NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पुस्तकें
भारत
राजनीति
कोरोना लॉकडाउनः ज़बरिया एकांत में कुछ और किताबें
वरिष्ठ लेखक अजय सिंह अपने इस आलेख में तीन ज़रूरी किताबों का ज़िक्र कर रहे हैं, जो हम सबके लिए महत्वपूर्ण हैं। ये हैं- ‘फ़ेसबुक का असली चेहरा’, ‘तफ़्तीश’ और ‘सत्ता की सूली’। 
अजय सिंह
05 Jun 2020
ज़बरिया एकांत में कुछ और किताबें

यह बात ग़ौर करने की है कि सोशल मीडिया के जितने भी प्रभावशाली प्लेटफ़ार्म हैं, वे सब अमेरिकी हैं, और अमेरिका की भू-राजनीतिक व सांस्कृतिक रणनीति की ज़रूरत के तहत उनका संचालन होता है। इंटरनेट की समूची दुनिया अमेरिकी छत्रछाया में है। किसी का भी नाम लीजिये—गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, वाट्सएप, इंस्टाग्राम—वे सब अमेरिका के अरबपति-खरबपति टेक्नोक्रेटों के नियंत्रण व स्वामित्व में हैं। इन टेक्नोक्रेटों के तार अमेरिका के शीर्ष सत्ता प्रतिष्ठान से—जिसमें रक्षा व ख़ुफ़िया मशीनरी शामिल है—जुड़े हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिका का ज़बर्दस्त कब्ज़ा है, और इसके जरिए वह दुनिया के दिमाग़ पर पैनी नज़र रखता है।

हाल के वर्षों में कई देशों में सोशल मीडिया के इन प्लेटफ़ार्मों की भूमिका व निष्पक्षता के बारे में गंभीर सवाल उठते रहे हैं। ख़ासकर फ़ेसबुक और वाट्सएप को लेकर, क्योंकि इन दोनों का दायरा बहुत बड़ा और पहुंच बहुत दूर तक है। भारत इससे अछूता नहीं है, और यहां भी इन दोनों कंपनियों का कामकाज गंभीर सवालों के घेरे में है।

वर्ष 2019 में छप कर आयी किताब ‘फ़ेसबुक का असली चेहरा’ भारत में फ़ेसबुक और वाट्सएप के कामकाज की आलोचनात्मक जांच-पड़ताल करती है। अपने देश के संदर्भ में इस किताब का ख़ासा महत्व है, हालांकि इस पर चर्चा बहुत कम हुई है। इसे सिरिल सैम और परंजय गुहा ठाकुरता ने मिल कर लिखा है। इन दोनों पत्रकारों ने मेहनत से छानबीन कर इकट्ठा किये गये तथ्यों का विश्लेषण कर बताया है कि फ़ेसबुक और वाट्सएप सत्ताधारी दक्षिणपंथी पार्टी की राजनीति को बढ़ावा देने का काम करते रहे हैं। इन दोनों कंपनियों का यह दावा कि हम निष्पक्ष हैं, सरासर झूठा है। (इन दोनों कंपनियों का मालिक एक ही व्यक्ति—मार्क ज़ुकरबर्ग—है।)

Facebook.jpg

सिरिल सैम और परंजय गुहा ठाकुरता  ने ‘फ़ेसबुक का असली चेहरा’ में तथ्य और आंकड़े देकर बताया है कि दोनों कंपनियां (फ़ेसबुक और वाट्सएप) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ़ायदा पहुंचाने में शामिल रही हैं। यह काम 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले से चलता आ रहा है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस अभियान ने 2019 का लोकसभा चुनाव आते-आते और आक्रामक रूप ले लिया।

फ़र्ज़ी, ग़लत और नफ़रत फैलाने वाली ख़बरें जारी करना, ग़लत-सलत प्रचार चलाना, सरकार बनाने-गिराने का खेल खेलना, जानकारियां चुराना, आम चुनाव के नतीज़े को नरेंद्र मोदी व भाजपा के पक्ष में मोड़ देने के लिए हर तरह की तिकड़म करना फ़ेसबुक और वाट्सएप का धंधा रहा है। सोशल मीडिया के असली चरित्र को समझने के लिए यह ज़रूरी किताब है। यह किताब मई 2019 में लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के ठीक पहले आयी।

मान लीजिये, आपसे कुछ सवाल पूछे जायें। मसलनः ‘तुम मुसलमान हो?’, ‘तुम लोग उर्दू अख़बार में ही काम क्यों करते हो?’, ‘यह अवामी तहरीक का क्या मतलब होता है?’, ‘तुम लोग अख़बार निकालते हो या आंदोलन चलाते हो?’, ‘तुम्हारे लिए क्या बड़ा है, मज़हब या मुल्क?’—तो समझ लीजिये, यह हिंदुस्तान की पुलिस है और आप मुसलमान हैं। अगर आप मुसलमान हैं, तो आप शर्तिया तौर पर आतंकवादी हैं! और आतंकवादी की जगह या तो जेल है या कोई सुनसान जगह, जहां उसका एनकाउंटर किया जा सके!

Tafteesh.jpg

लेखक राजेश कुमार का नाटक ‘तफ़्तीश’ (2015) इस सवाल को बड़ी तल्ख़ी और तीखेपन से उठाता है कि हिंदुस्तान में मुसलमान की जगह कहां है और क्या है। या, उसकी कोई जगह है भी कि नहीं! ऊपर के पैराग्राफ़ में जो डायलाग दिये गये हैं, वे ‘तफ़्तीश’ नाटक से लिये गये हैं। एक घंटा तीस मिनट की अवधि का यह नाटक एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से विस्तारित किया है। यह परेशान करनेवाला सशक्त नाटक है।

पूरी सरकारी मशीनरी, जिसमें पुलिस व सेना शामिल है, किस तरह इस्लामाफ़ोबिया और हिंदू दिमाग़ (हिंदू साइक) से संचालित होती है, इसे राजेश कुमार ने बड़ी बेबाकी से ‘तफ़्तीश’ में उजागर किया है। एक मुसलमान का उत्पीड़न सिर्फ इसलिए होता है कि वह मुसलमान है। सरकारी आतंक (स्टेट टेरर) मुसलमान के साथ जो चाहे सलूक करने के लिए आज़ाद है।

2020 के हिंदुस्तान में जिस तरह उग्र दक्षिणपंथी राजसत्ता बड़े  पैमाने पर नौजवान मुसलमान ऐक्टिविस्टों को गिरफ़्तार कर रही है, उसका पूर्वाभास ‘तफ़्तीश’ नाटक में मौजूद है। नाटक 2013 में लिखा गया था, और छपा दो साल बाद।

कभी-कभी ज़रूरी, प्रासंगिक किताबें ग़ुमनामी में रह जाती हैं। ऐसी ही एक किताब है, ‘सत्ता की सूली’ (2019)। इसे समाचार पोर्टल जनचौक से जुड़े तीन पत्रकारों—महेंद्र मिश्र, प्रदीप सिंह और उपेंद्र चौधरी—ने मिलकर लिखा है।

सत्ता की सूली.jpg

नागपुर में 1 दिसंबर 2014 को जज ब्रिजगोपाल हरिकिशन लोया की रहस्यमय मृत्यु हो गयी थी। तीन सौ पेज की किताब ‘सत्ता की सूली’ बेहद संदिग्ध परिस्थितियों में हुई इसी मौत और इससे जुड़ी घटनाओं, काग़ज़ात व दस्तावेज़ों पर केंद्रित है। इस किताब का संपादन ढंग से नहीं हुआ है, इसमें बेतरतीबपना और दोहराव है, इसके बावजूद यह किताब ध्यान देने लायक है।

सीबीआई अदालत के जज लोया सोहराबुद्दीन फ़र्जी मुठभेड़ हत्या का मामला देख रहे थे। इस हत्या में भाजपा नेता अमित शाह मुख्य अभियुक्त थे। अमित शाह बाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और अब केंद्रीय गृह मंत्री हैं। हत्या के इस मामले में अमित शाह को गिरफ़्तार किया गया था और बाद में उन्हें गुजरात से तड़ीपार किया गया था।

मई 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जज लोया पर बहुत दबाव था कि वह इस मामले को रफ़ा-दफ़ा करें। लेकिन लोया दबाव, प्रलोभन व भय के आगे झुके नहीं। उनकी संदिग्ध मौत के बाद यह मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया और अमित शाह पर से हत्या का मामला हटा लिया गया। ‘सत्ता की सूली’ किताब इस पूरे मामले की विस्तृत जांच-पड़ताल करती है और मांग करती है कि जज लोया की संदिग्ध मौत की दोबारा जांच हो। हमें भी यह मांग करनी चाहिए, क्योंकि शक की सूई नरेंद्र मोदी सरकार की ओर इशारा कर रही है।

(लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें :  कोरोना लॉकडाउनः ज़बरिया एकांत के 60 दिन और चंद किताबें

Coronavirus
Lockdown
Hindi books
hindi literature
Hindi fiction writer
Lockdown and Books

Related Stories

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

देवी शंकर अवस्थी सम्मान समारोह: ‘लेखक, पाठक और प्रकाशक आज तीनों उपभोक्ता हो गए हैं’

वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"

समीक्षा: तीन किताबों पर संक्षेप में

यादें; मंगलेश डबरालः घरों-रिश्तों और विचारों में जगमगाती ‘पहाड़ पर लालटेन’

किताब: दो कविता संग्रहों पर संक्षेप में

कोरोना लॉकडाउनः ज़बरिया एकांत के 60 दिन और चंद किताबें

गिरिजा कुमार माथुर ने आधुनिकता को उचित संदर्भ में परिभाषित किया

नामवर सिंह : एक युग का अवसान

कृष्णा सोबती : मध्यवर्गीय नैतिकता की धज्जियां उड़ाने वाली कथाकार


बाकी खबरें

  • Women Hold Up More Than Half the Sky
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    महिलाएँ आधे से ज़्यादा आसमान की मालिक हैं
    19 Oct 2021
    हाल ही में जारी हुए श्रम बल सर्वेक्षण पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 73.2% महिला श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करती हैं; वे किसान हैं, खेत मज़दूर हैं और कारीगर हैं।
  • Vinayak Damodar Savarkar
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बहस: क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?
    19 Oct 2021
    बार-बार यह संकेत मिलता है कि क्षमादान हेतु लिखी गई याचिकाओं में जो कुछ सावरकर ने लिखा था वह शायद किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था अपितु इन माफ़ीनामों में लिखी बातों पर उन्होंने लगभग अक्षरशः अमल भी किया।
  • Pulses
    शंभूनाथ शुक्ल
    ‘अच्छे दिन’ की तलाश में, थाली से लापता हुई ‘दाल’
    19 Oct 2021
    बारिश के चलते अचानक सब्ज़ियों के दाम बढ़ गए हैं। हर वर्ष जाड़ा शुरू होते ही सब्ज़ियों के दाम गिरने लगते थे किंतु इस वर्ष प्याज़ और टमाटर अस्सी रुपए पार कर गए हैं। खाने के तेल और दालें पहले से ही…
  • migrant worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन
    19 Oct 2021
    "अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद घाटी की स्थिति और खराब हुई है। इससे अविश्वास का माहौल कायम हुआ है, इसलिए इन हत्याओं की जिम्मेवारी सीधे केंद्र सरकार की बनती है।”
  • Non local laborers waiting for train inside railwaysation Nowgam
    अनीस ज़रगर
    कश्मीर में हुई हत्याओं की वजह से दहशत का माहौल, प्रवासी श्रमिक कर रहे हैं पलायन
    19 Oct 2021
    30 से अधिक हत्याओं की रिपोर्ट के चलते अक्टूबर का महीना सबसे ख़राब गुज़रा है, जिसमें 12 नागरिकों की हत्या शामिल हैं, जिनमें से कम से कम 11 को आतंकवादियों ने क़रीबी टारगेट के तौर पर मारा है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License