NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कोरोना संकट:  वेतन, भोजन और रहने की समस्या से जूझते देश की राजधानी में मजदूर
लॉकडाउन के चलते दिल्ली के सफ़दरजंग एयरपोर्ट पर काम करने वाले 250 से 300 मजदूरों की दशा बहुत ख़राब हो गई है। ये सभी यहां एयरपोर्ट के निर्माण कार्य के लिए आये थे। लेकिन सरकार द्वारा बिना किसी पुख़्ता इंतजाम किये गए लॉकडाउन में फँस गए हैं।
मुकुंद झा
01 May 2020
WORKER
लॉकडाउन के चलते दिल्ली के सफ़दरजंग एयरपोर्ट पर काम करने वाले 250 से 300 मजदूरों की दशा बहुत ख़राब हो गई है।

दिल्ली : 'लॉकडाउन के पहले से हमे कोई वेतन नहीं मिला है। हमारे पास न खाने के लिए है, न ही पीने का साफ पानी है। शौचालय और पहनने के साफ कपड़े भी नहीं है। छोटी-छोटी झुग्गियों में पांच-पांच, छह-छह लोग रहते हैं। यहां इतना मच्छर काटता है कि लगता है कोरोना से नहीं तो डेंगू-मलेरिया से पक्का मर जाएंगे।'

ये बातें हमें दिल्ली के सफ़दरजंग एयरपोर्ट पर लॉकडाउन से फंसे एक 52 वर्षीय प्रवासी मज़दूर मंगरू ने बताई। मंगरू करीब 30 साल से निर्माण मजदूरी का काम करते हैं। इस लॉकडाउन में वो और उनके जैसे करीब 250 से 300 मजदूर यहां फंसे हुए हैं। ये सभी यहां एयरपोर्ट के निर्माण कार्य के लिए आये हुए थे। लेकिन सरकार द्वारा बिना किसी पुख़्ता इंतजाम किये गए लॉकडाउन में फँस गए हैं।

फंसे मज़दूरों ने पत्र लिखकर दिल्ली के मुख्यमंत्री से मदद की गुहार लगाई । पूरा पत्र देखिए

IMG-20200501-WA0023.jpg

IMG-20200501-WA0022_0.jpg

गौरतलब है कि निर्माण मजदूर पूरी तरह से असंगठित तौर पर घूमते हुए काम करते हैं। इनके पास कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता है, ये रोज कमाते और रोज खाते हैं। ऐसे में इस लॉकडाउन में काम बंदी से इनका जीवन बहुत ही मुश्किल हो गया है।

आपको बता दें कि इस तरह पूरे देश में कई जगह निर्माण मज़दूर फंसे हुए हैं। देश में करोडों की संख्या में निर्माण मजदूर काम करते हैं। ये अधिकांशतया ठेकदारों के नीचे काम करते हैं।

कई मजदूरों ने बताया किस प्रकार से उन्हें लगातार 12-12 घन्टे काम कराया जाता है और फिर उन्हें 200 से 600 तक दिहाड़ी दी जाती है। उन्हें कोई भी छुट्टी नहीं मिलती है, न ही उनका कोई दुर्घटना बीमा होता है। अगर उन्हें किसी दुर्घटना में चोट आ भी जाती है तो उन्हें कोई मदद ठेकेदार या मालिक के द्वारा नहीं दी जाती है।

फंसे मजदूरों ने बताया कि पहले भी हम लोग कोई बहुत बेहतर स्थिति में नहीं थे लेकिन कम से कम खाने और पहनने की दिक्क्त नहीं होती थी। लेकिन अभी जनवरी से ही वेतन नहीं मिला है। लॉकडाउन से पहले ठेकदार 10 दिन पर एक हजार रुपये दे देता था लेकिन अब वो भी नहीं दे रहा है। यहां तक की ठेकदार ने कहा था कि वो हमे सरकार से मिलने वाला पांच हजार रुपये दिलाएगा लेकिन अभी तक हमे कोई पैसा नहीं मिला है।

MAZDUR 1.jpg

मंगरु के साथ के ही एक अन्य मजदूर ने बताया कि सर यहाँ का बाथरूम इतना गंदा है कि आदमी उसी से मर जाए। इसके साथ ही हम और हमारे बच्चे खतरनाक जगह पर रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि झुग्गियों का एक ही रास्ता है और बीच रास्ते में लगभग 40 फिट का विशाल गढ्ढा है। वहां मात्र 3 से 3.5 फुट की जगह जाने के लिए है। यहां से गुजरने पर हमेशा लगता है कही इसमें गिर न जाए। कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई हमारी समस्याओं पर ध्यान नहीं देता हैं।  

Capture_30.PNG

         (मज़दूर इसी शौचालय में जाते है ।)

पीपल्स एसोसिएसन इन ग्रासरूट एक्शन एंड मूवमेंट (PAIGAM) के संस्थापक सदस्य गिरी जो इन मज़दूरों के राहत के लिए कार्य कर रहे है। उन्होंने न्यूज़क्लिक से कहा कि "यह हमारे देश की दुर्दशा है कि जो लोग देश का निर्माण करते हैं वो ही आज बदहाली में जी रहे हैं।"

उन्होंने कहा "इन मज़दूरों की झुग्गियां ठीक उस हैलीपैड के सामने हैं जहाँ से देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री उड़ान भरते हैं। आप सोचिए ये मज़दूर किसके लिए एयरपोर्ट बना रहे हैं इनमें से तो कोई भी मज़दूर अपनी ज़िंदगी में इसका फायदा नहीं लेगा लेकिन ये अपनी जान जोख़िम में डालकर देश का निर्माण कर रहे हैं। लेकिन हमारी सरकारें इन्हे ही हाशिये पर धकेल दे रही हैं।"

फंसे मज़दूरों में से एक मज़दूर आशिक ने वीडियो जारी कर कहा कि ‘हम सफ़दरजंग एयरपोर्ट से बोल रहे हैं। यहाँ हम एनकेजी कंपनी में काम कर रहे हैं। यहां हम लोगो को कोई मदद नहीं कर रहा है ठेकेदार बोलता है कि भाई कंपनी पैसा नहीं दे रही तो मै कहाँ से दूँ। इसके बाद कंपनी के स्टाफ ने हमारा बैंक खाता, आधार, फोन नंबर लिखा था कि वो हमारे खाते में सरकार की तरफ से पैसा डलवाएगी लेकिन कुछ नहीं आ रहा है।'

इसके साथ ही आशिक ने कंपनी के स्टाफ पर बदतमीज़ी के भी आरोप लगाए हैं। वो कहते हैं कि कंपनी हम लोगों को बाहर नहीं निकलने देती है। यहाँ सभी लोगों की जांच की जा चुकी है किसी को बीमारी नहीं है। हम हिंदू मुस्लिम सब साथ में रहते हैं। यहाँ बहुत लोग रोज़ा करते हैं, हम लोगों को इफ्तारी और सहरी के लिए कुछ नहीं मिलता है। न ही हमारे पास पैसा है। इसलिए हम अनुरोध करते हैं कि सरकार की ओर से जल्दी से जल्दी कुछ मदद की करे।’

इसके साथ ही एक महिला मज़दूर ने कहा कि "हम लोग यहाँ फंसे हुए है कोई हमारी नहीं सुन रहा हैं। थोड़ा कुछ कच्चा राशन दिया है वो भी इतना कम है कि हम कैसे इसमें पांच बच्चो के साथ रहे है।"

Capture_29.PNG

हालंकि गुरुवार को मज़दूरों द्वारा बहुत हंगामा और कंपनी स्टाफ के घेराव करने के बाद मज़दूरों को 500 रुपये दिया गया है लेकिन मज़दूरों का कहना है कि इससे कितने दिन का खर्च चलेगा। इसलिए हमें पूरा वेतन देकर घर भेज दिया जाए।  

लगभग इन सभी मज़दूरों ने निम्न मांग रखी है...

1) इन मजदूरों को दिल्ली सरकार द्वारा घोषित 5000 रुपये आर्थिक मदद मिले जो अभी तक नहीं मिली है।  

2) भोजन और साफ पानी की व्यवस्था की जाए।

3) पहले तो उनके पिछले मासिक वेतन का भुगतान  किया जाए इसके साथ ही इस लॉकडाउन के दौरान कामबंदी का भी भुगतान किया जाए।  

4) जहाँ ये लोग अभी रुके हुए हैं वहां साफ़-सफ़ाई कराई जाए। साथ ही मच्छर भगाने वाली दवा का छिड़काव किया जाए। मच्छर के चलते मज़दूर रात में सो नहीं पाते हैं।

हालंकि सरकार ने देशभर में फंसे मज़दूरों को उनके घर भेजने की बात कही हैं। इसके लिए काम भी किया जा रहा है लेकिन इसकी प्रक्रिया बहुत जटिल है।  

Coronavirus
Lockdown
Workers and Labors
Delhi labours
Delhi Workers
unemployment
Daily Wage Workers
Daily Wage Labours
Arvind Kejriwal

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

उनके बारे में सोचिये जो इस झुलसा देने वाली गर्मी में चारदीवारी के बाहर काम करने के लिए अभिशप्त हैं

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

राजस्थान ने किया शहरी रोज़गार गारंटी योजना का ऐलान- क्या केंद्र सुन रहा है?

विशेषज्ञों के हिसाब से मनरेगा के लिए बजट का आवंटन पर्याप्त नहीं

बजट के नाम पर पेश किए गए सरकारी भंवर जाल में किसानों और बेरोज़गारों के लिए कुछ भी नहीं!


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License