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जाति-वटवृक्ष के पत्ते नहीं, जड़ें काटने की ज़रूरत!
जाति एक वट वृक्ष के समान होती है। इसलिए राज वाल्मीकि सुझाव दे रहे हैं कि वाहन से ही नहीं मन से भी हटाएं जाति।  
राज वाल्मीकि
24 Jan 2021
जाति-वटवृक्ष के पत्ते नहीं, जड़ें काटने की ज़रूरत!
Image courtesy: Social Media

बाबा साहेब ने कहा था–“हम किसी भी राह पर चलें, हर राह पर जाति का राक्षस रास्ता रोके खड़ा मिलता है।“ दलितों के सन्दर्भ में यह आज भी सही है चाहे गाँव हों या शहर। वर्तमान समय में शहरी क्षेत्र में जाति को दृश्य से अदृश्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है यानी जाति तो रहे पर दिखे नहीं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के वाहनों पर जाति सूचक शब्द लिखे होने पर उनका चालान काटा गया। वजह यही कि इससे जाति का पता चल जाता है और यह भी पता चल जाता है कि भारत एक जातिवादी देश है।

वाहन से ही नहीं मन से भी हटाएं जाति 

हमारे यहाँ जाति देश की रग–रग में व्याप्त है। अनुसूचित जाति के लोग अगर खाने-पीने के सामान बेचने की दुकान भी खोलते हैं तो अपनी जाति छिपाकर और कथित उच्च कहे जाने वाले लोग खुलेआम अपनी जाति सूचक नाम रखते हैं। बड़े-बड़े होटलों से लेकर छोटे-छोटे पान की दुकानों पर भी आपको ‘पाण्डेय पान भंडार’ देखने को मिल जाएगा पर कहीं भी आपको ‘भंगी ढाबा’ या ‘चमार चाय’ नहीं लिखा मिलेगा। क्योंकि दलितों को पता है कि यदि उन्होंने अपने जाति सूचक शब्दों का यहाँ इस्तेमाल किया तो उनकी दुकान नहीं चलेगी। जाति  जानकर ही लोग उनके यहाँ खाना खाने या चाय पीने नहीं आएँगे। कारण स्पष्ट है-यहाँ  व्याप्त जाति भेद और छुआछूत। इसलिए जरूरी है कि जाति को वाहनों या दुकानों से ही नहीं, मन से भी हटाएं ।

जाति सूचक सरनेम का किया जाए प्रतिषेध 

जाति सूचक शब्द वाहनों पर न हों, दुकानों पर न हों, इतना ही काफी नहीं। जरूरत इस बात की भी है कि हमारे सरनेम भी जाति सूचक शब्द न हों। बेहतर हो कि कानून बनाकर इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाए। क्योंकि हमारे दैनिक व्यवहार में कहीं भी नाम बताने या लिखाने की आवश्यकता होती है तो कथित उच्च जाति वाले लोग तो शान से अपना जाति सूचक सरनेम बता देते हैं और अनुसूचित जाति को अपना जाति सूचक सरनेम बताने में बहुत संकोच होता है। क्योंकि वे जान जाते हैं कि अब ऊंची जाति का व्यक्ति उन्हें और उनके काम को तवज्जो नहीं देगा। इस संकोच से बचने के लिए  दलित वर्ग के लोग भी अपने सरनेम ऊंची जाति के लोगों का लगाने लगते हैं। बहुत से लकड़ी का काम करने वाले अपना सरनेम ‘शर्मा’ लगाकर ब्राह्मण बन जाते हैं। पर कभी-कभी दलितों को ऊंची जाति का सरनेम लगाना बहुत भारी पड़ जाता है।

7 दिसम्बर, 2020 को गुजरात में दलित युवक भरत ‘जाधव’ को तथाकथित ऊँची जाति की तरह सरनेम रखने की वजह से पीटा गया। सवर्ण समुदाय के लोगों को भरत जाधव में यह गलती दिखी कि वह अपने शर्ट के बटन को खोलकर रखता था, वहीं दूसरी तरफ अपने नाम के सरनेम में जाधव लगाए हुए था। राजपूत जाति (सवर्ण) का मानना था कि जाधव सरनेम लिखने से कोई दलित उसको भाई का संबोधन कैसे कर सकता है? इसके साथ-साथ वह सवर्णों की तरह कैसे रह रहा है? क्योंकि गुजरात के राजपूत अपना सरनेम ‘जाधव’ रखते हैं। 

फिल्मों और टी.वी. सीरियलों में  कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पात्रों के नाम  भी आपको दलित जाति सूचक नहीं मिलेंगे। उदाहरण के लिए “भाभी जी घर पर हैं” में आपको मनमोहन तिवारी मिल जाएंगे, विभूति नारायण मिश्रा मिल जायेंगे पर कोई दलित जाति सूचक नाम नहीं मिलेगा। 

हमारी आर्मी में तो जाति के नाम पर सेना की टुकडियां होती हैं। जेलों में भी दलित जाति सूचक नामों को जानकर जेल प्रशासन भी उन्हें ऐसे काम देते हैं जो उनकी जातिगत पेशों के नाम पर थोपे गए हैं। इसलिए बेहतर है कि कानून बनाकर  ऐसे जाति सूचक सरनेम हटा दिए जाएँ। 

जाति सूचक शब्दों व मुहावरों  पर भी हो प्रतिबन्ध

जिस तरह ‘भंगी’ शब्द पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है उसी तरह “चोरी-चमारी”, “चूहड़ा-चमार”, “चमार की औलाद”,  “मार मार के भंगी बनाना”, “भंगी की लड़कियों की तरह भाग जायेगी”, “भंगिन जैसी दिख रही है”, “मैं क्या भंगी हूँ?” जैसे अपमानजनक शब्दों पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए। ऐसे शब्द समाज में जाति और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।

जाति के बुनियादी ढांचे को ढहाने की ज़रूरत

बाबा साहेब ने एक बार कहा था कि भारत में जाति व्यवस्था एक ऐसी चार मंजिल की इमारत है जिसमें सीढ़ियां नहीं हैं। जो जहां जन्म लेता है आजीवन  वहीं रहता है। न नीचे वाला ऊपर जा सकता है और न ऊपर वाला नीचे आ सकता है। आज के समय में  ऐसी इमारत को ढहाने की जरूरत है। सबको समतल धरातल पर लाने की जरूरत है। पुराने को ढहाकर ही नव निर्माण होता है। यदि हम समाज में समता, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व चाहते हैं तो इस इमारत को ढहाना ही होगा। 

धर्मग्रंथों को आस्था की नहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए

यदि हमारे धर्मग्रंथ वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देते हों तो उन्हें प्रासंगिक समझा जाए। यदि कोई भी धर्मग्रंथ मानवता के खिलाफ हो, मानवीय अधिकारों के खिलाफ हो, मानवीय गरिमा के विरुद्ध हो  तो उसे नकारने की जरूरत है न कि आस्था के नाम पर उस पर अंधश्रद्धा दिखाने की। यदि हम धर्म ग्रंथों के आधार पर जाति व्यवस्था को न्यायसंगत या उचित करार देते हैं तो फिर जाति व्यवस्था का अंत कभी नहीं हो सकता है। इसलिए जाति को सही बताने वाले धर्म ग्रंथों को अप्रासंगिक माना जाए।

सामाजिक मानसिकता में बदलाव की जरूरत : अंतरजातीय विवाहों को मिले प्रोत्साहन

सामाजिक समानता लाने के लिए जरूरी है सामाजिक मानसिकता में बदलाव। आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम जाति जैसी निकृष्ट मानसिकता में बदलाव लाएं। कथित उच्च जाति आज भी अपने जातीय श्रेष्ठता के दंभ में चूर है। कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा था, जाति का असर भी अफीम की तरह ही है। यही कारण है कि आज कोई दलित किसी ब्राह्मण कन्या से या राजपूत या बनिए की कन्या से प्रेम विवाह कर लेता है तो यह उनकी नजर में अक्षम्य अपराध हो जाता है। भले ही वह दलित लड़का उनकी लड़की के लिए कितना ही योग्य क्यों न हो। परिणाम यह होता है कि कथित उच्च जाति के लोग अपने जाति दंभ के कारण अपनी बहन-बेटी और उस दलित लड़के की हत्या करने से भी नहीं चूकते।

आज आवश्यकता यह है कि इस तरह के प्रेम विवाहों को अपनी आन-बान और शान का मुद्दा न बनाकर उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। अंतर जातीय विवाहों को मान्यता दी जानी चाहिए। और अखबार में अपने विवाह योग्य पुत्र-पुत्रियों के लिए सूटेबल मैच देखने के साथ ही जाति की जगह ‘कास्ट नो बार’ जैसे शब्द लिखे जाने चाहिए।

पाठ्यक्रमों में जाति को कुप्रथा का दर्जा दें

जाति समाप्ति के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को स्कूल और कॉलेजों में  यह पढ़ाएं कि– ‘जाति व्यवस्था इंसानियत पर कलंक है।‘ यह एक कुप्रथा है। इसको जल्द से जल्द खत्म किया जाना चाहिए। क्योंकि यह एक इंसान को दूसरे इंसान के साथ भेदभाव करना सिखाती है। उसे छुआछूत करना सिखाती है। यह अन्याय और अत्याचार को प्रोत्साहित करती है। यह समानता के खिलाफ है। यह बंधुत्व के विरूद्ध है। अगर हमारे बच्चे यह सब पढ़ेंगे तो समझेंगे कि जाति प्रथा मानवता पर कलंक है तो इसको नष्ट करने में ही समझदारी है। युवाओं की इस तरह की सोच निश्चित ही जाति विनाश का कारण बनेगी।

प्रचार-प्रसार के माध्यमों से हो जाति मिटाने के आह्वान

आज का युग तकनीक का युग है। आज हमारे पास रेडियो, अख़बार, टी.वी. से लेकर सोशल मीडिया तक अनेक प्रचार-प्रसार के माध्यम हैं। मोबाईल और इंटरनेट ने बड़ी क्रांति ला दी है। यदि हम जाति के विनाश के लिए इन्हीं हथियारों का उपयोग करें तो निश्चित ही हमें जाति के अंत और जातिविहीन समाज के निर्माण में बड़ी सफलता मिलेगी। कोरोना वायरस के बारे में जागरूक करने के लिए इन माध्यमों ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। जाति को मिटाने में भी ये माध्यम अपनी बेहतरीन भूमिका अदा कर सकते हैं।

जाति एक वट वृक्ष के समान होती है। वट वृक्ष जितना बढ़ता जाता है उतनी ही अपनी शाखाओं से जमीन का स्पर्श करता है। फिर उन्हें जमीन में प्रवेश करता है और फिर वे वट वृक्ष की जड़ों का रूप धारण कर लेती हैं। एक स्थिति ऐसी आती है कि ये पता करना मुश्किल हो जाता है कि इस वृक्ष की असली जड़ कौन है। लेकिन यदि हम उपरोक्त हथियारों से इस जाति-वट वृक्ष की जड़ें ही काट दें तो एक दिन इसका समूल नाश हो सकता है। पर इसके लिए जनमानस और सरकार में इस तरह की इच्छाशक्ति होनी जरूरी है।

(लेखक सफाई कर्मचारी आन्दोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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