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कोरोना संकट: सूरत में प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या और कथित 'गुजरात मॉडल' की हक़ीक़त
एक तरफ जहां देश में केरल और राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल कोरोना से लड़ाई लड़ने के लिए उदाहरण बने हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ गुजरात मॉडल घुटनों पर दिखाई दे रहा है। प्रशासनिक स्तर पर विफलता का यह आलम है कि सूरत में मज़दूर आत्महत्या कर रहे हैं और घर जाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।
अंकित पांडेय
20 Apr 2020
सूरत
Image courtesy: Deccan Herald

गुजरात के एक स्थानीय अखबार 'गुजरात समाचार' में 18 अप्रैल को छपी एक खबर के अनुसार सूरत में दो प्रवासी श्रमिकों ने आत्महत्या कर ली। इनमें से 22 साल के सुनील रायसाहेब चौहान उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं। दूसरे 20 वर्षीय प्रवीण बाबूलाल कलाल छत्तीसगढ़ के राजसमंद के देवगढ़ के निवासी हैं। अख़बार के मुताबिक लॉकडाउन के चलते काम न होने और अपने घर लौटने में असमर्थ होने के दबाव में इन दो प्रवासी मज़दूरों ने आत्महत्या कर ली।

SURAT.JPG

पिछले दिनों सूरत से लगातार प्रवासी मज़दूरों की बेबसी की खबरें आ रहीं हैं। 14 अप्रैल को जब मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा तबका मुंबई के बांद्रा में इकट्ठा हुए मज़दूरों की घटना को सांप्रदायिक रंग देने में लगा था तब भी सूरत में बड़ी संख्या में मज़दूर इकट्ठा होकर घर जाने की मांग कर रहे थे। इससे पहले 11 अप्रैल को भी सूरत में सैकड़ों की संख्या में मज़दूर सड़क पर आकर वेतन और घर जाने की मांग कर रहे थे। इन सब घटनाओं के बावजूद गुजरात सरकार ने प्रवासी मज़दूरों के संदर्भ में कोई स्थायी कदम नहीं उठाये।

देश भर में लॉकडाउन में फंसे मज़दूरों की हालत का अंदाजा हमें एक गैरसरकारी संगठन स्ट्रैंडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) द्वारा किए एक सर्वे से मिलता है। यह सर्वे लॉकडाउन-1 की अवधि यानी 25 मार्च से 14 अप्रैल के मध्य 11,159 प्रवासी मज़दूरों पर किया गया है। 15 अप्रैल को जारी की गई इस सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन-1 की अवधि में 89 फीसदी प्रवासी मज़दूरों को उनके एंप्लॉयर ने वेतन का भुगतान नहीं किया है। जबकि 96% सरकारी राशन से भी महरूम हैं।  

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 11 हजार प्रवासी मज़दूरों में से केवल 51 फीसदी के पास 1 दिन से कम का राशन बचा है जबकि 72 फीसदी का कहना है कि उनका राशन दो दिन में खत्म हो जाएगा। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपये और खाने के अभाव में कुछ कामगार कम खाना खा रहे हैं जबकि कुछ कामगार भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले कामगार शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट झेल रहे हैं और अब उनमें घर जाने को लेकर निराशा आ गई है।

अब अगर सूरत की बात करें तो उसे देश के टेक्सटाइल हब या भारत के सिल्क सिटी के रूप में जाना जाता है। यहां पर उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, बंगाल और अन्य राज्यों से मज़दूर अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए आते हैं। लेकिन लॉकडाउन होने की वजह से इन मज़दूरों की रोजी रोटी तो गयी ही और साथ ही साथ वो घर लौटने में भी असमर्थ हैं। गर्मी के दिनों ये लोग एक छोटे से कमरों में अपना जीवन जीने के लिए विवश हैं और खाने की समस्या लगातार बनी हुई है। लॉकडाउन की वजह से वो अपने कमरों से बाहर भी नहीं जा सकते। रुपये और खाने के अभाव में इस संकट के बीच इन मज़दूरों की सारी आशाएं ओझल होती नजर आ रही हैं। इसके चलते उनको बार बार सड़कों पर आना पड़ रहा है

गौरतलब है कि कोरोना संकट जिन राज्यों में तेजी से बढ़ता नजर आ रहा उनमें से एक राज्य गुजरात भी है। 19 अप्रैल तक राज्य में कोरोना के 1376 पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं और 53 मौतें हो चुकी हैं। गुजरात में उच्च मृत्यु दर शायद राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की खतरनाक स्थितियों को दर्शाती है। इसे समझने की आवश्यकता है, क्योंकि पिछले दिनों गुजरात को भारत के अनुसरण के लिए मॉडल राज्य के रूप में पेश किया गया है।

संपूर्ण भारत में लॉकडाउन होने के बाद ही गुजरात सरकार ने कोविड-19 के रोगियों के इलाज के लिए अस्पतालों को आरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें 156 वेंटिलेटर की खरीद की गई और अपने 9,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों को वेंटिलेटर का प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। तत्काल प्रबन्धन के ये आकड़े गुजरात में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की खराब स्थिति को दर्शाते हैं।

आपको याद दिला दें कि 2014 में गुजरात मॉडल ऑफ डेवलपमेंट का बखान करते हुए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे। 2001 से 2014 के बीच वे लगभग 13 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियां स्वास्थ्य सेवा केंद्र में उनकी स्वास्थ्य सेवा नीति को प्रतिबिंबित कर सकती है और कोरोनावायरस महामारी के बारे में उनकी प्रतिक्रिया को समझने में हमारी मदद कर सकती है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के रिसर्चर संजीव कुमार के 'द वायर' में छपे लेख के अनुसार वर्तमान में, गुजरात में प्रति 1,000 जनसंख्या पर 0.33 अस्पताल के बिस्तर हैं।  राष्ट्रीय औसत प्रति 1,000 जनसंख्या पर 0.55 बिस्तर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में 2011 में प्रति 1000 जनसंख्या पर 0.70 अस्पताल के बिस्तर थे।

साथ ही गुजरात में, सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने में होने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत और बिहार जैसे राज्यों की तुलना में अधिक है। चिकित्सा पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में, 2009-10 में गुजरात 25वें स्थान पर था। 2001 में, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो राज्य में कुल 1,001 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 244 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 7,274 उप-केंद्र थे। 2011-12 में, जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या मामूली रूप से बढ़कर 1,158 और 318 हो गई, उप-केंद्रों की संख्या समान रही।

आज भी गुजरात में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बिहार से भी कम है। बिहार में सार्वजनिक ग्रामीण अस्पतालों की कुल संख्या गुजरात के ग्रामीण सार्वजनिक अस्पतालों की कुल संख्या का लगभग तीन गुना है।

एक तरफ जहां देश में केरल मॉडल, राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल कोरोना से लड़ाई लड़ने के लिए उदाहरण बने हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ गुजरात मॉडल घुटनों के बल खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। जब देश भर में स्थिति भयावह है तो हमें विकास के उस मॉडल पर सवाल उठाना होगा जिसे हमने चुना है और जिसने हमें संकट के समय छोड़ दिया है।

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