NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना संकट: सूरत में प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या और कथित 'गुजरात मॉडल' की हक़ीक़त
एक तरफ जहां देश में केरल और राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल कोरोना से लड़ाई लड़ने के लिए उदाहरण बने हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ गुजरात मॉडल घुटनों पर दिखाई दे रहा है। प्रशासनिक स्तर पर विफलता का यह आलम है कि सूरत में मज़दूर आत्महत्या कर रहे हैं और घर जाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।
अंकित पांडेय
20 Apr 2020
सूरत
Image courtesy: Deccan Herald

गुजरात के एक स्थानीय अखबार 'गुजरात समाचार' में 18 अप्रैल को छपी एक खबर के अनुसार सूरत में दो प्रवासी श्रमिकों ने आत्महत्या कर ली। इनमें से 22 साल के सुनील रायसाहेब चौहान उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं। दूसरे 20 वर्षीय प्रवीण बाबूलाल कलाल छत्तीसगढ़ के राजसमंद के देवगढ़ के निवासी हैं। अख़बार के मुताबिक लॉकडाउन के चलते काम न होने और अपने घर लौटने में असमर्थ होने के दबाव में इन दो प्रवासी मज़दूरों ने आत्महत्या कर ली।

SURAT.JPG

पिछले दिनों सूरत से लगातार प्रवासी मज़दूरों की बेबसी की खबरें आ रहीं हैं। 14 अप्रैल को जब मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा तबका मुंबई के बांद्रा में इकट्ठा हुए मज़दूरों की घटना को सांप्रदायिक रंग देने में लगा था तब भी सूरत में बड़ी संख्या में मज़दूर इकट्ठा होकर घर जाने की मांग कर रहे थे। इससे पहले 11 अप्रैल को भी सूरत में सैकड़ों की संख्या में मज़दूर सड़क पर आकर वेतन और घर जाने की मांग कर रहे थे। इन सब घटनाओं के बावजूद गुजरात सरकार ने प्रवासी मज़दूरों के संदर्भ में कोई स्थायी कदम नहीं उठाये।

देश भर में लॉकडाउन में फंसे मज़दूरों की हालत का अंदाजा हमें एक गैरसरकारी संगठन स्ट्रैंडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) द्वारा किए एक सर्वे से मिलता है। यह सर्वे लॉकडाउन-1 की अवधि यानी 25 मार्च से 14 अप्रैल के मध्य 11,159 प्रवासी मज़दूरों पर किया गया है। 15 अप्रैल को जारी की गई इस सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन-1 की अवधि में 89 फीसदी प्रवासी मज़दूरों को उनके एंप्लॉयर ने वेतन का भुगतान नहीं किया है। जबकि 96% सरकारी राशन से भी महरूम हैं।  

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 11 हजार प्रवासी मज़दूरों में से केवल 51 फीसदी के पास 1 दिन से कम का राशन बचा है जबकि 72 फीसदी का कहना है कि उनका राशन दो दिन में खत्म हो जाएगा। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपये और खाने के अभाव में कुछ कामगार कम खाना खा रहे हैं जबकि कुछ कामगार भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले कामगार शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट झेल रहे हैं और अब उनमें घर जाने को लेकर निराशा आ गई है।

अब अगर सूरत की बात करें तो उसे देश के टेक्सटाइल हब या भारत के सिल्क सिटी के रूप में जाना जाता है। यहां पर उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, बंगाल और अन्य राज्यों से मज़दूर अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए आते हैं। लेकिन लॉकडाउन होने की वजह से इन मज़दूरों की रोजी रोटी तो गयी ही और साथ ही साथ वो घर लौटने में भी असमर्थ हैं। गर्मी के दिनों ये लोग एक छोटे से कमरों में अपना जीवन जीने के लिए विवश हैं और खाने की समस्या लगातार बनी हुई है। लॉकडाउन की वजह से वो अपने कमरों से बाहर भी नहीं जा सकते। रुपये और खाने के अभाव में इस संकट के बीच इन मज़दूरों की सारी आशाएं ओझल होती नजर आ रही हैं। इसके चलते उनको बार बार सड़कों पर आना पड़ रहा है

गौरतलब है कि कोरोना संकट जिन राज्यों में तेजी से बढ़ता नजर आ रहा उनमें से एक राज्य गुजरात भी है। 19 अप्रैल तक राज्य में कोरोना के 1376 पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं और 53 मौतें हो चुकी हैं। गुजरात में उच्च मृत्यु दर शायद राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की खतरनाक स्थितियों को दर्शाती है। इसे समझने की आवश्यकता है, क्योंकि पिछले दिनों गुजरात को भारत के अनुसरण के लिए मॉडल राज्य के रूप में पेश किया गया है।

संपूर्ण भारत में लॉकडाउन होने के बाद ही गुजरात सरकार ने कोविड-19 के रोगियों के इलाज के लिए अस्पतालों को आरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें 156 वेंटिलेटर की खरीद की गई और अपने 9,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों को वेंटिलेटर का प्रबंधन करने के लिए प्रशिक्षण दिया गया। तत्काल प्रबन्धन के ये आकड़े गुजरात में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की खराब स्थिति को दर्शाते हैं।

आपको याद दिला दें कि 2014 में गुजरात मॉडल ऑफ डेवलपमेंट का बखान करते हुए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे। 2001 से 2014 के बीच वे लगभग 13 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियां स्वास्थ्य सेवा केंद्र में उनकी स्वास्थ्य सेवा नीति को प्रतिबिंबित कर सकती है और कोरोनावायरस महामारी के बारे में उनकी प्रतिक्रिया को समझने में हमारी मदद कर सकती है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के रिसर्चर संजीव कुमार के 'द वायर' में छपे लेख के अनुसार वर्तमान में, गुजरात में प्रति 1,000 जनसंख्या पर 0.33 अस्पताल के बिस्तर हैं।  राष्ट्रीय औसत प्रति 1,000 जनसंख्या पर 0.55 बिस्तर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में 2011 में प्रति 1000 जनसंख्या पर 0.70 अस्पताल के बिस्तर थे।

साथ ही गुजरात में, सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने में होने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत और बिहार जैसे राज्यों की तुलना में अधिक है। चिकित्सा पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में, 2009-10 में गुजरात 25वें स्थान पर था। 2001 में, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो राज्य में कुल 1,001 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 244 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 7,274 उप-केंद्र थे। 2011-12 में, जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या मामूली रूप से बढ़कर 1,158 और 318 हो गई, उप-केंद्रों की संख्या समान रही।

आज भी गुजरात में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बिहार से भी कम है। बिहार में सार्वजनिक ग्रामीण अस्पतालों की कुल संख्या गुजरात के ग्रामीण सार्वजनिक अस्पतालों की कुल संख्या का लगभग तीन गुना है।

एक तरफ जहां देश में केरल मॉडल, राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल कोरोना से लड़ाई लड़ने के लिए उदाहरण बने हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ गुजरात मॉडल घुटनों के बल खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। जब देश भर में स्थिति भयावह है तो हमें विकास के उस मॉडल पर सवाल उठाना होगा जिसे हमने चुना है और जिसने हमें संकट के समय छोड़ दिया है।

Coronavirus
Corona Crisis
Lockdown crisis
Surat
Gujrat model
Migrant workers
migrants
workers protest
Narendra modi
Daily Wage Workers
poverty

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

अनुदेशकों के साथ दोहरा व्यवहार क्यों? 17 हज़ार तनख़्वाह, मिलते हैं सिर्फ़ 7000...

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License