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भारत
राजनीति
चिल्ड्रन ऑफ़ डार्कनेस : मैथिली शिवरामन
मैथिली शिवरामन, लिंगों के बीच और समुदायों के भीतर समानता की प्रखर सेनानी, मायूसी के साथ लिखती हैं कि जातिवाद लोगों के जनसमूह को पैदा करता है। इसे ‘हॉन्टेड बाय फ़ायर’ से लिया गया है: जो जाति, वर्ग, शोषण और मुक्ति पर भिन्न निबंध हैं (जो वाम प्रकाशन, 2013; की एक ईबुक के रूप में भी उपलब्ध है), यह लेख पहली बार 12 जुलाई, 1969 को मेनस्ट्रीम में छपा था। मैथिली शिवरामन, एक अनुभवी मार्क्सवादी नेता तो थीं ही लेकिन वे तमिलनाडु के मज़दूरों और महिलाओं के अधिकारों की हिमायती भी थीं, एक ऐसे प्रेरणादायक नाम और लोकप्रिय राजनीतिक नेता का रविवार को चेन्नई में निधन हो गया। वे 81 वर्ष की थीं और उनके परिवार में अब उनके पति और बेटी हैं।
मैथिली शिवरामन
31 May 2021
Translated by महेश कुमार
मैथिली शिवरामन

सरकार द्वारा बार-बार यह याद दिलाना कि राष्ट्र गांधी का शताब्दी वर्ष मना रहा है, उन लोगों को भद्दा सा लगता है जो रत्नापुरी का दौरा कर चुके हैं और वहाँ के जीवन से काफी परिचित हैं।  

रत्नापुरी, छोटी सी सुंदर नदी और लाल और सफेद लिली से अलंकृत एक छोटा सा गाँव है, जो लिली अपने तालाबों को ईर्ष्या भरी नज़रों से छिपाती हैं। और वे भाग्यशाली लोग कौन हैं जो इसकी सुंदरता का आनंद उठा रहे हैं? गांधीजी बड़ी ही मार्मिक कोमलता से उन्हे 'हरिजन', यानि खुदा के बच्चे कहते हैं। फिर, कितनी भी कोमल भाषा क्यों न हो और चाहे उसे किसी भी नेक इरादे से क्यों न कहा गया हो, लेकिन वह कठोर वास्तविकता को या हक़ीक़त को छिपा नहीं  सकती है। इसका सटीक और ईमानदार वर्णन होगा 'चिल्ड्रेन ऑफ डार्कनेस'; ऐसे बच्चे जिनके पैदा होने के लिए गर्भ धारण बहुत ही पीड़ा में हुआ और मायूसी में जन्म हुआ। पैदा होते ही  उनका जीवन असहनीय अपमान और अनादर का जीवन बन जाता है – जो उन्हे हर रोज उनके होने की या उनके आस्तित्व की एक भयानक याद दिलाता है।

चलो रत्नापुरी की सैर करते हैं। आखिर यह गांधीवादी वर्ष है। यहाँ हम आए हैं। मुख्य सड़क के सबसे नजदीक की सड़क अग्रहारम है, जो द्विजों यानि सवरणों का सुरक्शित इलाका है। थोड़ा आगे जाएंगे तो कुड़ियाना थेरू है, जो किसानों की गली है। क्या सभी निवासी भूमि जोतते हैं? नहीं, उनमें से अधिकांश भूमि के मालिक हैं लेकिन वे जोतने वाले नहीं हैं। महत्वपूर्ण रूप से कहा जाए तो वे सवर्ण हिंदू हैं।

चलो जल्दी चलो, अब हम रत्नापुरी के 'हृदय' में प्रवेश करते हैं। रत्नापुरी का 'हृदय' मिट्टी के ढेरों का एक समूह है या गांधीवादी अभिव्यक्ति का इस्तेमाल करें तो यह एक 'गोबर का ढेर' है, जो खेतों के बीच में है और बाजार से करीब आधा मील दूरी पर है। चलते वक़्त सावधान रहें, क्योंकि आपको दलदली कीचड़ से गुजरना होगा या मैदान के तटबंध पर चलना होगा। आप क्या उम्मीद कर रहे हैं, चेरी के लिए कोई ठोस राजमार्ग बना होगा? सवर्ण हिंदू आमतौर पर इसे परैया की गली पारा थेरू कहते हैं, लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति से बात करते समय उन्होंने खुद को सही करते हुए बताय कि इसे 'हरिजन स्ट्रीट 'कहते हैं, तभी लगा जैसे अचानक गांधीजी को याद कर रहे हों। वैसे भी क्या फर्क पड़ता है?

बहुत सारे लोग, नौजवान और बूढ़े, सड़कों पर हैं। क्या आज कोई काम नहीं कर रहा है या कोई मेला चल रहा है? मार्च के मध्य की बात है। फसल अभी खत्म हुई है। जून के मध्य तक, जब रोपाई का मौसम शुरू होता है, तो चेरी के लोगो की लंबी और अवैतनिक छुट्टी होती है, जिसमें पूरी तरह से भूमिहीन मजदूर होते हैं। उनमें से एक भी काश्तकार विरले ही मिलता है। इतना ही नहीं, वे मवेशी या भेड़ भी नहीं पाल सकते, क्योंकि उनकी गली हर तरफ धान के खेतों से घिरी हुई है। कोई भी आवारा गाय या बकरी जमींदारों के प्रकोप के कारण ज्यादा समय तक टिक नहीं सकती है।

एक युवक जमीन पर बैठा अपने पैर के अंगूठे से जमीन को खुरच रहा है - न ही वह क्रोधित है और न ही व्यथित है, शायद थका और ऊबा हुआ है। उसकी महिला जो लंबे समय से अगले भोजन की तैयारी से आगे सोचना बंद कर चुकी है, उसे देखती है। उसके चेहरा सपाट है लेकिन दर्द का एक स्पर्श भी नज़र आता है। क्या यह वही चेहरा है जिसने गांधीजी को उस घृणित शब्द ‘लाखों बेज़बान’ कहने के लिए उकसाया था?

चेरी में शायद ही कोई किराना या चाय की दुकान मिल पाए। चेरी के निवासी अपना मामूली समान खरीदने के लिए कुड़ियाना थेरू या गांव के बाजार में जाते हैं। वे अपनी खुद की चाय की दुकान क्यों नहीं खोलते? इसका उत्तर एक जबरदस्त भेदभाव को प्रकट करता है - 'हमारे पास पर्याप्त पूंजी नहीं है। और यदि हम किसी तरह खोलते भी हैं, तो कोई हम से चाय नहीं खरीदेगा, यहां तक कि हमारे अपने लोग भी नहीं खरीदेंगे। क्योंकि, हम अच्छी चाय नहीं बना सकते हैं। और अगर वे हमसे खरीदते भी हैं, तो भी वे हमें ठीक से पैसे का भुगतान नहीं करेंगे। वे केवल हिंदू जाति यानि सवर्ण जाती के मालिकों को भुगतान करते हैं क्योंकि वे उनसे डरते हैं। कुछ समय बाद ही हम बड़े नुकसान में चले जाएंगे। 'हालांकि 'उच्च जाति' की चाय की दुकाने उन्हें चाय पिलाती हैं, लेकिन कुछ ही हरिजनों ऐसे होंगे जो दुकान में बैठकर और फुरसत में इसका आनंद लेने की हिम्मत कर सकते हैं।

हरिजन परिवारों के बच्चे दिन भर गंदगी में क्यों खेलते रहते हैं - क्या वे स्कूल नहीं जाते हैं? गांव के बीचों-बीच बने नए स्कूल में अपने बच्चों का ख्याल रखते हुए एक महिला शिक्षिका रक्षात्मक रूप से कहती है: 'उन्हें आने से कौन रोकता है? जब वे आना ही नहीं चाहते हैं तो हम इसमें कोई मदद नहीं कर सकते हैं। देखिए, वे शिक्षा की परवाह नहीं करते हैं।’ एक हरिजन माँ शर्म और अपराधबोध के साथ समझाती है: ‘स्कूल बहुत दूर है। मैं रोज नहीं देख सकती कि मेरा बेटा वहां जाता है या नहीं। वह शायद अपने दोस्तों के साथ कहीं खेलने जा सकता है। लेकिन मैं अपनी लड़की को स्कूल नहीं भेज सकती क्योंकि मैं जब काम करने बाहर जाती हूँ तो बच्चे की देखभाल कौन करेगा?'

आइए पंचायत के अध्यक्ष से कुछ देर बात करते हैं। 'क्या हरिजन स्ट्रीट में बालवाड़ी और स्कूल खोलना अच्छा नहीं होगा? जबकि सरकार तो कहती है कि हमें हरिजनों तक पहुंचने के विशेष प्रयास करने चाहिए। और अगर वे इन सेवाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं, तो क्यों न हम उन्हें स्कूल उनके दरवाजे तक ले जाएं। आखिरकार, वे जड़ता की किसी अतिरिक्त खुराक के साथ तो पैदा नहीं हुए थे। और किसने उन्हें सदियों तक अलग-थलग रखा? साथ ही, यदि पंचायत कार्यालय को हरिजन स्ट्रीट में स्थानांतरित कर दिया जाता है, तो वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहने के बाद उनके मुहल्ले में स्ट्रीट लाइट और पानी के नल अचानक आ सकते हैं!'

पंचायत अध्यक्ष साहब हमारे अजीबोगरीब सुझावों से भयभीत और थोड़ा चकित भी नज़र आते हैं और बड़े ही आधिकारिक रूप से जवाब देते हैं: 'लेकिन हमारे पास सरकारी आदेश हैं कि स्कूल और पंचायत कार्यालय को गाँव के केंद्र में ही बनाया जाना चाहिए।' हाँ, यह समझ तो सही है। कि स्ट्रीट लाइट और स्कूल 'गुरुत्वाकर्षण के केंद्र' यानि गाँव के मध्य में रहने वाले हिन्दू जाति के लोगों के लिए हैं, न कि 'गाँव के बाहर’ पड़े हरिजन लोगों के लिए हैं।

ओह, नहीं, जातिवाद कोई ऊंची जातियों का विशेष एकाधिकार नहीं है। जाति के पदानुक्रम में ऊपर रहने वाला पल्लर समुदाय जो परैया से अलग रहता है हरिजनों में उनका भी अपना पदानुक्रम है। यह अजीब तरह से 'उच्च जातियों' के पैटर्न की याद ताजा करती है, हरिजनों के भीतर जाति पदानुक्रम भी भोजन की आदतों पर आधारित है। किसी की आहार संबंधी आदतों में जितना संकोची व्यवहार होता है, वह पिरामिड में उतना ही ऊपर होता है। पल्लर समुदाय के लोग मरी हुई गाय नहीं खाते हैं जो परैया समुदाय का एक खास व्यंजन है। लेकिन जो भी हो इस अपवाद के चलते, गरीबी ने उनमें स्वस्थ भोजन की आदतें डाल दी हैं। वे केकड़ों (खेत के केकड़े), घोंघे, हर उपलब्ध प्रकार की जड़ी-बूटी और यहां तक कि पंखों वाली चींटियों का भी भोजन करते हैं। जबकि कुड़ियाना थेरू के निवासी हालांकि इन्हें नांव के चप्पू से भी नहीं छूते थे। वे सामाजिक उच्च जातियों के बचे हुए खाने की दावत को अस्वीकार करते है।

'बिग गॉड'

आइए उस मां और उसके छोटे बेटे को बात करते हुए सुनते हैं। माँ लड़के को एक नारियल और दो आने देती है और उससे कहती है: 'बेटा, कुड़ियाना थेरु के मंदिर जाओ। अंदर मत जाना  और चीजों को फर्श पर रखना। पुजारी उन्हें खुद ले जाएगा। और याद रखो कि दुनिया में किसी भी चीज़ के लिए मंदिर के भीतर जाने की हिम्मत मत करना - क्योंकि, अगर आप ऐसा करेंगे,  तो आप अंधे हो जाएंगे। छोटे लड़के ने कभी भी मंदिर के भीतर जाने की कोशिश नहीं की, यह जानने के लिए कि क्या वह वास्तव में अंधा हो जाएगा क्योंकि वह जानता था कि हिंदू जाति के भगवान को उसके घर से ज्यादा डरना चाहिए और उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। कभी-कभी समारोह मनाने के लिए 'बिग गॉड' का बड़ा जुलूस निकाला जाता है। लेकिन जब जुलूस  चेरी के पास पहुंचता तो जुलूस को हरिजनों का प्रसाद लेने से रोक दिया जाता था। इन देवताओं को चेरी की सड़कों/गलियों में जुलूस के माध्यम से कभी प्रदूषित नहीं होने दिया गया था। यह पूछना हास्यास्पद होगा कि क्या रत्नापुरी ने कभी गांधीजी या उनके मंदिर-प्रवेश अभियानों के बारे में सुना था। उन्होंने भले ही भव्य मदुरै मीनाक्षी या कांची कमचची मंदिरों के द्वार हरिजनों के लिए खोल दिए हों, लेकिन कई कम विशेषाधिकार प्राप्त गांवों के भीतर मौजूद मंदिरों में आज भी खुदा के इन बच्चों के लिए दरवाजे बंद हैं।

क्या इससे रत्नापुरी को कोई फर्क पड़ता अगर कल, कोई प्रलय आ जाए और सभी हरिजनों को अनंत दया के नाम पर निगल जाए? ऐसा तो नहीं होना चाहिए, यह देखते हुए कि वे कभी भी समुदाय की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो वास्तव में, समुदाय का जीवन अच्छी तरह से ठप हो सकता है। कौन इनकी जमीन जोतेगा? हिंदू जाति के जमींदार खेतों की गंदगी और कीचड़ के आदी नहीं हैं और उनकी संवेदनशील त्वचा को सूरज से एलर्जी भी है। समुदाय में होने वाली सभी मौतों के दाह संस्कार में कौन शामिल होगा? यह कैसी विडम्बना है कि जिस हरिजन को सवर्ण हिन्दू से जीवन भर सुरक्षित दूरी पर रखा जाता है,  जब हिन्दू जाति के व्यक्ति का बेजान शरीर चिता में जल रहा होता है, तो वही हरिजन उसका वफादार, और अकेला साथी होता है। और गांव के मरे हुए मवेशियों को कौन दफनाएगा? गांव की खबर, खासकर बच्चे या मां की मौत जैसी बुरी खबर को गांव की जनता तक कौन पहुंचाएगा? ये वही हरिजन हैं जो गाँव में फैलने वाले प्लेग या किसी अन्य घातक बीमारी के फैलने की घटनाओं की घोषणा करते हैं। 

और सबसे बड़ी बात कि आने वाली बाढ़ से ग्रामीणों को कौन आगाह करेगा? जब काले-स्याह बादल उमड़ते हैं और नदियाँ प्रफुल्लित होने लगती हैं, तो वे चिल्ड्रेन ऑफ डार्कनेस ही हैं जो रात भर जागते हैं ताकि बाकी सभी लोग चैन से सो सकें। क्रोधित नदी के गाँव पहुँचने के संकेत से पहले ही वे गाँव वालों को सचेत कर देते है ताकि वे अपने उत्पीड़कों/शोषकों को बचा सके। क्योंकि समाज के ये 'अच्छे लोगों' हरिजन को बताते हैं कि बाढ़ तभी शांत होगी जब गाँव की रक्षा हरिजन द्वारा की जाएगी। क्यों? क्या गंगा माँ डर के मारे इसलिए भाग जातीं है, कि कहीं परैया के चरण उसकी पवित्रता को दूषित न कर दें।

क्या रत्नापुरी एक विकृत कल्पना की उपज है या पचास साल पहले का कोई दृश्य है? तमिलनाडु में आज भी हजारों रत्नापुरी (शायद ऐसे फैंसी नामों के साथ नहीं) हैं। अगर कोई इसे चुनौती देना चाहता है, तो मैं उसे केवल हमारे सुनसार जंगल की यात्रा करने के लिए सलाह दे सकती हूं। यह वास्तव में कोई आदर्श अवकाश स्थल नहीं होगा, लेकिन इससे एक 'अन्य भारत' की झलक पाने में कोई नुकसान नहीं होगा। वास्तव में, यह बहुत ही बेहतरीन विचार होगा यदि हमारे राजनयिकों, अन्य अफसरों के अलावा, इन गांवों का दौरा करें (सवारी सीखने के बजाय) और उसे अपने प्रशिक्षण के हिस्से के रूप में या 'भारत दर्शन' के हिस्से के रूप में जरूरी बनाएँ।  आखिरकार, सामंती भारत के व्यापक रूप से प्रचलित अवशेष के रूप में यह 'आधुनिक' भारत का उतना ही अभिन्न अंग हैं जितना कि महान इस्पात संयंत्र और बहुउद्देशीय भाखड़ा नांगल बांध है। ये हालात यदि और कुछ नहीं, तो कम से कम दुनिया के अन्य हिस्सों में रंगभेद या नस्लीय भेदभाव की निंदा करते हुए ओजस्वी भाषण देने वालों को कम से कम शर्मिंदा कर सकते है। अगर हमारे विदेश सेवा के जवान, अंतरराष्ट्रीय मंचों से मानवाधिकारों के सबसे कट्टर समर्थक हैं, तो उन्हे अपने घर में झांकना चाहिए जहां उन्हें संतुलन की भावना मिलेगी।

दैवीय रूप से तय डिवीज़न 

रत्नापुरी की भूमि को जोतने वाले और राष्ट्र के जीवन के निर्वाहक न केवल अपने श्रम के फल से वंचित हैं बल्कि वे सभी मानवीय गरिमा से वंचित हैं। उनके आर्थिक शोषण से संतुष्ट न होते हुए, समाज ने उन्हें यह भी विश्वास दिलाया है कि समाज में कठोर पदानुक्रमित जाति की श्रेणियों में मनुष्यों का विभाजन दैवीय रूप से तय है। इस तरह दासों द्वारा दासता की स्वीकृति को बड़ी चतुराई से सुरक्षित किया गया है। मानव निर्मित असमानता को पवित्र बनाने के लिए शासक वर्ग ने असंख्य अन्य उदाहरणों को धर्म में उपयोग किया है।

इतिहास में कभी भी कोई भी वास्तविक मुक्ति चांदी की थाल पर नहीं सौंपी गई है। यहां तक ​​कि अपने भाग्य में लिखे को मानने वाले और नपुंसक क्रोध के लिए कुख्यात ये 'बेज़ुबान लाखों' लोग भी एक दिन अपने उत्पीड़कों और शोषकों के खिलाफ उठ खड़े हो सकते हैं और रत्नापुरी की शांत सड़कें एक खूनी युद्ध के मैदान में बदल सकती हैं।

आर्थिक और राजनीतिक कारकों के चलते जरूरी सामाजिक समायोजन करने और गांधीवादी हृदय परिवर्तन के रूप में तर्कसंगत बनाने की तुलना में खुद से जीती हुई समानता, उत्पीड़ितों में गरिमा और गर्व की भावना को बढ़ावा देती है। ऐसा तब हुआ था जब ब्लैक पैंथर्स [संयुक्त राज्य अमेरिका की एक क्रांतिकारी समाजवादी और अश्वेत राष्ट्रवादी पार्टी- ईडीएस।] और स्टोकली कारमाइकल के क्रांतिकारी समर्थकों [जो एक त्रिनिडाडियन-अमेरिकी, ब्लैक पैंथर पार्टी के सदस्य थे और नागरिक अधिकारों के संघर्ष में सक्रिय थे- ईडीएस।] ने संयुक्त राज्य अमेरिका के लिली-सफ़ेद इलाकों को गोरों के लिए असुरक्षित बना दिया था इसी के बाद गोरे लोग अश्वेतों को एक ताकत के रूप में मानने लगे थे। और अधिक महत्वपूर्ण रूप से कहा जाए तो, क्या गांधी का भारत, जो अहिंसा की इबादत करता है, क्या अहिंसा की यह इबादत खुद की सड़कों पर हिंसा की बढ़ती घटनाओं को कवर करने के लिए है, ताकि वह 'हार्लेम के गर्म, खूनी ग्रीष्मकाल' जैसी घटना घटने से बच सके? (1965 का अश्वेत लोगों का हार्लेम में हिंसक विरोध, जो न्यूयॉर्क शहर का काले लोगों का पड़ोस है- ईडीएस]?

सौजन्य: mayday.leftword.com

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Children of Darkness by Mythily Sivaraman

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