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बढ़ती हिंसा व घृणा के ख़िलाफ़ क्यों गायब है विपक्ष की आवाज़?
हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लोग अपने जान-माल और बच्चों के भविष्य को लेकर सहम गए हैं।
अफ़ज़ल इमाम
13 Apr 2022
ram_navmi
प्रतीकात्मक तस्वीर- Deccan Herald

हमेशा धूमधाम और शांतिपूर्ण तरीके से मनाए जाने वाले पर्व रामनवमी के मौके पर इस बार आधा दर्जन से अधिक राज्यों में हिंसा हुई। सभी जगहों पर पैटर्न एक जैसा था- मसलन मस्जिदों के सामने हुड़दंग, उकसाने वाली नारेबाजी और डीजे बजाना। कुछ जगहों पर तो मस्जिदों की दीवार पर चढ़ कर भगवा झंडे भी लगाए गए, जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल हुईं हैं। कई जगहों पर इसकी प्रतिक्रिया भी हुई, जिसने दंगे का रूप ले लिया। हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लोग अपने जान-माल और बच्चों के भविष्य को लेकर सहम गए हैं।

पिछले 8-10 दिनों के भीतर जो कुछ देखने को मिला है, उसके बारे आमतौर माना जा रहा है कि यह तो महज ट्रेलर था। असली पिक्चर तो अभी आनी बाकी है, क्योंकि वर्ष 2024 में लोकसभा के आम चुनाव हैं, जबकि उसके पहले गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश व कर्नाटक समेत 11 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

यूपी चुनाव में जो ‘अस्सी बनाम बीस’ व बुल्डोजर की राजनीति शुरू हुई थी, वह आगे भी जारी रहेगी। ऐसा इसलिए कि चुनाव जीतने का यह एक ऐसा अचूक फार्मूला साबित हुआ है, जिसके सामने प्रचंड बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, अशिक्षा, समाज के कमजोर तबकों का उत्पीड़न और सरकार की तमाम नाकामियां जैसे मुद्दे जमींदोज हो जाते हैं।

राजस्थान में करौली के बाद मध्य प्रदेश के खरगोन का दंगा काफी चर्चित रहा। यूपी की नकल करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने भी दर्जनों मकानों व दुकानों पर बुलडोजर चलवा दिए और इसके लिए उन्होंने अपनी पीठ भी थपथपाई। उनके समर्थकों ने उन्हें नया नाम ‘बुल्डोजर मामा’ दे दिया है। दरअसल राज्य में विधानसभा चुनाव का माहौल बन चुका है और चौहान इस बार मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे या नहीं? इस बात पर संशय है, क्योंकि राज्य में गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम तेजी से उभरा है। वे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं। बुलडोजर वाले मामले में दोनों के बीच की श्रेय लेने की जबरदस्त होड़ दिखाई पड़ रही है। वैसे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम भी चर्चा में हैं। साथ ही कैलाश विजयवर्गीय और उमा भारती जैसे नेता भी वहां अपनी-अपनी तरह से सक्रिय हैं।

इसी तरह चुनाव वाले राज्य गुजरात के हिम्मतनगर और खम्भात आदि जगहों से भी हिंसा की खबरें आईं हैं। करीब 7 माह पहले ही वहां विजय रूपाणी को हटा कर भूपेंद्र पटेल को नया सीएम बनाया गया था। गुजरात भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। यही कारण है कि यूपी में जीत हासिल करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में रोड शो किया था। कर्नाटक में भी पिछले वर्ष जुलाई में येदियुरप्पा की जगह बासवराज बोम्मई को सीएम पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद से ही यह राज्य हिजाब विवाद, हलाल मीट, मुस्लिम दुकानदारों, कारीगरों व ऑटो वालों का बहिष्कार आदि के कारण चर्चा में बना हुआ है। यहां भी रामनवमी के मौके पर कोलार व कुछ अन्य जगहों पर हिंसा हुई है।

दक्षिण भारत में कर्नाटक इकलौता राज्य है, जहां भाजपा की सरकार है। वर्ष 2019 में कांग्रेस व जद (एस) के विधायकों को तोड़ कर उसने ने वहां सत्ता पर कब्जा किया था। इसे बचाए रखना भाजपा लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। बहरहाल उपरोक्त मुद्दों से तैयार हुए माहौल के बीच पार्टी ने राज्य में अपना चुनावी अभियान शुरू कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि हिंसा व घृणा किसी भी देश और समाज के लिए बेहद घातक हैं, लेकिन भारत में यह तेजी से बढ़ती नजर आ रही है। हालत यह हो गई है कि गाली-गलौज और यहां तक कि बलात्कार की खुली धमकी को भी कुछ लोग सोशल मीडिय़ा पर उचित ठहरा रहे हैं। स्थिति दिनों-दिन गंभीर होती जा रही है, लेकिन किसी भी स्तर पर कोई अंकुश नहीं है।

हैरत की बात यह है कि विभिन्न राज्यों में हुई हिंसक घटनाओं व उन्मादी माहौल को लेकर विपक्षी पार्टियों की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। सिर्फ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शांति व भाईचारे की अपील करते हुए एक ट्वीट किया, जबकि सपा नेता अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, आम आदमी पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी समेत अन्य विपक्षी नेता खामोश हैं।

पार्टियों की आपसी प्रतिद्वन्द्विता अलग बात है, लेकिन देश में जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसमें अमन-चैन व भाईचारे के लिए इन पार्टियों के नेताओं को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि तक कुछ कदम का मार्च करना ही चाहिए था। यदि यह संभव नहीं था, तो कम से कम संयुक्त बयान तो जारी ही किया जा सकता था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

देश में तेजी बढ़ रही हिंसा और घृणा के मसले पर विपक्ष दलों की उदासीनता समाज में भारी बेचैनी पैदा कर रही है। इस खामोशी के बहुत सारे मतलब भी निकाले जा रहे हैं। हद तो यह है कि जब विभिन्न शहरों में हिंसक झड़प हो रही थी, तो कांग्रेस और बसपा एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त दिखे। वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव यूपी में होने वाली आपराधिक घटनाओं की खबरें ट्वीट कर रहे थे। वे शायद अपने राजनीतिक कैरियर में दूसरी बार बड़ी गलती कर रहे हैं। वर्ष 2013 में जब मुजफ्फरनगर दंगा हुआ था तो अखिलेश यूपी के मुख्यमंत्री थे और उस समय दंगा भड़काने वालों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए थी, वह उन्होंने नहीं की थी। अब यह दूसरा मौका है, जब जनता ने उन्हें प्रदेश में मजबूत विपक्ष बनाया है तो भी वे खामोश हैं। क्या ‘भाईचारा’ और जातीय जनगणना जैसे मुद्दे सिर्फ चुनाव के लिए थे? 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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