NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संविधान दिवस की गूंज और लोकतंत्र को कमज़ोर करने के सुनियोजित प्रयास
फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदी जी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज हुई है।
डॉ. राजू पाण्डेय
07 Dec 2021
democracy
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

संविधान दिवस पर आयोजित भव्य कार्यक्रमों का आनंद लेते हुए हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य, मानवाधिकारों की स्थिति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आकलन करने वाले हर अंतर्राष्ट्रीय मापक पर हमारा प्रदर्शन 2014 से क्यों नीचे गिरा है? मार्च 2021 में अमेरिकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने भारत का दर्जा स्वतंत्र से घटाकर आंशिक स्वतंत्र कर दिया था। फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदी जी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज हुई है।

दिसंबर 2020 में अमेरिका के कैटो इंस्टीट्यूट और कनाडा के फ्रेजर इंस्टीट्यूट द्वारा जारी ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2020 में हम 162 देशों में 111 वें स्थान पर रहे। वर्ष 2019 में हम 94 वें स्थान पर थे। स्वीडन के वी डेम इंस्टीट्यूट ने 22 मार्च 2021 को जारी डेमोक्रेसी रिपोर्ट में भारत के दर्जे को डेमोक्रेसी से इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विथाउट बॉर्डर्स(मुख्यालय-पेरिस) द्वारा जारी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में हम 142वें स्थान पर हैं। वर्ष 2016(133) से यह गिरावट जारी है।

इसे भी पढ़ें : भारतीय संविधान पर चल रहे अलग-अलग विमर्शों के मायने!

संवैधानिक प्रजातंत्रों पर संकट विश्व व्यापी है- ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, पोलैंड, हंगरी, टर्की और इजराइल इसके उदाहरण हैं। लेकिन इन देशों की तरह हमारे देश में न तो आपातकाल लगा है, न सेना सड़कों पर गश्त कर रही है, न ही नागरिक अधिकारों को निलंबित रखा गया है बावजूद इसके हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र पर संकट है। यह खतरा उस प्रत्यक्ष, स्पष्ट, दिखने और इस कारण प्रतिकार करने योग्य खतरे से एकदम अलग है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में आपातकाल के दौरान उपस्थित हुआ था। वर्तमान भाजपा सरकार अपने दोनों कार्यकालों में और विशेषकर प्रथम कार्यकाल में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र पर चरणबद्ध, सुनियोजित, सूक्ष्म, अप्रत्यक्ष आक्रमण करती रही है जिसकी तीव्रता उत्तरोत्तर बढ़ी है और द्वितीय कार्यकाल में इसे स्थूल रूप में देखा-अनुभव किया जा सकता है।

एक नई और अनूठी रणनीति के तहत सरकार और भाजपा के प्रवक्ता भूतकाल में कांग्रेस द्वारा संवैधानिक प्रावधानों से किए गए खिलवाड़ को चर्चा में बनाए रखते हैं। यह पहले की भूलों द्वारा अपने अनुचित आचरण को न्यायोचित ठहराने की कुटिल चाल ही है।

सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और सरकार का अंतर चरणबद्ध रूप से मिटाया जा रहा है। सरकार और राष्ट्र दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं। सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी या उसकी विचारधारा का विरोध राजद्रोह कहा जा रहा है। सरकार की नीतियों की आलोचना राष्ट्रविरोधी गतिविधि का दर्जा प्राप्त कर रही है। सत्ता को उत्तरदायी और प्रशासन को जिम्मेदार बनाने वाली संस्थाओं को कमजोर किया गया है। न्यायपालिका को दबाव में लाया जा रहा है। एक ओर तो न्यायपालिका पर सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और क्रियाकलापों का अनुचित और असंवैधानिक होने के बावजूद  समर्थन करने का दबाव है तो दूसरी ओर उसे बहुमत को पसंद आने वाले निर्णय देने का परामर्श दिया जा रहा है। भ्रष्टाचाररोधी प्रक्रियाओं को विकास में बाधक अवरोधों के रूप में चित्रित किया जा रहा है।

लोकतंत्र को बहुसंख्यक तंत्र में बदलने की कोशिश है जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए बहुत कम स्थान एवं सम्मान है। संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करने के यह प्रयास अनेक आक्रामक और आकर्षक नारों पर टिके हैं- उग्र असमावेशी राष्ट्रवाद, तीव्र गति से बाधा रहित विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, मजबूत और निर्णय लेने वाली सरकार, नया भारत, बहुसंख्यक वर्चस्व आदि। इन नारों के आलोक में यह प्रचारित किया जा रहा है कि सशक्त देश बनने के लिए हमें थोड़ा कम लोकतांत्रिक होना होगा, जरा अधिक प्रतिशोधी और हिंसक बनना होगा; लोकतंत्र में अधिकारों का मजा हमने खूब ले लिया अब बारी कर्त्तव्य पालन की है(यह कोई सार्वभौम नागरिक कर्त्तव्य नहीं हैं बल्कि सत्ताधारी पार्टी और उसकी विचारधारा की सफलता के लिए आवश्यक कर्त्तव्य हैं)। इस बात की पूरी तैयारी है कि हमें तर्कशील, सजग एवं सतर्क नागरिक से अंधभक्त और आज्ञापालक प्रजा में तबदील कर दिया जाए। 

प्रत्यक्ष सरकारी दमन का स्थान अब सरकार समर्थकों की भाषिक एवं वैचारिक हिंसा ने ले लिया है। इन्हें "जाग्रत बहुसंख्यक समुदाय" के ऐसे प्रतिनिधियों में रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो मर्यादा और सहनशीलता जैसे उन "दुर्गुणों" से सर्वथा मुक्त हैं जिनके कारण बहुसंख्यक समुदाय की कथित "दुर्दशा" हुई है।

दरअसल यह सरकार संरक्षित ट्रोल समूह हैं जिनके वित्त पोषण की सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी। हिंसा और घृणा फैलाने के अतिरिक्त इतिहास के विकृतिकरण का उत्तरदायित्व भी इन पर है। सिनेमा, संगीत, साहित्य, पत्रकारिता, हास्य-व्यंग्य तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों पर इनका निर्णय अंतिम होता है और अपनी नापसंदगी का भोंडा, अश्लील एवं हिंसक इज़हार करने की स्वतंत्रता इन्हें मिली हुई है। भाषिक-वैचारिक हिंसा को भौतिक हिंसा में बदलते देर नहीं लगती और हम मॉब लिंचिंग एवं भीड़ द्वारा न्याय के दृश्य देखते हैं। 

यह आश्चर्यजनक है कि अधिकांशतः अल्पसंख्यक एवं दलित इनका शिकार बनते हैं, प्रायः आरोप बहुसंख्यक वर्चस्व की हिमायत करने वाले चरम दक्षिणपंथी संगठनों पर लगते हैं और लगभग हमेशा इन पर कोई खास कार्रवाई नहीं होती। इसके बाद भी अल्पसंख्यक समुदाय से बहुसंख्यक समुदाय को होने वाले खतरे का नैरेटिव जोर शोर से फैलाया जाता है। पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के एक बड़े भाग के साथ सरकार की लगभग व्यावसायिक हिस्सेदारी है और इनका उपयोग नोम चाम्सकी के शब्दों में कंसेंट मैन्युफ़ैक्चर करने के लिए किया जा रहा है।

आदम शेवोरोस्की का यह कथन बहुत प्रसिद्ध हुआ था- प्रजातंत्र वह प्रणाली है जिसमें पार्टियां चुनाव हारती हैं। प्रजातंत्र के स्थायित्व के लिए चुनावी जवाबदेही आवश्यक है। प्रत्येक चुनी हुई सरकार को निश्चित समयावधि के बाद स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से जनता के पास जाकर जनादेश लेना होता है। लोकतंत्र तभी स्थायी होता है जब प्रत्येक भागीदार राजनीतिक दल की किसी न किसी रूप में सत्ता में हिस्सेदारी की संभावना जीवित होती है। किसी राजनीतिक दल अथवा वर्ग को पूरी तरह स्थायी या अस्थायी रूप से मुकाबले से बाहर कर देना लोकतंत्र के स्वास्थ्य हेतु अच्छा नहीं होता।

भाजपा की रणनीति कुछ ऐसी ही लगती है जब इसके नेता कांग्रेस मुक्त भारत जैसी अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते हैं। यह कथन स्वस्थ चुनावी स्पर्धा में  प्रमुख प्रतिद्वंद्वी को हतोत्साहित करने के प्रयास से एकदम अलग शत्रु के सफाए जैसी उग्र भावना को दर्शाता है। प्रधानमंत्री पूरे देश में लोक सभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव अनेक बार दे चुके हैं। उन्हें अपने चुनाव जिताऊ करिश्मे का यकीन है और यह भी पता है कि उन्हें चुनौती देने वाला कोई ताकतवर विपक्षी नेता नहीं है। उनके मन में यह आशा भी है कि देशभक्ति, राष्ट्रहित, राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंड भारत तथा डबल इंजन की सरकार द्वारा तीव्र विकास जैसे मुद्दे क्षेत्रीय दलों के विधानसभा में प्रदर्शन पर विपरीत प्रभाव डालेंगे और केंद्र सरकार पर नियंत्रण रखने के प्रमुख साधन के रूप में उभरने वाले क्षेत्रीय दल धीरे धीरे समाप्त हो जाएंगे।

एक देश-एक चुनाव नारे को न्यायोचित ठहराने के लिए जो तर्क दिए जा रहे हैं वे प्रबंधकीय कौशल पर आधारित हैं यथा खर्च में कमी, कार्यकुशलता आदि। आदरणीय गृह मंत्री ने लॉ कमीशन को लिखे अपने पत्र में सरकारों के निश्चित एवं अपरिवर्तनीय कार्यकाल की सिफारिश की थी जो सीधे सीधे चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा आवश्यक होने पर सरकार को हटाने के लोकतांत्रिक अधिकार के विरुद्ध है। राष्ट्रपति प्रणाली भाजपा और मोदी जी का अंतिम अभीष्ट है, प्रयास उसके निकटतम पहुँचने वाली कोई व्यवस्था कायम करने का है।

भाजपा की चुनावी मशीन की अपराजेयता की चर्चा सर्वत्र है किंतु इसे ताकत देने वाले अर्थ तंत्र की चर्चा एकदम नहीं है। वर्ष 2014 में भाजपा और कांग्रेस को विदेशी योगदान कर्त्ताओं से अनियमित रूप से धन लेने का दोषी पाया गया था। भाजपा ने सत्ता में होने का लाभ उठाकर एफसीआरए में ही संशोधन कर दिया, विदेशी कंपनियों की परिभाषा संशोधित की गई और भूतलक्षी प्रभाव से अनियमितता को नियम संगत बनाया गया। इतना ही नहीं अब दानकर्ताओं की पहचान को पूर्णतः गुप्त रखने वाले इलेक्टोरल बांड अस्तित्व में हैं। भाजपा ने 2019 के चुनावों से पहले 2410 करोड़ रुपए का फण्ड इकट्ठा किया जिसका 60 प्रतिशत अर्थात 1450 करोड़ रुपए इलेक्टोरल बांड से आए थे। कांग्रेस एवं अन्य क्षेत्रीय पार्टियां इलेक्टोरल बांड से धन प्राप्ति के मामले में बहुत पीछे हैं और हो सकता है कि उत्तरोत्तर महंगे होते जा रहे चुनावों में पैसे की कमी उनके प्रदर्शन को प्रभावित करे।

उग्र दक्षिणपंथ और कट्टर हिंदुत्व की हिमायत करने वाली शक्तियां एक लंबे समय से जनांकिकी परिवर्तनों का स्वप्न देखती रही हैं जब अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में बहुसंख्यक समुदाय की जनसंख्या बढ़ाकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अल्पसंख्यक हर स्थान पर अल्पसंख्यक ही रहें। घुसपैठियों को निकाल बाहर करने और कश्मीर में देश भर से लोगों को बसाने के वादों के पीछे दबी जुबान में जनसंख्यात्मक वर्चस्व का तर्क दिया जाता है। कुल मिलाकर कोशिश यह है कि अल्पसंख्यकों के निर्वाचित होने की संभावना शून्य हो जाए और वे संसद-विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व प्राप्त न कर सकें।

ये भी देखें: 6 दिसंबर,1992 : सिर्फ़ बाबरी मस्जिद नहीं, ढहा था लोकतंत्र का स्तंभ

चुनाव आयोग पिछले पांच वर्षों में न केवल चुनाव में होने वाले अंधाधुंध खर्च पर अंकुश लगाने में असफल रहा है बल्कि आदर्श आचार संहिता का अनुपालन सुनिश्चित करने में भी लाचार नजर आया है। घृणा फैलाकर धार्मिक ध्रुवीकरण करने वाले भाषणों के प्रति चुनाव आयोग अतिशय सहिष्णु रहा है और उसके द्वारा भाषणकर्ताओं को दिए गए दंड प्रतीकात्मक रहे हैं। चुनाव आयोग पर सत्ताधारी दल के शीर्ष नेता को चुनाव प्रचार के लिए सहूलियत और समय देने वाले चुनाव कार्यक्रम तैयार करने के आरोप भी लगे हैं। 

सरकार विपक्ष के नेता की नियुक्ति को लेकर अनिच्छुक लगती है। 1977 के एक विधान के अनुसार सबसे बड़े प्रतिपक्षी दल का नेता जिसे लोकसभा अध्यक्ष इस रूप में मान्यता भी दें नेता प्रतिपक्ष माना जाता है। 2014 में बीजेपी द्वारा नियुक्त अटॉर्नी जनरल ने तर्क देते हुए कहा कि किसी भी प्रतिपक्षी दल की सदस्य संख्या सदन के कोरम(55 सदस्य) के बराबर नहीं है इसलिए लोकसभा अध्यक्ष नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के लिए बाध्य नहीं हैं। यह भी चकित करने वाला था कि अक्टूबर 2014 में मुम्बई के आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली के आवेदन पर उत्तर देते हुए लोकसभा के अवर सचिव के सोना ने जानकारी दी कि नेता प्रतिपक्ष के चयन के लिए न्यूनतम सीटों का प्रावधान नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया किंतु आश्चर्यजनक रूप से पूरे 5 वर्षों का कार्यकाल पूर्ण होने तक इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ।

सरकार के कामकाज पर नियंत्रण रखने वाली चौथी शाखा की अनेक संस्थाओं में यथा सीबीआई के निदेशक या सूचना आयुक्त अथवा फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिपक्ष के नेता की अहम भूमिका होती है। इसके अभाव में नियुक्ति प्रक्रिया बाधित होने लगी। अब सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और बिना नेता प्रतिपक्ष के इस तरह की नियुक्तियों की अनुमति दे दी। इस प्रकार सरकार इन महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपने मनचाहे प्रमुखों को नियुक्त कर सकी।

एक जनवरी 2014 को राष्ट्रपति ने संसद द्वारा पारित लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून को स्वीकृति दी थी। भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सत्ता हासिल करने वाली मोदी सरकार ने लगभग पूरा कार्यकाल बिना लोकपाल के निकाल दिया और अंततः 2019 के आम चुनावों के पहले एक ऐसी समिति द्वारा जिसमें सत्ता पक्ष के सदस्यों का बहुमत था अपारदर्शी तरीके से लोकपाल की नियुक्ति की गई।

आरटीआई एक्ट को कमजोर करने की सरकार की कोशिशें लगातार चर्चा में रही हैं और आरटीआई कार्यकर्ताओं को बार बार सड़कों पर आना पड़ा है। 2013 के केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश में कहा गया था कि राजनीतिक दल आरटीआई एक्ट की परिधि में आते हैं क्योंकि वे आरटीआई एक्ट के सेक्शन 2 (एच) के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' हैं।

8 साल बीत चुके हैं फिर भी एक भी पार्टी सीआईसी के आदेश और आरटीआई एक्ट का अनुपालन नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर ने सूचना के अधिकार कानून के कमजोर होने के उदाहरण स्वरूप पीएम केयर्स फंड के बारे में सूचना के अभाव की विस्तृत चर्चा की थी।

9 मई 2014 को पारित व्हिसिल ब्लोअर एक्ट को अधिसूचित करने में सरकार को रुचि नहीं दिखती। इसमें ऐसे संशोधन किए गए हैं जिनसे यह अर्थहीन बन गया है। यदि व्हिसिल ब्लोअर भ्रष्टाचार के किसी मामले में एक सामान्य नागरिक द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त होने वाली जानकारी से अधिक जानकारी देता है तो उसे मिलने वाली सुरक्षा समाप्त हो जाएगी तथा उस पर ऑफिस सीक्रेट एक्ट के तहत मुकद्दमा चलाया जा सकेगा।

ऑफिस सीक्रेट एक्ट के उल्लंघन तथा न्यायालय की अवमानना के मामलों का उपयोग  उन खोजी पत्रकारों पर करने की धमकी बार बार सरकार की ओर से आती रही है जो भ्रष्टाचार एवं अनियमितता को उजागर करते हैं।

2019 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार  यूएपीए के तहत एक वर्ष में गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की कुल संख्या 1948 थी। इस कानून के अंतर्गत वर्ष 2016 से लेकर वर्ष  2019 तक 5922 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए थे। किंतु इनमें से केवल 132 व्यक्तियों पर दोष सिद्ध हो सका। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि यूएपीए का दुरुपयोग किया जा रहा है।

राफेल सौदे के अंकेक्षण के समय सीएजी द्वारा अंतिम रिपोर्ट दिए जाने से तीन माह पहले ही सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट को यह बता दिया गया था कि राफेल सौदे में कीमत संबंधी विवरण रिपोर्ट का हिस्सा नहीं होगा क्योंकि इसे गोपनीयता की दृष्टि से हटा लिया जाएगा।

सीबीआई और ईडी की गिरती साख से हम सभी परिचित हैं। यह संस्थाएं असहमत स्वरों को भयभीत करने का उपकरण बन कर रह गई हैं। सीबीआई में सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच फरवरी 2020 में हुआ विवाद और इसमें देश के शीर्ष नेतृत्व का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि इन संस्थाओं की स्थिति चिंताजनक है।

संसद में भी सरकार असंसदीय परंपराओं की स्थापना के नए दृष्टांत प्रस्तुत कर रही है। कोरोना के स्वास्थ्य आपातकाल जैसे हालातों में अध्यादेश के रूप में तीन कृषि कानूनों का लाना, उन्हें बिना विस्तृत चर्चा और संसदीय समिति द्वारा छानबीन के आननफानन में अनुचित ढंग से पारित कराना और अब व्यापक जनअसंतोष को देखते हुए इन्हें एक विधेयक के माध्यम से वापस ले लेना यह दर्शाता है कि सरकार, सदन द्वारा सुनवाई के संसद सदस्यों के अधिकार पर भरोसा नहीं करती। सरकार सदन में अराजकता और गतिरोध को प्रोत्साहित करती लगती है क्योंकि इस तरह वह बिना चर्चा के कानूनों को आसानी से पारित करा सकती है। पहले भी सरकार विवादित आधार कानून को मनी बिल के रूप में पेश कर पारित करा चुकी है। सरकार राज्यसभा में जहां वह अल्पमत में थी-  चर्चा से बचना चाहती थी इसलिए उसने यह रास्ता अपनाया। आश्चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर के फैसले को सही ठहराया।

सरकार को उत्तरदायी बनाने वाली और उस पर नियंत्रण रखने वाली संवैधानिक संस्थाओं और प्रावधानों को कमजोर करने की कोशिश लोकतंत्र के लिए घातक है। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार मारिया रेसे का यह कथन हमें हमेशा याद रखना चाहिए  "तथ्यों के बिना आप के पास सत्य नहीं हो सकता है। सत्य के बिना आप के पास विश्वास नहीं हो सकता और इनमें से किसी के बिना आप लोकतंत्र नहीं हो सकते।"

Indian constitution
Constitution of India
B R Ambedkar
Constitutional right
democracy
Narendra modi
Modi government

बाकी खबरें

  • sex ratio
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: चिंताजनक स्थिति पेश कर रहे हैं लैंगिक अनुपात और घरेलू हिंसा पर NFHS के आंकड़े
    04 Dec 2021
    जन्म के दौरान लड़के-लड़कियों के अनुपात में पिछले पांच सालों में बहुत गिरावट आई है. अब 1000 लड़कों पर सिर्फ़ 878 महिलाएं हैं। जबकि 2015-16 में 1000 लड़कों पर 954 लड़कियों की संख्या मौजूद थी।
  • NEET-PG 2021 counseling
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नीट-पीजी 2021 की काउंसलिंग की मांग को लेकर रेजीडेंट डॉक्टरों ने नियमित सेवाओं का किया बहिष्कार
    04 Dec 2021
    ‘‘ओपीडी सेवाएं निलंबित करने से प्राधिकारियों से कोई ठोस जवाब नहीं मिला तो हमें दुख के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि हम फोरडा द्वारा बुलाए देशव्यापी प्रदर्शन के समर्थन में तीन दिसंबर से अपनी सभी…
  • Pilibhit
    तारिक अनवर
    भाजपा का हिंदुत्व वाला एजेंडा पीलीभीत में बांग्लादेशी प्रवासी मतदाताओं से तारतम्य बिठा पाने में विफल साबित हो रहा है
    04 Dec 2021
    नागरिकता और वैध राजस्व पट्टे की उम्मीदें टूट जाने के साथ शरणार्थियों को अब पिछले चुनावों में भाजपा का समर्थन करने पर पछतावा हो रहा है।
  • Gambia
    क्रिसपिन एंवाकीदेऊ
    गाम्बिया के निर्णायक चुनाव लोकतंत्र की अहम परीक्षा हैं
    04 Dec 2021
    गाम्बिया में राष्ट्रपति पद का चुनाव हो रहा है। पर्यवेक्षकों का मानना है ये चुनाव गाम्बिया के लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण अग्निपरीक्षा हैं। 
  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License