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स्वास्थ्य
राजनीति
...कोर्बिन जाने के लिए नहीं आये थे
ब्रिटेन में कई लोग कहते हैं कि वर्तमान कोरोना महामारी संकट में स्वास्थ्य सेवाएं जिस तरह चरमराई हैं और सामाजिक क्राइसिस उत्पन्न हुआ है ऐसे में कोर्बिन जैसा प्रधानमंत्री मरुभूमि में नख़लिस्तान सरीखा होता।
अक्षत सेठ
14 Apr 2020
Jeremy Corbyn
Image courtesy: Business Insider

पिछले दिनों ब्रिटिश लेबर पार्टी ने अपना नया नेता चुन लिया। निवर्तमान नेता जेरेमी कोर्बिन की छाया कैबिनेट में ब्रेक्सिट मामलों के मंत्री कियर स्टॉर्मर नए नेता हैं।

ब्रेक्सिट का विषय वैसे भी अब कोरोना महामारी के भयावह संकट के आगे बेमानी हो गया है। ब्रिटेन के प्रधांनमंत्री बोरिस जॉनसन खुद अभी आईसीयू से बाहर आए हैं। वैसे भी ब्रेक्सिट का मामला दिसंबर 2019 के आम चुनावों ने सेटल कर दिया है। जिन लोगों को ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से हो रहे अलगाव से दिक्कत थी वे भी कम से कम इस बात से मुतमईन हैं कि कोर्बिन कभी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। इन लोगों में ब्रिटेन का मध्यम मार्गीय उदारवादी तबका, ब्यूरोक्रेसी और सारे बड़े कॉर्पोरेट हाउस शामिल हैं। इनके नुमाइंदे चूँकि लेबर पार्टी संसदीय दल के भीतर हमेशा से मज़बूत रहे इसीलिए कोर्बिन और उनकी समाजवादी आर्थिक नीतियों व स्वतंत्र  विदेश नीतियों के खिलाफ खेमेबंदी उन्हें सबसे ज़्यादा झेलनी पड़ी। और इसी भीतरघात ने 2019 के चुनावों में लेबर पार्टी को 1935 के बाद उसके सबसे खराब प्रदर्शन तक ला दिया।

दरअसल 2016 के जनमत संग्रह में जब ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में मतदान किया तब तक एक देश में दो देश बन चुके थे। एक, संसाधन संपन्न लंदन व इंग्लैंड का दक्षिण पूर्व जहाँ से 2008 की आर्थिक मंदी के ज़िम्मेदार शेयर बाज़ार और हेज फण्ड कंपनियां चलती हैं। दूसरा, कभी अपनी फैक्टरियों और अब पलायन, मुफलिसी व हर क्षेत्र में पिछड़ेपन से जूझ रहा मध्य व उत्तरी इंग्लैंड तथा स्कॉटलैंड और दशकों तक हिंसा का शिकार रहा उत्तरी आयरलैंड।

लेबर पार्टी की ज़्यादातर सीटें कभी ट्रेड यूनियन और कपड़ा उद्योग से लेकर खानों और जहाज़ निर्माण के केंद्र रहे इसी मध्य व उत्तरी इंग्लैंड से आती हैं। 80 के दशक में मैगज़ीनों में महिला सशक्तिकरण की प्रतीक मार्गरेट थैचर ने यहाँ की खानें बंद कीं और सरकारी उद्योग प्राइवेट हाथों में देकर देश का भाग्य लंदन के हाथ में सौंप दिया। रही सही कसर 1997 में चुनकर आयी लेबर पार्टी के तत्कालीन नेता टोनी ब्लेयर ने पूरी कर दी। ब्लेयर लंदन के शेयर बाज़ार संभालने और अमेरिका संग इराक मे बमबारी में इस तरह मुब्तिला हुये कि लेबर पार्टी के परंपरागत समर्थकों ने तंग आकर वोट करने जाना ही छोड़ दिया।

2004 में ब्लेयर ने पूर्वी यूरोप के देशों के लोगों को ब्रिटेन में रहने और काम करने की छूट दे दी जो वैसे भी यूरोपीय संघ में होने की शर्त का हिस्सा था। कोयला खदानें और उद्योग धंधे बंद होने से निराश हताश और उन्हें बचाने की लड़ाई हारे वयोवृद्ध मेहनतकश अब नस्लभेद की और रुख करने लगे। 2016 के रेफेरेंडम में यूरोपीय संघ छोड़ने का फैसला इन्हीं उत्तरी और मध्य इंग्लैंड के मतदाताओं ने व्यवस्था और उच्च वर्गीय राजनेताओं की दशकों चली बेरुखी से उपजी नफ़रत और अब बाहर से काम ढूंढने आये रोमानिया बुल्गारिया जैसे देशों से प्रवासियों और मुसलामानों पर गुस्से का इज़हार करते हुए लिया। अब इनके लिए हर समस्या का दोष प्रवासियों और कथित बाहरी लोगों पर डालने वाला तर्क सही था।

2019 के दिसंबर में इन्हीं लोगों ने बोरिस जॉनसन को वोट दिया और लेबर पार्टी की दशकों तक सुरक्षित रही सीटों की लाल दीवार ढह गयी। मीडिया पंडितों और पार्टी के भीतर ब्लेयर समर्थकों ने सारा दोष आराम से कोर्बिन और उनकी कथित ‘देश विरोधी’ व वामपंथी छवि पर मढ़ दिया। अब शायद भारत के पाठकों को यह सब कहीं पहले सुना हुआ लगेगा। सच उसके उलट था ही।

दरअसल 2016 के बाद ब्रेक्सिट का नाटक कुछ ज़्यादा ही चला और जनता उकता गयी। एक लोकतान्त्रिक जनमत संग्रह में हुए फैसले को पलटने की उदारवादियों ने भरसक कोशिशें कीं। कोर्बिन कभी इस फैसले को उलटना नहीं चाहते थे। लेकिन हमें याद रखना पडेगा कि अब यूरोपीय संघ के मॉडल का विरोध किसी वामपंथी आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि दक्षिणपंथी सांस्कृतिक आधार पर हो रहा था। और लेबर पार्टी के और कोर्बिन के सबसे मुखर समर्थक छात्र, अश्वेत व अल्पसंख्यक एवं फासीवाद विरोधी इस लॉजिक का साथ नहीं दे सकते थे।

कोर्बिन 2015 में सदस्यों के वोट से चुनकर आये थे। पार्टी में उनके विरोधियों के एक गुट ने इस बात का फायदा उठाया कि पार्टी सदस्य और कोर्बिन समर्थक एक उग्र एकाकी दक्षिणपंथी राष्ट्र का हिस्सा नहीं बनना चाहते। कोर्बिन को उनकी समझदारी वाली पोजीशन से दबाव में पीछे हटना पड़ा और यह तय हुआ कि चुनाव जीतने पर पार्टी यूरोपीय संघ की सदस्यता पर दूसरा जनमत संग्रह कराएगी। बोरिस जॉनसन ने खुद को लोकतंत्र समर्थक व ब्रेक्सिट के झंझट को सुलझाने वाले की तरह पेश किया और लेबर पार्टी का दूसरे जनमत संग्रह का तर्क बेहद लचर साबित हुआ।

उत्तरी इंग्लैंड की कुछ सीटें जो लेबर पार्टी हारी वह 1918 से पार्टी की सुरक्षित सीटें थीं। चुनावों के बाद बीबीसी पर प्रसारित एक कार्यक्रम में एक महिला इस बात पर फूट फूट कर रोई कि जिस पार्टी को उसके माता-पिता और पिछली पीढ़ियों ने आँख मूंदकर वोट दिया, उसने उस पार्टी की जगह थैचर की कंज़र्वेटिव पार्टी को मन मसोस कर वोट दिया ताकि ब्रेक्सिट का मसला ख़त्म हो जाए।

मेरी बड़ी इच्छा थी कि कोर्बिन के पीएम बन जाने के बाद 1985 का उनका एक वाकिया दर्ज कराऊँ। कंज़र्वेटिव सांसद टेरी डिक्स ने मांग की कि ब्रिटेन की संसद हाउस ऑफ़ कॉमन्स में कोर्बिन जैसे लोग जो बेतरतीब बनकर चले आते हैं, उनका प्रवेश बंद करा दिया जाए। कोर्बिन का जवाब था- वह कोई फैशन परेड नहीं है, न जेंटलमेंस क्लब है। संसद वह जगह है जहाँ जनता का प्रतिनिधित्व किया जाता है। ऐसे व्यक्ति का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन जाना जितनी शिद्द्त से  दुनिया का हर इंसाफ़ पसन्द व्यक्ति चाहता था, उतना ही डर ब्रिटेन की व्यवस्था को था।

रोज़ मीडिया में कंज़र्वेटिव सांसदों के बयान आते-  यह आदमी डाउनिंग स्ट्रीट (ब्रिटिश पीएम के आधिकारिक आवास का पता) के आसपास भी पहुँच गया तो क्या होगा! 2017 में जब कोर्बिन ने तत्कालीन पीएम थेरेसा में के बहुमत का सफाया कर दिया तो डर और बढ़ गया। कारण स्पष्ट था- दशकों से जो सांसद और उसका समाजवाद परिहास का विषय था, वह अचानक सत्ता के क़रीब था। ब्रिटेन में नेता प्रतिपक्ष एक बराबरी पर आधारित समाज का सपना देख रहा था, कॉर्पोरेट टैक्स बढ़ाने की बात कर रहा था। मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य और ब्रॉडबैंड के बारे में बात कर रहा था। लेकिन कोर्बिन से ब्रिटिश अभिजात्य वर्ग की नफ़रत उनकी विदेश मामलों और ब्रिटिश साम्राज्य के काले अतीत पर उनकी दो टूक आलोचनात्मक राय के कारण सबसे ज़्यादा रही है।

कोर्बिन पर सबसे घटिया और अनर्गल आरोप उनके यहूदी विरोधी होने के लगाए जाते रहे हैं। कारण- उनका फिलस्तीन के हक़ का समर्थन। कंज़र्वेटिव पार्टी के भयानक मुस्लिम द्वेष और नस्लभेद को मीडिया और प्रेस ने उतना कभी नहीं उछाला जितना कोर्बिन के कथित यहूदी विरोध को। उत्तरी आयरलैंड से लेकर ग़ज़ा तक पश्चिमी और ब्रिटिश नीतियों का विरोध उन्हें आतंकवाद समर्थक और देश विरोधी की संज्ञा दिलाता रहा। उनकी हर बात को कथित रूप से स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रेस ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया। ब्रेक्सिट पर पार्टी के एक मुश्किल स्थिति में फंस जाने के अलावा कोर्बिन की छवि का चरित्र हनन युद्धस्तर पर करवाकर व्यवस्था ने तात्कालिक लड़ाई जीत ली।

पर क्या यह हार अंतिम सत्य है? नवनिर्वाचित नेता कियर स्टॉर्मर कोर्बिन खेमे से नहीं आते, पर टोनी ब्लेयर के समर्थक तो बिल्कुल नहीं। स्टॉर्मर मानते हैं कि पार्टी को बाज़ारवाद से इतर गरीबों और अल्पसंख्यकों के हक़ में खड़ा करने की कोर्बिन की नीति सही थी। नेता प्रतिपक्ष होने की वजह से कोर्बिन की नीतियों मसलन आर्थिक बराबरी, निशुल्क स्वास्थ्य सेवा को बनाये और बचाये रखना, रेलवे का प्राइवेट हाथों से लेकर राष्ट्रीयकरण और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए ग्रीन नई डील। यह सब अब एजेंडे पर हैं और कोर्बिन के आने के बाद से लेबर पार्टी के भीतर और बाहर एक मज़बूत जनपक्षधर तबका उभरा है जो इन नीतियों की वकालत करेगा।

कई लोग कहते हैं कि वर्तमान कोरोना महामारी संकट में स्वास्थ्य सेवाएं जिस तरह चरमराई हैं और सामाजिक क्राइसिस उत्पन्न हुआ है ऐसे में कोर्बिन जैसा प्रधानमंत्री मरुभूमि में नख़लिस्तान सरीखा होता (नख़लिस्तान : रेगिस्तानी इलाके में वह हरा-भरा टुकड़ा जहाँ खजूर के पेड़ हों)। लेकिन महामारी में विकसित देशों के नर्सिंग स्टाफ द्वारा रेनकोट फाड़कर बढ़ते मरीज़ों के लिए मास्क की कमी पूरी करना कोर्बिन की स्वास्थ्य में फंडिंग न होने के संकट पर सवालों को मौज़ू बनाता है। इस डगमगयी व्यवस्था को अब एक नयी राह और नए स्वप्न का परिवर्तन ही उबार सकता है।

कोर्बिन की छवि एक नैतिकतावादी की रही है जो प्रधानमंत्री प्रश्न काल में सीधे लोगों की दिक्कतों से जुड़े प्रश्न पूछते रहे हैं और उनकी बातों में लच्छेदार रेटोरिक व चुटकुले बतोलेबाजी जैसी चीज़ें नदारद हैं जिसे ब्रिटिश राजनीति और मीडिया में पीएम बनने का गुण माना जाता है। जब उनकी वेशभूषा को लेकर शिकायत हुई तब वे अपनी मां का बना स्वेटर पहनकर संसद जाते थे अब सूट पहन लेते हैं। वे साइकिल से चलने का शौक़ रखते हैं जिसे ब्रिटेन की कुख्यात टेबलायड प्रेस ने चेयरमैन माओ स्टाइल बाइसिकल की उपमा दे दी। सामान्यतः अन्य राजनेताओं से इतर वे अपनी निजी ज़िंदगी को मीडिया से बचाकर रखते हैं। पर चुनाव के बाद उनकी पत्नी को यह कहना पड़ा कि मेरे पति के साथ मीडिया में जो बर्ताव हुआ है उसका उन्होंने बहादुरी से सामना किया है।

अंत में, भारत के लोगों के लिए यह जानना ज़रूरी है कि 2002 के गुजरात दंगों पर कोर्बिन ने सबसे पहले सवाल उठाये और 2019 में कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद उनकी पार्टी की आलोचना को अभिजात्य प्रवासी भारतीयों और उनमें फैले आरएसएस के नेटवर्क ने मुद्दा बनाकर कोर्बिन को खूब कोसा। वे इसीलिए भी चर्चा में रहे हैं कि उन्होंने प्रवासी भारतीयों में व्याप्त जाति प्रथा का विरोध किया है। विरोध तो उन्होंने सऊदी अरब का भी किया है और हर उस दमनकारी शासन का जो दुनिया के किसी देश में क़ायम रहा है। 2019 में जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की सौवीं वर्षगांठ पर यदि कोर्बिन प्रधानमंत्री रहे होते तो अब तक ब्रिटेन ने उस बर्बर हत्याकांड के लिए आधिकारिक माफ़ी मांग ली होती। नेता प्रतिपक्ष के नाते वे सिर्फ थेरेसा में से ऐसा करने की मांग कर सकते थे।

कोर्बिन ने कहा है कि वे कहीं नहीं जा रहे और न्याय व समानता के लिए लड़ाई जारी रखेंगे। 2013 में गाँधी पीस प्राइज से नवाज़े गए इस सत्तर वर्षीय व्यक्ति की समझाइश शायद चुनावों में फीकी सी लगी हो पर उसकी मनुष्यता में समानता के प्रति निष्ठा के पैरोकार जब तक हैं, तब तक टेबलायड प्रेस को चैन की वंशी नहीं बजानी चाहिए।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज में पीएचडी के छात्र हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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