NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कोरोनो वायरस से लड़ने में 'पूंजीवाद' असफल रहा है
हमें इस तरह के ख़तरनाक और अनावश्यक सामाजिक बिखराव को अब दोबारा नहीं झेलना चाहिए।
रिचर्ड डी. वोल्फ़
04 Apr 2020
पूंजीवाद

कोरोना वायरस के ख़तरे को लेकर ढह गई अर्थव्यवस्था में भारी मात्रा में धन झोंकना भयभीत सरकार की हताश नीतियों में शामिल है। आर्थिक नियंत्रण करने वाला वर्ग धन का सृजन करता है और इसे बड़े निगमों और विशेष रूप से बड़े बैंकों को "उन्हें संकट से उबरने के लिए" बेहद कम ब्याज दरों पर उधार देते हैं। सरकारी खजाने ढह गई अर्थव्यवस्था को वापस पाने के लिए बहुत बड़ी रकम उधार देती है, जिसकी वे 'सामान्य' के तौर पर कल्पना करते हैं अर्थात वायरस आने से पहले की अर्थव्यवस्था पाने पर ध्यान केंद्रित करता है। पूंजीवाद के नेता अपने वैचारिक बाधाओं के कारण नीतिगत विफलताओं की तरफ जा रहे हैं।

नीतियों की इस समस्या का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाना था जो वायरस की चपेट में आने से पहले था: साल 2019 तक वैश्विक पूंजीवाद वर्ष 2020 में पतन का खुद एक प्रमुख कारण था। 2000 और 2008-2009 की घटनाओं से पूंजीवाद का जख्म ठीक नहीं हुआ। जिन वर्षों में कम ब्याज दर रहे उन वर्षों ने निगमों और सरकारों को लगभग शून्य ब्याज दर की लागत पर असीमित उधार लेकर उनकी सभी समस्याओं को "हल" करने में सक्षम बनाया था। केंद्रीय बैंकों द्वारा अर्थव्यवस्थाओं में लगाए गए कुल नए पैसे वास्तव में मुद्रास्फीति की आशंका पैदा कर रहे थे, लेकिन मुख्य रूप से शेयर बाज़ारों में इनकी क़ीमतें ख़तरनाक तरीक़े से चक्कर काट रही थी जो मौलिक आर्थिक मूल्यों और वास्तविकताओं से बहुत दूर थी। आय और धन की असमानताएं ऐतिहासिक ऊंचाइयों तक पहुंच गईं।

संक्षेप में, पूंजीवाद ने एक और घटना के लिए असुरक्षा का निर्माण किया था जो संभावित कारण की किसी भी संख्या को उजागर कर सकता था। इस बार ये कारण2000 का डॉट.मेल्टडाउन (इंटरनेट आधारित घटना) या 2008/9 का सब-प्राइम मेल्टडाउन नहीं था; यह एक वायरस था। और निश्चित रूप से, मुख्यधारा की विचारधारा को इस कारण पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, न कि कमजोरियों पर। इस प्रकार मुख्यधारा की नीतियों को इस वायरस के आने से पहले वाले पूंजीवाद को फिर से स्थापित करने का लक्ष्य है। भले ही अगर वह सफल हो जाता है तो वे हमें एक पूंजीवादी व्यवस्था में पहुंचा देगा, जिसकी इकट्ठा हो चुकी कमजोरियां जल्द ही फिर से एक और कारण से ढह जाएंगी।

कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर मैं पूंजीवाद और इसकी कमजोरियों की आलोचना पर ध्यान केंद्रित करता हूं जो इसने कई कारणों से इकट्ठा कर लिया है। वायरस प्रकृति का हिस्सा हैं। इसने मनुष्यों पर हमला किया है और कभी-कभी तो खतरनाक रूप से पहले भी और हाल के इतिहास में हमला किया है। साल 1918 में स्पैनिश फ्लू के चलते संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 7,00,000 लोग मारे गए और अन्य जगहों पर लाखों लोगों की मौत हुई। हाल के वायरस में SARS, MERS और Ebola शामिल हैं। लोगों के स्वास्थ्य के लिए जो मायने रखता है वह प्रत्येक समाज की तैयारी है: इस खतरनाक वायरस से निपटने के लिए बड़ी संख्या में जांच करना, मास्क, वेंटिलेटर, अस्पताल में बिस्तर, प्रशिक्षित कर्मी आदि का होना ज़रुरी है। अमेरिका में, ऐसी वस्तुएं निजी पूंजीवादी उद्यमों द्वारा उत्पादित की जाती हैं जिनका लक्ष्य लाभ कमाना ही है। ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करना और भंडारण करना लाभदायक नहीं था, जो पहले था ही नहीं और अभी भी नहीं किया जा रहा है।

न ही अमेरिकी सरकार ने उन चिकित्सा उत्पादों का उत्पादन किया या भंडारण किया। शीर्ष अमेरिकी सरकारी कर्मचारी निजी पूंजीवाद को विशेषाधिकार देते हैं; सुरक्षा और मजबूती देना उनका प्राथमिक उद्देश्य है। इसका परिणाम यह है कि न तो निजी पूंजीवाद और न ही अमेरिकी सरकार ने लोगों के स्वास्थ्य और उनकी रक्षा करने और ध्यान रखने के लिए किसी भी आर्थिक व्यवस्था का सबसे बुनियादी कर्तव्य निभाया। दिसंबर 2019 से शुरु हुए कोरोनोवायरस महामारी के लिए अमेरिकी पूंजीवाद की स्थिति स्पष्ट है जो बहुत धीमी है। यह विफल हो गई है। यही वह समस्या है।

पूंजीवाद पर ध्यान देने का दूसरा कारण है कि ट्रम्प, जीओपी और अधिकांश डेमोक्रेट द्वारा मौजूदा आर्थिक पतन को लेकर प्रतिक्रियाएं जो पूंजीवाद की किसी भी आलोचना से सावधानीपूर्वक बचते हैं। ये सभी वायरस, चीन, विदेशियों और अन्य नेताओं को लेकर चर्चा करते हैं लेकिन कभी भी ये सभी उस व्यवस्था के बारे में चर्चा नहीं करते जिसमें रहकर वे काम करते हैं। जब ट्रम्प और अन्य नेता अपने और दूसरों के जीवन को खतरे में डालने के बावजूद चर्चों और नौकरियों पर लौटने के लिए दबाव डालते हैं तो ऐसे में वे लोगों की सेहत से पहले एक ढहते हुए पूंजीवाद को पुनर्जीवित करते हैं।

तीसरा कारण पूंजीवाद को यहां दोष ठहराया जाता है कि वैकल्पिक व्यवस्थाएं- जो पहले लाभ वाले तर्क द्वारा संचालित नहीं होती हैं - वायरस को उचित तरीके से निपटा सकती हैं। हालांकि वायरस के चलते महामारी के लिए आवश्यक सभी चीजों का उत्पादन और भंडारण करने के लिए लाभदायक नहीं है, यह प्रभावशाली है। जो धन इस महामारी में पहले से ही गंवा दी गई है उसने जांच और वेंटिलेटर के उत्पादन और स्टॉक करने की लागत को पार कर लिया है, जिसकी कमी आज की आपदा में बहुत सहायक हो रही है। पूंजीवाद अक्सर तत्काल सामाजिक जरूरतों और मूल्यों की कीमत पर लाभ अर्जित करता है। इसमें पूंजीवाद पूरी तरह अप्रभावशाली होता है। यह महामारी अब उस सत्य को लोगों तक पहुंचा रही है।

एक वर्कर-कूप (कर्मचारियों के सहकारी) आधारित अर्थव्यवस्था - जहां श्रमिक लोकतांत्रिक तरीके से उद्यम चलाते हैं, वे ये तय करते हैं कि क्या, कैसे और कहां उत्पादन करना है और किसी भी मुनाफे का क्या करना है - लाभ अर्जित करने से पहले सामाजिक आवश्यकताओं और लक्ष्यों (जैसे महामारी के लिए उचित तैयारी) को तरजीह दे सकते हैं। सभी पूंजीवादी समाजों में श्रमिक बहुसंख्यक होते हैं; इन बहुसंख्यक के अपने हित भी होते हैं। नियोक्ता की हमेशा मामूली संख्या होती है और इनके "विशेष हित" होते हैं। पूरे समाज के जीने या मरने को सुनिश्चित करने के लिए पूंजीवाद उक्त अल्पसंख्यक को पद, लाभ और शक्ति प्रदान करता है। इसीलिए अब सभी कर्मचारी इस बात पर आश्चर्य और चिंता करते हैं कि हमारी नौकरियां, आमदनी, घर और बैंक खाते कितने समय तक टिकेंगे - यदि ये हमारे पास अभी भी हैं। अल्पसंख्यक (नियोक्ता) उन सभी सवालों का फैसला करता है और बहुसंख्यक (कर्मचारियों) को उन निर्णयों को लेने से रोकता है, भले ही उन बहुसंख्यक को उनके निर्णयों के साथ रहना चाहिए।

बेशक, अब सर्वोच्च प्राथमिकता लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को पहले रखना है। इस प्रकार से देश भर के कर्मचारी असुरक्षित नौकरी की स्थिति में काम करने के आदेशों को मानने से इनकार करने के बारे में सोच रहे हैं। अमेरिकी पूंजीवाद ने इस प्रकार आज के सामाजिक एजेंडे पर एक आम हमला किया है। महामारी के सामने पूंजीवाद की विफलता से सीखना दूसरी प्राथमिकता है। हमें इस तरह के खतरनाक और अनावश्यक सामाजिक बिखराव को दोबारा नहीं झेलना चाहिए। इस प्रकार सिस्टम का बदलाव अब आज के सामाजिक एजेंडे पर भी चल रहा है।

रिचर्ड डी. वोल्फ, मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक हैं और न्यू यॉर्क में न्यू स्कूल विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय मामलों में स्नातक कार्यक्रम में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वोल्फ का साप्ताहिक कार्यक्रम "इकोनॉमिक अपडेट" 100 से अधिक रेडियो स्टेशनों द्वारा पेश किया जाता है और फ्री स्पीच टीवी के माध्यम से 55 मिलियन टीवी के दर्शकों तक पहुंचता है। डेमोक्रेसी एट वर्क के पास उनकी दो हालिया पुस्तकें अंडरस्टैंडिंग मार्क्सवाद और अंडरस्टैंडिंग सोशलिज्म उपलब्ध है, दोनों पुस्तकें democracyatwork.info पर उपलब्ध हैं।

इस लेख को इकोनॉमी फ़ॉर ऑल द्वारा पेश किया गया था, जो इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टिट्यूट की एक परियोजना है।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

Capitalism Has Failed in Fighting Coronavirus

capitalism
Capitalism Crisis
Socialism
Coronavirus
COVID 19

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के घटते मामलों के बीच बढ़ रहा ओमिक्रॉन के सब स्ट्रेन BA.4, BA.5 का ख़तरा 

कोरोना अपडेट: देश में ओमिक्रॉन वैरिएंट के सब स्ट्रेन BA.4 और BA.5 का एक-एक मामला सामने आया

कोरोना अपडेट: देश में फिर से हो रही कोरोना के मामले बढ़ोतरी 

कोविड-19 महामारी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में दुनिया का नज़रिया नहीं बदल पाई

कोरोना अपडेट: अभी नहीं चौथी लहर की संभावना, फिर भी सावधानी बरतने की ज़रूरत

कोरोना अपडेट: दुनियाभर के कई देशों में अब भी क़हर बरपा रहा कोरोना 

कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब पहुंची 

देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, PM मोदी आज मुख्यमंत्रियों संग लेंगे बैठक


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा
    08 Feb 2022
    आज हम डॉ. सत्यजीत के साथ कोविड -19 के टीके का उत्पादन के बारे में बात करेंगे, टीके के निर्यात को ले के दुनिया के अलग- अलग देशों और उनके कंपनियों की नीतियों को भी समझेंगे और इन टीकों से जो बड़ा…
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : रुद्रप्रयाग में दस साल पहले प्रस्तावित सैनिक स्कूल अभी तक नहीं बना, ज़मीन देने वाले किसान नाराज़!
    08 Feb 2022
    रुद्रप्रयाग विधानसभा के जखोली विकासखंड के थाती-बड़मा गांव में 2013 में सैनिक स्कूल प्रस्तावित किया गया था मगर आज तक यहाँ सरकार स्कूल नहीं बनवा पाई है। पढ़िये न्यूज़क्लिक संवाददाता मुकुंद झा की यह…
  • Media
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ‘केंद्रीय मीडिया प्रत्यायन दिशा-निर्देश-2022’ : स्वतंत्र मीडिया पर लगाम की एक और कोशिश?
    08 Feb 2022
    यह सरकारी दिशा-निर्देश ऊपर से जितने अच्छे या ज़रूरी दिखते हैं, क्या वास्तव में भी ऐसा है? ‘‘सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता’’ या ‘जन व्यवस्था’ जितने आवश्यक शब्द हैं, इन्हें लागू करने की नीति या…
  • union budget
    सी. सरतचंद
    अंतर्राष्ट्रीय वित्त और 2022-23 के केंद्रीय बजट का संकुचनकारी समष्टि अर्थशास्त्र
    08 Feb 2022
    केंद्र सरकार आखिरकार केंद्रीय बजट में ठहरे/गिरते सरकारी राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय में स्पष्ट वृद्धि के बीच में अंतर क्यों कर रही है?
  • jammu and kashmir
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर : क्षेत्रीय दलों ने परिसीमन आयोग के प्रस्ताव पर जताई नाराज़गी, प्रस्ताव को बताया जनता को शक्तिहीन करने का ज़रिया
    08 Feb 2022
    महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि बीजेपी गांधी के भारत को गोडसे के भारत में बदलना चाहती है। इस लक्ष्य के लिए जम्मू-कश्मीर को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License