NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
क्या कांग्रेस ने वह मौका गवां दिया जो सालों बाद उसे मिला था?
सालों बाद गांधी नेहरू परिवार के पास यह मौका था कि वह पार्टी को परिवारवाद के आरोप से दूर ले जाता और ऐसा विश्वसनीय विपक्ष बनता जिसकी लोकतंत्र को ज़रूरत होती है, लेकिन यह नहीं हुआ।
अमित सिंह
25 Aug 2020
congress

कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की सोमवार को करीब सात घंटे तक चली मैराथन मीटिंग के बाद यह फैसला लिया गया कि सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी और अगले छह महीने में पार्टी अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। मजेदार बात यह है कि इस समिति ने एक साल पहले भी यही तय किया था।

कांग्रेस कार्य समिति के इस फैसले पर दो बात बहुत मौजूं हैं। पहला यदि नेतृत्व के सवाल को हल ही नहीं करना था तो फिर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर उसे अटेम्ट करने की कोशिश करके जगहंसाई क्यों कराई गई?

और दूसरी बात की अगर बैठक बुला ही ली गई तो सात घंटे बाद उसी निष्कर्ष पर क्यों पहुंच गए जहां एक साल पहले ही पहुंच गए थे? आखिर इससे भी ज्यादा हास्यास्पद और कुछ हो सकता है?

इसके अलावा सालों बाद गांधी नेहरू परिवार के पास यह मौका था कि वह पार्टी को परिवारवाद के आरोप से दूर ले जाता और ऐसा विश्वसनीय विपक्ष बनता जिसकी लोकतंत्र को जरूरत होती है, लेकिन यह मौका गवां दिया गया।

आखिर जब परिवार के नेता राहुल और प्रियंका गांधी ने यह संकेत दे दिया है कि अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का हो सकता है और सोनिया गांधी उस पद पर रहना नहीं चाहती जिस पर पिछले दो दशकों से उनका कब्जा है। साथ ही यह भी समझ आता है कि गांधी परिवार को ही अपनी पसंद का नेता चुनना है तो फिर परिवार यह क्यों तय नहीं कर पा रहा है कि पार्टी की कमान किस सदस्य को सौंपी जाए?

गौरतलब है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक से एक दिन पहले रविवार को ही पूर्णकालिक एवं जमीनी स्तर पर सक्रिय अध्यक्ष बनाने और संगठन में ऊपर से लेकर नीचे तक बदलाव की मांग को लेकर सोनिया गांधी को 23 वरिष्ठ नेताओं की ओर से पत्र लिखे जाने की जानकारी सामने आई।

आपको बता दें कि पिछले छह सालों में लोकसभा एवं विभिन्न विधानसभा चुनावों में लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में मजबूत बदलाव लाने, जवाबदेही तय करने, नियुक्ति प्रक्रिया को मजबूत बनाने और हार का उचित आकलन करने की मांग की थी।

पत्र में कहा गया था कि पार्टी का प्रदर्शन सुधारने के लिए ऊपर से लेकर नीचे तक के नेतृत्व में व्यापक परिवर्तन लाने और फैसले लेने के लिए एक मजबूत तंत्र की स्थापना की जरूरत है।

इन नेताओं में पांच पूर्व मुख्यमंत्री, कांग्रेस कार्यसमिति के कई सदस्य, मौजूदा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शामिल थे।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर, सांसद विवेक तन्खा, कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद तथा पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, राजेंदर कौर भट्टल, एम. वीरप्पा मोइली, पृथ्वीराज चव्हाण, पीजे कुरियन, अजय सिंह, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, पूर्व पीसीसी प्रमुख राज बब्बर (यूपी), अरविंदर सिंह लवली (दिल्ली) और कौल सिंह ठाकुर (हिमाचल), वर्तमान में बिहार प्रचार प्रमुख अखिलेश प्रसाद सिंह, हरियाणा के पूर्व स्पीकर कुलदीप शर्मा, दिल्ली के पूर्व स्पीकर योगानंद शास्त्री और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित शामिल थे।

कांग्रेस का पुनरुत्थान ‘एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है’ का तर्क देते हुए पत्र में कहा गया कि जब देश स्वतंत्रता के बाद सबसे गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करता है तो ऐसे में पार्टी के प्रदर्शन में निरंतर गिरावट कैसे आ सकती है। हालांकि खास बात ये है कि नेताओं ने अपने इन सुझावों के साथ ही अपने पत्र में ये भी कहा है कि गांधी-नेहरू परिवार हमेशा पार्टी का ‘अभिन्न अंग’ बने रहेंगे।

गौरतलब है कि सोनिया गांधी के कमान संभालने के बाद शायद यह पहला मौका था जब पार्टी के नेताओं ने शीर्ष नेतृत्व से अपनी कोई बात कही थी, वरना ज्यादातर समय परिवार बचाने की ही बात होती है। हालांकि इस बार भी जिस तरह से बाकी नेताओं ने परिवार को बचाने की कोशिश शुरू कर दी उससे यह साफ जाहिर होता है कि पार्टी नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं या समझना नहीं चाहते कि परिवार और पार्टी अलग अलग है और नेता कार्यकर्ता पार्टी के लिए हैं, परिवार के लिए नहीं।

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पार्टी के कई अन्य वरिष्ठ एवं युवा नेताओं ने सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व में भरोसा जताया और इस बात पर जोर दिया कि गांधी परिवार ही पार्टी को एकजुट रख सकता है।

दरअसल कांग्रेस पार्टी की परेशानी यही है। कांग्रेस को लगातार दूसरे आम चुनाव में भयानक हार का सामना करना पड़ा। 2014 में महज 44 लोकसभा सीटें लाने वाली पार्टी 2019 के आम चुनाव में इस आंकड़े में सिर्फ आठ की बढ़ोतरी कर सकी है। अभी तक कहा जाता था कि गांधी परिवार एक गोंद की तरह कांग्रेस को जोड़े रखता है क्योंकि इसका करिश्मा चुनाव में वोट दिलवाता है लेकिन साफ है कि वह करिश्मा अब काम नहीं कर रहा है। पर कांग्रेस के परिवार समर्थक नेताओं को यह बात समझ नहीं आ रही है।

आपको याद दिला दें कि गांधी नेहरू परिवार के तीन सदस्य सोनिया, राहुल और प्रियंका कांग्रेस में तीन सबसे प्रभावशाली भूमिकाओं में हैं और ठीक उसी वक्त पार्टी सबसे कमजोर हालत में है।

हालांकि इस दौरान कुछ राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में पार्टी का प्रदर्शन जरूर बेहतर हुआ। इनमें से कुछ में पार्टी सत्ता में भी है लेकिन इसका श्रेय शीर्ष नेतृत्व के साथ ही स्थानीय विकल्प और एंटी इनकंबेंसी वोट को जाता है। पार्टी जहां पर बेहतर तैयारी के साथ मैदान में उतरी जनता ने उसे वोट दिया। हालांकि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इनमें से कुछ जगहों पर बगावत पर लगाम लगा पाने में नाकाम रहा। बगावत करने वाले ज्यादातर नेताओं का आरोप है कि शीर्ष नेतृत्व खासकर राहुल गांधी उनके मिलने का समय नहीं देते हैं। इसके चलते मध्य प्रदेश में सत्ता गंवानी पड़ी, गुजरात में बड़ी संख्या में विधायकों और नेताओं ने साथ छोड़ दिया। राजस्थान में लंबी जद्दोजहद के बाद किसी तरह से सरकार बच गई। 

ऐसे में सीडब्ल्यूसी की बैठक में बदलाव पर चर्चा हो सकती थी। पत्र के बहाने कुछ बदलाव करके गांधी नेहरू परिवार दिखावे के लिए ही पार्टी को लोकतांत्रिक तरीके से चलता हुआ साबित कर सकता था लेकिन इसके बजाय सीडब्ल्यूसी की बैठक में लीपापोती शुरू हो गई।

सूत्रों के मुताबिक सीडब्ल्यूसी की बैठक काफी हंगामेदार रही और अधिकतर सदस्यों ने पत्र लिखने वाले नेताओं को निशाने पर लिया। अंबिका सोनी और कुछ अन्य नेताओं ने पत्र लिखने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पत्र लिखने वाले नेताओं पर निशाना साधा और कहा कि जब सोनिया गांधी अस्वस्थ थीं और कांग्रेस मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में लड़ाई लड़ रही थी तो इस तरह का पत्र क्यों लिखा गया?

कुछ खबरों में कहा गया था कि राहुल गांधी ने यह आरोप लगाया कि पत्र लिखने वाले नेता भाजपा के साथ साठगांठ कर रहे हैं जिसके बाद गुलाम नबी आजाद ने पार्टी से इस्तीफे की पेशकश की, हालांकि बाद में कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि गांधी की तरफ से ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की गई।

यानी जरूरी मसलों पर चर्चा ही नहीं हुई। यह साफ है कि बिना नेतृत्व का मसला सुलझाए और संगठन में जरूरी बदलाव किए कांग्रेस का पुनर्जन्म नहीं होने वाला है लेकिन हर जरूरी सवाल से कांग्रेस दूर भाग रही है। यह जितने लंबे समय तक चलता रहेगा पार्टी को नुकसान ही पहुंचाएगा लेकिन इसकी परवाह शीर्ष नेतृत्व को नहीं है। ऐसे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि इस हालत में कांग्रेस रसातल की ओर नहीं जाएगी तो किस ओर जाएगी?

इसे भी पढ़ें : विश्लेषणः कांग्रेस का असल संकट विचारहीनता और स्वप्नहीनता है!

 

Congress
sonia gandhi
Rahul Gandhi
cwc
MANMOHAN SINGH
ghulam nabi azad

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

ख़बरों के आगे-पीछे: पंजाब में राघव चड्ढा की भूमिका से लेकर सोनिया गांधी की चुनौतियों तक..

त्वरित टिप्पणी: जनता के मुद्दों पर राजनीति करना और जीतना होता जा रहा है मुश्किल

मणिपुरः जो पार्टी केंद्र में, वही यहां चलेगी का ख़तरनाक BJP का Narrative

चुनाव नतीजों के बाद भाजपा के 'मास्टर स्ट्रोक’ से बचने की तैयारी में जुटी कांग्रेस

यूपी चुनाव हलचल: गठबंधन के सहारे नैया पार लगाने की कोशिश करतीं सपा-भाजपा

नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!

विपक्षी एकता में ही है देश की एकता

बीच बहस: विपक्ष के विरोध को हंगामा मत कहिए

सत्ता की चाह में डूबे नेताओं की आदत है पार्टी बदलना


बाकी खबरें

  • प्रगतिशील वर्गों का हंगरी के समलैंगिकता संबंधी क़ानून पर हमला
    पीपल्स डिस्पैच
    प्रगतिशील वर्गों का हंगरी के समलैंगिकता संबंधी क़ानून पर हमला
    18 Jun 2021
    पीडोफ़िलिया से लड़ने की आड़ में हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार ने एक क़ानून लागू किया है जो नाबालिगों तक एलजीबीटी के बारे में चर्चा करने वाली सामग्री के प्रसार पर रोक लगाता है।
  • राजनीति: यूपी में ऊंट नहीं ‘हाथी’ किस करवट बैठेगा सबको है इंतज़ार!
    असद रिज़वी
    राजनीति: यूपी में ऊंट नहीं ‘हाथी’ किस करवट बैठेगा सबको है इंतज़ार!
    18 Jun 2021
    कहावत तो ऊंट की है कि देखते हैं ऊंट किस करवट बैठेगा, लेकिन यूपी में राजनीति ख़ासकर 2022 के चुनाव की हवा मापने और भांपने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है यह देखना कि आने वाले दिनों में बीएसपी प्रमुख मायावती…
  • ओएफबी
    रौनक छाबड़ा
    ओएफबी के निगमीकरण के ख़िलाफ़ रक्षा महासंघ अनिश्चितकालीन हड़ताल पर विचार-विमर्श कर रहे हैं
    18 Jun 2021
    केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ऑर्डनेन्स फैक्ट्री बोर्ड को सात नए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में तब्दील किये जाने की योजना को मंजूरी दे दी है। वहीं कर्मचारियों की ओर से 19 जून को विभिन्न…
  • इस संकट की घड़ी में लोगों की मदद करने के लिए सरकार को ख़र्च बढ़ाना चाहिए
    शिन्ज़नी जैन
    इस संकट की घड़ी में लोगों की मदद करने के लिए सरकार को ख़र्च बढ़ाना चाहिए
    18 Jun 2021
    महामारी आने के पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था मांग में कमी की समस्या से जूझ रही है, ऐसे में अर्थशास्त्री और वाम आंदोलन लगातार सरकार से मांग बढ़ाने के लिए अपने ख़र्च में वृद्धि करने की अपील कर रहा है।
  • अगला क़दम : अदालतों को यूएपीए का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों को दंडित करना चाहिए
    एजाज़ अशरफ़
    अगला क़दम : अदालतों को यूएपीए का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों को दंडित करना चाहिए
    18 Jun 2021
    दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा कठोर क़ानूनों को मनमाने ढंग से लागू करने की प्रवृत्ति पर क्यों तंज़ कसा है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License