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भारत
राजनीति
इतिहास कहता है- ‘’चिंतन शिविर’’ भी नहीं बदल सका कांग्रेस की किस्मत
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस चुनावों में जीत के लिए पहले भी चिंतन शिविर करती रही है, लेकिन ये शिविर कांग्रेस के लिए इतने कारगर नहीं रहे हैं।
रवि शंकर दुबे
14 May 2022
congress

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कई दशक सत्ता चलाई, अपने शासकीय दौर में कांग्रेस ने एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता दिए। चाहे वो जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, लाल बहादुर शास्त्री हों या फिर राजीव गांधी। इन नेताओं की नीतियों और फैसलों का ही नतीजा है कि कोई भी सत्ताधारी दल कांग्रेस के सामने ज्यादा नहीं टिक सका। लेकिन साल 2014 में जब देश ने कांग्रेस का विकल्प भाजपा में ढूंढा तब हालातों ने पूरी तरह से करवट बदल ली। यहां से न सिर्फ कांग्रेस का पतन शुरू हो गया, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर दिग्गज नेताओं की आपसी रार सामने आ गईं। नतीजा ये रहा है कि मध्यप्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक कई दिग्गज युवा नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। जिसका सबसे बड़ा कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ठहराया गया। 

आने वाले अगले सालों में कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव और साल 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं, जिसके लिए कांग्रेस ने शीर्ष से लेकर बूथ लेवल तक में बदलाव का निर्णय लिया है। इन बदलावों पर फैसला लेने के लिए राजस्थान में कांग्रेस का चिंतन शिविर आयोजित किया गया है। तीन दिनों के इस चिंतन शिविर में कांग्रेस देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, कृषि और युवाओं से जुड़े मसलों पर मंथन कर रही है। ताकि आने वाले चुनावों में रिवाइवल का रोडमैप तैयार किया जा सके। 

कांग्रेस के इतिहास को अगर खंगालें तो अबतक चार बार चिंतन शिविर का आयोजन किया जा चुका है, लेकिन ये कांग्रेस का दुर्भाग्य ही है कि पहले हुए चार में सिर्फ एक चिंतन शिविर ही कांग्रेस के लिए अनुकूल रहा है जबकि तीन बार उसे हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में अब उदयपुर में आयोजित किया गया पांचवा चिंतन शिविर उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में हार को भुलाकर नई रणनीतियों के पथ पर चलने के लिए आयोजित किया गया है। ताकि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी को दोबारा सत्ता में लाया जा सके।

कांग्रेस का पहला चिंतन शिविर

70 के दशक में जब समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण का वर्चस्व देश में लगातार बढ़ रहा था और वे तत्कालीन इंदिरा गांधी पर एक बाद एक ज़ुबानी हमले कर रहे थे, तब इसकी काट ढूंढने के लिए कांग्रेस ने साल 1974 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में चिंतन शिविर का आयोजन किया था। बुलंदशहर के नरौरा में आयोजित हुए इस चिंतन शिविर में पार्टी की अलग-अलग कमेटियों ने इँदिरा पर हो रहे व्यक्तिगत राजनीतिक हमलों के ऊपर विचार विमर्श किया और एक खास रणनीति बनाई। बावजूद इसके इंदिरा सरकार की लोकप्रियता लगातार गिरती गई और विपक्ष हावी होता गया।

विपक्ष के लगातार हावी होने का नतीजा ये रहा कि इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी और 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को करारी हार मिली। इन चुनावों में कांग्रेस 352 लोकसभा सीटों से घटकर 154 सीटों पर सिमट गई जबकि जनता पार्टी 35 सीटों से बढ़कर 295 पर पहुंच गई। कांग्रेस को सत्ता गवांनी पड़ी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इस तरह से कांग्रेस का पहला चिंतन शिविर ज़ाया हो गया।

कांग्रेस का दूसरा चिंतन शिविर 

90 का दशक... राजीव गांधी की हत्या के 7 साल बाद गांधी परिवार की कांग्रेस में वापसी हुई, सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। सोनिया गांधी ने पार्टी की राजनीतिक दशा और दिशा पर मंथन-चिंतन करने के लिए मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में चिंतन शिविर का आयोजन किया, जहां कांग्रेस ने एकला चलो की नीति तय की।

हालांकि ये भी कांग्रेस के मुफीद नहीं रहा, साल 1998 और साल 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को देशभर में अकेले चुनाव लड़ने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ गया। 1998 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ 141 सीटें मिलीं। जबकि 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिलीं। साल 1999 में भारतीय जनता पार्टी 24 दलों के साथ सत्ता में आई। अटल बिहारी वाजपेयी साल 1998 में 13 महीने प्रधानमंत्री रहे। हालांकि जब 1999 में भाजपा सत्ता में आई तब उन्होंने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि यहां से अटल बिहारी वाजपेयी एक मज़बूत विपक्षी नेता के तौर पर तो उभरे ही, साथ में भाजपा को भी भविष्य के लिए एक नींव मिल गई। यानी कांग्रेस का मध्यप्रदेश में हुआ शिविर भी नाकामयाब रहा।

कांग्रेस का तीसरा चिंतन शिविर

कांग्रेस को अब पता चल चुका था कि देश में वो अकेली सबसे बड़ी पार्टी नहीं है, बल्कि अटल-आडवाणी की जोड़ी भी शाइनिंग इंडिया के रथ पर सवार होकर देशवासियों को भाजपा की तरफ मोड़ने में जुट गई है। यही कारण है अब कांग्रेस ने एकला चलो की ज़िद छोड़कर समान विचारधारा वाली पार्टियों को साथ मिला लिया, जिसमें आरजेडी और एनसीपी जैसी पार्टियां शामिल थीं। कांग्रेस ने गठबंधन का ये फैसला 2004 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले साल 2003 में हिमाचल प्रदेश में आयोजित हुए चिंतन शिविर में लिया। 

गठबंधन के फैसले ने कांग्रेस का भाग्य पलट दिया, और साल 2004 में हुए लोकसभा चुनावों को दौरान अटल-आडवाणी के रथ का चक्का जाम हो गया। इसके बाद कांग्रेस ने 2014 तक सरकार चलाई और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इतिहास में कांग्रेस का यही एक चिंतन शिविर था जो सफल रहा।

कांग्रेस का चौथा चिंतन शिविर  

अब बारी थी लोकसभा चुनाव 2014 की... जब देशभर में मोदी लहर ज़ोरो पर थी। और कांग्रेस भी राहुल गांधी का राजतिलक करने की तैयारी में जुटी थी यही कारण है कि पहली बार ऐसा हुआ जब राहुल गांधी के लिए एक विशेष पार्टी उपाध्यक्ष का पद बनाया गया। इससे पहले राहुल गांधी पार्टी के महासचिव थे। कांग्रेस ने जयपुर में चिंतन शिविर का फैसला किया। इस शिविर में चुनाव से संबंधी और पार्टी में बदलाव से संबंधी तमाम बातें हुईं, लेकिन बीते 10 साल की सत्ता में हुई ग़लतियां और देश में बह रही मोदी लहर को निष्प्रभावी बनाने पर कम चिंतन हुआ। यही कारण रहा कि कांग्रेस ने इतिहास की सबसे बड़ी हार दर्ज की, या यूं कहें कि कांग्रेस की हार इतनी बुरी थी कि सदन में नेता प्रतिपक्ष के लिए आंकड़े भी नहीं जुटा पाई। यानी कांग्रेस का ये शिविर भी नाकामयाब रहा।

उदयपुर में कांग्रेस का पांचवा चिंतन शिविर

साल 2014 में जो कांग्रेस लड़खड़ाई फिर ठीक से खड़ी नहीं हो सकी। जिसके कई कारण निकल कर सामने आये। सबसे बड़ा कारण शीर्ष नेतृत्व का स्थिर न होना। यही वजह रही है पार्टी बूथ लेवल पर बेसहारा होती चली गई और एक के बाद एक लगातार कई चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। इन्ही हार के घावों को भरने के लिए कांग्रेस का पांचवा चिंतन शिविर राजस्थान के उदयपुर में आयोजित किया। जहां कई बड़े बदलाव और मोदी सरकार की गलत फैसलों पर चर्चा की गई है। सबसे पहले तो उन नेताओं को संदेश दिया गया कि जो कहते हैं कि पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी ने कहा कि इस शिविर में अपनी बातें रखें, लेकिन बाहर सिर्फ एकता का ही संदेश जाना चाहिए। सोनिया गांधी ने कहा कि ये सरकार महात्मा गांधी के हत्यारों का महिमामंडन करती है। आपको बता दें कि इस चिंतन शिविर में कांग्रेस अल्पसंख्यकों, बेरज़गारी, महंगाई, आदिवासियों और किसानों को मुख्य धारा में रखकर आगे की रणनीति तैयार करने में जुटी है, हालांकि देखने वाली बात ये होगी ये शिविर कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद होता है।

कांग्रेस के सभी चिंतन शिविरों में ध्यान देने वाली एक बात है, कि शिविरों का आयोजन तभी होता है जब पार्टी कोई चुनाव हार चुकी हो, यानी एक भी शिविर तब आयोजित नहीं हुए जब पार्टी सत्ता में हो... कहने का अर्थ ये है कि कांग्रेस को सत्ता में रहते हुए जो ग़लतियां हुई हैं उनपर भी चिंतन-मंथन करने ज़रूरत है, शायद तभी कोई संजीवनी मिल सकती है।

फिलहाल कांग्रेस के सामने एक चुनौती हो तो भी ठीक है.... लेकिन शीर्ष नेतृत्व से लेकर बूथ लेवल तक पार्टी संघर्ष करती ही दिख रही है। फिर दिग्गजों का पार्टी छोड़ जाना भी कम पीड़ा नहीं देता। उसपर भी भाजपा द्वारा कांग्रेस और राहुल गांधी पर लगातार डेंट करते रहना लोगों को इमरजेंसी, सिख दंगे और कश्मीरी पंडितों का पलायन भुलाने नहीं दे रहा। ऐसे में कांग्रेस भाजपा से कैसे निपटेगी ये देखना दिलचस्प होगा।

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