NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना वायरस: रोजगार का संकट, गांव की याद और लॉकडाउन
लॉकडाउन की वजह से दिहाड़ी मजदूरों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया है जिसके चलते लोग गांवों की तरफ जा रहे हैं। कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए देशव्यापी बंदी ज़रूरी कदम है लेकिन यह हर उस चीज़ का विकल्प नहीं है जो सरकार को करना चाहिए।
अमित सिंह
26 Mar 2020
कोरोना वायरस
Image courtesy: Twitter

एक वक्त था जब 30 वर्षीय सूरज कुमार सुबह 6 बजे ही रिक्शा लेकर दिल्ली के लक्ष्मी नगर स्थित मदर डेयरी प्लांट के सामने खड़े हो जाते थे। दिनभर भागदौड़ की स्थिति रहती थी। कई बार दोपहर में भोजन करने का वक्त मिलता था लेकिन अभी वो बिल्कुल खाली हैं। सुबह 11 बजे के करीब उनसे मुलाकात होती है। वह मदर डेयरी के बगल ही एक बरसाती की बनी झुग्गी में अपने रिक्शे पर बैठे हुए होते हैं।

सूरज कहते हैं, 'पिछले पांच दिन से कोई काम नहीं है। अब तो पुलिस वाले रिक्शा भी नहीं निकालने दे रहे हैं। अगर आप रिक्शा निकालकर सड़क पर खड़े हो जाओ तो कोई सवारी नहीं मिलती है। हालांकि पुलिस वालों की गालियां जरूर मिल जाती है। अभी तो ज्यादातर नजदीक के जिलों के लोग अपने गांवों की तरफ निकल गए हैं। मेरा घर दूर है इसलिए फंसे हुए हैं। ट्रेन और बस कुछ नहीं चल रही है।'

मदर डेयरी के सामने ही एनएच 24 है। लॉकडाउन के समय भी बड़ी संख्या में पैदल सफर करते हुए लोग दिख जाएंगे। उसी सड़क पर अपने दो लोग पैदल जा रहे थे। इसमें मुजफ्फरनगर के रहने वाले राम सूरत भी थे। उन्होंने बताया, 'बस और ट्रेन सरकार ने बंद कर दी है। ऐसे में घर पैदल ही जाना होगा। प्रधानमंत्री ने अपील की है जो जहां पर रहे वहीं रुका रहे लेकिन हमारे सामने संकट यह है कि यहां कोई काम नहीं है। इसलिए खाने का संकट खड़ा हो जाएगा। गांव पहुंच जाएंगे तो कटाई का काम शुरू होने वाला है। उसमें घरवालों का हाथ बंटा देंगे।'

वो आगे कहते हैं, 'पैदल जाने वाले लोगों को पुलिस वाले ज्यादा परेशान नहीं कर रहे हैं। अगर कोई सब्जी या दूध की गाड़ी मिल जाएगी तो आराम से घर पहुंच जाएंगे। नहीं तो पैदल ही यह सफर तय करना होगा। यहां रुकने का कोई मतलब नहीं बन रहा है।'

राम सूरत की तरह ही सैकड़ों और लोग उस सड़क से घर वापसी कर रहे हैं। ज्यादातर की कहानी यही है। लॉकडाउन की वजह से उनका रोजगार छिन गया है तो उन्हें गांव की याद आ रही है।

गौरतलब है कि कोरोना वायरस के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 दिन की देशव्यापी बंदी की घोषणा की है। उनके इस कदम की सराहना की जानी चाहिए। क्योंकि अभी तक का बाकी देशों का अनुभव यह बता रहा है कि इस वायरस से निपटने में लॉकडाउन एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है।

देशव्यापी बंदी ज़रूरी कदम है लेकिन यह हर उस चीज का विकल्प नहीं है जो सरकार को करना चाहिए। इसे दो तरीके से देखे जाने की ज़रूरत है। पहला इसका आर्थिक पक्ष है।

करोड़ों मजदूर, किसान, छोटे व्यापारी, कर्मचारी वगैरह अपना खर्च कैसे चलाएंगे। इसका ध्यान दिए जाने की जरूरत है। कुछ राज्य सरकारें इस पर फोकस कर रही है लेकिन यह वह पहलू है जिस पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

लाखों गरीबों को राशन देने, वंचितों के खाते में पैसे डलवाने, कोरोना का इलाज कर रहे डॉक्टरों और नर्सों को आवास सुरक्षा देने, आवश्यक वस्तुओं की दुकाने खुली रखने और उन वस्तुओं को जरूरतमंद लोगों के घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था करने के लिए सरकार को युद्धस्तर पर लगना पड़ेगा। फिलहाल इसे लेकर देश भर की सरकारें अभी उदासीन नजर आ रही हैं।

दरअसल इस लॉकडाउन का गरीबों पर कितना बुरा असर होगा अभी इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकारों को मिलकर काम करना होगा। सरकार को इस पूरी आपदा से निपटने के लिए रोडमैप तैयार करना होगा। बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें अगले कुछ दिनों में सरकारी मदद की जरूरत पड़ेगी। उदाहरण के लिए देशभर में 18 लाख बेघर हैं जिन्हें अगले कुछ दिन सरकार की ही सहायता पर आश्रित रहना होगा।

इसके अलावा देश की श्रम शक्ति का अधिकांश हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम कर रहा है। उसे इस लॉकडाउन की कीमत आय की कमी के रूप में चुकाना होगा। अभी सरकार ने अपील की है कि वेतन और भत्तों में कटौती नहीं होनी चाहिए लेकिन इस अपील का लागू होना मुश्किल दिख रहा है। छोटे कारोबारी खुद तबाह दिख रहे हैं। आने वाले दिनों में हो सकता है कि वह अपने कर्मचारियों को वेतन देने की हालात में ही न रह जाएं। ऐसे में सरकार को किसी रूप में हस्तक्षेप करके ज्यादा से ज्यादा लोगों के हाथ में नकदी पहुंचानी होगी।

इस लॉकडाउन का दूसरा पक्ष स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा है। देश में प्रति दस लाख लोगों में 12 की जांच की जा रही है। चीन में यह आंकड़ा प्रति 10 लाख पर 221 है तो यूरोपीय और अमेरिकी देशों में यह हजारों में है। जिस तरह इस वायरस से निपटने के लिए लॉकडाउन जरूरी है। उसी तरह ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच भी उतनी ही जरूरी है ताकी एक निश्चित समय पर इसे रोका जा सके। नहीं तो लॉकडाउन करके हम जो हासिल करना चाहते हैं वह संभव नहीं हो पाएगा।

इसी तरह हमारे यहां प्रति 11,600 लोगों पर एक चिकित्सक है, जो हमारी दयनीय हालत के बारे में बखूबी बयान कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर देश को अपनी जीडीपी को 4 से 5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करना चाहिए। एक ऐसी सरकार जिसने कुछ ही दिनों में देशव्यापी लॉकडाउन लागू कर दिया वह अब भी स्वास्थ्य पर जीडीपी का सिर्फ डेढ़ प्रतिशत खर्च कर रही है। यह एक बड़े संकट की तरफ इशारा कर रही है।

शहरों का आंकड़ा तब भी ठीक है लेकिन गांवों की तरफ पलायन करते ये मजदूर अगर अपने साथ इस वायरस को भी ले गए तो हालात बेकाबू हो जाएंगें। ऐसे में हमारी सरकारों के लिए यह समय अपनी नीतियों को लेकर सोचने का है।

COVID-19
Coronavirus
India Lockdown
Daily Wage Workers
Narendra modi
Central Government

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के नए मामले तो कम हुए लेकिन प्रति दिन मौत के मामले बढ़ रहे हैं  
    29 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,35,532 नए मामले सामने आए हैं | इसके अलावा कोरोना से बीते दिन 871 मरीज़ों की मौत हुई है और देश में अब तक 4 लाख 93 हज़ार 198 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।
  • unemployment
    अजय कुमार
    सरकारी नौकरियों का हिसाब किताब बताता है कि सरकार नौकरी ही देना नहीं चाहती!
    29 Jan 2022
    जब तक भारत का मौजूदा आर्थिक मॉडल नहीं बदलेगा तब तक नौकरियों से जुड़ी किसी भी तरह की परेशानी का कोई भी मुकम्मल हल नहीं निकलने वाला।
  • Gorakhpur
    सत्येन्द्र सार्थक
    गोरखपुर : सेवायोजन कार्यालय में रजिस्टर्ड 2 लाख बेरोज़गार, मात्र 4.42% को मिला रोज़गार
    29 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश में सक्रिय बेरोज़गारों की संख्या 41 लाख से ज़्यादा है। मगर सेवायोजन कार्यालय की वेबसाइट के अनुसार रिक्त पदों की संख्या सिर्फ़ 1,256 है।
  • hum bharat ke log
    लाल बहादुर सिंह
    झंझावातों के बीच भारतीय गणतंत्र की यात्रा: एक विहंगम दृष्टि
    29 Jan 2022
    कारपोरेट ताकतों ने, गोदी मीडिया, इलेक्टोरल बॉन्ड समेत अनगिनत तिकड़मों से अपनी हितैषी ताकतों को राजनीतिक सत्ता में स्थापित कर तथा discourse को कंट्रोल कर एक तरह से चुनाव और लोकतन्त्र का अपहरण कर लिया…
  • Padtaal Duniya Bhar Ki
    न्यूज़क्लिक टीम
    अफ़ग़ानिस्तान हो या यूक्रेन, युद्ध से क्या हासिल है अमेरिका को
    28 Jan 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में गहराते मानवीय संकट, भुखमरी पर हुई दो अंतरराष्ट्रीय बैठकों के परिणामों पर न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से चर्चा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License