NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोविड-19: लेबर संकट ने पंजाब के ग्रामीण भाईचारे को किया तार-तार!
पंजाब के गांवों के धनी किसानों के इशारों पर पंचायतें प्रस्ताव पास करके मज़दूरों की दिहाड़ी का रेट निश्चित कर रही हैं। साथ ही प्रस्तावों में यह भी कहा गया है कि गांव का मज़दूर किसी दूसरे गांव में जाकर मज़दूरी नहीं कर सकता।
शिव इंदर सिंह
23 May 2020
पंजाब के ग्रामीण
फोटो : सविंद्र सिंह

कोरोना वायरस के कारण पंजाब के गांवों में आया लेबर संकट अब भाईचारिक सांझ को खत्म करने लगा है। गांवों में अपने आप को चौधरी मानने वाले ऐसे हालातों का फायदा उठाकर लोगों में दरार डालने में लगे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पंजाब से करीब 11 लाख प्रवासी मजदूर पलायन कर रहे हैं। करीब 6 लाख मजदूर तो केवल लुधियाना से ही हैं। वैसाखी के मौके पर दूसरे राज्यों से पंजाब आने वाले लेबर भी अबकी बार नहीं पहुंच सके हैं। ऐसे में धान के सीज़न में पंजाब के किसानों की निर्भरता क्षेत्रीय मजदूरों पर ही रह गई है।

इन हालातों में गांवों के धनी किसानों के इशारों पर पंचायतें प्रस्ताव पास करके मज़दूरों की दिहाड़ी का रेट निश्चित कर रही हैं। साथ ही प्रस्तावों में यह भी कहा गया है कि गांव का मज़दूर किसी दूसरे गांव में जाकर मजदूरी नहीं कर सकता। प्रस्तावों को न मानने वाले मज़दूरों व किसानों का बहिष्कार करने व बड़ा जुर्माना लगाने की धमकियां दी जा रही हैं।

मज़दूर भाईचारे ने भी अंदर ही अंदर अपनी लामबंदी शुरू कर दी है। किसानों को डर है कि कहीं स्थानीय मज़दूर अपना रेट प्रति एकड़ न बढ़ा दें। ठेके पर जमीनें लेने वाले किसान मुकरने लगे है। इसी तरह किसानों के बीच भी एक नई लकीर खड़ी होने लगी है। किसान-मज़दूर संगठन इस मामले को लेकर गंभीर हैं, वे किसी भी सूरत में कोई दरार नहीं देखना चाहते।

जिला मुक्तसर के ब्लॉक गिदड़बाहा ने इस मामले की शुरुआत की है, अब समूचे मालवा क्षेत्र में ही इस तरह का माहौल बनने लगा है। मलौट तहसील के गांव माहूआणा में पंचायत समूह ने गांव में जमीन का ठेका निश्चित कर दिया है। जिला बठिंडा के गांव जीदा की पंचायत ने लेबर का रेट प्रति एकड़ 3000 रुपये से 3200 रुपये तक तय किया है। जो इसका पालन नहीं करेगा उसे 10,000 रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा।

बठिंडा के ही गांव गुरुसर भगता ने प्रति एकड़ धान की रोपाई का रेट 3000 रुपये निश्चित किया है। इसी तरह जिला मोगा के गांव रनीके ने ठेके का रेट फ़िक्स कर दिया है। जिला मानसा के गांव भैनी बाघा में प्रस्ताव पास किया गया है कि ठेके की अदायगी दो किश्तों में करनी है जबकि पहले यह एक ही किश्त में होती थी। इसी गांव में मज़दूरी का रेट 3200 रुपये तय किया गया है। जिला बरनाला के दर्जनों गांवों में आपसी कड़वाहट बढ़ने लगी है। इसी जिला के गांव चीमा की पंचायत ने तो जुर्माने की रकम 1 लाख रख दी है।

आपको बता दें कि पहले ये रेट अलग अलग इलाके के लिए अलग अलग था। जैसे लुधियाना के आसपास 3200 रुपये प्रति एकड़ तो बरनाला में 3500 रुपये प्रति एकड़ था। लेकिन इस बार न सिर्फ 200 से 300 रुपये कम रेट फिक्स किया गया है बल्कि मजदूरों की मोलभाव करने की ताकत को भी खत्म किया गया है। यही कारण है कि मजदूर इस व्यवस्था से नाराज हैं।

भारतीय किसान यूनियन (उगराहां), पटियाला ने गांव गज्जूमाजरा में जिला स्तरीय मीटिंग करके किसानों-मजदूरों को संयम बरतने के लिए कहा है। यूनियन के जिला प्रधान मनजीत सिंह नियाल ने कहा है कि लेबर का संकट अल्पकालिक है पर लकीरें गहरी होने का डर है जो कि आने वाले समय के लिए खतरनाक संकेत है।

भारतीय किसान यूनियन (क्रांतिकारी) के राज्य प्रधान सुरजीत सिंह फूल व जनरल सैक्रेटरी बलदेव सिंह ज़ीरा ने मांग रखी है कि सरकार सहकारी सभाओं के जरिए धान की रोपाई के लिए मशीनों का प्रबंध करे। उन्होंने कहा कि वे किसी भी हाल में गांवों के स्वयं घोषित चौधरियों की चलने नहीं देंगे।

दोआबा क्षेत्र की गन्ना बेल्ट में अभी यह संकट नहीं उभरा है लेकिन किसान-मज़दूर नेताओं का कहना है कि आने वाले दिनों में यह क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है। मालवा क्षेत्र में तो अफवाहों का बाजार भी गर्म है। मालवा के एक गांव जेठूके में तो अफवाहों के कारण किसानों व मज़दूरों के दो गुटों में टकराव होते होते बचा।

इसी इलाके के गांव असपाल कलां व झल्लूर में भी इस तरह के मज़दूर विरोधी प्रस्ताव पास किए गए हैं। जिला संगरूर के गांव लाडबनजारा व कौहरीआ से भी इस तरह की ख़बरें मिल रही हैं। कानून विशेषज्ञ कहते हैं कि पंचायतों द्वारा पारित किए गए ऐसे प्रस्ताव गैर-कानूनी हैं। बेशक यह अल्पकालिक सामाजिक संकट है पर यह जांत-पांत की दीवार को और मज़बूत करेगा।

जिला लुधियाना के एक किसान सतवंत सिंह का कहना है, “पिछले साल मैंने अपनी ज़मीन 50,000 रुपये एकड़ के हिसाब से ठेके पर दी थी पर अब लगता है कि अगर 45,000 रुपये में दी जाए तो मैं शुक्र मनाऊंगा।” लुधियाना के ही गांव हलवारा के खेत मज़दूर झण्डा सिंह का कहना है, “धनी किसान पंचायतों के द्वारा प्रस्ताव पास करके गरीबों की रोजी रोटी पर लात मार रहे हैं, सरकारों को इस मामले में हमारी मदद करनी चाहिए, नहीं तो हमारे परिवार भूखे मर जाएंगें।”

एक अनुमान के मुताबिक पंजाब में 15 लाख के करीब खेती मज़दूर हैं। पंजाब खेत मज़दूर यूनियन के राज्य जनरल सैक्रेटरी लछमन सिंह सेवेवाला का कहना है कि वे न तो दबाव के पक्ष में हैं और न ही काला बाजारी के हक में हैं। लेबर के संकट कारण जो सामाजिक संकट उभरा है उसे संयम के साथ हल करने की जरूरत है। दोनों पक्षों के हित सांझे हैं व मुश्किलें एक हैं।
उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष गांवों के स्वयं घोषित चौधरियों की चालों को समझें।

वामपंथी नेता कॉमरेड सुखदर्शन सिंह नट्ट का कहना है कि मज़दूरी की दर आर्थिकता के मांग व पूर्ति के सिद्धांत अनुसार अपने आप तय होती है। यानी अगर काम अधिक है और श्रमिक कम हैं तो मज़दूरी का रेट बढ़ता है उसी तरह अगर काम कम व वर्कर अधिक हैं तो मज़दूरी की दर नीचे चली जाती है। पंचायतों ने जब मज़दूरी के न्यूनतम रेट बारे कभी कोई प्रस्ताव पास नहीं किया तो उन्हें अब मजदूरी का अधिकतम रेट तय करने का भी कोई अधिकार नहीं है। किसान हर साल धान लगाने के लिए दूर-दूर से सस्ते दाम पर मज़दूरों को बुलाते हैं उस समय पंचायतें कुछ नहीं बोलीं तो अब जब मज़दूर चार पैसे ज्यादा कमाने के लिए दूसरे गांवों में जा रहे हैं तो ये पंचायतें प्रस्ताव पास करने लगीं हैं, जोकि सरासर गैर-कानूनी हैं।

कोरोना महामारी के चलते पंजाब के गांवों से लगातार इस तरह की ख़बरें आ रही हैं, जिससे पता लगता है कि लोगों के बीच आपसी सद्भावना टूटी है। पंजाब में कोविड-19 से शहीद भगत सिंह नगर के जब बलदेव सिंह की पहली मौत हुई उस समय पंजाब के एक खास तबके ने प्रवासी भारतीयों को दोषी ठहराया, राज्य के कई गांवों में एनआरआईज़ के साथ बुरा बर्ताव किया गया।

महीना भर पहले जब गांवों में स्वयं की सुरक्षा के लिए ठीकरी पहरे लगते थे उस समय भी लोगों में मनमुटाव की खबरें मिलती रहीं। गांवों के लोग शिकायत करते थे कि नाकों पर खड़े नौजवानों ने नाकों को सुरक्षा की बजाय रौब का अड्डा बना लिया था।

कोरोना वायरस के नाम पर जिस तरह देशभर में जानबूझकर मुस्लिम भाईचारे को बदनाम किया गया इसकी कीमत हिन्दू बाहुल्य व भाजपा प्रभाव वाले होशियारपुर जिला की तलवाड़ा तहसील के गुर्जर मुसमानों को भी चुकानी पड़ी।

सोशल मीडिया पर फैलाई जा रहीं अफवाहों के मद्देनज़र गांवों के लोगों ने गुर्जर मुसलमानों से दूध लेना बंद कर दिया था। हुजूर साहब से श्रद्धालुओं के वापिस लौटने के बाद जैसे ही पंजाब में कोरोना के केस बढ़े तो कई गांव में श्रद्धालुओं का बायकॉट किया गया।

इस पूरे घटनाक्रम बारे पंजाब के नामवर समाजशास्त्री प्रोफेसर बावा सिंह का कहना है, “कोरोना महामारी के चलते गांवों के लोगों में जो दरारें आई हैं वे जागरूकता की कमी व सरकारों की नालायकी के कारण पनपी हैं पर मौजूदा समय जो लेबर के संकट कारण गांवों में आपसी भाईचारिक सांझ टूट रही है वह और भी खतरनाक बात है। लोगों का समझना चाहिए कि महामारी व लेबर का संकट थोड़े समय की बात है लेकिन लोगों को सारी उम्र इकट्ठे रहना है।”

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

labour crisis
Lockdown
Congress
Rural Punjab
Amrinder Singh

Related Stories

छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय

उत्तराखंड चुनाव: भाजपा एक बार फिर मोदी लहर पर सवार, कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर से उम्मीद

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

किसान संसद: अब देश चलाना चाहती हैं महिला किसान

किसान आज देश की संसद का एजेंडा तय कर रहे हैं, कल देश की राजनीति की तक़दीर तय करेंगे

किसान आंदोलन: सड़क से संसद तक लड़ते किसान

महानगरों में दूसरे लॉकडाउन के बाद बिगड़ी मज़दूरों की हालत


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License