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कोरोना संकट : आपको मालूम है कितनी मुश्किल झेल रहे हैं भारत के स्वास्थ्यकर्मी?
भारत में 70 प्रतिशत नर्स महिलाएं है, जो सबसे अधिक झेलती हैं। घर भी, बाहर भी। अस्पताल में अभी तक पर्याप्त सुरक्षा सुविधाएं नहीं हैं।
कुमुदिनी पति
30 Mar 2020
स्वास्थ्यकर्मी
Image courtesy: Youtube

भारत में हम कोविड-19 के तीसरे स्टेज के मुहाने पर हैं। यह सबसे ख़तरनाक दौर है, और अभी तक हम इसका मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं हैं। स्टेज 3 में पता ही नहीं लगेगा कि संक्रमण कहां से आ रहा है। ऐसे हालात में हमारे देश के स्वास्थ्यकर्मियों पर कितना दबाव आएगा, इसकी कल्पना करना  मुश्किल है। भारत में 70 प्रतिशत नर्स महिलाएं है, जो सबसे अधिक झेलती हैं। दिल्ली की एक सरकारी नर्स से मैंने बात की तो वह नाइट ड्यूटी से लौटी थीं। उन्होंने बताया कि एयरपोर्ट के पास के बड़े होटलों में उनकी ड्यूटी है।

यहां अधिकतर विदेशी लोग क्वरंटाइन में हैं। ‘‘हमें हर दरवाजे़ पर जाकर खटखटाना पड़ता है, फिर लक्षण देखने पड़ते हैं-बुखार व खांसी तो नहीं है, सांस लेने में दिक्कत तो नहीं है। 5 तल्ले ऊपर-नीचे जाकर हालत खराब हो रही है, क्योंकि स्टाफ पर्याप्त नहीं है। घर लौटकर रोज़ सिर से नहाना पड़ता है। फिर घर का सारा काम करती हूं। चक्कर आने लगते हैं।’’ सुरक्षा किट्स के बारे में पूछने पर बताती हैं, ‘‘आज मास्क खत्म हो गए। कई दिनों से बिना ग्लव्स के काम कर रही हूं।’’ इन्हें जाते-आते रोज़ 10 जगह रोककर आई-कार्ड मांगते हैं।

बंगलुरु में कार्यरत एक फार्मेसिस्ट बताने लगीं कि ‘‘फार्मेसी का काम अब दिन भर चल रहा है, क्योंकि लोग खांसी-सर्दी से भी डरने लगे। मुझे डर लगता है कि इतने मरीजों को डील कर रही हूं, न जाने कब संक्रमित हो जाऊं?’’वह बताने लगीं कि सरकार ने चेतने में 2 हफ्ते की देर कर दी वरना पहले लॉकडाउन हो गया होता तो ये नौबत नहीं आती।

मुम्बई-दिल्ली की नर्सों ने बताया ‘‘सड़कों पर घर जा रहे लोगों की कतारें कांवड़ों जैसी हैं, जबकि सभी को अपनी जगह पर रोकना चाहिये था और समस्त सुविधाएं उन तक पहुंचानी थी। इससे संक्रमण बढ़ेगा। किट्स के बारे में पूछने पर उन्होंने एक व्हाट्सऐप वीडियो भेजा जिसमें चीन की एक महिला सुरक्षाकर्मी तीन लेयर का सुरक्षा पोषाक और गॉग्लस सहित तील ग्लव्स पहन रही थी। उन्होंने बताया, ‘‘ये है सही प्रोटेक्टिव गियर और 6 घंटे बाद हमें मास्क और ग्लव्स बदल देने चाहिये। डिसपोज़ल का भी तरीका है। पर ऐसा कुछ नहीं हो रहा।

हमारे पास न पर्याप्त मास्क हैं ने ग्लव्स’’। सुरक्षा की गारंटी कैसे होगी पूछने पर उन्होंने बताया कि स्वाथ्यकर्मियों को प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु विटामिन-सी गोली 2 बार दिन में और बीकॉसूल-ज़िंक एक बार लेने के अलावा कोविड प्रोफिलैक्सिस के लिए एक दवा साप्ताहिक लेने को कहा गया;  जैसे ही बात मीडिया ने लीक की, दवा बाज़ार में खतम हो गई। ये केवल हाई-रिस्क वालों के लिए था। पर, अभी टेस्टिंग किट, मास्क, वेंटिलेटर बड़े अस्पतालों में तक काफी नहीं हैं। देश में केवल डेढ़ लाख टेस्टिंग किट हैं-उन्हें बर्बाद किया जाएगा तो ज़रूरतमंद मरीजों का टेस्ट रुक जाएगा। पर आतंक के दौर में कौन सुने?

गर्भवती महिलाएं भयभीत हैं, उनकी डिलिवरी कहां और कैसे सुरक्षित ढंग से होगी, जबकि अमेरिका ने घर पर डिलिवरी और ऑनलाइन कन्सलटेशन को प्रोत्साहित करना शुरू किया है। भारत में अल्ट्रासाउंड के लिए क्या मोबाइल वैन का प्रबंध हो सकेगा, सोचने की बात है।

मुम्बई की एक नर्स बताने लगीं कि सही वैज्ञानिक तरीके से सूचनाएं प्रसारित नहीं हुईं तो लोगों में पैनिक फैल गया। मज़दूरों को बताया नहीं गया कि उनके लिए क्या व्यवस्था होगी, तो वे गांव भागने लगे। अब उनकी टेस्टिंग तो हुई नहीं थी तो करोना वायरस हमारे हाथ से निकल गया है। अब कम्युनिटी स्तर पर फैलना ही है। उन्होंने कहा ‘‘हम स्वास्थ्यकर्मी सिर पर कफन बांधकर निकलते हैं घर से।

आज हैं कल नहीं भी हो सकते हैं’’। घर में बाई के न आने से खाना पकाना, झाड़ू-पोछा, कपड़े धोना, बच्चों को देखना सबकुछ उनके जिम्मे है। 5 मिनट बैठ नहीं पातीं। ‘‘पर हम इस तरह कब तक काम करेंगे, यदि हमारी प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई और हम संक्रमित हुए तो एक स्टाफ, एक मां, एक घर संभालने वाली बैठ जाएगी। सब काम ठप्प हो जाएगा। इसलिए अभी से प्राइवेट अस्पतालों और क्लिनिक्स के स्टाफ को भी न्यूनतम ट्रेनिंग देकर काम में लगाना चाहिये,’’ वह बोलीं।

बंगलुरु में आईटी कम्पनियों का गढ़ है। कम्पनियों ने जल्दी वर्क फ्रॉम होम नहीं दिया तो कई कर्मी घर नहीं जा सके और पीजी या शेयर्ड फ्लैटों में कैद हैं। बाद में यात्रा पर रोक लग गई। कुछ के पास लैपटॉप नहीं थे इसलिए दोस्तों के साथ शेयर करना पड़ रहा। इसके चलते देर रात तक काम चलता है। कई कर्मियों ने बताया कि काम का लोड बढ़ गया है क्योंकि हम घर से काम कर रहे हैं।

एक लड़की से मैनेजर ने पूछा कि 10 बजे रात तो वो ऑनलाइन थी, तो काम क्यों बंद कर दिया? यानी आप इंटरनेट पर कुछ दूसरा न करें।

‘‘पीजी में केवल नाश्ता और रात का खाना मिलता है। दिन में स्विग्गी से मंगाते हैं। पता नहीं यह सब कितना साफ है’’ एक महिला बोली।

इलाहाबाद की एक डॉक्टर बोलीं, ‘‘इमर्जेंसी में केस मॉनिटर करने पड़ते हैं। मरीजों में भय व्याप्त है। खांसी-सर्दी और हल्का बुखार तो इस मौसम में आम है। दमा वालों को भी मौसम बदलने पर कष्ट होता है। अब हर कोई सोच ले कि कोविड-19 का संक्रमण है, तो हम कहां तक समझाएंगे’’। उन्होंने बताया ‘‘मेडिकल सुविधाओं की कमी के कारण एक ही अस्पताल स्क्रीनिंग कर रहा है और टेस्ट तो लखनऊ में होगा। हम टेस्टिंग में बहुत पीछे चल रहे हैं।’’ इनके पति ऑनलाइन प्रवेश के काम में लगे हैं, बाई नहीं आती तो बेटी दिन भर मां को न पाकर चिढ़चिढ़ी सी हो गई है।

इसी तरह घरेलू महिलाएं भी बेहद परेशान हैं। असम की एक महिला बोलीं “छोटे से घर में पति और बच्चे दिन भर रहते हैं तो ज़रा सी फुर्सत नहीं मिल पाती। बच्चे आपस में लड़ते हैं, बार-बार मना करने पर पार्क और सड़क की ओर भागने लगते हैं तो पकड़कर अंदर करना पड़ता है। फिर घर में बाई नहीं आती तो सारे काम करने पड़ते हैं। बच्चों को काम करने की आदत ही नहीं है; और अब तो पति को ऑनलाइन क्लास लेने को कहा गया है।’’

अगर हम देखें कि अधिक संक्रमण वाले राज्यों में क्या हो रहा है, जहां खाड़ी देशों से लौटे मज़दूर रहते हैं तो केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे प्रदेश इनमें आते हैं। यहां तो आशा कर्मियों को घर-घर जाने को कहा गया है ताकि वे कोविड-19 के बारे में सामुदायिक चेतना बढ़ाएं। दूसरे, कि बाहर से लौटे हुए लोगों की 14 दिनों तक मॉनिटरिंग करनी है-उनके लक्षण देखने हैं। पर इन महिलाओं को एन-95 मास्क और ग्लव्स नहीं दिये गये हैं। हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक और आंध्र में इस मामले में लापरवाही है।

बताया जा रहा है कि हैंड सैनिटाइज़र खत्म है! जब 1000-2500 परिवारों पर एक आशाकर्मी का अनुपात है और इन महिलाओं को अपनी अन्य ड्यूटी के साथ इस काम को करना है, तो ‘‘12-12 घंटे की पाली होती है। फिर घर पर सारे काम करने होते हैं, तो सरकार को हमें विटामिन टॉनिक, दूध और फल अलग से देना चाहिये कि हम जनता की सेवा बेहतर कर सकें’’, एक ने कहा। ‘‘हमें कोरोना वायरस संक्रमण हुआ तो हम कितने घरों को संक्रमित कर देंगे, इसका अंदाज़ा भी हो!’’

दिल्ली सहित कई जगहों के स्वास्थ्यकर्मी ट्वीट कर रहे हैं और सरकार को पत्र लिख रहे कि उन्हें हाउसिंग सोसाइटी वाले धमका रहे हैं कि वे प्रवेश न करें। मकान मालिक इन लोगों से घर खाली करवा रहे हैं-संक्रमण के डर से। ऐसा ही एयरलाइन स्टाफ के साथ भी हो रहा।

हमें अन्य देशों के अनुभवों से सीखना होगा। पहली दुनिया का सबसे विकसित देश अमेरिका के न्यूयार्क की एक नर्स बाथरूम में रोती हैं, क्योंकि मरने वालों को ट्रकों पर फ्रीज़ करके भेजा जा रहा है, कई रोगी कभी अपने परिवार को देख नहीं सकते, ऐसे ही मर रहे। ‘‘यह सब देखकर दिल टूटता है, हम ही उनके परिजन हैं; काम और तनाव से सो नहीं पाते’’। उन्हें चीन और इटली में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की मौत देखकर डर भी लगता है। दूसरी ओर, सुरक्षा गाउन, मास्क आदि तेज़ी से समाप्त हो रहे हैं और मरीजों की संख्या इतनी बड़ी है कि आईसीयू में चलने की जगह नहीं- ऐसे में तो उनकी जान को खतरा है।

सभी स्वास्थ्यकर्मी विनती कर रहे हैं-‘‘हम घर नहीं जा पा रहे, आप घर में रहो, वरना हम सबको कोई नहीं बचा सकता।’’ हमारी सरकार को भी युद्ध स्तर पर संवेदना के साथ हर तबके के बारे में सोचना होगा। सर्वदलीय टास्क फोर्स बनाकर और व्हाट्सऐप पर नागरिक कमेटियां बनाकर देश को संकट से उबारना होगा क्योंकि यह आपात स्थिति है। मीडिया भय पैदा करने की जगह जनता को शिक्षित करे और सकारात्मक अनुभवों को साझा करे, जैसे पुणे के माइलैब डिस्कवरी का सस्ते किट का आविष्कार जो ढाई घंटे में रिज़ल्ट देगा या सिंगापुर के वैज्ञानिकों द्वारा 5 मिनट में टेस्ट रिज़ल्ट देने वाले किट का आविष्कार। जनता भी युद्ध के दौर जैसा अनुशासन रखे।

(कुमुदिनी पति एक महिला एक्टिविस्ट और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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