NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
संवैधानिक नैतिकता बनाम लोकलुभावन वास्तविकता
न्यायमूर्ति गोगोई के राज्यसभा में नामांकन की स्वीकृति संवैधानिक नैतिकता और लोकलुभावन वास्तविकता के बीच मौजूद अनिश्चित तनाव है।
अजय गुदावर्ती
26 Mar 2020
गोगोई

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने और संवैधानिक संकट की महामारी की ओर इशारा करने वाले कई टिप्पणीकार सख्त टकराव को उजागर करते हैं जो आज हम संवैधानिक नैतिकता और व्याप्त लोकलुभावन वास्तविकता के बीच सामना कर रहे हैं। ये दो ढ़ांचे आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक और संस्थागत जीवन के सुनियोजन का एक अलग तरीका है। जबकि संवैधानिक संकट का मातम और ख़तरा जो एक उदार लोकतांत्रिक भावना के लिए उठाता है वह वास्तविक है, लोकलुभावन वास्तविकता की पेशकश करने के संदर्भ में जबतक हम इसका विश्लेषण नहीं करेंगे केवल यह इंगित करने के लिए यह पर्याप्त नहीं हो सकता है।

लोकतंत्र के संसदीय रूप में संवैधानिक व्यवस्था जिसे भारत ने अपनाया था वह कानून के शासन के सिद्धांतों पर आधारित है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे पर आधारित है। शक्तियों का ये बंटवारा राज्य की सामूहिक शक्ति को एक तरीके से संगठित करने का एक तरीका है ताकि सत्ता को केंद्रीकृत न किया जा सके, लेकिन यह राजनीति में अलग अलग हित समूहों को भी मान्यता देता है जिनका परिणाम स्वरूप एक दूसरे के साथ संघर्ष या तनाव क़ायम रहता है।

सरकार के अंगों के बीच लाभकारी तनाव हितों के टकराव को दर्शाता है जो धरातल पर भी मौजूद है। संवैधानिक नैतिकता के हिस्से के रूप में यह उम्मीद की जाती है कि इस तरह की व्यवस्था न केवल समावेशी होगी बल्कि यह भी स्वीकार करेगी कि कुछ संघर्ष अपरिवर्तनीय हैं। यह मानता है कि सामूहिक लक्ष्यों और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है। प्रत्येक समाज को स्थिरता प्राप्त करने के लिए सामान्य मूल्यों और सहमति की आवश्यकता होती है, लेकिन यह अपने आप में व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्र वाक्य के अधिकार के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है। शक्तियों का बंटवारा तनाव के किसी भी समाधान को प्राप्त किए बिना भी इस तनाव को संघर्ष में धकेले बिना क़ायम रखने का एक तरीक़ा है। तनाव को निरंतर और अकाट्य माना जाता है।

इसी तरह संस्थागत मामलों के प्रबंधन में हमारी प्रक्रियाएं स्वीकृत सर्वसम्मति के साथ सह-अस्तित्व के लिए तनाव और हितों के टकराव की आवश्यकता को दर्शाती हैं। मिसाल के तौर पर जिस तरह से संसद के अध्यक्ष की परिकल्पना की गई है, वह विशिष्टता का पद है और लुभावना भी: सदन के अध्यक्ष को तटस्थ होना चाहिए, भले ही वह किसी पार्टी से संबंध रखते हों और उस विशेष पार्टी की विचारधारा और सांसद होने के नाते अपना वह पद धारण करते हों। अध्यक्ष सदन के नियमों के अनुसार काम करते हैं न कि अपनी पार्टी के पक्षपातपूर्ण हितों के द्वारा। कोई उस घटना को याद कर सकता है कि जब उनकी पार्टी सरकार से बाहर हो गई तो सोमनाथ चटर्जी ने स्पीकर पद से इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया था कि स्पीकर के रूप में वे "दलगत राजनीति से ऊपर" हैं जबकि उनकी पार्टी ने इस राजनीतिक निर्णयों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से विश्वासघात के रूप में उनके फैसले को लेकर एहसास कराया। बाद में उन्हें अनुशासनहीनता और पार्टी लाइन का पालन न करने को लेकर पार्टी से निकाल दिया गया।

चटर्जी का मामला उस तनाव की प्रकृति पर प्रकाश डालता है जिस पर संवैधानिक नैतिकता आधारित है। क्या वह अपनी संवैधानिक स्थिति को लेकर सही थे या वह एक शिक्षित व्यक्ति होने की संवेदनशीलता को दर्शा रहे थे जो राजनीतिक संगठन के लोकप्रिय या लोकलुभावन तर्क को मानता है, कि यह "जनता" का प्रतिनिधित्व करता है जिसने इसे चुना था? संवैधानिक सिद्धांत, भले ही इसे प्रस्तुत किया जाता है और संप्रभु शक्ति के रूप में लोकप्रिय लोकतंत्र के साथ एक आवश्यक तनाव में रहते हैं। संप्रभुता लोकप्रिय इच्छाशक्ति से अलग न किए जा सकने और संवैधानिक मानदंडों को बनाए रखने की आवश्यकता के बीच बिखरा हुआ है।

संवैधानिक मानदंड स्वयं अमूर्त सिद्धांत नहीं हैं बल्कि राष्ट्र के इतिहास का परिणाम है। वे भविष्य में प्राप्त होने वाली चीजों की प्रतीक्षा की दृष्टि और संक्रमण या ऐतिहासिक प्रक्रिया को प्रस्तुत करते हैं जो अतीत को भविष्य से जोड़ता है। यह ऐतिहासिक स्मृति के प्रति हमारी निष्ठा है जो हमें एक प्रामाणिक सामूहिक संस्था बनाती है।

उत्तर औपनिवेशिक लोकतंत्र में लोकप्रिय प्रतिनिधित्व और संवैधानिक नैतिकता की दो प्रक्रियाएं असहमति पर निर्भर रहीं। ये विचार समय के साथ दोनों को मिलाने का था, लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम समाज को कितना संतुलित बनाते हैं। भारत में सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बरकरार रहीं, जबकि दोनों को मिलाने का काम भी जारी रहा। लोकप्रिय इच्छाशक्ति के अभाव वाले ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने कानून के शासन के प्रक्रियात्मक सिद्धांतों और प्रक्रियात्मक तटस्थता के सिद्धांतों को कायम रखते हुए स्पष्ट रुप से अपनी वैधता को बरकरार रखा जो इसे शक्तियों के पृथक्करण जैसी व्यवस्था द्वारा पेश किया गया था। यह ऐतिहासिक संकेत उपनिवेश काल के बाद भी जारी रही।

आज जो संकट हम देख रहे हैं - राज्यसभा में जस्टिस गोगोई के नामांकन की स्वीकृति के साथ पृथक्करण के सिद्धांत के साथ समझौता किया गया है - यह संवैधानिक नैतिकता और अंतर्निहित लोकलुभावन वास्तविकता के बीच अनिश्चित तनाव की निरंतरता है। न्यायमूर्ति गोगोई ने कानून का उल्लंघन नहीं किया है लेकिन संवैधानिक नैतिकता किया है, जो कि आंशिक रूप से जानबूझ कर किया गया और स्वैच्छिक है।

संवैधानिक नैतिकता के विपरीत लोकलुभावन वास्तविकता है। वर्तमान राजनीतिक शासन को संवैधानिक नैतिकता से नहीं बल्कि लोकलुभावन वास्तविकता की अनिवार्यता से निर्देशित किया जाता है - भले ही भाषणों में प्रधानमंत्री संविधान का पालन करते हों और उसका हवाला देते हों। लोकलुभावन विचार के हिस्से के रूप में संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत प्रभावित हैं और संदिग्ध बने हुए हैं। स्थिरता प्राप्त करने और समावेशीता प्रदान करने के तरीके के रूप में लाभकारी तनाव उद्देश्य की एकता और पहचान की समानता की प्रामाणिकता द्वारा प्रतिस्थापित किए जाते हैं। वास्तव में वर्तमान शासन में लोकलुभावन दबाव में नीति बनाए जाते हैं।

अगर किसी के योजनाओं को तैयार करने या चुनावी नारे लगाने के तरीके पर भी ध्यान दिया जाए तो यह लोकलुभावन दबाव को प्रस्तुत करता है। हाल ही में टैक्स स्कीम 2020 को “विवाद से विश्वास” या इंस्टिलिंग ट्रस्ट द्वारा विवादों को हल करने के रूप में बताया गया है। यहां यह संकल्प को लेकर है और तनाव को कायम रखने को लेकर नहीं है; यह विश्वास को लेकर है कि यह परस्पर विरोधी हितों में संतुलन नहीं कर रहा है। यह इरादे को लेकर है, प्रक्रियाओं को लेकर नहीं। इसे राष्ट्र निर्माण का अधिक प्रत्यक्ष और प्रामाणिक तरीका माना जाता है।

इसी तरह की एक शैली में न्यायमूर्ति गोगोई ने टिप्पणी की कि उनका नामांकन अब संसद और न्यायपालिका को "राष्ट्र-निर्माण" के एक असाधारण लक्ष्य की दिशा में करीब से काम करने की अनुमति देता है। दूरी बनाए रखने के बजाय यह एक नए प्रकार के "अनुसंधान" को हासिल करने को लेकर है।

क्या यह एक लोकप्रिय कल्पना से बेहतर तरीके से जुड़ता है कि हम कौन हैं या हम क्या बनने वाले हैं: अधिक एकीकृत और एक-सा जो एकता और शक्ति को प्रकट करता है? यह एक अलग बात है कि यह एक बहुमत की सरकार को अनुमति देता है जो न केवल अल्पसंख्यकों के अधिकारों से समझौता करता है बल्कि बहुसंख्यक समुदाय से भी कई वर्ग को बाहर करता है और यह भी बोलने की आज़ादी और व्यक्तिगत अधिकारों के अधिकार से समझौता करेगा।

जो प्रश्न हमें वास्तव में पूछने की जरूरत है वह यह है कि सत्ता को केंद्रीकृत न करने की संवेदनशीलता, विभिन्न पहचानों और व्यक्तिगत अधिकारों को बनाए रखना लोकप्रिय कल्पना में कोई मायने नहीं रखता? या यह है कि वे मायने रखते हैं, लेकिन एक विभिन्न सांस्कृतिक शैली में काम करते हैं, जो संवैधानिक नैतिकता के लिए प्रतिज्ञा करते हैं उन्होंने सीखने की परवाह नहीं की, लेकिन केवल खुद को बड़ा आदेश देने वाले के रूप में देखा?

लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Constitutional Morality Versus Populist Reality

constitution
Judiciary
Separation of powers
Populism
Justice Ranjan Gogoi

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

ज्ञानवापी कांड एडीएम जबलपुर की याद क्यों दिलाता है

एक्सप्लेनर: क्या है संविधान का अनुच्छेद 142, उसके दायरे और सीमाएं, जिसके तहत पेरारिवलन रिहा हुआ

RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 

मुद्दा: हमारी न्यायपालिका की सख़्ती और उदारता की कसौटी क्या है?

जनतंत्र पर हिन्दुत्व का बुल्डोजर और अंबेडकर की भविष्यवाणी

भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 

शिक्षित मुस्लिम महिलाओं ने हिजाब फ़ैसले को “न्यायिक अतिक्रमण’ क़रार दिया है 

दबाये जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत का बहुलतावादी लोकतंत्र बचा रहेगा: ज़ोया हसन

सामाजिक कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को लगातार दंडित किया जा रहा है: सुधा भारद्वाज


बाकी खबरें

  • एम.ओबैद
    एमपी : ओबीसी चयनित शिक्षक कोटे के आधार पर नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे
    26 Apr 2022
    चयनित शिक्षक पिछले एक महीने से नियुक्ति पत्र को लेकर प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन मांग पूरी न होने पर अंत में आमरण अनशन का रास्ता चयन किया।
  • अखिलेश अखिल
    यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का अमृतकाल है
    26 Apr 2022
    इस पर आप इतराइये या फिर रुदाली कीजिए लेकिन सच यही है कि आज जब देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है तो लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तम्भों समेत तमाम तरह की संविधानिक और सरकारी संस्थाओं के लचर होने की गाथा भी…
  • विजय विनीत
    बलिया पेपर लीक मामला: ज़मानत पर रिहा पत्रकारों का जगह-जगह स्वागत, लेकिन लड़ाई अभी बाक़ी है
    26 Apr 2022
    "डबल इंजन की सरकार पत्रकारों को लाठी के जोर पर हांकने की हर कोशिश में जुटी हुई है। ताजा घटनाक्रम पर गौर किया जाए तो कानपुर में पुलिस द्वारा पत्रकारों को नंगाकर उनका वीडियो जारी करना यह बताता है कि…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जन आंदोलनों के आयोजन पर प्रतिबंध अलोकतांत्रिक, आदेश वापस लें सरकार : माकपा
    26 Apr 2022
    माकपा ने सवाल किया है कि अब जन आंदोलन क्या सरकार और प्रशासन की कृपा से चलेंगे?
  • ज़ाहिद खान
    आग़ा हश्र काश्मीरी: गंगा-ज़मुनी संस्कृति पर ऐतिहासिक नाटक लिखने वाला ‘हिंदोस्तानी शेक्सपियर’
    26 Apr 2022
    नाट्य लेखन पर शेक्सपियर के प्रभाव, भारतीय रंगमंच में महत्वपूर्ण योगदान और अवाम में उनकी मक़बूलियत ने आग़ा हश्र काश्मीरी को हिंदोस्तानी शेक्सपियर बना दिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License