप हमारी सुरक्षा चाहते हैं तो घरों के अंदर रहें।”

 'डॉकटरों के साथ पुलिस का ख़राब रवैया’

कई डॉक्टर जिन्होंने न्यूज़क्लिक से बात की उन्होंने पुलिस व्यवहार के बारे में काफ़ी चिंताजनक बातें कहीं। उन्होंने बताया, “लोगों को पीटना और अपनी ताक़त का इज़हार करना समय मददगार नहीं हो सकता है। जो लोग घर से बाहर आते हैं, उन्हें शिक्षित करना और उनके साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए। विडंबना यह है कि लोगों की छोड़ो पुलिस डॉक्टरों को भी नहीं बख्श रही है।”

एलएचएमसी और एलएनजेपी अस्पतालों में कम से कम दो डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि जब वे ड्यूटी पर जा रहे थे तो पुलिस ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। डॉक्टर ने कहा, “चूंकि एलएनजेपी मेरे निवास के करीब है, मैं अपने वाहन का उपयोग नहीं करता हूँ। मैं सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करता हूं। एक दिन पहले, मैं एक रिक्शा में अस्पताल जा रहा था। मुझे एक चेक प्वाइंट पर आगे बढ़ने से रोक दिया गया। अपनी पहचान बताने के बाद भी दूसरे चेक प्वाइंट पर एक पुलिसकर्मी ने मुझे गालियाँ दीं। मैंने उसे अपना पहचान पत्र दिखाया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ और मुझसे कहता रहा कि ‘तू आगे नहीं जा सकता है'। जब उनके वरिष्ठ अधिकारी ने आकर मेरा आईडी कार्ड चेक किया, तो उन्होंने मुझे जाने की अनुमति दी। तीसरे चेक प्वाइंट पर भी यही हुआ। पुलिस का बर्ताव डॉक्टरों के साथ निंदनीय है।”

केवल सफदरजंग अस्पताल ही ऐसा अस्पताल है जहां कई कोरोना वायरस रोगियों को भर्ती किया गया है, जो लगता है कि बेहतर ढंग से तैयार किया गया है। अस्पताल के सुपर-स्पेशियलिटी ब्लॉक में एक विशेष जगह बनाई गई है। इमारत में आठ मंजिल हैं और उसकी तीसरी और चौथी मंजिल को विशेष रूप से कोविड़-19 रोगियों के लिए रखा गया है।

सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक, डॉ॰ बलविंदर सिंह के अनुसार, मरीजों के लिए 75 बेड लगा दिए गए हैं और आपात स्थिति में अस्पताल इसे 90 तक बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के रोगियों के लिए नौ बेड आईसीयू में भी रखे गए हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का महत्व

पेशे से वकील अशोक अग्रवाल, जो ग़रीबों के लिए बेहतर स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अपनी मुहिम चलाने के लिए जाने जाते हैं, ने कोरोना वायरस से लड़ने की तैयारियों के संबंध में किए जा रहे लंबे दावों को बकवास क़रार दिया है।

उन्होंने कहा, “इससे निपटने की कोई तैयारी नहीं है। दिल्ली सरकार रोगियों को नियमित स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने तक में असमर्थ है। उनके अस्पतालों में आईसीयू की संख्या अपर्याप्त है। सभी ओपीडी को बंद कर दिया गया है। जिन मरीजों को चिकित्सा की आवश्यकता है, उन्हें कोरोना के नाम से बाहर किया जा रहा है।”

उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल राज्य सरकार को अपने 33 अस्पतालों में आईसीयू बेड में 3 प्रतिशत से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने का निर्देश दिया था। उन्होंने उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका का जिक्र कराते हुए और उसके बारे में सरकार द्वारा दायर एक हलफनामे का जिक्र करते हुए कहा, “लेकिन इस आदेश का पालन कभी नहीं किया गया। मोहल्ला क्लीनिक के तमाशे को छोड़कर, कुछ भी पर्याप्त नहीं है। निजी अस्पतालों में आईसीयू बेड 10 प्रतिशत से 38 प्रतिशत के बीच है। दिल्ली सरकार के अस्पतालों में कुल 10,000 बेड हैं, जिनमें केवल 400 वेंटिलेटर से सुसज्जित बिस्तर आईसीयू में हैं। इनमें से 52 वेंटिलेटर काम नहीं कर रहे हैं। प्रत्येक वेंटिलेटर पर हर वर्ष हरेक अस्पताल में 10-15 रोगियों की संख्या बढ़ रही है।”

वेंटिलेटर की संख्या बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि 15 सरकारी अस्पतालों ने 63 वेंटिलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

अग्रवाल ने कहा कि राज्य भर में कमोबेश यही स्थिति है।  कुछ अस्पतालों को छोड़कर, यह अकमी मुख्यत स्वास्थ्य सेवा के मामले में के ना होने से है। 

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य को कभी मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया। इसे अब तक समवर्ती सूची में नहीं डाला गया है। इसके लिए एक राष्ट्रीय क़ानून की ज़रूरत है या थी। स्वास्थ्य सेवा पर नीति के मसौदा में, सरकार ने वादा किया था कि स्वास्थ्य को शिक्षा के अधिकार जैसी समवर्ती सूची में शामिल किया जाएगा। लेकिन अंतिम मसौदे में, इस प्रस्ताव को छोड़ दिया गया है। जब तक सरकार स्वास्थ्य सेवा को मौलिक अधिकार घोषित नहीं करती, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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