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कोरोना संकट : कृपया, पीड़ित को ही अपराधी मत बनाइए!
ये ब्लेम गेम... ये कहानी ‘चीन गंदा है’ से शुरू होती है और भारत में कनिका कपूर से होते हुए पलायन करते ग़रीब मज़दूरों और फिर मुसलमान विरोध तक पहुंच जाती है।
मुकुल सरल
31 Mar 2020
कोरोना संकट

हमें एक दुश्मन चाहिए...अपनी हर कमी को छुपाने के लिए, हर नाकामी का ठीकरा फोड़ने के लिए। दिल्ली दंगों में भी यही हुआ और अब कोरोना संकट में भी यही ब्लेम गेम (Blame game) खेला जा रहा है।

‘ये चीनी वायरस है’ और ‘चीन गंदा है’ से शुरू हुआ ये सिलसिला भारत में कनिका कपूर से होते हुए पलायन करते गरीब मज़दूरों से होता हुआ अब अपने अंजाम तक पहुंच गया है। यानी अब उसे सही दुश्मन मिल गया है- मुसलमान। तबलीगी जमात इज्तिमा। अब और क्या चाहिए इस बेकाबू होते हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराने के लिए।

कम टेस्ट या टेस्ट किट की कमी, सुरक्षा उपकरण जैसे मास्क इत्यादि का अभाव, वैटिलेंटर की कमी, डॉक्टर की कमी, इलाज की कमी अब सबका ठीकरा निज़ामुद्दीन मरकज़ और तबलीग-ए-जमात के नाम पर मुसलमानों पर फोड़ दिया जाएगा।

इससे पहले कोशिश की गई पाकिस्तान के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम करने की। कि पाकिस्तान में हिन्दुओं को राशन नहीं दिया जा रहा है। ऐसा झूठा मैसेज बनाने वालों ने और उसे आगे बढ़ाने वालों ने, दोनों ने नहीं पूछा, कि भारत में न जाने कितने हिन्दू अभी भी राशन से महरूम हैं। कि अपनी राजधानी में ही एक वक्त की रोटी के लिए एक शेल्टर होम से दूसरे शेल्टर होम की तरफ़ दौड़ रहे हैं। लेकिन नफ़रत भरी ख़बरें फैलाने वालों को इस सबसे क्या मतलब।

ये लोग अभी हिन्दू से पहले मिडिल क्लास बन गए थे। अभी जब लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली, मुंबई, सूरत और देश के अन्य हिस्सों से पैदल ही अपने घर की ओर चल पड़े ग़रीब मज़दूरों की तस्वीरें आईं तो इन लोगों ने कहा कि यही लोग हैं जो कोरोना फैलाएंगे। एक नेता ने कहा कि ये छुट्टी मनाने जा रहे हैं, एक ने कहा कि पुलिस को इनके पांव तोड़ देने चाहिए। बरेली में सैनेटाइज़ करने के नाम पर मज़दूरों की भीड़ को जिनमें बच्चे भी शामिल थे, केमिकल से नहला दिया गया, बिहार में मज़दूरों के पहुंचते ही स्कूलों में बंद कर दिया गया।

कोरोना के असली मुजरिम तो यही थे न! जी हां, जिनका इस बीमारी को लाने में कोई योगदान नहीं, वही आज इसके लिए सबसे बड़े ज़िम्मेदार हो गए। अपराधी हो गए।

लेकिन गरीबों को दोषी बनाकर मध्यम और उच्च वर्ग की भावना तो संतुष्ट होती थी लेकिन इससे अपनी नाकामियों के खुलासे और चुनावी राजनीति में नुकसान का भी जोखिम था। यानी गरीब-अमीर के जरिये वो राजनीति नहीं सधती जिससे आगे जा कर अपनी कमियों को भी ढंका जा सके और वोटों की फसल भी काटी जा सके। अब वो मिल गया है। वो वर्ग है मुसलमान।

दरअसल दक्षिण दिल्ली के निज़ामुद्दीन पश्चिम इलाके में एक से 15 मार्च के बीच तब्लीग-ए-जमात का इज्तिमा यानी सम्मेलन हुआ। इसे आप सत्संग कह सकते हैं यानी ऐसा कार्यक्रम जिसमें धार्मिक मकसद से लोग एक ख़ास जगह जमा होते हैं और धार्मिक प्रवचन सुनते हैं। बताते हैं कि इसमें दो हज़ार से ज्यादा लोगों ने शिरकत की थी।

इस इज्तिमे में कई देशों से धार्मिक नेता धर्म का प्रचार करने आए थे। भारत के अलग अलग हिस्सों से आए करीब 600 लोगों ने भी इसमें हिस्सा लिया।

अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि कुछ लोगों के कोरोना वायरस से संपर्क में आने की आशंका के बाद इलाके को सील कर दिया गया है।

पिछले हफ्ते श्रीनगर में करीब 60 वर्षीय व्यक्तित की संक्रमण से मौत होने के बाद फिक्र होना शुरू हुई। इस शख्स ने इज्तिमे में शिरकत की थी।

अधिकारियों ने बताया कि भारतीय नागरिक तो ट्रेनों और उड़ानों के जरिये वापस चले गए। देश के कई हिस्सों में सामने आए कुछ मामलों के संपर्क खंगाले गए तो उनका संबंध इस इज्तिमे से निकाला।

इस मरकज़ में कोरोना वायरस के 24 मरीज पाए गए हैं और वहीं इस जमात में शामिल हुए 7 लोगों की मौत हो गई है। जिसमें श्रीनगर के एक व्यक्ति के अलावा 6 तेलंगाना से हैं।

अब सूत्रों के मुताबिक तब्लीगी जमात का नेतृत्व करने के लिए एक मौलाना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का सोमवार को आदेश दिया गया है।

लेकिन सवाल है कि इतना बड़ा आयोजन बिना पुलिस-प्रशासन की अनुमति के तो हो नहीं रहा होगा। साथ ही ये एक से 15 मार्च के बीच था। तब कहीं कोई रोक नहीं थी। इस बीच हमने-आपने होली भी अच्छे से मनाई और लोग दफ़्तर भी आते जाते रहे। इस बीच थोड़ी-बहुत रोक लगाई गई, लेकिन 22 मार्च ‘जनता कर्फ़्यू’ से पहले कहीं भी कोई काम रुका नहीं था। उसी दिन दोपहर बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने 27 या 31 मार्च तक के लॉकडाउन की अलग-अलग घोषणा की थी। लेकिन इस बीच भी सरकार बनाई और गिराई गई और अयोध्या में भी जमावड़ा हुआ।

एनडीटीवी की ख़बर के अनुसार तबलीगी जमात की ओर से अपनी सफाई में कहा गया है कि-

“जब 'जनता कर्फ़्यू' का ऐलान हुआ, उस वक्त बहुत सारे लोग मरकज़ में थे। उसी दिन मरकज़ को बंद कर दिया गया। बाहर से किसी को नहीं आने दिया गया। जो लोग मरकज़ में रह रहे थे उन्हें घर भेजने का इंतजाम किया जाने लगा।

21 मार्च से ही रेल सेवाएं बन्द होने लगीं. इसलिए बाहर के लोगों को भेजना मुश्किल था। फिर भी दिल्ली और आसपास के करीब 1500 लोगों को घर भेजा गया। अब करीब 1000 लोग मरकज़ में बच गए थे।

जनता कर्फ्यू के साथ-साथ 22 मार्च से 31 मार्च तक के लिए दिल्ली में लॉकडाउन का ऐलान हो गया। बस या निजी वाहन भी मिलने बंद हो गए। पूरे देश से आए लोगों को उनके घर भेजना मुश्किल हो गया। 

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का आदेश मानते हुए लोगों को बाहर भेजना सही नहीं समझा। उनको मरकज में ही रखना बेहतर था।

24 मार्च को SHO निज़ामुद्दीन ने हमें नोटिस भेजकर धारा 144 का उल्लंघन का आरोप लगाया। हमने इसका जवाब में कहा कि मरकज़ को बन्द कर दिया गया है। 1500 लोगों को उनके घर भेज दिया गया है। अब 1000 बच गए हैं जिनको भेजना मुश्किल है। हमने ये भी बताया कि हमारे यहां विदेशी नागरिक भी हैं।

इसके बाद हमने एसडीएम को अर्जी देकर 17 गाड़ियों के लिए कर्फ्यू पास मांगा ताकि लोगों को घर भेजा जा सके। हमें अभी तक कोई पास जारी नहीं किया गया। 25 मार्च को तहसीलदार और एक मेडिकल कि टीम आई और लोगों की जांच की गई।

26 मार्च को हमें SDM के ऑफिस में बुलाया गया और DM से भी मुलाकात कराई गई। हमने फंसे हुए लोगों की जानकारी दी और कर्फ्यू पास मांगा। 27 मार्च को 6 लोगों की तबीयत खराब होने की वजह से मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया।

28 मार्च को SDM और WHO की टीम 33 लोगों को जांच के लिए ले गई, जिन्हें राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में रखा गया।

28 मार्च को ACP लाजपत नगर के पास से नोटिस आया कि हम गाइडलाइंस और कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। इसका पूरा जवाब दूसरे ही दिन भेज दिया गया।

30 मार्च को अचानक ये खबर सोशल मीडिया में फैल गई की कोरोना के मरीजों की मरकज़ में रखा गया है और टीम वहां रेड कर रही है।

अब मुख्यमंत्री ने भी मुकदमा दर्ज करने के आदेश दे दिए। अगर उनको हकीकत मालूम होती तो वह ऐसा नहीं करते।

हमने लगातार पुलिस और अधिकारियों को जानकारी दी के हमारे यहां लोग रुके हुए हैं। वह लोग पहले से यहां आए हुए थे। उन्हें अचानक इस बीमारी की जानकारी मिली।

हमने किसी को भी बस अड्डा या सड़कों पर घूमने नहीं दिया और मरकज़ में बन्द रखा जैसा के प्रधानमंत्री का आदेश था. हमने ज़िम्मेदारी से काम किया।

इस बयान के बाद काफ़ी कुछ साफ़ हो जाता है। इसके बरअक्स अगर हम बाकी देश का भी नज़ारा करें तो दिखता है कि 22 मार्च को भी दिन भर जनता कर्फ़्यू का पालन करने वालों ने खुद शाम 5 बजे उस कर्फ़्यू को तोड़ दिया और ताली, थाली और शंख-घंटे-घड़ियाल बजाते हुए सड़कों पर निकल आए। जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी के नेता और प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल थे। यानी किसी को न तो कोरोना के संकट की सही जानकारी थी, न किसी ने प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान या जनता कर्फ़्यू का मतलब समझा था।

23, 24 मार्च को भी इसी तरह राज्यव्यापी लॉकडाउन का उल्लंघन होता रहा। उसके बाद 24 मार्च की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोबार देश के नाम संबोधन में उसी रात 12 बजे से देशव्यापी संपूर्ण बंदी यानी लॉकडाउन की घोषणा की।

इस तरह सही मायने में लॉकडाउन 24 मार्च से शुरू हुआ और तब तक निज़ामुद्दीन मरकज़ यानी सेंटर से काफी संख्या में लोग निकल चुके थे। अगर कुछ लोग रुके थे तो उन्हें निकालने की ज़िम्मेदारी सरकार और प्रशासन की थी। जैसे मज़दूरों के लिए सही व्यवस्था करने की। क्योंकि लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद वे भी मजबूर होकर अपने गांव-घर की तरफ़ निकल पड़े इससे बेपरवाह की उन्हें भी संक्रमण का ख़तरा है। क्योंकि उन्हें भूख और संक्रमण में से एक चुनना था। इसलिए उन्होंने भूखों न मरने का विकल्प न चुनते हुए अपने गांव-घर जाने का फ़ैसला किया।

अब आप किसे दोष देंगे। सरकार की रणनीति और तैयारियों को या इन आम लोगों को। आयोजकों को भी आप एक बार को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, लेकिन बीमार...बीमार-परेशान लोगों को तो अपराधी नहीं ठहरा सकते।

ईमानदारी से कहें तो संपन्न वर्ग से आने वाली कनिका कपूर या अन्य लोग भी इसके दोषी नहीं ठहराए जा सकते जिन्हें विदेश से लौटते समय शुरू में ये जानकारी ही नहीं थी कि वे संक्रमित हैं। ये काम तो सरकार और एयरपोर्ट अथॉरिटी का था कि वो एयरपोर्ट पर ही हर किसी की पूरी जांच करता और संक्रमित या संदिग्ध लोगों को आइसोलेट या क्वारंटाइन करता। 

शुरुआत में मशहूर गायिका कनिका कपूर के कोरोना संक्रमित होने का जैसे ही पता चला मेन मीडिया और सोशल मीडिया में तूफान आ गया और लोग उन्हें एक विलेन, एक अपराधी की तरह देखने लगे। यानी जिस समय व्यक्ति को सबसे ज़्यादा सहानुभूति और केयर की ज़रूरत होती है, उस समय उसे दुश्मन और एक अपराधी बनाकर पेश कर दिया गया। सबने आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर उनका मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया। जब उनके संक्रमित होने के बारे में पता चला और उनको क्वांरेटाइन किया गया तब से उनके खिलाफ ऐसा प्रचार शुरू हुआ कि बस कोरोना की जड़ वही हैं। जबकि एनडीटीवी को फोन पर उन्होंने बताया कि वे 9 मार्च से पहले भारत आईं थीं। उनका कहना है कि उन्होंने कुछ भी नहीं छुपाया है। और जब वे लंदन से भारत (मुंबई) लौटीं उस समय तक भारत में एयरपोर्ट पर भी कुछ काग़ज़ी कार्रवाई के अलावा कोई मेज़र स्टैप नहीं उठाए गए थे और उन्हें जाने दिया गया। इसके बाद वे होली के मौके पर अपने घर लखनऊ आ गईं। अब इसमें उन्हें कैसे दोषी ठहराया जा सकता है।

डॉक्टर खुद कहते हैं कि इस संक्रमण में ज़रूरी नहीं कि शुरुआत में लक्षण दिखने ही लगें। कई लोगों को अंत तक लक्षण नहीं दिखे और वो संक्रमित पाए गए। अब ऐसे में कोई क्या करेगा।

इसका तो एक ही इलाज था जो नहीं किया गया कि पहले ही एयरपोर्ट पर लॉकडाउन होता या अब ज़्यादा से ज़्यादा परीक्षण और फिर इलाज ही इससे निजात दिला सकता है।

कुल मिलाकर हमें कोरोना संकट के समय भी नफ़रत और घृणा का माहौल नहीं बनना चाहिए, वरना कई मासूम इसका शिकार हो जाएंगे।

लेकिन मुश्किल ये है कि आम लोगों को तो समझाया जा सकता है मगर उन लोगों का क्या, जो इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कब किसी मामले में हिन्दू-मुस्लिम का एंगल निकले और वो अपनी राजनीति कर सकें। बलात्कार से से लेकर दंगों तक यही कहानी दोहराई गई है।

आप यक़ीन मानिए इस बार भी अगर तबलीगी जमात का मामला न होता तो कोई और होता। शायद शाहीन बाग़। शायद कोई और ताहिर हुसैन। कोई और उमर खालिद। जिसपर सारे मामले की ज़िम्मेदारी डालकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा जा सके और ध्रुवीकरण का मकसद भी सध जाए।

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